Homeविचारराजनैतिक मुद्देक्या अकाल तख्त के आदेश पर CM इस्तीफा दे दें? भगवंत मान विवाद और...

क्या अकाल तख्त के आदेश पर CM इस्तीफा दे दें? भगवंत मान विवाद और टिवाना का ऐतिहासिक सबक: जब जिन्ना के दवाब में झुके ‘मुख्यमंत्री’

अगर नेता ने धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाई है तो अकाल तख्त उसे धार्मिक दंड दे सकती हैं, उसके धार्मिक अधिकार सीमित कर सकती हैं या उसका सामाजिक बहिष्कार कर सकती हैं। लेकिन लोकतांत्रिक पद पर बने रहने या न रहने का अंतिम निर्णय जनता के हाथ में होना चाहिए।

पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान को अकाल तख्त ने ‘गुरु दोखी’ और खालसा पंथ का विरोधी करार दिया है। उनके इस्तीफे की माँग हो रही है, उनके बहिष्कार की बातें हो रही हैं और उन पर राजनीतिक तथा धार्मिक दबाव बनाया जा रहा है। दूसरी तरफ भगवंत मान इन आरोपों को स्वीकार करने से इनकार कर चुके हैं और इस्तीफा देने के संकेत भी नहीं दिए हैं।

भगवंत मान को इस्तीफा देना चाहिए या नहीं, इस सवाल पर बात करने से पहले 1940 के दशक के पंजाब को समझना जरूरी है। क्योंकि वहीं से इस प्रश्न का एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक संदर्भ मिलता है। उस दौर का पंजाब आज के पंजाब से बिल्कुल अलग था। तब लाहौर भी पंजाब का हिस्सा था और रावलपिंडी भी।

1947 से पहले का पंजाब

उस समय पंजाब के मुख्यमंत्री या प्रीमियर मलिक खिज्र हयात टिवाना थे। वे पंजाब की प्रभावशाली यूनियनिस्ट पार्टी के नेता थे और 1942 में पहली बार पंजाब के मुख्यमंत्री बने थे।

साल 1946 में टिवाना दोबारा मुख्यमंत्री बने। उनकी सरकार को पंजाब के दो बड़े राजनीतिक दलों, अकाली दल और कॉन्ग्रेस, दोनों का समर्थन प्राप्त था। यह वह समय था जब देश बेहद उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा था। मुस्लिम लीग अलग पाकिस्तान की माँग कर रही थी, कॉन्ग्रेस देश के विभाजन का विरोध कर रही थी और अंग्रेज अपनी सत्ता बचाने की कोशिश में लगे हुए थे।

मलिक खिज्र हयात टिवाना

1945 में द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त हो चुका था और अंग्रेजों के लिए भारत पर नियंत्रण बनाए रखना कठिन होता जा रहा था। फरवरी 1947 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने घोषणा की कि भारत को स्वतंत्रता दी जाएगी। जून 1947 में अंग्रेजों ने मुस्लिम लीग की पाकिस्तान संबंधी माँग स्वीकार करते हुए भारत के विभाजन की योजना का भी ऐलान कर दिया।

भारत और पाकिस्तान की सीमाएँ तय करने के लिए सर सिरिल रेडक्लिफ को भारत भेजा गया। सीमांकन के दौरान आबादी, धर्म, भाषा और स्थानीय नेतृत्व की इच्छाएँ महत्वपूर्ण कारक बन गईं। मुस्लिम लीग का दावा था कि पंजाब में मुसलमान सबसे बड़ी आबादी हैं, इसलिए पूरा पंजाब पाकिस्तान में शामिल होना चाहिए।

इस माँग के सामने केवल हिंदू नेता ही नहीं खड़े थे। मुस्लिम लीग को सबसे बड़ा विरोध पंजाब के मुख्यमंत्री मलिक खिज्र हयात टिवाना से झेलना पड़ रहा था। टिवाना स्वयं एक प्रभावशाली मुस्लिम नेता थे लेकिन उन्होंने पंजाब के विभाजन का स्पष्ट विरोध किया।

दरअसल, यह विरोध नया नहीं था। 1935 से ही यूनियनिस्ट पार्टी और मुस्लिम लीग के बीच खींचतान चल रही थी। 1937 में सर सिकंदर हयात खान और मोहम्मद अली जिन्ना के बीच एक समझौता भी हुआ था। हालाँकि, उसमें पाकिस्तान का उल्लेख नहीं था लेकिन जिन्ना चाहते थे कि यूनियनिस्ट पार्टी के विधायक मुस्लिम लीग में शामिल हों।

1940 में मुस्लिम लीग ने लाहौर प्रस्ताव पारित किया, जिसे बाद में पाकिस्तान प्रस्ताव कहा गया। इसके बाद मुस्लिम लीग ने यूनियनिस्ट पार्टी पर लगातार दबाव बनाना शुरू किया कि वह भी पाकिस्तान निर्माण का समर्थन करे। चूँकि यूनियनिस्ट पार्टी के अधिकांश बड़े नेता मुसलमान थे और इसलिए उन पर मजहबी आधार पर दबाव डाला जाने लगा।

1944 तक मुस्लिम लीग का प्रभाव काफी बढ़ चुका था। जिन्ना ने एक बैठक में टिवाना पर पाकिस्तान के समर्थन के लिए दबाव बनाया। टिवाना कुछ समय के लिए असमंजस में पड़े लेकिन पंजाब के गवर्नर ने उन्हें अपने रुख पर कायम रहने की सलाह दी और उन्होंने जिन्ना की माँगों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

इसके बाद उनके खिलाफ जिन्ना एंड कंपनी ने व्यापक दुष्प्रचार शुरू कर दिया। उन्हें कौम का गद्दार, काफिर और मुसलमानों का दुश्मन कहा गया। यहाँ तक कि जिन्ना ने भी उन्हें काफिर घोषित कर दिया। विभाजन की घोषणा के बाद यह अभियान और तेज हो गया।

टिवाना लगातार यह कहते रहे कि पंजाब का विभाजन नहीं होना चाहिए। उनका मानना था कि पंजाब में रहने वाले विभिन्न धर्मों के लोगों के बीच एक साझा सांस्कृतिक संबंध है। लेकिन यह रुख उनके लिए राजनीतिक रूप से भारी पड़ गया। उनके खिलाफ सड़कों पर विरोध प्रदर्शन शुरू हुए। उनके प्रतीकात्मक जनाजे निकाले गए। मौलानाओं ने उनके खिलाफ तकरीरें दीं। जहाँ भी वे जाते, उन्हें काफिर और कौम का गद्दार कहा जाता। उनकी गाड़ियों को घेरा जाता और उन पर लगातार सामाजिक तथा धार्मिक दबाव बनाया जाता।

आखिरकार 2 मार्च 1947 को खिज्र हयात टिवाना ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। पूर्व आईएएस अधिकारी आर.के. कौशिक ने ‘द ट्रिब्यून’ में प्रकाशित अपने लेख में उनके इस्तीफे की घटना का उल्लेख किया है।

कौशिक के अनुसार, इस्तीफे वाले दिन टिवाना पंजाब के शिक्षा मंत्री इब्राहिम खान बर्क के घर गए थे। वहाँ मंत्री के 8 वर्षीय बेटे ने उनसे कहा, “क्या आप वही खिज्र टिवाना अंकल हैं जो मुस्लिम मुल्क पाकिस्तान के रास्ते का रोड़ा हैं? मैं तो आपसे हाथ नहीं मिलाऊँगा।” यह सुनकर टिवाना विचलित हो गए। बाद में उन्होंने विकास मंत्री सरदार स्वर्ण सिंह से कहा, “मैं मुस्लिम लीग से लड़ाई जारी रख सकता था लेकिन यदि हमारे बच्चे ही हमें खलनायक समझने लगे हैं, तो बेहतर है कि हम रास्ते से हट जाएँ और जो होना है, होने दें।”

इसके बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया। अगले ही दिन मोहम्मद अली जिन्ना ने घोषणा की कि पाकिस्तान के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा दूर हो चुकी है। इतिहासकारों का मानना है कि इसके बाद पंजाब में हालात तेजी से बिगड़े और व्यापक सांप्रदायिक हिंसा का दौर शुरू हुआ।

भगवंत मान को देना चाहिए इस्तीफा?

आज भगवंत मान को लेकर उठ रहा विवाद कुछ लोगों को उसी इतिहास की याद दिलाता है। अकाल तख्त का कहना है कि उसे भगवंत मान की दो आपत्तिजनक वीडियो मिली हैं और इसी आधार पर उन्हें खालसा पंथ का विरोधी माना गया है। अकाली दल और कॉन्ग्रेस समेत कई राजनीतिक दलों ने भी इस आधार पर उनके इस्तीफे की माँग की है।

हालाँकि भगवंत मान के इस्तीफे का सवाल यदि उठता है, तो उसके कारण लोकतांत्रिक और प्रशासनिक होने चाहिए। यदि कोई मानता है कि उनके शासनकाल में पंजाब पर कर्ज बढ़ा है, अपराध नियंत्रण कमजोर रहा है, जेलों से अपराधी वीडियो कॉल कर रहे हैं, ड्रग्स की समस्या का समाधान नहीं हुआ या चुनावी वादे पूरे नहीं हुए, तो ये राजनीतिक और जनहित से जुड़े मुद्दे हैं। ऐसे कारणों के आधार पर जनता किसी मुख्यमंत्री से जवाब माँग सकती है और इस्तीफे की माँग भी कर सकती है।

लेकिन केवल इसलिए कि किसी धार्मिक संस्था ने आदेश दिया है, किसी चुने हुए मुख्यमंत्री को पद छोड़ देना चाहिए यह लोकतांत्रिक दृष्टि से गंभीर प्रश्न है। अगर नेता ने धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाई है तो अकाल तख्त उसे धार्मिक दंड दे सकती हैं, उसके धार्मिक अधिकार सीमित कर सकती हैं या उसका सामाजिक बहिष्कार कर सकती हैं। लेकिन लोकतांत्रिक पद पर बने रहने या न रहने का अंतिम निर्णय जनता के हाथ में होना चाहिए।

लोकतंत्र में सत्ता का अंतिम स्रोत जनता होती है। यदि जनता को लगता है कि कोई नेता उसके विश्वास के अनुरूप नहीं है, तो चुनाव में उसे सत्ता से बाहर किया जा सकता है। पंजाब में भी अगला चुनाव दूर नहीं है। ऐसे में फैसला जनता के हाथ में होना चाहिए, न कि किसी ऐसी व्यवस्था के हाथ में जो निर्वाचित जनप्रतिनिधियों से ऊपर स्वयं को स्थापित कर दे।

खिज्र हयात टिवाना की कहानी इसी बहस का ऐतिहासिक उदाहरण प्रस्तुत करती है। यह कहानी केवल एक व्यक्ति के इस्तीफे की नहीं बल्कि इस सवाल की है कि क्या लोकतांत्रिक राजनीति को धार्मिक दबाव के अधीन होना चाहिए। इतिहास बताता है कि जब राजनीतिक निर्णय लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बजाय धार्मिक या सामुदायिक दबाव के आधार पर होने लगते हैं, तो उसके दूरगामी परिणाम पूरे समाज को भुगतने पड़ सकते हैं।

Join OpIndia's official WhatsApp channel

  सहयोग करें  

'द वायर' जैसे राष्ट्रवादी विचारधारा के विरोधी वेबसाइट्स को कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

अर्पित त्रिपाठी
अर्पित त्रिपाठीhttps://hindi.opindia.com/
अवध से बाहर निकला यात्री...

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

दलित-जाट-तमिल कोई नहीं है हिंदू… मौलाना सज्जाद नोमानी खुले में कर रहा भारतीयों को तोड़ने का प्रयास: सनातनियों से करता है घृणा, तालिबानियों को...

वायरल वीडियो में मौलाना सज्जाद नोमानी ने हिंदुओं को बहुसंख्यक मानने से इनकार किया। पुराने तालिबान समर्थन और विवादित बयानों की चर्चा भी।

‘हर हिंदू घर में है संभावित हत्यारा-बलात्कारी’: वामपंथी अपूर्वानंद ने हिंदुओं के खिलाफ फिर उगला जहर, मुस्लिमों को बताया पीड़ित

यूट्यूब चैनल 'सत्य हिंदी' पर वामपंथी अपूर्वानंद ने फिर हिंदुओं के खिलाफ जहर उगला। कहा कि हर हिंदू घर में संभावित हत्यारा-बलात्कारी छिपा हुआ।
- विज्ञापन -