ताजमहल के ‘तेजोमहालय’ शिव मंदिर होने के दावे को लेकर कानूनी लड़ाई अब देश की अदालत में पहुँच गई है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आगरा कोर्ट के उस फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को नोटिस जारी किया है, जिसमें ताजमहल के वैज्ञानिक और भौतिक सर्वे की माँग को खारिज कर दिया गया था।
जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल की बेंच ने इस मामले को सुनवाई के योग्य मानते हुए सभी पक्षों से जवाब माँगा है। यह याचिका वरिष्ठ वकील हरि शंकर जैन और सौम्या श्रीवास्तव के जरिए दाखिल की गई है। याचिका में माँग की गई है कि एक ‘एडवोकेट कमिश्नर’ (कोर्ट कमिश्नर) नियुक्त किया जाए।
यह कमिश्नर ताजमहल के परिसर के अंदर जाकर गहन निरीक्षण करे। साथ ही वहाँ की पूरी फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी कराई जाए। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि ताजमहल असल में भगवान शिव का ‘तेजोमहालय’ मंदिर था, जिसे बाद में मकबरे में बदल दिया गया।
वैज्ञानिक सर्वे के बिना इतिहास जानना नामुमकिन
हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने दलील दी कि ताजमहल का सही इतिहास जानना बेहद जरूरी है। इसके लिए वहाँ छिपे हुए धार्मिक प्रतीकों और वास्तुकला के अवशेषों का वैज्ञानिक और भौतिक सर्वे होना चाहिए। इसके बिना सच्चाई सामने आना नामुमकिन है।
अदालत ने इस मामले को बेहद गंभीर माना। कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत इसे न्यायिक जाँच के दायरे में रखने का फैसला किया है। यह कानूनी लड़ाई साल 2015 में आगरा की एक स्थानीय अदालत से शुरू हुई थी। तब याचिकाकर्ताओं ने सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश 26 नियम 9 के तहत कोर्ट कमिश्नर नियुक्त करने की माँग की थी।
लेकिन, 18 जुलाई 2019 को आगरा के सिविल जज (सीनियर डिवीजन) ने तकनीकी आधार पर इस अर्जी को खारिज कर दिया था। इसके बाद याचिकाकर्ता जिला अदालत पहुँचे। वहाँ भी 4 अप्रैल 2026 को एडिशनल जिला जज ने इस पुनर्विचार याचिका को कानूनी रूप से विचारणीय न मानते हुए खारिज कर दिया था।
हाई कोर्ट सख्त, 10 दिन के भीतर तामील होगा नोटिस
निचली अदालतों से झटका लगने के बाद याचिकाकर्ताओं ने आखिरकार इलाहाबाद हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने दलील दी कि निचली अदालतों के फैसले से ऐतिहासिक सच्चाई को सामने लाने वाले जरूरी सबूतों को जुटाने का रास्ता बंद हो गया है। हाई कोर्ट ने अब इस मामले में तेजी दिखाते हुए आदेश दिया है कि सभी विपक्षी दलों (केंद्र सरकार और ASI) को 10 दिनों के भीतर नोटिस तामील कराया जाए।
मामले की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने सरकार और ASI का पक्ष रख रहे एडिशनल सॉलिसिटर जनरल और वकील मनोज कुमार सिंह की मौजूदगी में निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने सभी प्रतिवादियों को अंतरिम अनुमति देते हुए साफ कहा है कि वे अगली सुनवाई से पहले अपना जवाबी हलफनामा (Counter-Affidavit) कोर्ट में दाखिल करें।

