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इंडोनेशिया के प्रम्बानन मंदिर के संरक्षण में मदद करेगी भारत सरकार, कई देशों के हिंदू मंदिरों को देती रही है मदद: समझिए इन सभी में PM मोदी की भूमिका कितनी अहम

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया यात्रा ने एक बार फिर दुनिया के सामने भारत की सांस्कृतिक कूटनीति को रेखांकित किया है। प्रम्बानन मंदिर से लेकर अंकोरवाट, माई सन, वाट फाउ, रमना काली और तिरुकेतीश्वरम जैसे ऐतिहासिक मंदिरों के संरक्षण में भारत महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

भारतीय संस्कृति और सभ्यता की जड़ें केवल भारतीय उपमहाद्वीप तक ही सीमित नहीं रही हैं, बल्कि सदियों से इसका प्रसार सुदूर पूर्व से लेकर खाड़ी देशों तक रहा है। समय के थपेड़ों और ऐतिहासिक उथल-पुथल के कारण इन देशों में मौजूद कई प्राचीन भारतीय सांस्कृतिक धरोहरें जर्जर हो गईं या नष्ट कर दी गईं।

आधुनिक युग में भारत सरकार ने अपनी विदेश नीति और सांस्कृतिक कूटनीति के एक प्रमुख हिस्से के रूप में इन वैश्विक धरोहरों के संरक्षण और जीर्णोद्धार का बीड़ा उठाया है। इस अभियान का एक बेहद जीवंत और ऐतिहासिक दृश्य प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इंडोनेशिया दौरे के दौरान देखने को मिला।

अपनी इंडोनेशिया यात्रा के समय प्रधानमंत्री ने वहाँ के सबसे बड़े और ऐतिहासिक हिंदू मंदिर परिसर ‘प्रम्बानन’ (Prambanan) का दौरा करेंगे। प्रम्बानन मंदिर न केवल इंडोनेशिया की स्थापत्य कला का एक अद्भुत उदाहरण है, बल्कि यह दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय संस्कृति, रामायण और महाभारत के गहरे ऐतिहासिक प्रभावों को भी प्रदर्शित करता है।

प्रधानमंत्री की इस यात्रा ने दुनिया को यह संदेश दिया कि भारत अपनी सीमाओं से परे बिखरी हुई इस साझी सांस्कृतिक विरासत को न केवल सम्मान देता है, बल्कि इसके संरक्षण के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। इंडोनेशिया के बाली, सुमात्रा और जकार्ता जैसे क्षेत्रों में आज भी भारतीय संस्कृति की गहरी छाप दिखाई देती है।

इसी प्रतिबद्धता के तहत भारत सरकार ने कंबोडिया, वियतनाम, लाओस, बांग्लादेश, श्रीलंका और बहरीन जैसे कई देशों में स्थित ऐतिहासिक मंदिरों के जीर्णोद्धार और पुनर्निर्माण के लिए वित्तीय एवं तकनीकी सहायता प्रदान की है, जिससे इन देशों के साथ भारत के संबंध और अधिक प्रगाढ़ हुए हैं।

इंडोनेशिया में 1100 साल पुरानी हिंदू विरासत को मिलेगा नया संबल: जानें प्रम्बानन मंदिर का इतिहास

प्रम्बानन मंदिर का निर्माण 9वीं शताब्दी के मध्य, लगभग 850 ईस्वी में संजय राजवंश के राजा राकाई पिकातन के शासनकाल में कराया गया था। यह इंडोनेशिया का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर परिसर और दक्षिण-पूर्व एशिया के सबसे विशाल हिंदू धार्मिक स्थलों में शामिल है।

प्रम्बानन मंदिर (फोटो साभार: worldhistory)

अपने मूल स्वरूप में इस परिसर में लगभग 240 छोटे-बड़े मंदिर थे, जिनमें ब्रह्मा, विष्णु और भगवान शिव को समर्पित त्रिमूर्ति मंदिर सबसे प्रमुख हैं। इनमें भगवान शिव का केंद्रीय मंदिर लगभग 47 मीटर ऊँचा है, जिसे पूरे परिसर का मुख्य आकर्षण माना जाता है।

इस मंदिर में भगवान शिव के साथ माता पार्वती, भगवान गणेश और महर्षि अगस्त्य की प्राचीन प्रतिमाएँ भी स्थापित हैं। प्रम्बानन की दीवारों पर पत्थरों पर उकेरी गई रामायण और भागवत पुराण की कथाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि भारतीय महाकाव्यों का प्रभाव सदियों पहले इंडोनेशिया के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में गहराई तक पहुँच चुका था।

मंदिर परिसर में स्थित खुले मंच पर आज भी प्रसिद्ध ‘प्रम्बनन रामायण बैले’ का मंचन होता है, जिसमें रामायण की कथा को नृत्य और संगीत के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। यह आयोजन दुनिया भर के पर्यटकों को आकर्षित करता है। वर्ष 1991 में यूनेस्को ने पराम्बनन मंदिर परिसर को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया था।

हिंदू-बौद्ध साम्राज्यों की विरासत आज भी जीवंत

लगभग 27 करोड़ की आबादी वाले इंडोनेशिया में करीब 24 करोड़ लोग इस्लाम धर्म का पालन करते हैं, लेकिन इस्लाम के आगमन से पहले यहाँ कई शताब्दियों तक शक्तिशाली हिंदू और बौद्ध राजवंशों का शासन रहा। पहली शताब्दी से लेकर 15वीं शताब्दी तक कुताई, तारामुनगर, श्रीविजय, मताराम, कंदिरी, सिंघासारी और महान मजापाहित जैसे साम्राज्यों ने इस क्षेत्र पर शासन किया।

इन राजवंशों ने भव्य मंदिरों, स्तूपों और सांस्कृतिक स्मारकों का निर्माण कराया, जिनके अवशेष आज भी जावा, सुमात्रा, बोर्नियो और बाली जैसे द्वीपों पर सुरक्षित हैं। इंडोनेशिया में इन प्राचीन मंदिरों को ‘चंडी’ कहा जाता है। बाली द्वीप को आज भी ‘देवताओं की भूमि’ के रूप में जाना जाता है।

यहाँ स्थित बेसकिह मंदिर परिसर, जिसे ‘मदर टेंपल’ भी कहा जाता है, इंडोनेशिया का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर समूह है। माउंट अगंग ज्वालामुखी की ढलानों पर स्थित इस परिसर में 80 से अधिक मंदिर हैं, जिनका मुख्य केंद्र पुरा पेनाटारन अगंग है। परंपराओं के अनुसार इसकी स्थापना 8वीं शताब्दी में ऋषि मार्कंडेय ने की थी।

वर्ष 1963 में माउंट अगंग में हुए भीषण ज्वालामुखी विस्फोट के दौरान भी मंदिर परिसर सुरक्षित बचा रहा, जिसे स्थानीय लोग दैवीय चमत्कार मानते हैं।

दियांग से सिंघासारी तक बिखरी है भारतीय संस्कृति की छाप, संरक्षण में भारत निभा रहा अहम भूमिका

इंडोनेशिया के जावा द्वीप पर स्थित दियांग पठार, जिसका अर्थ ‘देवताओं का निवास’ माना जाता है, देश के सबसे प्राचीन हिंदू मंदिरों का केंद्र है। यहाँ 7वीं और 8वीं शताब्दी के दौरान मताराम राजवंश ने मंदिरों का निर्माण कराया, जो पराम्बनन से भी पुराने माने जाते हैं।

वर्तमान में यहाँ आठ प्रमुख मंदिर सुरक्षित हैं, जिनके नाम महाभारत के पात्रों- अर्जुन, भीम, घटोत्कच और द्रौपदी पर रखे गए हैं। लावु पर्वत की ढलानों पर स्थित चंडी सुकुह मंदिर अपनी पिरामिड जैसी संरचना के कारण विशेष पहचान रखता है, जबकि चंडी चेतो पहाड़ी सीढ़ियों पर निर्मित एक अनूठा मंदिर है।

चंडी कंदल मंदिर में राजा अनुसापति की स्मृति से जुड़े अवशेष हैं और इसकी शिल्पकला में गरुड़ पुराण की वह प्रसिद्ध कथा उकेरी गई है, जिसमें गरुड़ अपनी माता विनिता को दासता से मुक्त कराने के लिए अमृत कलश लेकर आते हैं। वहीं चंडी सिंघासारी मंदिर भगवान शिव के भैरव स्वरूप को समर्पित है, जहाँ कभी विशाल शिवलिंग स्थापित था।

इस परिसर में देवी सरस्वती और प्रज्ञापारमिता की प्राचीन प्रतिमाएँ भी मिली हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस यात्रा के दौरान पराम्बनन मंदिर परिसर के क्षतिग्रस्त हिस्सों के संरक्षण और पुनर्स्थापन को लेकर भारत और इंडोनेशिया के बीच सहयोग को नई दिशा मिलने की संभावना है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) पहले से ही इस कार्य में भागीदारी निभा रहा है।

कंबोडिया में अंकोरवाट और ता प्रोहम मंदिरों का जीर्णोद्धार

दक्षिण-पूर्व एशिया में जब भी भारतीय सांस्कृतिक प्रभाव की बात होती है, तो कंबोडिया का नाम सबसे ऊपर आता है क्योंकि यहाँ दुनिया का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर परिसर ‘अंकोरवाट’ स्थित है। बारहवीं शताब्दी में राजा सूर्यवर्मन द्वितीय द्वारा निर्मित भगवान विष्णु का यह ऐतिहासिक मंदिर समय के साथ बेहद जर्जर स्थिति में पहुँच गया था।

अंकोरवाट मंदिर (फोटो साभार: Facebook @ Many Wonders)

भारत सरकार ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के माध्यम से अंकोरवाट मंदिर के संरक्षण और मरम्मत का विशाल कार्य अपने हाथों में लिया था। सन 1986 से 1993 के बीच भारतीय विशेषज्ञों की टीम ने कंबोडिया के कठिन जंगलों और सीमित संसाधनों के बीच इस मंदिर के ढाँचे को गिरने से बचाया और इसके मूल स्वरूप को सुरक्षित रखने में सफलता प्राप्त की।

अंकोरवाट की इस ऐतिहासिक सफलता के बाद, भारत सरकार ने कंबोडिया में ही स्थित एक और अत्यंत महत्वपूर्ण और जटिल मंदिर परिसर ‘ता प्रोहम’ (Ta Prohm) के संरक्षण का काम शुरू किया। ता प्रोहम मंदिर अपनी अनूठी स्थिति के लिए जाना जाता है जहाँ सदियों पुराने विशाल पेड़ों की जड़ें मंदिर के पत्थरों और दीवारों के साथ पूरी तरह से गुंथ चुकी हैं।

यहाँ चुनौती यह थी कि पेड़ों को काटे बिना और मंदिर के मूल ताने-बाने को नुकसान पहुँचाए बिना इसका संरक्षण किया जाए। भारत के ASI ने इस चुनौती को स्वीकार किया और कंबोडियाई अधिकारियों के साथ मिलकर आधुनिक इंजीनियरिंग और पारंपरिक संरक्षण तकनीकों के मिश्रण से ता प्रोहम मंदिर के जीर्णोद्धार के कई चरणों को सफलतापूर्वक पूरा किया, जिससे यह वैश्विक पर्यटकों के लिए आकर्षण का एक सुरक्षित केंद्र बन सका।

वियतनाम में ‘माई सन’ शिव मंदिर समूह का पुनरुद्धार

कंबोडिया के साथ-साथ वियतनाम में भी भारतीय संस्कृति के ऐतिहासिक पदचिह्न बेहद स्पष्ट हैं। वियतनाम के क्वांग नाम प्रांत में स्थित ‘माई सन’ (My Son) नाम की जगह पर चौथी से तेरहवीं शताब्दी के बीच चाम राजवंश द्वारा निर्मित एक हजार साल से भी अधिक पुराने शिव मंदिरों का एक विशाल समूह मौजूद है।

माई सन मंदिर (फोटो साभार: Vietnamcoracle)

यह यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल है, जो वियतनाम युद्ध के दौरान हुए बमवर्षक हमलों और लंबे समय की उपेक्षा के कारण बेहद खराब और खंडित अवस्था में पहुँच गया था। भारत सरकार और वियतनाम सरकार के बीच हुए द्विपक्षीय समझौतों के तहत भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इस ऐतिहासिक स्थल के संरक्षण और बहाली का काम अपने हाथों में लिया।

ASI ने वियतनाम के घने जंगलों के बीच स्थित इन ईंटों और पत्थरों से बने मंदिरों का गहन वैज्ञानिक अध्ययन किया और उनकी मूल वास्तुकला को बनाए रखते हुए उनका संरक्षण किया। संरक्षण कार्य के दौरान भारतीय विशेषज्ञों को कई महत्वपूर्ण प्राचीन मूर्तियाँ, शिलालेख और एक विशाल शिवलिंग भी प्राप्त हुआ, जिसने इस स्थल के ऐतिहासिक महत्व को और बढ़ा दिया।

लाओस के प्राचीन ‘वाट फाउ’ मंदिर का संरक्षण

दक्षिण-पूर्व एशिया के ही एक अन्य महत्वपूर्ण देश लाओस में भी भारत अपनी सांस्कृतिक कूटनीति के तहत ऐतिहासिक धरोहरों को सहेजने का काम कर रहा है। लाओस में स्थित ‘वाट फाउ’ (Vat Phou) एक अत्यंत प्राचीन और पवित्र मंदिर परिसर है जो मुख्य रूप से भगवान शिव को समर्पित है।

पहाड़ी की तलहटी में स्थित यह मंदिर परिसर खमेर साम्राज्य की वास्तुकला और संस्कृति का एक अनूठा उदाहरण है और इसे भी यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया है। समय के साथ प्रकृति की मार और रखरखाव के अभाव में इस मंदिर के कई हिस्से ढहने की कगार पर पहुँच गए थे।

भारत सरकार ने लाओस सरकार के अनुरोध पर इस मंदिर के जीर्णोद्धार की जिम्मेदारी संभाली और ASI के विशेषज्ञों को इस कार्य में लगाया। भारतीय विशेषज्ञों ने वाट फाउ मंदिर के विभिन्न हिस्सों, जैसे कि मुख्य गर्भगृह, दीर्घाओं और नक्काशीदार स्तंभों को वैज्ञानिक तकनीकों के माध्यम से मजबूती प्रदान की।

पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण यहाँ वर्षा जल के भराव और मिट्टी के खिसकने की गंभीर समस्या थी, जिसका समाधान भारतीय इंजीनियरों ने बेहद कुशलता से निकाला ताकि मंदिर के ढांचे को भविष्य में होने वाले नुकसान से सुरक्षित रखा जा सके। यह परियोजना लाओस के लोगों के लिए उनकी सांस्कृतिक पहचान को वापस पाने जैसा है और इसमें भारत का सहयोग दोनों देशों के बीच के गहरे दोस्ताना और सांस्कृतिक जुड़ाव को रेखांकित करता है।

बांग्लादेश में ऐतिहासिक रमना काली मंदिर का पुनर्निर्माण

अपने सुदूर पड़ोसियों के अलावा भारत ने अपने निकटतम पड़ोसी देशों में भी ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों के पुनरुद्धार में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण बांग्लादेश की राजधानी ढाका में स्थित ऐतिहासिक ‘रमना काली मंदिर’ और श्री आनंदमयी आश्रम है।

यह मंदिर लगभग तीन सौ साल पुराना था और ढाका के सांस्कृतिक जीवन का एक मुख्य केंद्र माना जाता था। परंतु, सन 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान पाकिस्तानी फौज ने ‘ऑपरेशन सर्चलाइट’ के तहत इस ऐतिहासिक मंदिर पर हमला कर इसे पूरी तरह से नष्ट कर दिया था और यहाँ रहने वाले कई पुजारियों व श्रद्धालुओं की बेरहमी से हत्या कर दी थी।

बांग्लादेश की स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक यह स्थल उपेक्षित रहा। भारत सरकार ने इस ऐतिहासिक अन्याय को सुधारने और बांग्लादेश के साथ अपने सांस्कृतिक संबंधों को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से इस मंदिर के पुनर्निर्माण का पूरा खर्च उठाने और वित्तीय मदद देने का फैसला किया।

भारत की आर्थिक और तकनीकी सहायता से रमना काली मंदिर का भव्य पुनर्निर्माण कार्य शुरू किया गया और इसे इसके प्राचीन गौरव के अनुरूप नया स्वरूप दिया गया। इस नवनिर्मित ऐतिहासिक मंदिर का औपचारिक उद्घाटन भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने अपनी बांग्लादेश यात्रा के दौरान किया था।

श्रीलंका के प्राचीन तिरुकेतीश्वरम शिव मंदिर का जीर्णोद्धार

भारत के एक अन्य द्वीपीय पड़ोसी देश श्रीलंका में भी भारतीय संस्कृति और रामायण काल से जुड़े कई महत्वपूर्ण स्थल मौजूद हैं। श्रीलंका के मन्नार जिले में स्थित ‘तिरुकेतीश्वरम शिव मंदिर’ (Thiruketheeswaram Temple) वहाँ के पाँच सबसे पवित्र शिव मंदिरों (पंच ईश्वरम) में से एक माना जाता है।

इस मंदिर का इतिहास बेहद प्राचीन है और इसका संबंध रामायण काल से भी जोड़ा जाता है। श्रीलंका में दशकों तक चले गृहयुद्ध के कारण यह पूरा क्षेत्र भारी अशांति और हिंसा की चपेट में रहा, जिसके परिणामस्वरूप इस पवित्र मंदिर परिसर को भारी नुकसान पहुँचा और श्रद्धालुओं का यहाँ आना-जाना लगभग बंद हो गया।

गृहयुद्ध की समाप्ति के बाद, श्रीलंका सरकार के अनुरोध पर भारत सरकार ने इस प्राचीन और ऐतिहासिक मंदिर के जीर्णोद्धार का पूरा खर्च और जिम्मेदारी उठाने का निर्णय लिया।

भारत सरकार ने इस परियोजना के लिए भारी वित्तीय अनुदान जारी किया और भारतीय विशेषज्ञों की देखरेख में मंदिर के मुख्य गोपुरम, महामंडपम और इसके पवित्र तालाब (केनी) की मरम्मत और सौंदर्यीकरण का कार्य अत्यंत बारीकी से करवाया गया।

भारत के इस सहयोग के कारण यह प्राचीन मंदिर एक बार फिर अपने भव्य रूप में लौट आया, जिससे न केवल श्रीलंका के तमिल और हिंदू समुदाय की धार्मिक भावनाओं को संबल मिला, बल्कि युद्ध की विभीषिका से उबर रहे क्षेत्र में शांति और सांस्कृतिक सद्भाव की एक नई शुरुआत हुई।

बहरीन के ऐतिहासिक श्रीनाथजी मंदिर का भव्य कायाकल्प

सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण का यह भारतीय अभियान केवल दक्षिण या दक्षिण-पूर्व एशिया तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका विस्तार खाड़ी देशों (पश्चिम एशिया) तक हो चुका है। खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के देशों में भारत के प्राचीनतम व्यापारिक संबंधों के गवाह के रूप में बहरीन की राजधानी मनामा में एक ऐतिहासिक मंदिर स्थित है।

मनामा के थाट बाजार में स्थित ‘श्रीनाथजी (श्री कृष्ण) मंदिर’ लगभग दो सौ साल पुराना है, जिसकी स्थापना थट्टा के सिंधी व्यापारी समुदाय द्वारा सन 1817 में की गई थी। यह मंदिर खाड़ी क्षेत्र के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है और यह बहरीन की धार्मिक सहिष्णुता तथा भारत के साथ उसके सदियों पुराने व्यापारिक व मानवीय संबंधों का एक जीवंत प्रतीक है।

इस ऐतिहासिक मंदिर की दो सौवीं वर्षगांठ के अवसर पर भारत सरकार के सहयोग से इसके भव्य पुनर्निर्माण और कायाकल्प के लिए एक विशाल पुनर्विकास परियोजना की शुरुआत की गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं अपनी बहरीन यात्रा के दौरान इस 4.2 मिलियन डॉलर (लगभग 30 करोड़ रुपए से अधिक) की लागत वाली पुनर्विकास परियोजना का औपचारिक शुभारंभ किया था।

इस प्रोजेक्ट के तहत मंदिर परिसर का विस्तार किया जा रहा है, जिसमें पारंपरिक भारतीय वास्तुकला और आधुनिक सुविधाओं का समावेशन किया गया है ताकि वहां आने वाले हजारों श्रद्धालुओं और पर्यटकों को एक भव्य आध्यात्मिक अनुभव मिल सके। बहरीन और भारत के द्विपक्षीय संबंधों में यह मंदिर एक सेतु का कार्य करता है और इसका यह भव्य जीर्णोद्धार इस बात का प्रमाण है कि भारत अपनी वैश्विक विरासत को हर कोने में सहेजने के लिए तत्पर है।

भारत सरकार द्वारा विभिन्न देशों में किए जा रहे मंदिर संरक्षण कार्य

विदेशी धरती पर भारतीय संस्कृति और इतिहास के इन प्रतीकों को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए भारत सरकार का विदेश मंत्रालय (MEA) और ASI मिलकर एक व्यापक और सुव्यवस्थित नीति के तहत काम कर रहे हैं।

भारत सरकार की इस दीर्घकालिक योजना के अंतर्गत दुनिया के विभिन्न देशों में फैली भारतीय मूल की विरासतों की पहचान की जाती है और संबंधित देशों की सरकारों के साथ मिलकर उनके संरक्षण के लिए तकनीकी सहायता, विशेषज्ञता और शत-प्रतिशत वित्तीय अनुदान (Grant-in-aid) प्रदान किया जाता है।

चाहे वह कंबोडिया के जंगलों में स्थित अंकोरवाट और ता प्रोहम के पत्थरों को नई जिंदगी देना हो, वियतनाम के माई सन में खंडित हो चुके चाम काल के शिव मंदिरों को फिर से वैज्ञानिक पद्धति से जोड़ना हो, लाओस के वाट फाउ मंदिर की पहाड़ी वास्तुकला को बचाना हो, या फिर युद्ध और हिंसा के इतिहास से प्रभावित रहे बांग्लादेश के रमना काली मंदिर और श्रीलंका के तिरुकेतीश्वरम मंदिर को उनके मूल स्वरूप में वापस खड़ा करना हो, इन सभी परियोजनाओं का पूरा वित्तीय और तकनीकी भार भारत सरकार स्वयं उठाती आ रही है।

इसके साथ ही बहरीन जैसे खाड़ी देशों में सदियों पुराने मंदिरों के पुनर्विकास में भारत का सहयोग यह दिखाता है कि भारत की सांस्कृतिक कूटनीति का दायरा कितना व्यापक है।

ये सभी प्रयास केवल पत्थरों और इमारतों की मरम्मत मात्र नहीं हैं, बल्कि यह भारत द्वारा अपनी वैश्विक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों को दुनिया भर में सहेजने, उन्हें आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित करने और वैश्विक स्तर पर आपसी सद्भाव, शांति और साझी विरासत के महत्व को स्थापित करने का एक अत्यंत दूरदर्शी प्रयास है।

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सौम्या सिंह
सौम्या सिंह
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