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‘Pok में ट्रेनिंग, घाटी में 1989 के नरसंहार में शामिल’: पूर्व आतंकी फारूक ने खोली अलगाववादी नेताओं और ISI की पोल

आत्मसमर्पण के बाद फारूक 8 साल जेल में रहे और इस दौरान तिहाड़ जेल में आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के संस्थापक मौलाना मसूद अजहर से मिले। जेल से रिहा होने के बाद वह आत्मसमर्पण करने वाले आतंकियों के पुनर्वास के लिए काम करने लगे।

दुनिया जानती है पाकिस्तान (Palistan) और उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई (ISI) आतंकियों को पोसते-पालते हैं और उनका इस्तेमाल अपने स्वार्थ के लिए करते हैं, भले ही पूरी की पूरी पीढ़ी बर्बाद ही क्यों ना हो जाए। कश्मीर में भी आजादी के नाम पर पाकिस्तान ने वहाँ के युवाओं को ऐसे ही बरगलाया। जिन्हें पाकिस्तान की गंदी नियत की जानकारी हो गई, उन्होंने आतंकवाद को छोड़ दिया।

जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी गतिविधियों में शामिल रहे और बाद में इससे तौबा करने वाले श्रीनगर के निवासी मोहम्मद फारूक खान उर्फ सैफुल्लाह फारूक कहते हैं कि पाकिस्तान कश्मीरी युवाओं को आतंकी गतिविधियों की ट्रेनिंग देता है और फिर अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करता है।

दैनिक भास्कर के साथ एक इंटरव्यू में फारूक ने बताया कि जब वह किशोरावस्था में थे, तब कश्मीरी घाटी में इस्लामिक आतंकवाद अपने चरम पर था। वह 1989 का वक्त था। उस समय युवाओं को कश्मीर की आजादी के नाम पर भड़काया जाता और आतंकी संगठनों में भर्ती किया जाता। वह भी अन्य लड़कों की तरह आतंकी गतिविधियों में शामिल हो गए और नियंत्रण रेखा (LOC) के पार पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) में AK-47 सहित अन्य हथियारों को चलाने की ट्रेनिंग ली।

उन्होंने बताया कि साल 1986 में कश्मीर में चुनाव हुआ था और उसमें यूनाइटेज जिहाद काउंसिल का प्रमुख और पाकिस्तान में रह रहा आतंकी सरगना सैयद सलाहुद्दीन भी चुनाव लड़ा था। उस चुनाव में सलाहुद्दीन हार गया और धांधली का आरोप लगाते हुए आतंकवाद का रास्ता अपना लिया। इस दौरान कई कश्मीरी युवा आतंकवाद के रास्ते पर चल पड़े।

फारूक बताते हैं कि पाकिस्तान से ट्रेनिंग लेने के बाद वह कश्मीर आ गए और आतंकी गतिविधियों में शामिल हो गए। इसी दौरान घाटी में एक विश्वविद्यालय के कुलपति मुशीर उल हक की हत्या आतंकियों ने कर दी। उन्होंने अपने साथी आतंकियों से पूछा कि कश्मीर में यह लड़ाई आजादी की है तो निर्दोष लोगों की हत्या क्यों की जा रही है, लेकिन किसी इसका उन्हें संतोषजनक जवाब नहीं मिला। इसके बाद उन्होंने आतंकवाद का रास्ता छोड़ने का निर्णय लिया और साल 1991 में आत्मसमर्पण कर दिया।

फारूक ने बताया कि आत्मसमर्पण के बाद वह 8 साल जेल में रहे और इस दौरान तिहाड़ जेल में आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के संस्थापक मौलाना मसूद अजहर से मिले। जेल से रिहा होने के बाद वह आत्मसमर्पण करने वाले आतंकियों के पुनर्वास के लिए काम करने लगे। इसके लिए उन्होंने एक संस्था भी बनाई, जिसे पुलिस ने भरपूर मदद की। उनका कहना है कि भारत ही उनकी मातृभूमि है।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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