Tuesday, January 26, 2021
20 कुल लेख

प्रो. रसाल सिंह

प्रोफेसर और अध्यक्ष के रूप में हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषा विभाग, जम्मू केंद्रीय विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं। साथ ही, विश्वविद्यालय के अधिष्ठाता, छात्र कल्याण का भी दायित्व निर्वहन कर रहे हैं। इससे पहले दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज में पढ़ाते थे। दो कार्यावधि के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय की अकादमिक परिषद के निर्वाचित सदस्य रहे हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में सामाजिक-राजनीतिक और साहित्यिक विषयों पर नियमित लेखन करते हैं। संपर्क-8800886847

जम्मू-कश्मीर के नव-निर्माण का दस्तावेज है नई अधिवास नीति, आतंकी सोच पर चोट के लिए नियम हो और सरल

हालिया लागू की गई नई अधिवासन नीति से लम्बे समय से वंचित/उपेक्षित बहुत से तबकों को लाभ होगा। इन तबकों में वाल्मीकी समुदाय के लाखों लोग...

भय बिनु होय न प्रीत: ड्रैगन को सामरिक और आर्थिक तरीकों से एक साथ घेरना ही उचित रास्ता

स्वदेशी उत्पादों का अधिकाधिक उपयोग चीन के सामरिक सामर्थ्य को क्रमशः कमजोर करेगा। स्वदेशी, स्वावलंबन और संकल्प आर्थिक वर्चस्व को...

‘राष्ट्रपति जी ने आपातकाल की घोषणा की है, लोगों को डरने की जरूरत नहीं’ – यूँ शुरू हुआ था दमन का दौर

"गरीबी हटाने" वाली इंदिरा ने लोकतंत्र हटा दिया। आपातकाल इंदिरा गाँधी ने अपनी गद्दी बचाने को सत्ता मोह में लगाया l 'इंदिरा इज इंडिया' को...

रोजगार और मजदूरों की भलाई के लिए चीन की ‘स्किल मैपिंग’ नीति पर योगी सरकार, एक साथ होंगे कई सुधार

चीन में स्किल मैपिंग डेटाबेस तैयार करने व विभिन्न औद्योगिक इकाइयों में आवश्यकतानुसार श्रम-शक्ति उपलब्ध कराने की ऐसी ही व्यवस्था है। इससे...

कोरोना आपदा से पैदा हुआ जड़ों की ओर लौटने का अवसर, विकास के वैकल्पिक मॉडल में ग्राम स्वराज पर हो फोकस

कोरोना जैसी आपदा ने गैर बराबरी जैसी असाध्य बीमारी को मिटाने का अवसर दिया है। जरूरी है कि फोकस अब ग्राम स्वराज पर हो।

लॉकडाउन की 3 बड़ी उपलब्धियाँ, आगे की योजनाएँ ताकि बेहतर तरीके से हो सके चुनौती का सामना

3 मई के बाद लॉकडाउन को हटाने के लिए भी दो स्तरों पर काम करने की आवश्यकता है। भारत को भविष्य में ऐसी किसी आपदा से निपटने के लिए...

कोरोना जैसे संकटों को लाइलाज बना सकती है बेहिसाब जनसंख्या

भारत की बेहिसाब जनसंख्या में कोरोना जैसी वैश्विक महामारी अलग तरह की चुनौती पेश करती है। स्वास्थ्य-सुविधाओं और साधनों की भारी कमी के कारण...

‘क्रीमी लेयर’ और सामाजिक न्याय का अपहरण

अगर आरक्षण के प्रावधानों से पिछड़ों-दलितों-वंचितों का सशक्तीकरण होता है, तो उन लाभार्थियों की भावी पीढ़ियों को क्रीमी लेयर में शामिल करके भविष्य में आरक्षण लाभ से वंचित क्यों नहीं किया जाना चाहिए? ऐसा करने से ही आरक्षण जैसे संवैधानिक प्रावधान का लाभ त्वरित गति से नीचे तक पहुँचेगा और आरक्षण के क्षेत्र में भी 'ट्रिकल डाउन' की सैद्धान्तिकी सचमुच फलीभूत होगी।

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