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‘अंबेडकर अंग्रेजों के एजेंट थे’: MP हाई कोर्ट के वकील अनिल मिश्रा की टिप्पणी पर बवाल, राष्ट्रद्रोह समेत कई धाराओं में FIR; खुद गिरफ्तारी देने पहुँचे SP ऑफिस

मध्य प्रदेश के ग्वालियर के अशोकनगर में डॉ भीमराव अंबेडकर के खिलाफ कथित अभद्र टिप्पणी को लेकर विरोध बढ़ गया है। मंगलवार (7 अक्टूबर 2025) को बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और अहिरवार समाज संगठन ने अलग-अलग समय पर कलेक्ट्रेट पहुँचकर अपना विरोध दर्ज कराया और ज्ञापन सौंपे हैं।

दोनों संगठनों ने एडवोकेट अनिल मिश्रा के खिलाफ गंभीर धाराओं में FIR दर्ज कर कठोर कार्रवाई की माँग की। बसपा के ज्ञापन में कहा गया कि अनिल मिश्रा ने ‘आचरण ग्वालियर पर लाइव’ नामक सोशल मीडिया कार्यक्रम में डॉ अंबेडकर के बारे में निंदनीय, अमर्यादित और भड़काऊ टिप्पणी की। बसपा ने इसे संविधान प्रेमियों की आस्था पर आघात और राष्ट्र के खिलाफ साजिश बताया।

पार्टी ने कहा कि डॉ अंबेडकर न केवल भारत रत्न और संविधान निर्माता हैं, बल्कि करोड़ों वंचितों के मसीहा भी हैं। इसलिए उनके खिलाफ की गई टिप्पणी संविधान और लोकतंत्र दोनों का अपमान है। बसपा ने माँग की कि अनिल मिश्रा पर राष्ट्रद्रोह और धार्मिक वैमनस्य फैलाने जैसी धाराओं में मामला दर्ज कर कड़ी कार्रवाई की जाए।

वहीं, अहिरवार समाज संघ ने भी राज्यपाल के नाम ज्ञापन सौंपा। संगठन ने कहा कि डॉ अंबेडकर ने अपना जीवन समता, न्याय और सामाजिक समरसता के लिए समर्पित किया था  और अनिल मिश्रा की टिप्पणी अपमानजनक होने के साथ-साथ समाज में वैमनस्य फैलाने का प्रयास है।

दोनों संगठनों ने प्रशासन से अपील की कि वह संविधान और डॉ अंबेडकर के सम्मान की रक्षा सुनिश्चित करे और ऐसी टिप्पणी करने वालों के खिलाफ तुरंत और सख्त कार्रवाई करे।

क्या है पूरा मामला?

ग्वालियर हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष अनिल मिश्रा पर डॉ भीमराव अंबेडकर के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी और फोटो शेयर करने का आरोप है। दरअसल रविवार (5 अक्टूबर 2025) की सुबह क्राइम ब्रांच की सोशल मीडिया मॉनिटरिंग टीम को एक व्हाट्सएप ग्रुप में डॉ अंबेडकर से जुड़ी विवादित वीडियो और फोटो मिली।

जाँच में पता चला कि यह पोस्ट अनिल मिश्रा के मोबाइल नंबर से अपलोड की गई थी। वीडियो में अंबेडकर के प्रति अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया गया था और उनके फोटो में छेड़छाड़ की गई थी। पोस्ट में उन्होंने डॉ भीमराव अंबेडकर पर तीखा हमला किया और लिखा, “अंबेडकर अंग्रेजों के एजेंट थे उनका बनाया संविधान देश के लिए घातक है, इसे जलाना चाहिए।” यह पोस्ट कुछ ही घंटों में वायरल हो गई।

पहले भी मिश्रा कई बार विवादित बयान दे चुके हैं, लेकिन इस बार मामला संविधान निर्माता पर था, इसलिए मामला गंभीर हो गया। भीम आर्मी और अन्य दलित संगठनों ने चेतावनी दी कि अगर पुलिस ने कार्रवाई नहीं की, तो वे सड़कों पर उतरेंगे। BSP और अहिरवार समाज संगठन ने कलेक्टर को ज्ञापन देकर मिश्रा के खिलाफ सख्त कार्रवाई की माँग की।

दर्ज हुई FIR और एडवोकेट मिश्रा ने दी सफाई

6 अक्टूबर 2025 की शाम ग्वालियर क्राइम ब्रांच ने कई शिकायतों के आधार पर मिश्रा के खिलाफ FIR दर्ज की। उन पर IPC की धारा 153A (समुदायों में नफरत फैलाना), 295A (धार्मिक भावनाएँ आहत करना), 505(2) (शांति भंग करने वाले बयान) और IT एक्ट की धारा 66A के तहत केस दर्ज किया गया।

FIR में कहा गया कि मिश्रा की पोस्ट अंबेडकर की छवि खराब करने और समाज में तनाव फैलाने वाली है। पुलिस ने उन्हें नोटिस जारी कर अपना पक्ष बताने को कहा। लेकिन मिश्रा ने खुद ही सामने आकर बयान दिया कि वे बेगुनाह हैं। उन्होंने कहा, “मैंने कोई गलत बात नहीं कही, मैं सिर्फ इतिहास की सच्चाई बता रहा था।” उन्होंने सवाल उठाया, “हिंदू देवी-देवताओं पर टिप्पणियाँ करने वालों पर पुलिस चुप क्यों है?”

7 अक्टूबर 2025 की सुबह असली ड्रामा शुरू हुआ। अनिल मिश्रा अपने समर्थक वकीलों और ‘रक्षक मोर्चा’ के सदस्यों के साथ ग्वालियर SP ऑफिस पहुँचे। हाथों में तख्तियाँ लेकर नारे लगाए, “मुझे गिरफ्तार करो, मैं खुद आ गया हूँ।” मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा, “मैं अंबेडकर के विरोध में रहूँगा, ये विदेशी जातंकवादी नहीं सुधरेंगे।”

SP ऑफिस में हंगामा मच गया। समर्थक नारे लगाने लगे ‘अनिल भाई को छोड़ो, नहीं तो हाईकोर्ट बंद’ लेकिन SP प्रतीक ठाकुर ने साफ कहा कि अभी जाँच चल रही है और गिरफ्तारी का समय नहीं आया। उन्होंने मिश्रा को फिर से नोटिस थमाया और पूछताछ के लिए थाने बुलाया। मिश्रा अपने समर्थकों के साथ नारे लगाते हुए लौटे, “अगर जेल जाना है तो जेल जाएँगे।”

परशुराम सेना ने दी विरोधियों को चुनौती

एक तरफ जहाँ भीम आर्मी, आजाद समाज पार्टी और कई एससी, एसटी, ओबीसी संगठनों ने मिश्रा के बयान का विरोध किया है। वहीं इसी बीच, भिंड जिले की परशुराम सेना ने अनिल मिश्रा के समर्थन में खुलकर मैदान में उतरने की घोषणा की है।

सेना के जिला अध्यक्ष देवेश शर्मा ने कहा, “जो लोग जूते की माला पहनाने जैसी बातें कर रहे हैं, उनमें दम है तो 15 अक्टूबर 2025 को ग्वालियर आकर दिखाएँ।” उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि परशुराम सेना वहाँ बड़ी संख्या में मौजूद रहेगी और किसी भी तरह की बदसलूकी का जवाब दिया जाएगा।

शर्मा ने कहा कि सवर्ण समाज शांत है, लेकिन अगर मर्यादा लांघी गई तो जवाब देना भी जानता है। विवाद बढ़ने के बाद प्रशासन सतर्क हो गया है। पुलिस ने सोशल मीडिया पर निगरानी बढ़ा दी है और दोनों पक्षों से शांति बनाए रखने की अपील की है।

पूरी तरह भूमिगत, ₹9785 करोड़ की लागत: मुंबई मेट्रो की जिस लाइन को डिरेल करना चाहती थी महाराष्ट्र की MVA सरकार, जानिए उससे कैसे जीवन होगा सुगम

दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले देश और देश के सबसे अधिक आबादी वाले शहरों में एक मुंबई, इनदिनों पर्यावरण और यातायात की गंभीर समस्याओं से जुझ हो रहा है। इसको देखते हुए मुंबई मेट्रो लाइन 3 की शुरुआत हो रही है। इस लाइन को एक्वा लाइन भी कहा जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 8 अक्टूबर को इसका उद्घाटन करने वाले हैं। यह परिवहन सिस्टम को दुरुस्त करने में अहम भूमिका अदा कर सकता है।

आरे और बीकेसी को जोड़ने वाली एक्वा लाइन के प्रारंभिक चरण का उद्घाटन अक्टूबर 2024 में किया गया था। इसके बाद, मई 2025 में इसे आचार्य अत्रे चौक तक विस्तारित किया गया। अब साइंस म्यूजियम स्टेशन से कफ परेड स्टेशन तक ये चलेगा। इसमें 11 प्रमुख भूमिगत स्टेशन शामिल हैं। यात्रियों को कम से कम आधी दूरी तय करने की सुविधा देने के लिए पिछले कुछ वर्षों में इस लाइन को धीरे-धीरे विस्तारित किया गया है।

मुंबई सेंट्रल, ग्रांट रोड, गिरगाँव, कालबादेवी, सीएसएमटी, हुतात्मा चौक, चर्चगेट, विधान भवन, कफ परेड और साइंस सेंटर, मुंबई मेट्रो-3 के तीसरे और अंतिम खंड में आते हैं। यह मेट्रो कॉरिडोर उत्तर में आरे से दक्षिण में कफ परेड तक 33.5 किलोमीटर लंबा है और इसमें 27 स्टेशन हैं। इसका निर्माण मुंबई मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (एमएमआरसीएल) ने किया है। आरे डिपो इस लाइन का एकमात्र हिस्सा है जो भूमिगत नहीं है।

9,785 करोड़ रुपये की लागत वाले इस चरण के साथ मेट्रो 3 कॉरिडोर का निर्माण पूरा हो गया। 2011 में इसकी योजना बनाई गई थी। इस पर काम जनवरी 2017 में देवेंद्र फडणवीस सरकार ने शुरू किया। सरकार ने इस दौरान 23,136 करोड़ रुपए का प्रारंभिक अनुमान बढ़कर 37,276 करोड़ रुपए हो गया। जापान अंतर्राष्ट्रीय सहयोग एजेंसी (JICA) ने 60% खर्च का वहन किया है, जबकि बाकि 40 फीसदी राशि केंद्र और राज्य सरकारों ने 50:50 के अनुपात में दिया है।

एक्वा लाइन के निर्माण के दौरान इंजीनियरों को दक्षिण मुंबई में ऐतिहासिक इमारतों और मुश्किल जमीन से निपटना पड़ा। उन्होंने कालबा देवी, गिरगाँव और फोर्ट जैसी जगहों पर 100 साल पुरानी इमारतों को बचाने के लिए नियंत्रित माइक्रोब्लास्टिंग और कीहोल टनलिंग जैसी तकनीक का इस्तेमाल किया। इस दौरान किसी भी निवासी को स्थायी रूप से बेदखल नहीं किया गया, बल्कि 730 से अधिक परिवारों को MMRCL द्वारा यथास्थान पुनर्वास प्रदान किया गया।

परिवहन में क्रांति है एक्वा लाइन

माना जा रहा है कि एक्वा लाइन हर दिन 17 लाख यात्रियों को ले जाएगी, जिससे मुंबई की परिवहन व्यवस्था पर दबाव काफी कम होगा। पूरी तरह भूमिगत मार्ग होने की वजह से सड़कों और दूसरे विकल्पों पर असर भी नहीं पड़ेगा।

मेट्रो लाइन 3 मुंबई के सबसे महत्वपूर्ण व्यावसायिक, आवासीय और वाणिज्यिक क्षेत्रों से होकर गुजरती है। इसके अलावा यह छत्रपति शिवाजी महाराज अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय टर्मिनलों के साथ-साथ कफ परेड, नरीमन पॉइंट, फोर्ट और बांद्रा कुर्ला कॉम्प्लेक्स (बीकेसी) जैसे वाणिज्यिक और कॉर्पोरेट केंद्रों के साथ-साथ मुंबई सेंट्रल, छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस (सीएसएमटी) और चर्चगेट जैसे क्षेत्रों को जोड़ता है।

(फोटो साभार- टाइम्स ऑफ इंडिया)

एक्वा लाइन के माध्यम से शहर के मध्य क्षेत्रों, जैसे आरे और सीप्ज़ ​​(सांताक्रूज इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात प्रसंस्करण क्षेत्र) जैसे आवासीय और औद्योगिक क्षेत्रों तक पहुँचना आसान होगा। धारावी और शीतलदेवी जैसे घनी आबादी वाले क्षेत्रों को भी बेहतर सार्वजनिक विकल्प मिलेगा। यानी मुंबई के भीड़भाड़ वाले बसों और लोकल ट्रेनों का बोझ थोड़ा कम हो जाएगा।

इस मेट्रो लाइन से आने-जाने का समय काफी कम होने की उम्मीद है। दरअसल बिजी टाइम के दौरान कफ परेड से आरे (जेवीएलआर) तक की यात्रा में केवल 54 मिनट लगेंगे। इससे सड़क पर कारों की संख्या कम होने से यातायात में 35% और ईंधन की खपत में प्रतिदिन करीब 3.54 लाख गैलन की कमी आएगी।

यह मेट्रो लाइन फिलहाल चल रहे मेट्रो लाइनों के साथ मिल कर पूरे शहर में कनेक्टिविटी में सुधार करेगी, जिससे सार्वजनिक परिवहन का एक व्यापक और प्रभावी नेटवर्क तैयार होगा।

यह मरोल नाका पर लाइन 1 (नीली लाइन), आरे जेवीएलआर (जोगेश्वरी-विक्रोली लिंक रोड) पर लाइन 6 (गुलाबी लाइन), सीएसएमटी पर लाइन 7ए (लाल लाइन) और लाइन 8 (गोल्ड लाइन), बीकेसी पर लाइन 2बी (पीली लाइन) के साथ-साथ दादर, महालक्ष्मी, मुंबई सेंट्रल, ग्रांट रोड और चर्चगेट पर पश्चिमी लाइन से जुड़ेगी।

द फ्री प्रेस जर्नल के अनुसार, एमएमआरसीएल के एक अधिकारी ने बताया है कि एक्वा लाइन गति के बारे में नहीं है, बल्कि आवागमन में सुगमता, सुरक्षा और सम्मान के बारे में भी है। एक बार पूरी तरह से चालू हो जाने पर, एक्वा लाइन मुंबई के सार्वजनिक परिवहन को बदल देगी। सड़कों पर भीड़भाड़ कम होगी और मुंबईवासियों के लिए एक सस्ता, सुगम परिवहन का साधन बनकर उभरेगी।

किफायती किराया, आराम पूरा

मुंबई मेट्रो लाइन 3 का किराया भी ज्यादा नहीं है। इसकी दरें 10 रुपए से 60 रुपए तक का है। टैरिफ चार्ट में बताया गया है कि 3 किलोमीटर तक यात्रा करने में 10 रुपए लगेंगे, जबकि 3 से 12 किलोमीटर के बीच की दूरी तय करने के लिए 20 रुपए लगेंगे।

टैक्सियों की तुलना में ये कम खर्चीला है, क्योंकि इतनी दूरी की यात्रा के लिए टैक्सियाँ 700 रुपए वसूलती हैं। नई प्रणाली भीड़भाड से बचाने के साथ-साथ वक्त पर चलने और गंतव्य तक पहुँचने की गारंटी देती है। साथ में एयरकंडीशन फ्री।

मेट्रो लाइन-3 के निर्माण में सामने आई चुनौतियाँ

एमएमआरसी ने मेट्रो लाइन के आसपास के इलाकों के आर्थिक विकास का बीड़ा भी उठाया है। एमएमआरसी ने नई रणनीति तैयार की है। इसके तहत मेट्रो लाइन के पास नरीमन पॉइंट पर 4.16 एकड़ भूमि के लिए भारतीय रिजर्व बैंक को पहले ही 3,472 करोड़ रुपये का भुगतान कर चुका है।

पिछले साल 7 अक्टूबर 2024 को आरे कॉलोनी और बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स (बीकेसी) के बीच 12.69 किलोमीटर लंबे खंड को जनता के लिए खोल दिया गया था। 9 मई को, बीकेसी से वर्ली तक 9.8 किलोमीटर लंबे खंड का उद्घाटन किया गया। वर्ली (आचार्य अत्रे चौक) और कफ परेड के बीच 10 किलोमीटर का खंड अब 8 अक्टूबर 2025 से उपलब्ध है।

इसलिए, 33.5 किलोमीटर लंबे इस कॉरिडोर को पूरा होने में 8 साल और 9 महीने लगे। इस बीच, 15,000 से ज़्यादा मज़दूरों, इंजीनियरों, वास्तुकारों और सुरंग निर्माण विशेषज्ञों ने इसमें योगदान दिया है।

मुंबई की घनी आबादी के चलते यहाँ भूमि अधिग्रहण बेहद चुनौतीपूर्ण रहा। पूरी तरह से भूमिगत डिज़ाइन के कारण, मेट्रो-3 के लिए खुदाई, सुरंग बनाना और दूसरे जमीनी कारणों की वजह से पूरी प्रक्रिया में काफ़ी समय लग गया।

मुंबई में सुरंग निर्माण के दौरान जल-जमाव वाली मिट्टी, बेसाल्ट चट्टानों सहित अलग-अलग तरह की दिक्कतें बड़ी चुनौती बनी।

मुंबई जैसे महानगर के लिए मानसून एक बड़ी समस्या है। क्योंकि बारिश होते ही पूरा शहर पानी में डूब जाता है। इसके अलावा, मुंबई मेट्रो 3 के लिए मार्ग झुग्गी-झोपड़ियों, व्यस्त बाज़ारों और ऐतिहासिक ढाँचों के नीचे से गुजर रहे थे। इसके लिए अधिक ध्यान और समय की आवश्यकता थी। ऐतिहासिक ढाँचों के पास किसी भी भूमिगत निर्माण से ढाँचे को नुकसान पहुँच सकता था। इसलिए अति सतर्कता की जरूरत थी।

मेट्रो लाइन में देरी की वजह राजनीति भी रही

मेट्रो लाइन में देरी की एक वजह राजनीति भी रही। इस महत्वपूर्ण परियोजना के विस्तार को प्रभावित किया और इसकी लागत भी बढ़ा दी। पिछले साल अक्टूबर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस ओर ध्यान दिलाया था।

ठाणे में एक रैली में उन्होंने आरोप लगाया, “मेट्रो लाइन 3 का काम देवेंद्र फडणवीस के मुख्यमंत्री रहते शुरू हुआ था और 60% काम उनके कार्यकाल में पूरा हुआ था। हालाँकि, जब महा विकास अघाड़ी (एमवीए) सत्ता में आई, तो उन्होंने अहंकार के कारण परियोजना को रोक दिया, जिससे लागत में 14,000 करोड़ रुपये की वृद्धि हो गई। यह पैसा किसका है? क्या यह उनका पैसा है? नहीं, यह महाराष्ट्र के करदाताओं की गाढ़ी कमाई है।”

अलग-अलग चैनलों, सोशल मीडिया, एक्टिविटों, अभिनेताओं और गैर-सरकारी संगठनों एनजीओ के माध्यम से पेड़ों के कटने और पर्यावरण को बचाने के नाम पर आरे में मेट्रो शेड के निर्माण को रोकने के लिए ‘आरे बचाओ’ अभियान शुरू किया गया। हालाँकि आम लोग अपने आनेजाने के लिए हर दिन भयानक दिक्कतों का सामना कर रहे थे। शिवसेना उद्धव गुट के नेता आदित्य ठाकरे ने ‘मेट्रो विरोध’ को अपना पसंदीदा अभियान बना लिया और पर्यावरण के नाम पर मेट्रो शेड परियोजना को रोकने की कोशिश की।

महा विकास अघाड़ी ने 2019 में मेट्रो कार शेड को आरे से कांजुरमार्ग ले जाने का फैसला लिया। ठाकरे ने पदभार संभालने के तुरंत बाद घोषणा की, “मैंने आज आरे मेट्रो कार शेड परियोजना का काम रोकने का आदेश दिया है। मेट्रो का काम नहीं रुकेगा, लेकिन अगले फैसले तक आरे का एक पत्ता भी नहीं काटा जाएगा। मैं पहला मुख्यमंत्री हूँ जिसका जन्म मुंबई में हुआ है। मेरे दिमाग में यह चल रहा है कि मैं शहर के लिए क्या कर सकता हूँ।”

हालाँकि, बॉम्बे हाईकोर्ट ने सरकार को फटकार लगाई थी क्योंकि कांजुरमार्ग की भूमि विवादित था। यहाँ जमीन के मालिकाना हक का मामला लंबित था और मामले के सुलझने तक इसका इस्तेमाल कोई नहीं कर सकता था। तब यह खुलासा हुआ था कि सरकार को पता था कि कांजुरमार्ग की संपत्ति पर मुकदमा चल रहा है।

बाद में, महाराष्ट्र के महाधिवक्ता को बॉम्बे उच्च न्यायालय में एक आवेदन प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया जिसमें कहा गया कि सरकार 2022 में मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की पहली कैबिनेट बैठक के दौरान शेड को कांजुरमार्ग से वापस आरे में स्थानांतरित कर देगी।

भारत में जापानी राजदूत सुजुकी सातोशी ने भी 17 फ़रवरी 2021 को मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को लिखे एक पत्र में अनुमानित खर्च और परियोजना में हो रही देरी को लेकर चिंता जताई थी।

जापानी राजदूत ने जोर देकर कहा, “इस परियोजना के वित्तपोषक होने के नाते, जापान सरकार और जेआईसीए इस बात को लेकर बेहद चिंतित हैं कि अगर समय पर ऋण नहीं दिया गया, तो परियोजना में देरी या गतिरोध जैसी गंभीर चुनौतियाँ आ सकती हैं।”

एमवीए के सत्ता से बेदखल होने के बाद भी यह दुष्प्रचार जारी रहा। आदित्य ठाकरे कई विरोध प्रदर्शनों में शामिल हुए और यहाँ तक कि झूठ भी बोला कि मेट्रो नेटवर्क कार शेड के बिना भी चल सकता है। पूर्व मंत्री के अनुसार, कारों को हर तीन से चार महीने में केवल रखरखाव की आवश्यकता होती है, इसलिए यह मुंबई मेट्रो का अनिवार्य हिस्सा नहीं है।

दूष्प्रचार के लिए आदित्य ठाकरे ने बच्चों का इस्तेमाल किया। इसके बाद राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) को हस्तक्षेप करना पड़ा। दिलचस्प बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही इन दावों को खारिज कर दिया था, फिर भी दुष्प्रचार बेरोकटोक जारी रहा।

राजनीतिक और अन्य, कई चुनौतियों और देरी का सामना करने के बावजूद, यह इंजीनियरिंग चमत्कार आखिरकार साकार हो गया है, जिससे न केवल मुंबई के निवासियों को लाभ हुआ है, बल्कि देश की तकनीकी क्षमताओं का लोहा दुनिया ने माना है।

(ये लेख अंग्रेजी में मूल रूप से लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

कफ सिरप में डायथिलीन ग्लाइकॉल 500% अधिक, बच्चों के लिए दवा ही बन गई जहर: तमिलनाडु में तैयार कर MP में की सप्लाई, जानिए सब कुछ

मध्यप्रदेश में कफ सिरप कोल्ड्रिफ पीकर मरने वाले बच्चों की संख्या 19 हो गई है। इस सिरप की जाँच से पता चला है कि ये तमिलनाडु के श्रीसन फार्मास्युटिकल मैन्युफैक्चरर के यहाँ तैयार किया गया है। चेन्नई के बाहरी इलाके में बैंगलुरु हाईवे पर ये फैक्ट्री मौजूद है।

जाँच के दौरान पूछताछ में फार्मास्युटिकल फैक्ट्री के मालिक रंगनाथ ने भी माना है कि उसने नॉन फार्मास्युटिकल ग्रेड के प्रोपलीन ग्लाइकॉल की 50-50 किलो के दो बैग मँगवाए थे। यानी 100 किलो जहरीला केमिकल मँगवाया गया था। हालाँकि दवाओं की एंट्री फैक्ट्री में दर्ज नहीं है। इसका भुगतान कैश के साथ-साथ ऑनलाइन जी-पे से किया गया था। दरअसल कंपनी ने सनराइज बायोटेक कंपनी से घटिया क्वालिटी का प्रोपलीन ग्लाइकॉल खरीदा था। इसका टेस्ट भी नहीं किया गया।

जाँच में ये भी सामने आया है कि सिरप में डाईएथिलीन ग्लाइकॉल और एथिलीन ग्लाइकॉल की मात्रा तय सीमा से 486 गुणा ज्यादा थी। यानी ये सिरप न सिर्फ बच्चे के लिए जानलेवा था, बल्कि बड़े से बड़ा जानवर, जैसे हाथी की भी किडनी खराब कर सकता था।

मार्च 2025 में खरीदा था केमिकल

जाँच में सामने आया कि मार्च 2025 में ये केमिकल कंपनी ने चेन्नई की सनराइज बायोटेक से खरीदा था। लेकिन ये नॉन फार्मास्युटिकल ग्रेड का था। यानी ये कारों के कूलेंट या एंटीफ्रीज में इस्तेमाल किया जाने वाला केमिकल था। इसकी शुद्धता की जाँच नहीं की गई थी। फार्मास्युटिकल ग्रेड केमिकल का उपयोग दवाओं में किया जाता है न की नॉन फार्मास्युटिकल ग्रेड का।

कंपनी ने सबूत छिपाने की कोशिश की

तमिलनाडु ड्रग्स कंट्रोल विभाग ने पाया कि इस घटिया केमिकल से कई दवाएँ तैयार की गई थी। जाँच टीम ने ये भी पाया कि अब प्रोपलीन ग्लाइकॉल का स्टॉक वहाँ मौजूद नहीं था। यानी कंपनी ने इसे छिपाने की कोशिश की। विभाग ने मंगलवार (7 अक्टूबर 2025) को फैक्ट्री के मालिक डॉ. जी रंगनाथन और कंपनी के मुख्य कैमिस्ट अधिकारी के. माहेश्वरी को कारण बताओ नोटिस जारी किया। साथ ही कंपनी की बाहर की दीवार पर दो अलग-अलग कारण बताओ नोटिस चिपकाए गए।

कंपनी पर औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 के गंभीर उल्लंघन का आरोप है। नोटिस में कहा गया है कि दवाओं पर गुणवत्ता नहीं बताया गया है। इसमें मिलावट है। इसमें डायथिलीन ग्लाइकॉल (48.6% w/v) है, जो एक जहरीला पदार्थ है और सेहत के लिए नुकसानदेह है। रंगनाथन और माहेश्वरी दोनों को जवाब देने के लिए पाँच दिन का समय दिया गया है।

नोटिस में फर्म को यह बताने के लिए कहा गया है कि उसके खिलाफ कार्रवाई क्यों न की जाए। फर्म को सारा स्टॉक वापस लेने, वितरण के पूरे रिकॉर्ड जमा करने और मास्टर फॉर्मूला रिकॉर्ड से लेकर प्रोपिलीन ग्लाइकॉल जैसे कच्चे माल के खरीद से उसके इस्तेमाल तक, सभी तरह के दस्तावेज जाँच दल के सामने रखने को कहा गया है।

दवा बनाने वाली फैक्ट्री मानकों के अनुरूप नहीं थी

दवा बनाने वाली कंपनी श्रीसन फार्मास्युटिकल मैन्युफैक्चरर का गेट बंद है। कंपनी के अंदर जाँच में पाया गया है कि फिल्टर्ड हवा की यहाँ व्यवस्था नहीं थी। दवाओं को गंदगी में ही रख दिया जाता था, जिससे इसके खराब होने की आशंका रहती थी। उपकरण टूटे हुए, जंग लगे मिले। बाहर के बगैर ट्रीटेड पानी का इस्तेमाल किया जाता था।

कमरे मे तापमान और नमी की निगरानी की कोई व्यवस्था नहीं, जो दवाओं के निर्माण के लिए अति आवश्यक है। लिक्विड पदार्थ प्लास्टिक के बोतल में रखे गए थे। निर्माण प्रक्रिया खुले में होती थी, जिससे प्रोडक्ट के प्रदूषित होने का खतरा बना रहता था। कंपनी ने नॉन फॉर्मा ग्रेड केमिकल का इस्तेमाल किया था।

फैक्ट्री के दवा बनाने वाली जगह पर क्या-क्या मिला

जाँच टीम ने पाया कि कमरे जल्दी बाजी में खाली किए गए थे। यहाँ से गंध आ रही थी। प्लास्टिक के जार के ढेर थे। कमरे का फर्श काफी दागदार था। खिड़कियाँ कसकर बंद की गई थी। ये खिड़की काफी छोटी थी। सफेद और नीले प्लास्टिक के कंटेनरों के ढेर दीवार से सटे हुए थे।

जमीन पर काली बाल्टियाँ, धातु के फ्रेम और विशाल ड्रमों के बिखरे ढक्कन पड़े थे। राख और मलबे के बीच में प्रोनिक आयरन सिरप के अधजले लेबल और साइप्रोहेप्टाडाइन हाइड्रोक्लोराइड सिरप आईपी की 200 मिलीलीटर की बेकार बोतलें खुले में पड़ी थीं।

नीले रंग के बैरल के लेबल पर लिखा था ‘लिक्विड ग्लूकोज, 300.80 किलोग्राम’। साथ ही लिखा था ‘खुदरा बिक्री के लिए नहीं’, इस पर जून 2025 में निर्मित और जून 2027 में एक्सपायर डेट लिखा था।

आस-पास के लोगों ने क्या कहा

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, कंपनी के नजदीक रहने वाले सरवन ने बताया कि वह अक्सर हरी वर्दी पहने करीब 10 महिलाओं को सुबह 9:30 बजे के आसपास आते देखता था, ये महिलाएँ शाम 5 बजे जाती थी।” महिलाओं ने उसे बताया था कि ये फैक्ट्री दिसंबर में बंद हो जाएगा, क्योंकि इसका लाइसेंस खत्म हो रहा है।” ये फैक्ट्री पिछले 13 सालों से चल रहा था। लेकिन किसी भी आसपास रहने वाले व्यक्ति को आज तक अंदर जाने का मौका नहीं मिला। पास के एक ऑटोमोबाइल शोरूम में काम करने वाले वेंकटेश ने कहा, “सभी कर्मचारी बस से आते थे – इस मोहल्ले से कोई नहीं था।”

इंडियन एक्सप्रेस ने पाया है कि जब तमिलनाडु के औषधि नियंत्रण विभाग के निरीक्षकों की टीम ने भवन संख्या 787, जो इकाई के लिए खाली थी, का दरवाज़ा खटखटाया, तो उन्हें 364 उल्लंघनों की एक सूची मिली।

2009 में बंद कंपनी से जुड़ा था श्रीसन फार्मास्युटिकल लिमिटेड

कंपनी के मालिक रंगनाथन ने 27 अक्टूबर, 2011 को विनिर्माण लाइसेंस प्राप्त किया था। यह 2026 तक वैध था। ये रंगनाथ की पहली फैक्ट्री नहीं थी। रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज (IOC) के दस्तावेजों से पता चलता है कि रंगनाथन श्रीसन फार्मास्युटिकल लिमिटेड के निदेशक थे। इसका गठन 25 दिसंबर 1990 को हुआ था। कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय (एमसीए) के रिकॉर्ड के अनुसार, कंपनी का दर्जा 2009 में रद्द कर दिया गया था, जिसका अर्थ है कि इसने उसी वर्ष किसी समय परिचालन बंद कर दिया था।

आरओसी दस्तावेजों के अनुसार, उस वर्ष फर्म का कारोबार और कुल व्यय दोनों शून्य थे। छिंदवाड़ा के पुलिस अधीक्षक अजय पांडे ने कहा, “जब हमने (श्रीसन फार्मास्युटिकल मैन्युफैक्चरर के) निदेशकों के बारे में पता लगाने की कोशिश की, तो हमने पाया कि वे एक ऐसी कंपनी का भी हिस्सा थे जो 2009 से बंद है। उनसे पूछताछ के बाद हमें और जानकारी मिलेगी।”

जाँच दल को श्रीसन फार्मास्युटिकल मैन्युफैक्चरर में कोल्ड्रिफ सिरप 60 एमएल के 570 बॉटल मिले हैं जो छिंदवाड़ा भेजने के लिए तैयार की गई थी। इसी बैच नंबर के सिरप पीने से मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा, बैतूल, नागपुर और पांढुणों में 19 बच्चों की मौत हुई है।

CJI गवई पर जूता फेंके जाने को लेकर वामपंथी और कॉन्ग्रेसी बहा रहे ‘घड़ियाली आँसू’, जज लोया केस में उन पर नहीं था भरोसा: जानें क्या है पूरा मामला

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) बीआर गवई पर सोमवार (6 अक्टूबर 2025) को एक मामले की सुनवाई के दौरान जूता फेंकने की कोशिश की गई। रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह घटना उस समय हुई जब CJI गवई की अध्यक्षता वाली बेंच में कुछ मामलों की सुनवाई चल रही थी।

इस दौरान 71 वर्षीय अधिवक्ता राकेश किशोर अचानक न्यायाधीशों के मंच के पास पहुँचे, अपना जूता उतारा और उसे CJI की ओर फेंकने का प्रयास किया। हालाँकि, मौके पर मौजूद सुरक्षा कर्मियों ने उन्हें तुरंत रोक लिया और अदालत से बाहर ले गए।

बताया जा रहा है कि इस दौरान अधिवक्ता ने चिल्लाकर कहा, “सनातन का अपमान नहीं सहेंगे।” इसके बाद उन्हें पुलिस के हवाले कर दिया गया। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री ने उन पर कोई मामला दर्ज कराने से इनकार कर दिया जिसके बाद पुलिस ने उन्हें छोड़ दिया।

बाद में बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने अधिवक्ता राकेश किशोर का वकालत लाइसेंस निलंबित कर दिया। घटना के बावजूद सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही प्रभावित नहीं हुई। CJI ने अदालत में मौजूद वकीलों से कहा कि वे सुनवाई जारी रखें।

CJI गवई की ‘हिंदू विरोधी टिप्पणी’ से परेशान था वकील

जूता फेंकने की कोशिश करने वाले वकील राकेश किशोर ने मीडिया से बातचीत में कहा कि वे CJI गवई की ‘हिंदू विरोधी टिप्पणी’ से बेहद परेशान थे। उनका कहना था कि चीफ जस्टिस ने पिछले महीने एक मामले की सुनवाई के दौरान भगवान विष्णु के एक भक्त की आस्था का मजाक उड़ाया था। इसी बात ने उन्हें अंदर तक चोट पहुँचाई।

यह मामला मध्य प्रदेश के खजुराहो स्थित जावरी मंदिर में भगवान विष्णु की मूर्ति की पुनरुद्धार से जुड़ा था। उस याचिका की सुनवाई के दौरान CJI गवई ने याचिकाकर्ता से तंज भरे लहजे में कहा था, “यह तो पब्लिसिटी के लिए दायर याचिका लगती है। आप खुद भगवान से जाकर कहिए कि वे कुछ करें। आप कहते हैं कि आप भगवान विष्णु के कट्टर भक्त हैं, तो जाकर प्रार्थना कीजिए।”

कानूनी तौर पर यह याचिका तकनीकी कारणों से खारिज की जा सकती थी लेकिन CJI गवई की इस व्यंग्यात्मक टिप्पणी को लेकर काफी आलोचना हुई। इसमें आस्था का मजाक उड़ा गया और कई लोगों ने इसे पूरी तरह अनावश्यक और असंवेदनशील बताया।

कॉन्ग्रेस और वामपंथी-लिबरल गैंग ने CJI की जाति को बनाया मुद्दा

हालाँकि, CJI पर हिंदू विरोधी टिप्पणी को लेकर जूता फेंकने का प्रयास किसी भी तरह से सही नहीं ठहराया जा सकता लेकिन कॉन्ग्रेस और वामपंथी-लिबरल समूह ने इस मौके का इस्तेमाल अपने राजनीतिक नैरेटिव को आगे बढ़ाने के लिए किया। उन्होंने पूरे मामले को CJI गवई की जाति से जोड़ दिया।

कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने घटना की निंदा करते हुए कहा कि यह घटना इस बात की याद दिलाती है कि जातिगत पूर्वाग्रह और मनुवादी सोच अब भी समाज में बनी हुई है। वहीं, ब्राह्मण विरोधी रुख के लिए जानी जाने वाली वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह भी इस बहस में शामिल हो गईं और उन्होंने भी इस घटना को CJI गवई की जाति से जोड़ने की कोशिश की। जयसिंह के अनुसार, यह घटना मुख्य न्यायाधीश की जाति के चलते की गई है और संस्थान के भीतर से उन्हें अलग-थलग करने की कोशिश है।

कई लोगों के लिए यह समझना मुश्किल हो सकता है कि CJI की जाति का उस व्यक्ति की हरकत से क्या संबंध है, जिसने हिंदू विरोधी टिप्पणी से आहत होकर जूता फेंकने की कोशिश की थी। लेकिन कॉन्ग्रेस और वामपंथी नैरेटिव में यह पूरी तरह फिट बैठता है। उनके लिए न तो यह किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत प्रतिक्रिया है और न ही कोई वास्तविक जातिगत भेदभाव। उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण हमेशा उनका नैरेटिव ही होता है बाकी सब कुछ उसके बाद आता है।

जज लोया केस में वामपंथी-लिबरल गैंग ने CJI गवई के बयानों को किया खारिज

जब 2014 में सीबीआई जज बीएच लोया की मौत हुई थी तब CJI गवई या उनके बयान का वामपंथी-लिबरल समूह पर कोई असर नहीं पड़ा था। CJI गवई ने 2017 में NDTV से बातचीत के दौरान जज लोया की मौत को लेकर फैलाई जा रही सभी साजिशी बातों को सिरे से खारिज किया था।

उस समय वह बॉम्बे हाईकोर्ट में कार्यरत रहे थे। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि जज लोया की मौत में कोई गड़बड़ी नहीं थी। गवई खुद उस अस्पताल में मौजूद थे जहाँ जज लोया को दिल का दौरा पड़ने के बाद भर्ती कराया गया था।

CJI गवई ने कहा था कि उन्होंने ICU में जज लोया का शव देखा जहाँ डॉक्टर उन्हें बचाने की पूरी कोशिश की थी। उन्होंने यह भी बताया था कि जज लोया के कपड़ों पर कोई खून के निशान नहीं थे और उन्हें किसी तरह की संदिग्ध स्थिति नहीं दिखी।

इसके बावजूद कॉन्ग्रेस और वामपंथी-लिबरल समूहों ने उस समय CJI गवई के बयान को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। उन्होंने जज लोया की मौत को लेकर झूठी कहानियाँ फैलाते हुए बीजेपी को निशाना बनाना जारी रखा। इन अफवाहों और आरोपों के पीछे उनका मकसद सिर्फ यह था कि जज लोया उस समय सोहराबुद्दीन एनकाउंटर केस की सुनवाई कर रहे थे, जिसमें उस वक्त बीजेपी अध्यक्ष और वर्तमान में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह मुख्य आरोपी थे।

इंदिरा जयसिंह और उनके गैंग ने जब न्यायपालिका की छवि खराब करने की कोशिश की

इंदिरा जयसिंह और उनके गैंग ने पहले भी न्यायपालिका की छवि खराब करने की कोशिश की थी। उस समय जस्टिस गवई बॉम्बे हाई कोर्ट में थे और अब वही भारत के चीफ जस्टिस हैं। जयसिंह का सर्वोच्च न्यायालय के प्रति सम्मान का इतिहास अच्छा नहीं रहा ह और अब जूता फेंकने की घटना को न्यायपालिका पर हमला बता रही हैं। लेकिन पहले वे खुद न्यायपालिका को बदनाम करने वाले गिरोह का हिस्सा थीं।

कॉन्ग्रेस से जुड़ी मानी जाने वाली इंदिरा जयसिंह उस लॉबी का हिस्सा थीं जिसने जज लोया की मौत को लेकर झूठ फैलाया। उस लॉबी ने यह आरोप लगाने की कोशिश की थी कि अमित शाह और बीजेपी का इसमें हाथ था। जबकि सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में कहा था कि जज लोया की मौत प्राकृतिक थी और इसमें किसी तरह की साजिश नहीं थी।

इंदिरा जयसिंह के साथ वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे और प्रशांत भूषण भी इस अभियान में शामिल थे। सुप्रीम कोर्ट ने इन तीनों को अदालत की गरिमा को ठेस पहुँचाने और न्याय की प्रक्रिया में रुकावट डालने की कोशिश के लिए फटकार लगाई थी।

उस समय चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस ए.एम. खानविलकर और जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ की पीठ ने कहा था कि इन वरिष्ठ वकीलों की याचिकाएँ न्यायाधीशों की छवि को नुकसान पहुँचाने और पूर्वाग्रह फैलाने की कोशिश हैं, खासकर बॉम्बे हाई कोर्ट के जज बी.आर. गवई के खिलाफ।

विडंबना यह है कि वही इंदिरा जयसिंह जिन्होंने पहले जस्टिस गवई की प्रतिष्ठा पर हमला किया था। वो अब उनकी जाति और न्यायपालिका पर हमले की बात कर रही हैं। जब वे बॉम्बे हाई कोर्ट में थे तब उन पर सवाल उठाना उन्हें सही लगा लेकिन अब जब वे चीफ जस्टिस हैं तो वही बात जातिगत भेदभाव बताई जा रही है।

आज तक भी कुछ लोग जज लोया की मौत को लेकर झूठी कहानियाँ फैलाते रहते हैं। वे लगातार यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि इस मामले में केंद्र सरकार की कोई भूमिका थी और यह साबित करना चाहते हैं कि न्यायपालिका जैसी संस्था भी सरकार के प्रभाव में है। इन साजिशी दावों के लिए कभी कोई सबूत नहीं दिया जाता है। जज लोया से जुड़े वे सभी तथ्य और बयान जो वामपंथी नैरेटिव के खिलाफ जाते हैं। उन्हें जानबूझकर अनदेखा कर दिया जाता है।

उस समय वामपंथी सोच रखने वाले कई विचारकों ने यहाँ तक कहा था कि जज गवई वरिष्ठ न्यायाधीशों को दरकिनार कर चीफ जस्टिस बनेंगे क्योंकि उन्होंने जज लोया की मौत को लेकर किसी गड़बड़ी से इनकार किया था।

विडंबना यह है कि वही जज गवई, जिन्हें पहले ‘सरकारी आदमी’ या ‘सरकार के इशारों पर चलने वाला’ बताया गया था, अब वामपंथी-लिबरल वर्ग के ‘प्रिय’ बन गए हैं। ऐसा लगता है कि भगवान विष्णु से जुड़े मजाक के बाद ये समूह उन्हें अपने नए नैरेटिव में फिट मानने लगे हैं।

जूता फेंकने की घटना पर कॉन्ग्रेसी और वामपंथी-लिबरल समूह की प्रतिक्रिया ने उनकी दोहरी सोच और पाखंड को उजागर कर दिया है। ये लोग किसी सिद्धांत या सच्चाई के लिए नहीं बल्कि सिर्फ अपनी जहरीली और स्वार्थी विचारधारा के लिए खड़े रहते हैं। उनकी राजनीति देश में विभाजन फैलाने पर टिकी हुई है।

इनके लिए न CJI गवई में और न ही पूर्व CJI डी.वाई. चंद्रचूड़ में कोई अंतर है। चंद्रचूड़ जो कभी वामपंथी वर्ग के प्रिय थे राम मंदिर पर फैसला सुनाने के बाद उनके निशाने पर आ गए। इस समूह के लिए हर व्यक्ति तब तक उपयोगी है जब तक वह उनके राजनीतिक हितों की सेवा करता है। जैसे ही कोई उनके एजेंडे से बाहर चला जाता है, वह उनके लिए बेकार हो जाता है।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में अदिति ने लिखी है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़े सकते हैं।)

CJI गवई पर सुप्रीम कोर्ट में जूता फेंकना वामपंथियों को लगा ‘दलित CJI पर जातिवादी हमला’, सनातन धर्म का विरोध कर हिंदुओं को बाँटने का फैला रहे प्रोपेगेंडा

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) बीआर गवई पर एक 71 साल के वकील ने सुप्रीम कोर्ट में सरेआम जूता फेंका और चिल्लाए- “सनातन का अपमान नहीं सहेंगे!”, यह गुस्से से भरा एक भावनात्मक कदम था। यह कदम नासमझी भरा, निंदनीय भी है लेकिन साफ तौर पर आस्था से जुड़ा हुआ है।

मगर कुछ ही मिनटों में भारत के उदारवादी हलकों ने इस घटना को एक अलग नजरिए से देखना शुरू कर दिया। उन्होंने इसे जाति से जोड़ दिया। उनका कहना था कि यह जूता सनातन धर्म की रक्षा में नहीं फेंका गया बल्कि एक ‘दलित CJI पर हमला’ था।

भारत के कुछ वामपंथी-उदारवादी बुद्धिजीवी हर बात को सामाजिक दरार में बदलने की कोशिश करते हैं। आस्था से जुड़ा हर विरोध उनके लिए जाति की लड़ाई बन जाता है। यह एक तरह की उलटी सोच है, जहाँ धर्म की बात भी जातिवाद के चश्मे से देखी जाती है।

विपक्ष के बड़े नेताओं में से एक राहुल गाँधी ने खुद को लंबे समय से जाति के मुद्दों का योद्धा बताया है। वे दलितों, पिछड़ों और जनजातीय समाज के लिए मसीहा बनने की कोशिश करते हैं लेकिन असल में उनकी पहचान को सिर्फ वोटों की गिनती तक सीमित कर देते हैं।

कभी मंदिरों में तयशुदा अंदाज में दर्शन करना, तो कभी पूरे देश में जाति जनगणना की माँग। राहुल की राजनीति सशक्तिकरण से ज्यादा समाज को बाँटने की रणनीति लगती है। इसी तरह कई क्षेत्रीय पार्टियाँ भी जाति के नाम पर समाज में दरारें पैदा करती हैं और अपनी राजनीति को आगे बढ़ाती हैं।

लेकिन इस माले में हकीकत बिल्कुल साफ है। जूता फेंकने वाले वकील ने कहीं भी जाति का जिक्र तक नहीं किया। उन्होंने कोई अपमानजनक शब्द नहीं बोले। उसके मुँह से सिर्फ एक बात निकली- ‘सनातन धर्म का अपमान नहीं सहेंगे।’

यहाँ वकील का गुस्सा खजुराहो में भगवान विष्णु की खंडित मूर्ति की पुनरुद्धार को लेकर सुनवाई में की गई टिप्पणी से जुड़ा था। सुनवाई के दौरान CJI बीआर गवई ने टिप्पणी की, जिसे कई लोगों ने तंज के तौर पर लिया। उन्होंने कहा- ‘जाइए, भगवान से खुद कहिए कुछ करें। आप कहते हैं कि आप कट्टर भक्त हैं तो जाकर प्रार्थना कीजिए।”

किसी आस्थावान हिंदू के लिए ऐसे शब्द आस्था का अपमान लगते हैं, चाहे ये अनजाने में ही क्यों न कहे गए हों। खासकर जब वो देश की सबसे बड़ी न्यायिपालिका से आए हों। वकील की प्रतिक्रिया जरूर हद से ज्यादा थी और स्वीकार नहीं की जा सकती लेकिन वो भावनात्मक थी, जातिवादी नहीं।

फिर भी कुछ ही घंटों में जाति की राजनीति शुरू हो गई। सोशल मीडिया पर एक्टिविस्ट और कुछ ‘धर्मनिरपेक्ष’ पत्रकार चिल्लाने लगे- “दलित CJI पर जातिवादी हमला!” ऐसा लगा जैसे उनके तय ढाँचे में फिट ने बैठने वाली कोई भी हिंदू आस्था की अभिव्यक्ति, उन्हें बर्दाश्त नहीं होती।

जातिवाद के पीछे की राजनीति

इस तरह की घुमावदार बातें करने की वजह साफ है- आस्था हिंदुओं को जोड़ती है, जबकि जाति उन्हें बाँटती है।

साल 2014 के बाद जब नरेंद्र मोदी का उदय हुआ और पुरानी वोट-बैंक की राजनीति हिल गई तब से विपक्ष और उसके समर्थक लगातार हिंदू एकता को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। इसके लिए वे बार-बार जाति के पुराने मुद्दों को हवा देते हैं। हर चुनाव में वही पुरानी रणनीति दोहराई जाती है। आरक्षण खत्म होने की झूठी बातें, ‘ब्राह्मणवादी हिंदुत्व’ का डर फैलाना और अब नया शोर, ‘दलित CJI पर हमला।’

साल 2024 के चुनाव से पहले अमित शाह का एक एडिट किया हुआ वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें झूठा दावा किया गया कि BJP जातिगत आरक्षण खत्म करना चाहती है? ये एक साजिश थी और अब वही सोच फिर से काम पर लग गया है। एक भावनात्मक विरोध को बहाना बनाकर दलित मतदाताओं को भड़काया जा रहा है और हिंदू समाज में दरार डालने की कोशिश हो रही है।

क्योंकि उनके लिए एकजुट हिंदू पहचान राजनीतिक रूप से खतरनाक है, खासकर जब सनातन धर्म से जुड़ी हो।

जब कुछ इस्लामी कट्टरपंथी ‘सर तन से जुदा’ जैसे नारे लगाते हैं, तब न तो वामपंथी सोच वाले लोग कुछ कहते हैं और न ही सुप्रीम कोर्ट इस्लामी विचारधारा पर कोई सवाल करता है। लेकिन जब कोई हिंदू अपनी आस्था की बात करता है तो सारा दोष उसी पर डाल दिया जाता है।

नूपुर शर्मा विवाद के दौरान दोहरापन साफ नजर आया। जब भीड़ खुलेआम सिर काटने की धमकी दे रही थी, पुतले फूँके जा रहे थे और मौत की माँग हो रही थी। तब सुप्रीम कोर्ट की मौखिक टिप्पणी ने चौंका दिया। कोर्ट ने कहा- “देश में जो हो रहा है, उसके लिए अकेली नूपुर शर्मा जिम्मेदार हैं।”

यानि कट्टरपंथी सड़कों पर खून माँग रहे थे लेकिन चर्चा का केंद्र बन गई एक महिला, जिसने उनके ही धर्मग्रंथों से उद्धरण दिया था। और वही वामपंथी-उदारवादी जमात, जो हर हिंदू विरोधी फिल्म पर ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ का रोना रोती है, उस वक्त ‘सर तन से जुदा’ के नारों पर पूरी तरह चुप हो गई।

तब भारत के तथाकथित ‘धर्मनिरपेक्ष जमीर’ वालों में से किसी ने दंगाइयों की निंदा करने की हिम्मत नहीं दिखाई। उल्टा, उन्होंने नूपुर शर्मा को ही दोषी ठहराना आसान और फैशनेबल समझा, जैसे देश को आग लगाने वाली वही थीं। लेकिन आज जब एक भावनात्मक और निंदनीय प्रतिक्रिया सामने आती है तो उसे जातिवादी हमला बताकर नया नैरेटिव खड़ा किया जा रहा है। यही है सोच का असली विरोधाभास।

सामान्य संदिग्ध: इंदिरा जयसिंह से लेकर सबा नकवी तक और अनगिनत ऑनलाइन ट्रोल

अपनी आदत से मजबूर कार्यकर्ता और वकील इंदिरा जयसिंह ने जूता फेंकने वाली घटना को ‘जातिवादी हमला’ घोषिक करने में कोई संकोच नहीं किया।

किस आधार पर? किसी भी नहीं। न कोई जातिसूचक शब्द बोला गया, न कोई अपमानजनक टिप्पणी, न ही कोई जाति का जिक्र। लेकिन सच्चाई से किसी की नैरेटिव क्यों बिगाड़े?

सबा नकवी, वही ‘पत्रकार’ जिन्होंने ज्ञानवापी मस्जिद में मिले शिवलिंग का मजाक उड़ाते हुए उसे परमाणु मॉडल से तुलना करने वाला मीम शेयर किया था। उन्होंने इस बार भी अपनी ‘धर्मनिरपेक्ष बुद्धिमत्ता’ का परिचय देते हुए कहा कि इस घटना के ‘साफतौर पर सामाजिक पहलू’ हैं।

उदारवादी शब्दावली में ‘सामाजिक आयाम’ का मतलब है- हमारे पास साक्ष्य नहीं है लेकिन हम संदर्भ का आविष्कार कर लेंगे।

कॉन्ग्रेस और विपक्षी दलों के मुद्दों को आगे बढ़ाने वाले कई सोशल मीडिया ट्रोल्स ने भी इस मुहिम में शामिल होकर आरोप लगाया कि यह एक दलित CJI के खिलाफ ‘जातिवादी हमला’ है।

पहचान की राजनीति के खतरनाक परिणाम

यहाँ सबसे दुखद बात यह है कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोग आस्था के प्रति संवेदनशीलता कैसे दिखाएँ। इस असली सवाल को पहचान की राजनीति की आँधी में दबा दिया गया है।

इस पर चर्चा करने के बजाए कि क्या CJI गवई की पिछली टिप्पणी उच्च संस्थानों में हिंदू भावनाओं के प्रति बढ़ती असंवेदनशीलता को दर्शाती है। बात को मोड़कर एक और ‘दलित पीड़ित’ की कहानी बना दी गई।

यह सिर्फ बौद्धिक बेईमानी नहीं है, बल्कि समाज के लिए नुकसानदेह भी है। इससे यह संदेश जाता है कि अगर कोई हिंदू अपनी धार्मिक चोट को सामने रखता है तो उसे भी गलत ठहराया जाएगा। जब तक कि वह वामपंथी जातिगत गणित में फिट न बैठे।

आस्था कोई जातिगत विशेषाधिकार नहीं

यह याद दिलाना जरूरी है कि सनातन धर्म किसी एक जाति की जागीर नहीं है। जिस आस्था की बात उस वकील ने की है, वह दलितों, ब्राह्मणों, पिछड़ों और आदिवासियों की समान रूप से है। अयोध्या से लेकर तिरुपति तक देशभर के मंदिरों में दलित श्रद्धालु बड़ी संख्या में जाते हैं। संत रविदास से लेकर चोखामेला तक कई दलित संत हिंदू आध्यात्मिक परंपरा के केंद्र में रहे हैं।

जब कोई कहता है, ‘सनातन का अपमान नहीं सहेंगे’ तो वह किसी जाति की नहीं बल्कि एक सभ्यता की पहचान की बात करता है। उसे जातिवाद में बदल देना सिर्फ आलसी सोच नहीं है बल्कि यह सनातन धर्म की उस आत्मा का अपमान है जो जाति और पंथ से ऊपर है।

जूता विरोध और न्यायिक स्वतंत्रता पर वामपंथियों का दोहरा मापदंड

विडंबना देखिए कि जो वामपंथी इकोसिस्टम आज CJI गवई पर जूता फेंकने को लेकर शोर मचा रही है, वही लोग सालों तक ऐसे ही कृत्यों को ‘विरोध का जायज तरीका’ बताकर सराहते रहे हैं। जब किसी नेता, पत्रकार या सार्वजनिक व्यक्ति पर जूता फेंका गया तो उसे प्रतिरोध का प्रतीक बना दिया गया। मीम बनाए गए, ट्वीट्स में तालियाँ बजीं और जूता फेंकने वालों को ‘फासीवाद के खिलाफ बहादुर लड़ाके’ कहकर महिमामंडित किया गया।

साल 2009 में पत्रकार जरनैल सिंह ने उस वक्त के गृह मंत्री पी चिदंबरम पर प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान जूता फेंका था। यह विरोध था साल 1984 के सिख विरोधी दंगों में आरोपित दो कॉन्ग्रेस नेताओं को CBI द्वारा क्लीन चिट दिए जाने के खिलाफ।

उस समय कई उदारवादी हलकों ने जरनैल सिंह को राजनीतिक अन्याय के खिलाफ साहसी प्रतिरोध का प्रतीक बताया। इसी तरह 2008 में इराकी पत्रकार मुन्तज़र अल-ज़ैदी ने अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज बुश पर जूते फेंके थे। वामपंथी खेमे ने इसे अमेरिका के इराक पर कब्जे के खिलाफ प्रतिरोध की मिसाल बताया।

लेकिन जैसे ही निशाना एक दलित CJI बन गया और विरोध करने वाला व्यक्ति सनातन धर्म की रक्षा में खड़ा था। वामपंथी नैतिकता की दिशा ही बदल गई। वही जूता फेंकने की हरकत, जिसे पहले ‘विरोध का साहसिक तरीका’ कहा गया था, अब ‘दलित गरिमा पर हमला’ बन गई। उनकी यह चुनिंदा नाराजगी साफ दिखाती है कि उनके लिए विरोध की स्वीकार्यता सिद्धांतों से नहीं बल्कि विचारधारा से तय होती है।

यह बात भी गौर करने लायक है कि वामपंथी खेमे ने कभी न्यायपालिका का सम्मान नहीं किया जब उसने उनकी विचारधारा की गूँज नहीं दोहराई। पूर्व CJI डीवाई चंद्रचूड़, जिन्हें कभी ‘प्रगतिशील प्रतीक’ माना जाता था, उन्हीं बुद्धिजीवियों के निशाने पर आ गए जब उन्होंने श्रीनिवासन जैन को दिए इंटरव्यू में वह चर्चित टिप्पणी की- “बाबरी मस्जिद का निर्माण ही अपवित्रता का मूल कार्य था।”

बस यही एक वाक्य काफी था कि जो व्यक्ति कभी उदारवादी ड्रॉइंग रूम्स का चहेता था, वह अचानक तीखी आलोचना का शिकार बन गया। वामपंथी पोर्टलों में एक के बाद एक लेख आए, जिनमें उनकी ‘धर्मनिरपेक्षता’ पर सवाल उठाए गए। कुछ ने तो उनके बयान को ‘खतरनाक’ और ‘पिछड़ापन दर्शाने वाला’ तक कह दिया।

तो जब वही जमात अचानक CJI गवई पर हुए जूता फेंकने की कोशिश पर आँसू बहाने लगती है तो यह न्यायपालिका की गरिमा या संस्थागत सम्मान की चिंता नहीं होती। यह सिर्फ एक राजनीतिक मौका होता है, एक ऐसा मौका जिससे सार्वजनिक बहस में जाति का तड़का लगाया जा सके और ‘दलित पीड़ित’ की पुरानी कहानी को फिर से दोहराया जा सके।

वामपंथी खेमे को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि CJI पर हमला हुआ। उन्हें सिर्फ इस बात की परवाह है कि इस घटना को कैसे हिंदू समाज में दरार डालने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है और जाति की राजनीति को गर्म रखा जा सके।

क्या यह वास्तव में जातिवादी हमला था या हिंदू एकता को कमजोर करने की वामपंथियों की हताशा?

हाँ, उस वकील का व्यवहार बेहद अनुचित था और कानून के अनुसार उसे सजा भी मिलनी चाहिए। लेकिन इस घटना पर जो प्रतिक्रिया सामने आई, वह भारत के बुद्धिजीवी वर्ग की एक और चिंताजनक तस्वीर दिखाती है कि उनका पहला स्वभाव समझने का नहीं बल्कि बाँटने का होता है।

किसी एक भी वामपंथी विचारक ने इस मुद्दे को गहराई से देखने या संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की कोशिश नहीं की। किसी ने एक आसान सवाल पूछना भी जरूरी नहीं समझा- उस वकील ने ऐसा क्यों किया? उसे किस बात ने उकसाया? उस समय उसकी मानसिक स्थिति क्या थी? अगर सिर्फ उसके इरादे को समझने की कोशिश की जाती, तो तस्वीर काफी हद तक साफ हो सकती थी।

आत्मचिंतन कभी वामपंथी खेमे की ताकत नहीं रही। तथ्य जानने की कोशिश करने के बजाए उन्होंने तुरंत हंगामा खड़ा कर दिया और इस घटना को ‘दलित CJI पर जातिवादी हमला’ कहकर प्रचारित करने लगे। न मंशा की परवाह की गई, न हालात की, बस नैरेटिव चलाना था। उनके लिए हिंदू की आस्था कट्टरता है लेकिन मुस्लिम की चोट ‘न्यायसंगत गुस्सा’ बन जाती है।

कोर्ट में एक 71 साल के वकील ने शायद जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया दी हो लेकिन उससे भी बड़ा अपराध है उन बुद्धिजीवियों की बौद्धिक बेईमानी, जिन्होंने इस घटना को हथियार बनाकर एक बार फिर हिंदू समाज को बाँटने की कोशिश की।

(मूलरूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में अमित केलकर ने लिखी है। अंग्रेजी में पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

गुंडे की तरह पीसकर छोड़ देंगे, धांधली हो रही है…. ‘अशांत’ हुआ प्रशांत का दल: ‘प्रत्याशी सुझाव पत्र’ में घपले से भड़के टिकट दावेदारों के समर्थक, जन सुराज में अराजकता भारी

बिहार में चुनावी बिगुल बज चुका है, दोनों प्रमुख गठबंधन अपनी-अपनी तैयारी में जुटे हैं और पूर्व चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर अपनी नए नवेले दल ‘जन सुराज’ के सहारे तीसरा मोर्चा बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इस चुनाव में खुद को दोनों प्रमुख गठबंधनों से अलग दिखाने के नाम पर प्रशांत किशोर ने आक्रामकता का सहारा लिया है।

प्रशांत गुस्से में हर किसी को चुनौती दे रहे हैं। चुनाव लड़ने और चुनावी तैयारियों को लेकर भी आक्रामक हैं। उन्होंने तो यहाँ तक एलान कर दिया था कि वो बिहार में सबसे पहले अपने उम्मीदवारों का एलान कर देंगे। चुनावों की तारीखों का एलान हो गया है लेकिन अब तक प्रशांत के उम्मीदवारों का कहीं अता-पता नहीं है। अलबत्ता उम्मीदवारी को लेकर जन सुराज के नेता-कार्यकर्ता अभी से आपस में भिड़ने लगे हैं।

जन सुराज: लोकतंत्र नहीं भीड़तंत्र

जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर ने जब राजनीतिक दल बनाने का एलान किया था तो उन्होंने दल के भीतर सबसे अधिक लोकतंत्र बनाने जैसे दावे किए थे। इसके अलावा अलग-अलग मंचों पर भी वह ऐसे दावे करते रहे हैं। यहाँ तक कि उम्मीदवारों के चयन में पूरी पारदर्शिता बरतने का भी उन्होंने दावा किया था।

प्रशांत किशोर ने अपने दल को लोकतांत्रिक दिखाने के लिए तय किया कि वह उम्मीदवारों का चयन भी लोगों की मर्जी से ही करेंगे। तय हुआ कि वह इसके लिए लोगों की राय लेंगे। इसके लिए उनके दल द्वारा ‘प्रत्याशी सुझाव प्रपत्र’ छपवाए गए हैं, इन पर उस विधानसभा क्षेत्र के कई संभावित उम्मीदवारों के नाम होते हैं। लोगों को इसमें से अपनी राय रखते हुए अपने द्वारा समर्थित जन सुराज के उम्मीदवार के नाम पर मुहर लगानी होती है।

जन सुराज द्वारा दिए जा रहे प्रत्याशी सुझाव प्रपत्र

यूँ तो इन पर्चे से जन सुराज अपनी पार्टी का लोकतंत्र दिखाना चाहती थी लेकिन इन्हीं की वजह से पार्टी के भीतर मौजूद भीड़ तंत्र का चेहरा सामने आ गया। बिहार में कई जगहों पर इन पर्चों को लेकर संभावित प्रत्याशियों के समर्थक ही आपस में भिड़ गए। कहीं, एक ही संभावित प्रत्याशी के समर्थकों को ज्यादा पर्चे दिए जाने की बात पर हंगामा हुआ तो कहीं अपने लोग बंद कमरे में अपने चहेते प्रत्याशी के नाम पर दनादन पर्चे भरते दिखे।

मुजफ्फरपुर के औराई विधानसभा का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है जिसमें एक कमरे में बैठे 3-4 लोग अपने पसंदीदा प्रत्याशी के नाम के दर्जनों-सैकड़ों फॉर्म भरते नजर आ रहे हैं। इस वीडियो में फॉर्म भर रहे ये लोग खुद इस बात को मान भी रहे हैं कि किसके समर्थन में वो पर्चे भर रहे हैं। यह वीडियो सामने आने के बाद दावा किया जा रहा है कि प्रशांत किशोर की पार्टी के ये प्रपत्र लोगों तक पहुँच ही नहीं रहे हैं। संभावित प्रत्याशी खुद ही अपने नाम पर मुहर लगवा रहे हैं।

इसमें जब वीडियो बना रहे लोगों ने मुहर लगा रहे लोगों से पूछा कि आप खुद ही क्यों छाप रहे हैं तो इस पर उन्होंने कहा कि जनता को पता ही नहीं है इसलिए हम खुद ही यह कर रहे हैं। ये लोग करीब 300 पर्चों पर मुहर लगा रहे थे।

यह कोई अकेली-इकलौती घटना नहीं है, ऐसा कई जगहों पर हुआ है और यह आम होता जा रहा है। दरभंगा में भी ऐसा ही मामला देखने को मिला। वहाँ भी प्रत्याशी चयन की प्रक्रिया के दौरान जमकर बवाल हुआ है। बैलेट पर हस्ताक्षर को लेकर शुरू हुआ विवाद मारपीट में बदल गया और कार्यकर्ता एक-दूसरे पर कुर्सियाँ फेंकने लगे। इस घटना में कई लोग घायल भी हो गए हैं।

बेनीपुर में हंगामा कर रहे लोगों ने यह दावा किया कि उनको पर्चे नहीं दिए गए हैं। लोगों ने धांधली का आरोप भी लगाया है। एक शख्स ने दावा किया कि एक व्यक्ति के समर्थकों को बंडल के बंडल दिए गए हैं। खूब गाली गलौज तक की गई है। एक अन्य शख्स के दावा कि कुछ-कुछ लोगों को 6-6 पर्चे दिए जा रहे हैं जबकि कुछ लोगों को एक भी नहीं मिल रहा है।

बिस्फी में भी जन सुराज के कार्यकर्ता सम्मेलन में वोटिंग को लेकर जमकर हंगामा हुआ है। बिस्फी में नागेंद्र यादव, मोहम्मद कलीन और वशिष्ठ नारायण को पार्टी की तरफ से संभावित प्रत्याशी बनाया गया है। तीनों के नाम के पर्चे जनता को दिए गए लेकिन वे आपस में ही भिड़ गए। संभावित प्रत्याशियों ने एक-दूसरे पर गुंडे तक बुलाने का आरोप लगा दिया है। दावा किया गया है कि यहाँ वशिष्ठ नारायण को पहले ही इस वोटिंग को लेकर बता दिया गया था लेकिन अन्य संभावित प्रत्याशियों को इसकी जानकारी नहीं दी गई थी।

वशिष्ठ नारायण झा का कहना है कि वो वोटिंग के समर्थन में थे और वो ताल ठोककर तैयार हैं। उन्होंने कहा कि अगर कोई गुंडागर्दी करेगा तो उसे गुंडे की तरह पीसकर छोड़ दिया जाएगा। अन्य संभावित उम्मीदवारों ने नाराजगी जताई है।

अब यह आपसी फूट ही जन सुराज की हकीकत बन गया है। यानी बड़े-बड़े दावे करने वाले प्रशांत किशोर अपनी पार्टी के भीतर ही लोकतंत्र नहीं बना पा रहे हैं।

क्यों टिकट बँटवारे में हुई देरी

प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने बिहार में अपनी बड़ी उपस्थिति और ‘नई राजनीति’ का दावा तो बहुत पहले कर दिया था लेकिन जब बात टिकट बाँटने की बारी आई तो पार्टी के अंदर ही कई परतें खुलने लगीं।

हालाँकि, प्रशांत किशोर ने महीनों पहले ऐलान किया था कि जन सुराज अपने दम पर चुनाव लड़ेगी, सबसे पहले टिकटों की घोषणा होगी मगर अब तक टिकटों की घोषणा नहीं हो पाई है। इसके पीछे कई वजहें हैं।

इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि जन सुराज को खुद भी एहसास है कि फिलहाल उसका जनाधार वोट कटवा से ज्यादा नहीं है। पार्टी के भीतर भी कई कार्यकर्ता इस बात को समझते हैं कि अगर टिकट बाँटे गए और चुनाव लड़ा गया, तो अधिकतर सीटों पर मुकाबला तीसरे या चौथे स्थान से आगे नहीं बढ़ पाएगा। ऐसे में प्रशांत किशोर अभी भी अन्य दलों के जनाधार वाले बागियों की आस में बैठे हैं।

दूसरी वजह है जन सुराज के संगठन को चलाने वाले स्थानीय लोग। जन सुराज का पूरा संगठन उन्हीं लोगों के हाथ में है जो शुरू से इस अभियान से जुड़े रहे हैं। इन कार्यकर्ताओं ने गाँव-गाँव में सर्वे किए, बैठकें कीं और पार्टी की नींव डाली। यही लोग जमीन पर पैसा भी खर्च करते हैं।

अब जब टिकट वितरण की घड़ी आई है, तो वही पुराने कार्यकर्ता खुद दावेदार बन बैठे हैं। ऐसे में अगर किसी को टिकट नहीं मिला या पक्षपात दिखा, तो बगावत तय है। ऐसे में प्रशांत किशोर इस बगावत से अपनी पार्टी को बचाने के लिए सही वक्त का इंतजार कर रहे हैं। खुद को अलग दिखाने का दावा करने वाले प्रशांत के सामने अभी पूरी तैयार भी ना हो सके संगठन को संभालने की जिम्मेदारी है।

40 साल बाद बिहार में 2 चरण में ही निपटेगा चुनाव, आज ‘वोट चोरी’ का प्रोपेगेंडा गढ़ने वालों के जमाने में बूथ लूट-हिंसा थी सामान्य: ‘सुशासन’ की एक कहानी यह भी

बिहार में विधानसभा चुनाव इस बार दो चरणों में हो रहे है। पहला चरण 6 नवंबर 2025 को इसके 5 दिनों बाद 11 नवंबर को दूसरे चरण के लिए वोट डाले जाएँगे। एक वक्त था जब 5-7 चरणों में भी मतदान होते थे। बिहार की चुनावी हिंसा सुर्खियाँ बटोरती थी। लेकिन अब शांतिपूर्वक चुनाव संपन्न हो रहे हैं। ये भी राज्य की कानून व्यवस्था में सुधार की गवाही देता है। इस बार बिहार चुनाव और भी खास है, क्योंकि 22 साल बाद हुए एसआईआर के माध्यम से वोटर लिस्ट अपडेट किया गया है।

लालू राज में निकलते थे बैलेट बॉक्स से ‘जिन्न’

लालू राज में चुनाव के दौरान बैलेट बॉक्स खुलते ही जिन्न निकलता था। यानी वोट से पहले के माहौल कुछ और बयां करते थे और जीत का सेहरा किसी और के सिर सजता था। बूथ लूट तो आम बात थी। हत्या, अपहरण की खबरों से पेपर पटे रहते थे। ये वह दौर था, जब चुनाव लोकतंत्र का उत्सव नहीं बल्कि डर और दहशत बन चुका था।। खुलेआम वोटरों को डराया धमकाया जाता था। मतदाताओं के वोट पहले ही पड़ चुके होते थे, उन्हें वापस भेज दिया जाता था।

90 का दशक तो खास तौर पर बूथ कैप्टरिंग के लिए कुख्यात रहा। 2004 तक चुनाव में हिंसा, हत्या, लूट, अपहरण, डराना-धमकाना आम था। अपराधियों की दबंगई से लोगों में निराशा और हताशा घर कर गई थी। अपराधियों को खुलेआम राजनीतिक संरक्षण मिल रहे थे। चुनाव का प्रभावित करने और मतदान अपने पक्ष में कराने के लिए इनका खूब इस्तेमाल किया जाता था। दरअसल दबंगों को कानून का कोई खौफ नहीं था। खुलेआम हत्याएँ होती थी। बारा नरसंहार, शंकर बिगहा नरसंहार जैसे कई सामूहिक नरसंहारों ने राज्य को हिला कर रख दिया था।

दबंगों के डर से वोट डालने के लिए विवश हुई जनता

ऐसे में आम आदमी दबंगों के डर से वहीं वोट डालते थे, जिसकी तरफ इनका इशारा होता था। मतदाताओं के लिए यह दशक हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा। उम्मीदवारों के लिए भी यह कम चुनौतीपूर्ण नहीं था। ऐसे में मतदान निष्पक्ष हो पाएगा कि नहीं, इसकी आशंका हमेशा बनी रहती थी। चुनाव में चाहे कोई उम्मीदवार जीते, लेकिन मतदाता हमेशा हारता था। चुनावी गड़बड़ियों पर पार पाने के लिए चुनाव आयोग कई चरणों में यहाँ चुनाव कराता था, लेकिन हिंसा और हत्या पर काबू पाना काफी मुश्किल रहा।

‘जंगल राज’ में सैकड़ों जानें चुनावी हिंसा में गई

1990 के चुनाव में 520 हिंसा की घटनाएँ हुई, जबकि 87 लोगों की जान गई। बिहार में लालू राज की शुरुआत हुई। साल 1995 में 1270 हिंसा की घटनाएं घटी और 54 लोगों की मौत हुई। 2000 के चुनाव में 61 लोग मारे गए। कुल मिलाकर 1990 से 2004 के बीच बिहार में 9 चुनाव हुए। इनमें करीब 641 लोगों की जान गई।

सबसे ज्यादा रक्तपात तो 2001 के पंचायत चुनाव में हुआ। राज्य में 23 साल के बाद पंचायत चुनाव हो रहा था। इसलिए पार्टियों ने पूरा जोर लगाया। नतीजा रहा 196 लोगों की मौत। 2004 के लोकसभा चुनाव में भी 28 लोगों की मौत हुई। बिहार में 1990 में एक चरण में चुनाव हुए थे। इसके बाद 1985 में 2 चरणों में वोटिंग हुई। 2000 और 2005 में तीन चरणों में चुनाव हुए जबकि 1995, 2005 में 5 चरणों में चुनाव हुए।

देश में पहली बार बूथ कैप्चरिंग बिहार में हुआ

देश में पहली बार बूथ कैप्चरिंग की खास घटना 1957 में बिहार के बेगूसराय के रचियाही में हुआ था। घटना की जानकारी दूसरे दिन लोगों को अखबार से पता चला। 1957 की इस घटना ने बिहार में राजनीति की दिशा ही बदल दी। राज्य के चुनाव पर माफिया हावी होने लगे। राजनीतिज्ञों और माफियाओं के साँठगाँठ की शुरुआत भी हो गई। 1980 तक आते-आते चुनाव में बाहुबलियों का बोलबाला देखा जाने लगा। हालाँकि देश में चुनाव सुधारों की चर्चा भी होने लगी। 1957 की घटना के बाद चुनाव आयोग ने सुरक्षाबलों की तैनाती पर जोर देना शुरू किया। धीरे-धीरे केंद्रीय बलों की मौजूदगी जरूरी हो गई।

‘बूथ लूट’ पर शेषन-राव की जोड़ी ने लगाया लगाम

बिहार में चुनावी हिंसा और बूथ लूट की घटनाओं पर लगाम लगाने का श्रेय जाता है मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन और के जे राव को। केजे राव बिहार विधानसभा चुनाव के विशेष पर्यवेक्षक बनाए गए थे। 2005 में दोनों की सख्ती से बिहार के चुनाव हिंसा पर काफी हद तक लगाम लगा। हालाँकि इसके बाद 2010 में 5 लोगों की चुनावी हिंसा में मौत हुई।

बैलेट पेपर की जगह 2006 में ईवीएम ने ले ली। इसके साथ ही बूथ कैप्चरिंग और बैलेट पेपर लूटने जैसी घटनाओं पर विराम लगा। EVM से वोट कराने के तरीके में भी काफी बदलाव आया है। वोटरों की विश्वसनीयता को कायम रखने के लिए EVM के साथ VVPAT को जोड़ा गया। पोलिंग स्टेशन के आसपास सीसीटीवी कैमरे लगाए गए। फ्लाइंग स्क्वॉड जैसे तकनीकी उपायों का प्रयोग शुरू हो गया।

बिहार विधानसभा चुनाव में तो उम्मीदवारों की रंगीन फोटो और बड़े अक्षरों में नाम दिखेगी, ताकि वोटरों को पहचाने में कोई दिक्कत न हो। हर पोलिंग स्टेशन की 100 फीसदी वेबकास्टिंग की जाएगी ताकि आँकड़ों में कोई गड़बड़ी न हो और तेजी से जुटाया जा सके। यहाँ तक कि पोस्टल बैलेट को गिनती पूरी होने से 2 राउंड पहले गिन लिया जाए, ताकि नतीजों पर किसी तरह की दुविधा न रहे। हर बूथ पर 1200 से कम वोटर होंगे। सीसीटीवी कैमरे और सुरक्षा बल तो रहेंगे ही।

चुनाव प्रक्रिया में लगातार हो रहे बदलाव के बावजूद विपक्ष चुनाव आयोग को कटघरे में खड़े कर रहा है। सरकार पर ‘वोट चोरी’ का इल्जाम लगाया जा रहा है। जबकि 2004 से पहले बिहार में ‘वोट चोरी’ नहीं बल्कि ‘वोट लूट’ होती थी। इसके प्रमाण सोशल मीडिया में तैर रहे हैं।

‘माँ ने कहा था- रिश्वत मत लेना, गरीबों के लिए काम करना’: सरकार के मुखिया के तौर पर 25वें वर्ष में PM मोदी का प्रवेश, CM से PM बनने तक के सफर को किया याद

पीएम मोदी ने 2001 के शपथग्रहण की तस्वीर पोस्ट करते हुए जनसेवा के 25वें साल में प्रवेश करने पर जनता का आभार जताया है। उन्होंने एक्स पर लिखा, “2001 में आज ही के दिन, मैंने पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी। देशवासियों के निरंतर आशीर्वाद से, मैं सरकार के मुखिया के रूप में अपनी सेवा के 25वें वर्ष में प्रवेश कर रहा हूँ।”

2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री बनने के दिनों को याद करते हुए उन्होने ट्वीट किया, “मेरी पार्टी ने मुझे बेहद चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में गुजरात के मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी सौंपी थी। उसी साल राज्य एक भीषण भूकंप से जूझ रहा था। पिछले वर्षों में एक महाचक्रवात, लगातार सूखे और राजनीतिक अस्थिरता देखी गई थी। इन चुनौतियों ने लोगों की सेवा करने और नए जोश और आशा के साथ गुजरात के पुनर्निर्माण के संकल्प को और मज़बूत किया।”

पीएम मोदी ने कहा, “जब मैंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, तो मुझे याद है कि मेरी माँ ने मुझसे कहा था – मुझे तुम्हारे काम की ज़्यादा समझ नहीं है, लेकिन मैं बस दो चीज़ें चाहती हूँ। पहला, तुम हमेशा गरीबों के लिए काम करोगे और दूसरा, तुम कभी रिश्वत नहीं लोगे। मैंने लोगों से यह भी कहा था कि मैं जो भी करूँगा, वो नेक इरादे से करूँगा और कतार में खड़े आखिरी व्यक्ति की सेवा करने के विजन से प्रेरित रहूँगा।”

सूखाग्रस्त गुजरात बना कृषि में अग्रणी राज्य

25 साल तक मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के रूप में अपने अनुभवों को साझा करते हुए पीएम मोदी ने कहा है कि हमने मिलकर उल्लेखनीय प्रगति की है। सीएम पद की शपथ वाले दिन को भी उन्होंने याद किया और कहा कि उन्हें आज भी याद है कि जब वे मुख्यमंत्री बने थे, तब ऐसा माना जाता था कि गुजरात अब कभी आगे नहीं बढ़ पाएगा। किसानों समेत आम नागरिक बिजली और पानी की कमी की शिकायत करते थे। कृषि मंदी की चपेट में थी और औद्योगिक विकास ठप था। लेकिन सभी ने मिलकर गुजरात को सुशासन का केंद्र बनाने के लिए काम किया और सफल हुए।

उन्होंने कहा, “सूखाग्रस्त गुजरात, कृषि क्षेत्र में अग्रणी राज्य बन गया। व्यापार की संस्कृति का विस्तार मज़बूत औद्योगिक और विनिर्माण क्षमताओं में हुआ। नियमित कर्फ्यू अब अतीत की बात हो गई। सामाजिक और भौतिक बुनियादी ढाँचे को बढ़ावा मिला। इन परिणामों को प्राप्त करने के लिए लोगों के साथ मिलकर काम करना बेहद संतोषजनक रहा।”

2014 के दिनों को पीएम ने किया याद

गुजरात से निकल कर 2013 में पहली बार जब बीजेपी ने 2014 लोकसभा चुनाव के लिए प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया। उन दिनों को याद करते हुए पीएम मोदी ने कहा, “देश विश्वास और शासन के संकट से जूझ रहा था। तत्कालीन यूपीए सरकार भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और नीतिगत पंगुता के सबसे बुरे रूप का पर्याय बन चुकी थी। भारत को वैश्विक व्यवस्था में एक कमज़ोर कड़ी के रूप में देखा जा रहा था। लेकिन, भारत की जनता की सूझबूझ ने हमारे गठबंधन को प्रचंड बहुमत दिलाया और यह भी सुनिश्चित किया कि हमारी पार्टी को तीन दशकों के बाद पहली बार पूर्ण बहुमत मिले।”

देश की बागडोर संभालने के 11 साल को लेकर पीएम मोदी ने कहा कि हमने इन वर्षों में कई बदलाव किए और देश को सशक्त बनाया। उन्होंने कहा, “पिछले 11 वर्षों में, हम भारत के लोगों ने मिलकर काम किया है और कई बदलाव हासिल किए हैं। हमारे अभूतपूर्व प्रयासों ने पूरे भारत के लोगों, विशेषकर हमारी नारी शक्ति, युवा शक्ति और मेहनती अन्नदाताओं को सशक्त बनाया है।”

25 करोड़ लोग गरीबी से हुए मुक्त

इन 11 सालों में देश की 25 करोड़ आबादी गरीबी की रेखा से ऊपर आई है। भारत दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में एक बन गया है। भारत उन देशों में शामिल है, जहाँ दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य सेवा और सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ हैं। हमारे किसान तरह-तरह के बदलाव लाकर यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि हमारा राष्ट्र आत्मनिर्भर बने।

उन्होंने कहा, ” हमने व्यापक सुधार किए हैं और सभी क्षेत्रों में भारत को आत्मनिर्भर बनाने की जनभावना है, जो ‘गर्व से कहो, यह स्वदेशी है’ के आह्वान में परिलक्षित होती है।”

जनता की सेवा करते-करते 25वें साल में प्रवेश पर उन्होंने जनता के उनपर विश्वास बनाए रखने के लिए आभार भी जताया। उन्होंने कहा, “मैं एक बार फिर भारत की जनता को उनके निरंतर विश्वास और स्नेह के लिए धन्यवाद देता हूँ। अपने प्रिय राष्ट्र की सेवा करना सर्वोच्च सम्मान है, एक ऐसा कर्तव्य जो मुझे कृतज्ञता और उद्देश्य से भर देता है। हमारे संविधान के मूल्यों को अपना निरंतर मार्गदर्शक मानते हुए, मैं आने वाले समय में विकसित भारत के हमारे सामूहिक स्वप्न को साकार करने के लिए और भी अधिक परिश्रम करूँगा।”

महाराष्ट्र में हिन्दुओं का धर्मांतरण करा रहा जेम्स वॉटसन निकला अमेरिकी सेना का अधिकारी, बिजनेस वीजा पर आया था भारत

महाराष्ट्र के भिवंडी में अमेरिकी नागरिक 58 वर्षीय जेम्स वॉटसन को शुक्रवार (3 अक्टूबर 2025) को गिरफ्तार किया गया। उस पर स्थानीय हिंदुओं को ईसाई बनाने के लिए धर्मांतरण रैकेट चलाने का आरोप है। जिस वक्त उसे गिरफ्तार किया गया, वह महाराष्ट्र के दो लोगों के साथ मिल कर प्रार्थना सभा कर रहा था।

अमेरिकी नागरिक वॉटसन भारत में व्यावसायिक वीजा पर रह रहा था। उसकी गिरफ्तारी ठाणे के हीरानंदानी एस्टेट में एक धार्मिक सभा के दौरान हुई। वह ठाणे और पालघर जिले के जनजातीय किसानों को बहला-फुसला कर एक व्यवस्थित धर्मांतरण रैकेट चला रहा था।

जनजातीय लोगों को लालच देकर स्थानीय निवासियों ‘सैनाथ गणपति सरपे’ और ‘मनोज गोविंद कोल्हा’ के साथ मिलकर वॉटसन ‘चिंबीपाडा गाँव’ में प्रार्थना सभाओं के नाम पर हिंदू धर्म की निंदा करता था और ईसाई धर्म अपनाने के लिए लालच दे रहा था। इन आरोपियों ने झूठे चमत्कारी उपचार का दावा करते हुए गरीब जनजातीय समुदाय का शोषण किया।

अमेरिकी नागरिक नहीं, सक्रिय सेना अधिकारी निकला जेम्स वॉटसन

गिरफ्तारी के बाद सामने आए एक बड़े खुलासे में यह बात पक्की हुई है कि जेम्स वॉटसन सिर्फ एक अमेरिकी नागरिक नहीं बल्कि अमेरिकी सेना का अधिकारी है। OpIndia की जाँच में उसके अमेरिकी सेना से कई लिंक मिले हैं, जिनसे उनकी पहचान मेजर के तौर पर हुई है।

कई सूत्रों के मुताबिक, मेजर जेम्स वॉटसन अमेरिकी सेना की 2nd Battalion, 44th Air Defence Artillery (ADA) के एक्जीक्यूटिव ऑफिसर है, जो फोर्ट कैंपबेल, केंटकी में तैनात है। यह वही यूनिट है जो उसके अपने लेख के अनुसार, ऑपरेशन फ्रीडम्स सेंटिनल (Operation Freedom’s Sentinel) में आगामी तैनाती की तैयारी कर रही थी।

वॉटसन की सक्रिय सैन्य भूमिका के और भी सबूत हैं। उसने साल 2020 में “Owning the Skies, Winning the Fight” शीर्षक से एक लेख लिखा था। इस लेख में उसने अनमैन्ड एरियल सिस्टम्स (UAS) यानी ड्रोन तकनीक से जुड़ी चुनौतियों और खतरों पर विस्तार से चर्चा की थी।

(फोटो साभार- DVIDS)

वॉटसन ने बताया था कि कैसे आधुनिक तकनीक के इस युग में दुश्मन सस्ते कॉमर्शियल ड्रोन में विस्फोटक लगाकर हमले करते हैं। उन्होंने चेताया था कि इस तरह के ‘लो एंड स्लो’ यानी कम ऊँचाई पर उड़ने वाले क्वाडकॉप्टर जैसे ड्रोन आज की सबसे गंभीर सुरक्षा चुनौती बन चुके हैं।

अपने लेख के निष्कर्ष में वॉटसन ने जोर दिया था कि एयर डिफेंस आर्टिलरी (ADA) को ड्रोन से निपटने की रणनीति पर पूरी तरह नियंत्रण रखना चाहिए।

अमेरिका के रक्षा विभाग की वेबसाइट पर मौजूद सबूत

मेजर जेम्स वॉटसन की सैन्य पृष्ठभूमि का संबंध सिर्फ उसके लिखे गए लेखों तक ही सीमित नहीं है। अमेरिका के रक्षा विभाग की आधिकारिक वेबसाइट Defence Visual Information Distribution Service (DVIDS) पर वॉटसन की कई तस्वीरें और एक वीडियो क्लिप भी मौजूद हैं। इन तस्वीरों में वह अमेरिकी सेना की यूनिफॉर्म पहने दिखाई देता हैं। एक वीडियो में वो साफ-साफ कहता सुनाई देता हैं, “मैं मेजर जेम्स वॉटसन, हरलबर्ट फील्ड, फ्लोरिडा से हूँ। सेना को 246वें स्थापना दिवस की शुभकामनाएँ देता हूँ।”

भारत में अवैध धर्मांतरण गतिविधियों के आरोप में एक सक्रिय अमेरिकी सेना के मेजर की गिरफ्तारी अपने आप में गंभीर मामला है। वो बिजनेस वीजा पर भारत आया था और यह गिरफ्तारी वीजा के दुरुपयोग और अमेरिकी सेना में सेवा के दौरान उनकी गतिविधियों को लेकर भी कई बड़े सवाल खड़े करती है।

यह मामला तब सामने आया जब रवींद्र भुरकुट (27) नामक निवासी ने भिवंडी तालुका पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई। उसने एक घर के बाहर लगभग 30-35 ग्रामीणों को ईसाई धर्म का प्रचार करते हुए देखा।

कथित तौर पर, जेम्स हिंदू धर्म के बारे में अपमानजनक टिप्पणी कर रहा था, उसे अंधविश्वास पर आधारित धर्म बता रहा था, और कह रहा था कि ईसाई धर्म अपनाकर ही सुख और सफलता प्राप्त की जा सकती है।

(मूल रूप से यह लेख अंग्रेजी में प्रकाशित हुई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

गुजारा भत्ता की मार ने पुरुषों को बनाया कर्जदार: तलाक की प्रक्रिया में लुटती बचत और समाज की बेरुखी से जूझती जिंदगी

जब एक पुरुष तलाक का सामना करता है, तो उसका आर्थिक संतुलन बुरी तरह प्रभावित हो सकता है। ‘द इकोनॉमिक टाइम्स’ की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 42% पुरुष गुज़ारा भत्ता (alimony) चुकाने के लिए ऋण लेने पर मजबूर हुए हैं। यह सिर्फ एक संख्या नहीं है, यह उन हजारों पुरुषों की सच्चाई बयां करती है, जो कानूनी दायित्व निभाने के लिए अपनी बचत और सम्मान, दोनों खो रहे हैं।

रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि करीब 49% पुरुषों ने तलाक की प्रक्रिया में 5 लाख रुपए से अधिक खर्च किए जबकि कई को अपनी आर्थिक स्थिरता वापस पाने में वर्षों लग जाते हैं। सोचिए, एक आदमी जो अपने परिवार का भरण-पोषण करने की जिम्मेदारी उठाता है, अचानक कर्ज में डूब जाता है। वह न केवल अपनी बचत खोता है बल्कि कई मामलों में अपने जीवन स्तर को बनाए रखने के लिए भी संघर्ष करता है।

मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर

तलाक केवल आर्थिक नहीं, बल्कि मानसिक रूप से भी पुरुषों को तोड़ देता है। कई पुरुष खुद को अकेला महसूस करते हैं, और उनके आत्म-सम्मान में कमी आती है। अध्ययनों से पता चला है कि तलाक के बाद पुरुषों में अवसाद (depression) और चिंता (anxiety) की दर तेज़ी से बढ़ जाती है।

वे अक्सर सोचते हैं कि समाज में उनकी पहचान अब क्या रह गई है। यह अकेलापन और असुरक्षा उन्हें और भी गंभीर मानसिक समस्याओं की ओर धकेल देती है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि पुरुष अपनी भावनाएँ साझा नहीं कर पाते क्योंकि समाज उनसे हमेशा मज़बूत बने रहने की उम्मीद करता है।

बच्चों से दूरी: एक पिता का सबसे बड़ा दर्द

बच्चे भी इस प्रक्रिया के शिकार होते हैं। माता-पिता के बीच तनाव उनके मानसिक और भावनात्मक विकास पर नकारात्मक प्रभाव डालता है।

एक पिता, जो अपने बच्चों के लिए हर संभव कोशिश करता है, अचानक खुद को उनकी ज़िंदगी से दूर पाता है। कई बार, तलाक के बाद पिता को बच्चों की कस्टडी नहीं मिलती, जिससे उनका भावनात्मक संतुलन पूरी तरह बिगड़ जाता है। बच्चे भी इस स्थिति को समझ नहीं पाते और इससे उन्हें भी गंभीर मानसिक आघात पहुँचता है।

सामाजिक कलंक और पुरुषों की पहचान

तलाक के बाद पुरुषों को समाज में कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। उन्हें अक्सर ‘असफल’ या ‘दोषी’ के लेबल के साथ देखा जाता है। यह सामाजिक कलंक उनकी मानसिक स्थिति को और भी बिगाड़ देता है।

कई पुरुषों का मानना है कि तलाक के बाद उनकी पहचान ही खत्म हो गई है, जिससे वे और अधिक अकेलापन महसूस करते हैं। अक्सर उन्हें अपने दोस्तों और परिवार से भी भावनात्मक समर्थन नहीं मिलता।

अब समय है समान न्याय की दिशा में कदम बढ़ाने का

तलाक एक जटिल सामाजिक और कानूनी मुद्दा है जो केवल महिलाओं को नहीं, बल्कि पुरुषों को भी गहराई से प्रभावित करता है। हमें इस भेदभावपूर्ण दृष्टिकोण के खिलाफ आवाज़ उठानी चाहिए और समान न्याय सुनिश्चित करने के लिए एकजुट होना चाहिए।

गुज़ारा भत्ता और अन्य कानूनी नीतियाँ निष्पक्ष होनी चाहिए ताकि दोनों पक्षों की वास्तविक आर्थिक स्थिति का ध्यान रखा जा सके। हमें एक ऐसे समाज की आवश्यकता है, जहाँ दोनों पक्षों की समस्याओं को समान रूप से समझा जाए और उन्हें सुलझाने के लिए उचित उपाय किए जाएँ। ताकि तलाक की प्रक्रिया में हर किसी की आवाज़ सुनी जाए और कोई भी व्यक्ति इस कठिनाई में अकेला न महसूस करे।