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श्रीनगर में लगाए पोस्टरों से लाल किले के बाहर धमाके तक: जानिए जैश-ए-मोहम्मद ने कैसे बनाया ‘व्हाइट कॉलर’ टेरर नेटवर्क, डॉक्टरों को दे रहा आतंक की ट्रेनिंग

दिल्ली के लाल किले के पास सुनहरी मस्जिद के करीब सोमवार (10 नवंबर 2025) शाम जबरदस्त धमाका हुआ। एक सफेद i-20 कार में हुआ यह विस्फोट इतना शक्तिशाली था कि 8 लोगों की मौत हो गई और 20 से अधिक घायल हुए। यह धमाका इतना जोरदार था कि आसपास खड़ी कई गाड़ियाँ जलकर खाक हो गईं। पुलिस को घटनास्थल से एक हाथ बरामद हुआ, जिसके DNA की जाँच से हमलावर की पहचान की जा रही है।

शुरुआती जाँच में सामने आया कि कार को डॉ मोहम्मद उमर नाम का संदिग्ध चला रहा था, जो फरीदाबाद के आतंकी मॉड्यूल से जुड़ा था। इस धमाके के बाद सुरक्षा एजेंसियाँ सतर्क हो गई हैं और लाल किला 3 दिनों के लिए बंद कर दिया गया है। लाल किला ब्लास्ट की जाँच गृह मंत्रालय ने NIA को सौंप दी है। अभी तक इस मामले की जाँच दिल्ली पुलिस कर रही थी।

कश्मीर में लगे कुछ पोस्टर बने आतंक की जाँच की शुरुआत

यह पूरी कहानी एक छोटी-सी लगने वाली लेकिन बेहद अहम घटना से शुरू हुई। श्रीनगर के नौगाम इलाके में दीवारों पर लगे धमकी भरे पोस्टरों से। अक्टूबर 2019 के बाद पहली बार अक्टूबर 2025 में ऐसे पोस्टर दिखे, जिनमें जैश-ए-मोहम्मद के नाम से सुरक्षा बलों को खुली धमकियाँ दी गई थीं। उस समय इलाके में सामान्य शांति थी, इसलिए अचानक ऐसे पोस्टरों का सामने आना पुलिस के लिए असामान्य संकेत था।

श्रीनगर के SSP जी वी सुनीप चक्रवर्ती ने तुरंत जाँच के आदेश दिए, जिन्होंने इससे पहले कई बड़ी आतंकी कार्रवाइयों को विफल किया था। पुलिस टीमों ने इलाके की CCTV फुटेज खंगालनी शुरू की और कुछ ही दिनों में तीन ऐसे चेहरों की पहचान हुई जो पहले पत्थरबाजी और भड़काऊ गतिविधियों में शामिल रह चुके थे। इन्हीं तीन ओवरग्राउंड वर्करों (OGWs) की गिरफ्तारी ने एक ऐसी कड़ी को खोला, जिसने धीरे-धीरे एक गहरे आतंकी नेटवर्क की परतें उजागर कर दीं।

जो शुरुआत में सिर्फ कुछ पोस्टर लगने की मामूली घटना लग रही थी, वही अब देश के भीतर फैले एक मल्टी-स्टेट आतंकी मॉड्यूल का शुरुआती सुराग बन चुकी थी। ऐसा नेटवर्क, जो कश्मीर से हरियाणा और दिल्ली तक अपनी जड़ें फैला चुका था।

मौलवी इरफान से खुला आतंकी साजिश का जाल

ओवरग्राउंड वर्करों (OGWs) की गिरफ्तारी के बाद जब पुलिस ने पूछताछ शुरू की, तो जाँच की दिशा शोपियाँ के मौलवी इरफान अहमद तक जा पहुँची। यही वह कड़ी थी, जिसने पूरे आतंक नेटवर्क का दरवाजा खोल दिया। इरफान कोई आम व्यक्ति नहीं था, वह स्थानीय मस्जिद में मौलवी था और मजहब के नाम पर युवाओं को कट्टरपंथ की राह पर मोड़ने का काम करता था।

तीन हफ्तों तक चली गहन पूछताछ में यह सामने आया कि इरफान का सीधा संबंध जैश-ए-मोहम्मद (JeM) और अंसार गजवत-उल-हिंद (AGH) जैसे पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठनों से था। इरफान के मोबाइल फोन से पुलिस को कई चौंकाने वाले सबूत मिले, जिनमें पाकिस्तान में बैठे जैश के आतंकी उमर बिन खत्ताब के टेलीग्राम चैनल से सीधा संपर्क शामिल था।

यही डिजिटल सबूत वह धागा साबित हुआ, जिसने जाँच एजेंसियों को एक ऐसे ‘व्हाइट कॉलर टेरर नेटवर्क‘ तक पहुँचा दिया, जो बाहर से शिक्षित और सभ्य दिखने वाले डॉक्टरों, मौलवियों और प्रोफेशनल्स की आड़ में देश के भीतर गहरी साजिश रच रहा था। इस खुलासे ने सुरक्षा एजेंसियों को झकझोर दिया, क्योंकि अब तक आतंक की परिभाषा बंदूकों और जंगलों तक सीमित मानी जाती थी, लेकिन यहाँ आतंक ‘डॉक्टरों के लैब कोट’ और ‘मौलवियों के उपदेश’ की ओट में पल रहा था।

डॉक्टरों की दुनिया में छिपा आतंक

मौलवी इरफान अहमद से मिली जानकारी ने पुलिस को एक चौकाने वाली दिशा दी। 3 पढ़े-लिखे डॉक्टरों तक पहुँचाया, जो अपने पेशे का पर्दा डालकर आतंक के असली मंसूबों में लिप्त थे। ये डॉ मुजम्मिल शकील (पुलवामा), डॉ आदिल अहमद राठर (कुलगाम) और डॉ शाहीना शाहिद (लखनऊ) थे।

पूछताछ में सामने आया कि ये डॉक्टर सिर्फ मरीजों का इलाज नहीं कर रहे थे, बल्कि उन्होंने आतंकियों के लिए हथियार और बम बनाने की सामग्री जुटाने में सक्रिय मदद की थी। खुद को मेडिकल प्रोफेशनल दिखाकर उन्होंने लोगों का विश्वास हासिल किया और किसी को शक होने से बचाया।

इन सभी का तार हरियाणा के फरीदाबाद में स्थित अल-फलाह यूनिवर्सिटी से जुड़ा था। यही वह जगह थी, जहाँ से पुलिस ने अब तक के सबसे बड़े विस्फोटक जखीरे में से एक बरामद किया। लगभग 2,900 किलो अमोनियम नाइट्रेट, हथियार और बम बनाने की सामग्री, जो दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में बड़े हमलों की योजना का हिस्सा हो सकती थी। यह खुलासा साफ कर देता है कि कैसे आतंक अब सिर्फ संघर्ष क्षेत्रों तक सीमित नहीं, बल्कि शिक्षा और पेशेवर संस्थानों के भीतर भी छिपकर काम कर रहा है।

यूनिवर्सिटी से आतंक की लैब तक: शिक्षा का काला इस्तेमाल

जाँच में सामने आया कि अल-फलाह यूनिवर्सिटी में कार्यरत डॉ मुजम्मिल शकील ने अपने पेशेवर माहौल का दुरुपयोग किया। उसने यूनिवर्सिटी की लैब उपकरणों और रिसर्च सामग्री का इस्तेमाल विस्फोटक तैयार करने के लिए किया। दिल्ली पुलिस की रिपोर्ट में कहा गया कि यूनिवर्सिटी में छिपाए गए RDX के सैंपल्स प्रयोग के तौर पर इस्तेमाल किए गए, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह तैयारी सिर्फ थिएरेटिकल नहीं बल्कि व्यावहारिक रूप से भी चल रही थी।

साथ ही, पहले अनंतनाग मेडिकल कॉलेज में कार्यरत डॉ आदिल अहमद राठर को सहारनपुर से गिरफ्तार किया गया। उसके कॉलेज लॉकर की तलाशी में AK-47 राइफल और कारतूस बरामद हुए। यह दर्शाता है कि इन डॉक्टरों ने स्वयं को मेडिकल प्रोफेशनल के रूप में छुपाकर, आतंक के लिए उपकरण और हथियार इकट्ठा किए, जिससे यह नेटवर्क पूरी तरह से शहरी और पेशेवर ढाँचे में घुसपैठ कर चुका था।

फरीदाबाद में बरामद 2,900 किलो विस्फोटक

जब पुलिस की टीम फरीदाबाद के धौज और फतेहपुर टगा गाँव में छापेमारी के लिए पहुँची, तो उन्हें वहाँ एक ऐसा खौफनाक जखीरा मिला कि सभी दंग रह गए। इन दो घरों से कुल 2,900 किलोग्राम अमोनियम नाइट्रेट बरामद हुआ, जो बड़े पैमाने पर विस्फोटक बनाने के लिए इस्तेमाल होता है।

सिर्फ इतना ही नहीं, पुलिस ने 20 टाइमर, इलेक्ट्रॉनिक सर्किट, तार, रिमोट कंट्रोल, बैटरियाँ और धातु की चादरें भी जब्त कीं। ये सभी सामान IED तैयार करने में काम आते हैं, यानी किसी भी बड़े हमले की योजना के लिए पूरी तरह से तैयार सामग्री थी।

इसके अलावा, एक घर से AK-56 राइफल, क्रिंकोव राइफल, चीनी पिस्तौल और बरेटा गन जैसे भारी हथियार भी मिले। जाँच में पता चला कि यह पूरा मॉड्यूल पाकिस्तान स्थित आतंकियों के निर्देशों पर काम कर रहा था और इसकी तैयारी लंबे समय से चल रही थी। इस खुलासे ने साफ कर दिया कि आतंक अब सिर्फ जंगली इलाकों या संघर्ष क्षेत्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि शहरी और शिक्षित माहौल में भी चुपचाप जाल बुन रहा है।

जाँच के बाद गिरफ्तारी का सिलसिला

मौलवी इरफान अहमद और तीन डॉक्टरों की गिरफ्तारी के बाद पुलिस की कार्रवाई और व्यापक हुई। जम्मू-कश्मीर और हरियाणा के अलग-अलग स्थानों से 8 और लोगों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें आरिफ निसार, यासिर-उल-अशरफ, मकसूद अहमद, और जमीर अहमद आहंगर उर्फ मुतलशा शामिल थे।

जाँच में यह भी सामने आया कि मुतलशा एक पैन-इंडिया चैट ग्रुप ‘फर्जंदान-ए-दारुल उलूम देवबंद’ का सक्रिय सदस्य था। यह ग्रुप ऑनलाइन युवाओं को जिहाद के लिए मानसिक रूप से प्रेरित और कट्टरपंथ की ओर मोड़ने का काम करता था। सभी गिरफ्तार आरोपितों को UAPA की धारा 16 और 18 के तहत न्यायिक हिरासत में भेजा गया, जिससे यह नेटवर्क पूरी तरह से न्यायिक नियंत्रण में आ गया।

दिल्ली तक कैसे पहुँची साजिश

जाँच में सामने आया कि फरीदाबाद से सटे इलाकों में विस्फोटक तैयार किए जा रहे थे और इन्हें दिल्ली में लाने की तैयारी थी। पुलिस को शक है कि इस नेटवर्क का मकसद दिल्ली या एनसीआर में बड़ा ब्लास्ट कराना था, ताकि सांप्रदायिक तनाव फैल सके। धौज में बरामद सामग्री से अनुमान है कि विस्फोटक पिछले दो वर्षों में धीरे-धीरे जुटाए गए थे।

फॉरेंसिक टीम ने मौके से मिले अवशेषों में अमोनियम नाइट्रेट फ्यूल ऑयल की मौजूदगी की पुष्टि की। यह वही केमिकल है जो फरीदाबाद में जब्त किए गए विस्फोटकों में भी पाया गया था। NIA और दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल अब यह जाँच कर रही है कि क्या यह आत्मघाती हमला (फिदायीन ऑपरेशन) था।

क्या था मकसद और आगे का खतरा

सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि डॉ उमर ने यह विस्फोट ‘घबराहट में किया गया हमला’ था। शक है कि फरीदाबाद में छापेमारी और डॉ मुजम्मिल की गिरफ्तारी के बाद उसने जल्दबाज़ी में धमाका कर दिया, ताकि साजिश उजागर होने से पहले कोई ‘प्रभावी वार’ किया जा सके। हालाँकि एजेंसियाँ यह भी जाँच कर रही हैं कि क्या दिल्ली मूल लक्ष्य थी, या यह धमाका किसी और बड़ी योजना का हिस्सा था।

ISIS-India की खौफनाक साजिश: खाना-पानी में जहर घोलने का प्लान

इसके अलावा, गुजरात ATS ने एक खौफनाक साजिश का पर्दाफाश करते हुए तीन आरोपितों ‘कैराना के आजाद सुलेमान शेख (20), लखीमपुर के मोहम्मद सुहैल (23) और एक डॉक्टर को गिरफ्तार किया था, जिन पर खाने-पीने की वस्तुओं में घातक जहर (रिसिन) मिलाकर बड़े पैमाने पर लोगों को मारने और दहशत फैलाने का आरोप है।

उनके निशाने में एक RSS कार्यालय, दिल्ली का आजाद मार्केट और अहमदाबाद का फल बाजार थे और छापे में तीन पिस्तौल, 30 कारतूस और ज़हर बनाने में काम आने वाला अरंडी का तेल बरामद हुआ है। जाँच में यह नाता भी मिला है कि गिरोह ISIS-KP से जुड़ा था और उसे पाकिस्तानी हैंडलर ‘अब्दुल खदीजा’ से टेलीग्राम के जरिए निर्देश मिलते थे, इस समूह का नेटवर्क यूपी, राजस्थान, गुजरात और आंध्र प्रदेश तक फैला पाया गया है और अब ATS साइबर फोरेंसिक से मोबाइल-लैपटॉप की पड़ताल कर संदेश-लेनदेन और धन के स्रोत का पता लगा रही है क्योंकि खाने-पीने में जहर मिलाना छिपकर व्यापक नुकसान और सार्वजनिक भय पैदा करने की नीति है।

यह पूरी कहानी बताती है कि कैसे एक छोटा-सा सुराग, कुछ दीवारों पर चिपके पोस्टर, देश की सुरक्षा एजेंसियों को एक ऐसे आतंकी नेटवर्क तक ले गया जो डॉक्टरों, मौलवियों और पढ़े-लिखे पेशेवरों के रूप में काम कर रहा था। इन लोगों ने ‘ज्ञान’ और ‘सेवा’ के नाम पर आतंक फैलाने की योजना बनाई थी।

अगर फरीदाबाद और कश्मीर में समय रहते छापेमारी न होती, तो दिल्ली एक बहुत बड़े हमले का शिकार हो सकती थी। फिलहाल, जाँच जारी है और देश की सुरक्षा एजेंसियाँ सतर्क हैं, ताकि कोई और ‘व्हाइट कॉलर आतंकी’ समाज के भीतर से फिर न उभरे।

सीमाँचल में क्यों बँटे मुस्लिम वोटर्स?

बिहार चुनाव में मुस्लिम वोटर्स कॉन्ग्रेस और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM के बीच लड़ रहे हैं। किशनगंज में मुस्लिम यह तो समझा नहीं सके कि कॉन्ग्रेस और AIMIM ने उनके लिए किया क्या है लेकिन इतना कहकर बात टाल रहे हैं कि उनका ‘दिमाग ठंडा’ रखा है।

कॉन्ग्रेस का समर्थन करने वाले एक मुस्लिम व्यक्ति कहते हैं, “राहुल गाँधी से खूब मोहब्बत करते हैं। हम मोदी को भी मानते हैं। लेकिन कमाकर तो खुद ही खाना है। बिहार में कॉन्ग्रेस ही आएगी।”

उधर, AIMIM समर्थक कहते हैं, “कॉन्ग्रेस ने नौजवान को बेरोजगारी दिया है। मुस्लिमों को कॉन्ग्रेस ने अंधेरे में रखा है। इस मामले में BJP सही है। BJP ने हिंदू-मुस्लिम के बीच झगड़ा खत्म किया है। कॉन्ग्रेस हिंदू-मुस्लिम झगड़े को बनाकर रखता था। मुस्लिम के लिए कुछ नहीं किया। भाईचारा बनाकर छुरा घोपने का काम करता है।”

देखिए ग्राउंड रिपोर्ट

कटिहार में बांग्लादेशी घुसपैठ से बदल गई डेमोग्राफी, 30 साल से हिंदुओं के मंदिर पर मुस्लिमों का कब्जा

बिहार ग्राउंड रिपोर्ट में ऑपइंडिया टीम कटिहार पहुँची, जहाँ बांग्लादेशी घुसपैठ ने डेमोग्राफी बदल दी और हिंदुओं के लिए खतरा पैदा कर दिया। यहाँ एक प्राचीन मंदिर पर पिछले तीन दशकों से मुस्लिम समुदाय का कब्जा है। हिंदू समुदाय जमीन से लेकर कोर्ट तक लड़ रहा है, लेकिन अपने आराध्य की पूजा का अधिकार नहीं मिल सका।

एक स्थानीय हिंदू निवासी ने कहा, “30 साल से मंदिर पर कब्जा है, हम कोर्ट गए, लेकिन न्याय नहीं मिला। घुसपैठिए बढ़ रहे, हमारी जमीन छीन रहे।”

अनुराग मिश्रा की रिपोर्ट से पता चला कि घुसपैठ ने इलाके की जनसांख्यिकी बदल दी, हिंदू अल्पमत में आ गए। इस मंदिर विवाद में हिंदू संगठन भी सक्रिय हैं, लेकिन मुस्लिम पक्ष दावा करता है कि जमीन उनकी है। कोर्ट केस लंबित है। यह लड़ाई हिंदू अस्तित्व की है।

देखिए ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट

बिहार में महिलाओं का वोट बैंक नीतीश के नाम, ₹10 हजार पाकर खुश: PM मोदी की रैली में बोलीं- उन्होंने आत्मनिर्भर बनाया

बिहार में महिला वोट बैंक नीतीश सरकार के साथ हैं। खासकर, जबसे सरकार ने इन महिलाओं के बैंक खाते में ₹10-10 हजार ट्रांसफर किए। ये धनराशि पाकर कोई महिला अपना बिजनेस खड़ा कर चुकी है तो कोई महिला सरकारी नौकरी में आगे बढ़ रही है।

सीतामढ़ी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली में शामिल इन महिलाओं ने कहा कि उन्हें नीतीश सरकार ने आत्मनिर्भर बनाया है, इसीलिए सिर्फ NDA को ही वोट देंगी। एक महिला ने कहा, “नरेंद्र मोदी को ही वोट देंगे। उन्होंने बिजली फ्री किया, जीविका से काम दिया, बच्चों को पढ़ाया। तेजस्वी सिर्फ बोलते हैं, जो किया है पीएम मोदी ने किया है।”

मधु कुमारी कहती हैं, “महिलाएँ आगे बढ़ रही हैं। वे आत्मनिर्भर बन रही हैं। पीएम मोदी बहुत अच्छा कर रहे हैं। मैं दिल्ली रहती थी, अब यहाँ BPSC से टीचर बन गई हूँ।”

देखिए ग्राउंड रिपोर्ट

कटिहार में बांग्लादेश सीमा पर मुस्लिम क्यों नकार रहे घुसपैठ की हकीकत, NRC-CAA का भी विरोध: डेमोग्राफी में बदलाव दिखा रही असलियत

बिहार विधानसभा चुनाव में ग्राउंड रिपोर्टिंग के लिए ऑपइंडिया की टीम सीमांचल के कटिहार पहुँची, जो बांग्लादेश सीमा से सटा है। यहाँ घुसपैठ बड़ा मुद्दा है, लेकिन स्थानीय मुस्लिम आबादी इसे अफवाह या राजनीतिक एजेंडा बताकर नकार रही है।

कटिहार में मुस्लिम आबादी 44% है, जो 1951 से 16% बढ़ चुकी। बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठिए आ रहे हैं, हिंदू अल्पमत होकर पलायन कर रहे।

एक स्थानीय मुस्लिम निवासी ने कहा, “यह BJP का वोट बैंक गेम है, हम देसी हैं, कोई घुसपैठ नहीं।” लेकिन हिंदू ग्रामीणों का कहना है, “लैंड ट्रांसफर अनौपचारिक तरीके से हो रहा, सुरजापुरी मुस्लिम ब्रदरहुड का नाम लेकर शेरशाहाबादी घुसपैठिए बस रहे।”

NRC-CAA का विरोध इसलिए क्योंकि वे डरते हैं कि असली घुसपैठिए पकड़े जाएँगे। कटिहार जैसे इलाकों में डेमोग्राफी चेंज नेशनल सिक्योरिटी थ्रेट है। असलियत ये है कि यहाँ भारी घुसपैठ हो रही है, लेकिन इसे स्वीकारना मुश्किल है।

देखें ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट

सीतामढ़ी में ध्रुव राठी फैन तेजस्वी के रोजगार वादे से भड़का, लेकिन मोदी रैली में NDA की तारीफें गूँजीं: महागठबंधन की राह मुश्किल क्यों?

बिहार विधानसभा चुनाव में ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट टीम माँ सीता की जन्मभूमि सीतामढ़ी पहुँची, जहाँ पीएम नरेंद्र मोदी ने भव्य रैली की। पीएम मोदी की रैली में भारी भीड़ उमड़ी। इस दौरान ज्यादातर लोग NDA केविकास और नीतीश कुमार की साफ छवि की तारीफ कर रहे थे। एक ध्रुव राठी फैन ने तेजस्वी यादव के जॉब प्रॉमिस पर भरोसा जताया, लेकिन जंगलराज के काले इतिहास को भूलने की बात पर लोग भड़क गए।

रैली में एक स्थानीय युवक ने कहा, “तेजस्वी के वादे सुन-सुनकर थक गए, लालू राज में बेरोजगारी चरम पर थी। NDA ने सड़कें, बिजली दी है।” अल्पमत में कुछ लोग तेजस्वी को मौका देने की बात कह रहे थे, लेकिन बहुमत ने इसे खारिज किया।

अनुराग मिश्रा की रिपोर्ट बताती है कि महागठबंधन की राह कठिन क्यों है- विकास की कमी और पुराने घोटालों का बोझ। सीतामढ़ी जैसे इलाकों में NDA का जलवा साफ दिखा।

देखें पूरी ग्राउंड रिपोर्ट

‘राहुल गाँधी से जरूरी नमाज’: अररिया में जब उल्टे पाँव लौटते दिखी मुस्लिम भीड़, कॉन्ग्रेस नेता मंच से देते रहे भाषण

बिहार के अररिया में राहुल गाँधी की रैली में भीड़ उल्टे पाँव लौटते दिखाई दी। राहुल गाँधी के मंच पर आने से पहले जो भीड़ थी, वो मंच पर आते ही कम होती चली गई। ये भीड़ मुस्लिमों की है। उनका कहना है कि राहुल गाँधी से ज्यादा जरूरी नमाज है।

हाल ऐसा रहा कि उधर राहुल गाँधी मंच से भाषण दे रहे थे और इधर रैली में आए लोगों ने भाषण सुनने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखी। रैली से वापस जाने वाले हर व्यक्ति के पास अपना कोई बहाना था। कोई पानी पीने के बहाने, कोई दवाई लाने के बहाने, तो कोई खाना खाने की बात कहकर रैली से खिसक लिया।

लोगों का कहना है कि राहुल गाँधी को देखना तो अच्छा लगता है लेकिन अररिया में उनके विधायक ने अब तक उनके लिए कुछ काम नहीं किया है।

देखिए लोगों ने क्या कुछ कहा, ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट में

भूत का भय या विस्थापन की पीड़ा: सामान्य नहीं है Netflix पर छाने वाली ‘बारामूला’ की कहानी, शिवलिंग से लेकर घंटियों की आवाज बयां करती हैं कश्मीरी पंडितों का दर्द

कश्मीर की घाटी जितनी खूबसूरत दिखती है, उतनी ही गहरी उनमे दबी पंडितों की एक कहानी है- नरसंहार की, पलायन की, पहचान खोने की और बिछड़ने की। निर्देशक आदित्य सुहास जंभाले और निर्माता आदित्य धार की Netflix पर आई फिल्म बारामूला (Baramulla) उसी कहानी को भीतर समेटे हुए चलती है। यह सिर्फ एक हॉरर फिल्म नहीं है बल्कि एक ऐसा भावनात्मक अनुभव है जो कश्मीरी पंडितों के सालों पुराने दर्द को नए अंदाज में सामने लाती है।

फिल्म की मुख्य कहानी DSP रिदवान सय्यद (अभिनेता मानव कौल) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो घाटी में बच्चों के रहस्यमय ढंग से गायब होने की जाँच कर रहे हैं। DSP की बीवी गुलनार (अभिनेत्री भाषा सुंबली) और उनका छोटा बेटा उस डरावने माहौल में धीरे-धीरे ऐसी चीजे महसूस करने लगते हैं, जो किसी सामान्य इंसान की समझ से परे है। फिल्म की शुरुआत से ही एक बेचैनी महसूस होती है, जैसे घाटी की ठंडी हवा में कोई आत्मा भटक रही हो, कोई जो लौटना चाहती हो, कोई जो अब भी अपनी जमीन तलाश रही है।

इसी डर और रहस्य के बीच फिल्म धीरे-धीरे हमें उस पुराने कश्मीरी पंडित परिवार की यादों में ले जाती है, जिसका घर अब किसी और का हो चुका है। कैमरा जब उस घर के कोनों में घूमता है तो बंद कमरे में शिवलिंग, घर की दीवारों पर लटकी तस्वीरें, पुराने लकड़ी के दरवाजे, बर्फ में ढकी खिड़कियों से लगता है जैसे हर चीज किसी खोए हुए जीवन का सबूत दे रही हो। यही वह जगह है, जहाँ फिल्म का हॉरर और पंडितों का दर्द एक-दूसरे में घुल जाते हैं।

बारामूला फिल्म में दिखाया गया डर सिर्फ आत्माओं का नहीं है बल्कि उस अदृश्य भय का है जो हर विस्थापित कश्मीरी पंडित के मन में आज भी है- ‘क्या हम कभी वापस जा पाएँगे?’ फिल्म सिर्फ यह नहीं दिखाती कि कैसे कश्मीरी पंडितों को घाटी से निकाला गया बल्कि यह दिखाती है कि उनके जाने के बाद घाटी कैसे बदल गई। जो घर कभी उनके थे, अब वो अजनबियों के हैं। उन घर में आज भी पूजा की घंटियाँ गूँजती हैं, जहाँ हिंदू भगवान का वास आज भी है लेकिन यह सब सन्नाटे की तरह है।

मानव कौल का किरदार रिदवान, जो खुद कश्मीर घाटी से ही है। वह धीरे-धीरे उस रहस्य की परतें खोलते हुए महसूस करता है कि जो बच्चे गायब होने की घटनाएँ हो रहीं है, वो सिर्फ सुपरनैचुरल नहीं बल्कि इतिहास के जख्म हैं। फिल्म यह ऐहसास दिलाती है कि कुछ दर्द इतने गहरे होते हैं कि वो मिट्टी में समा जाते हैं और जब कोई उस मिट्टी को कुरेदता है तो वही पुराने साये लौट आते हैं।

भाषा सुंबली, जो खुद ‘द कश्मीर फाइल्स’ में कश्मीरी पंडितों की पीड़ा का चेहरा बन चुकी हैं, यहाँ गुलनार के किरदार में एक और बार उस दर्द को जीवित करती हैं। जब वह अपने घर के कोनों में कुछ अनजानी आवाजे सुनती है या पुराने सपनों में किसी का नाम पुकारती है तो जैसे उसकी आत्मा किसी और के अतीत से टकरा रही है। शायद यह वही अतीत है, जो कभी किसी कश्मीरी पंडित परिवार का था।

फिल्म का हॉरर साइड जितना डर पैदा करता है, उतना ही वह सवाल भी खड़े करता है- क्या ये आत्माएँ सच में मरी हुई हैं या वे लोग जो जिंदा रहते हुए भी अपनी पहचान खो बैठे? क्या इन बच्चों के गायब होने की कहानी सिर्फ रहस्य है या वो उस खोई हुई पीढ़ी का दर्द है, जो अपने घरों से उखाड़ी गई और इतिहास की परछाइयों में खो गई?

आदित्य सुहास जंभाले ने इस फिल्म में कश्मीर को सिर्फ एक पृष्ठभूमि नहीं बल्कि एक जिंदा किरदार बना दिया है। यहाँ बर्फ, हवा, सन्नाटा सब बोलते हैं। कैमरा जब पहाड़ों से गुजरता है तो लगता है जैसे वो खुद दर्द बयां कर रहे हों। यह दर्द सिर्फ फिल्म के पात्रों का नहीं है बल्कि हर उस कश्मीरी पंडित का है, जिसने अपने बचपन की गलियाँ खो दी। यहाँ उस दर्द को दर्शक भी महसूस कर पा रहा है।

फिल्म के एक सीन में जब DSP रिदवान पुराने घर की फर्श के नीचे से कुछ चीजे निकालता है। इनमें बच्चों के खिलौने, टूटी तस्वीरें, पुराने दस्तावेज कोई भूतिया रहस्य से ज्यादा एक मानवीय त्रासदी बन जाता है। दर्शक समझ जाता है कि यह कहानी भूतों की नहीं बल्कि उन जिंदा लोगों की है, जिन्हें अपने ही घरों से भूत बना दिया गया। जो फिल्म का आधा हिस्सा खत्म होने के बाद सामने आता है।

बारामूला इस बात को बहुत खूबसूरती से कहती है कि कश्मीरी पंडितों का दर्द सिर्फ इतिहास नहीं है, वह अब भी जिंदा है, अब भी सिसक रहा है और अब भी घाटी की ठंडी हवा में बहता है। यह फिल्म याद दिलाती है कि विस्थापन सिर्फ जमीन खोना नहीं होता बल्कि अपने देवताओं, अपनी भाषा, अपने त्योहारों और अपनी यादों से कट जाना होता है।

अंत के 20 मिनट फिल्म को हॉरर से सन्नाटे में बदल देते हैं। सालों पहले घाटी में हुए नरसंहार की कहानी फिल्म के किरदारों को जीवंत दिखाई देती है। एक परिवार, जिसके साथ धोखा हुआ है। वही धोखा जो फिल्म के अंत में क्लाइमेक्स बन जाता है। फिल्म प्रेमी भी सोचने पर मजबूर हो जाते हैं कि असली हॉरर किसी भूत या चुड़ैल का नहीं बल्कि उस खोए हुए अतीत का है, जिसे हमने देखने से इनकार कर दिया।

बारामूला फिल्म अपने भीतर कश्मीरी पंडितों की चीख समेटे हुए है। एक ऐसी चीख जो दिखती नहीं, सुनाई नहीं देती पर उसे महसूस किया जा सकता है। यह फिल्म डर नहीं दिखाती बल्कि बताती है कि जब कश्मीरी पंडितों ने अपनी जमीन, अपनी पहचान और अपना घर खो दिया तो उनकी आत्मा आज भी भटक रही है।

ऑपइंडिया ने भी कश्मीरी पंडितों के पलायन और नरसंहार को लेकर हमेशा आवाज बुलंद की है, इससे जुड़े आर्टिकल पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।

इबादतगाह को छोड़ क्यों मजहबी भीड़ को सुहाती हैं खुली सड़कें और एयरपोर्ट, समझिए ये अकीदा है या शक्ति प्रदर्शन?

कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु के इंटरनैशनल कैम्पेगौड़ा एयरपोर्ट पर कुछ लोगों के खुले में नमाज पढ़ने का एक वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल है। कर्नाटक बीजेपी के प्रवक्ता विजय प्रसाद ने अपने X हैंडल पर नमाज पढ़ते लोगों के फोटो और वीडियो शेयर किए हैं। विजय प्रसाद ने लिखा है कि यह बेंगलुरु अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के टी2 टर्मिनल के अंदर इसकी अनुमति कैसे दी गई है।

विजय प्रसाद ने इस घटना को लेकर सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठाए हैं। सोशल मीडिया पर इसी तरह के तमाम सवाल उठाए जा रहे हैं। इस बीच एक और सवाल जो उठ रहा है वो ये कि मजहब विशेष के लोगों द्वारा सार्वजनिक जगहों पर नमाज पढ़ना जैसी गतिविधि करना का क्या ताकत दिखाने की कोशिश है?

ये सवाल इसलिए भी उठ रहा है क्योंकि लगभग सभी बड़े एयरपोर्ट्स की तरह ही कैम्पेगौड़ा एयरपोर्ट पर पूजा या इबादत करने के लिए बाकायदा कक्ष बनाए गए हैं। बेंगलुरु एयरपोर्ट की वेबसाइट के मुताबिक, एयरपोर्ट के दोनों टर्मिनल (T-1, T-2) के पास Multi-Faith Prayer Rooms यानि सर्व धर्म प्रार्थना कक्ष बने हुए हैं। जहाँ जाकर किसी भी धर्म या पंथ के लोग अपनी प्रार्थना कर सकते हैं।

बेंगलुरु एयरपोर्ट का सर्व धर्म प्रार्थना कक्ष (फोटो- Instagram/BLR Airport)

यह सब जानने-समझने के बाद अब सवाल वही है कि जब सुविधा उपलब्ध है, तब भी सार्वजनिक जगह पर नमाज पढ़ना क्या केवल अकीदे का ही प्रदर्शन है या फिर किसी तरह का शक्ति प्रदर्शन? क्योंकि यह कोई इकलौती घटना नहीं है। मुंबई एयरपोर्ट से लेकर लखनऊ के स्कूल, मॉल, रेलवे स्टेशन से लेकर कलेक्ट्रेट परिसर तक, इन सभी जगहों पर नमाज पढ़े जाने से जुड़ी खबरें इससे पहले भी सामने आई हैं और केवल मुट्ठी भर घटनाएँ हैं जिनका जिक्र हम कर रहे हैं।

कई मंदिरों तक में नमाज पढ़ने की घटनाएँ सामने आ चुकी हैं। बीते दिनों उत्तर प्रदेश के बदायूँ में एक मुस्लिम ने मंदिर में नमाज पढ़ी थी, मथुरा से भी ऐसा मामला सामने आया है। ऐसी घटनाओं और ऐसी वीडियोज की इंटरनेट पर भरमार है।

ईद की नमाज के दौरान सड़कें बंद किए जाने की कितनी ही घटनाएँ आपने सुनी और देखी होंगी। ईद पर तो कई बार प्रशासन खुद तय करता है कि कहाँ नमाज पढ़ी जाए और कहाँ नहीं, फिर भी सड़कों को बंद करने की घटनाएँ दिखती हैं। यह बात जुमे की नमाज के लिए भी कही जा सकती है। उस दिन भी नमाज के लिए सड़कों को जाम कर देने की लोगों की आदत बन गई है। इसकी वजह यह नहीं है कि आस-पास जगह खाली नहीं है, या कोई व्यवस्था नहीं है बल्कि वजह यह है कि लोगों को यह दिखना है कि वो कितने ताकतवर हैं।

नमाज पढ़ना इस्लाम का जरूरी हिस्सा है और उस मजहब के मानने वाले इसे पढ़ें यह किसी विवाद की बात नहीं है। विवाद इस बात पर है कि प्रशासन या कोई अथॉरिटी ‘मस्जिद, ईदगाह या प्रार्थना कक्ष’ जैसे वैकल्पिक स्थान मुहैया करवाती है तो फिर नमाज पढ़ने के लिए सार्वजनिक स्थल को चुना क्यों जाता है? क्या यह अपनी उपस्थिति का संदेश देने और खुद की मौजूदगी का एहसास कराने की कोशिश नहीं लगती है? क्या ऐसा नहीं लगता है कि एक मजहब विशेष के लोग यह साबित करना चाहते हैं कि आप उनकी मौजूदगी को समझें, महसूस करें और शायद डरें भी?

जब कोई समुदाय बार-बार सार्वजनिक स्थानों पर एकजुट होकर अपने अकीदे का प्रदर्शन करता है, तो यह स्वाभाविक रूप से एक संदेश की तरह होता है। यह संदेश होता है कि हम एकजुट हैं और अब तुमसे दबने वाले नहीं हैं। यह उनकी अपनी कथित असुरक्षा को ताकत के दम पर जीतने की कोशिश होती है। यही वजहें कई बार फिर विवाद को भी जन्म दे देती हैं।

नवंबर 2021 की बात है, खुले में नमाज को लेकर राजधानी दिल्ली से सटे गुरुग्राम में हिंदू और मुस्लिमों के बीच विवाद की नौबत आ गई। यहाँ लोग बार-बार यह माँग कर रहे थे कि खुले में नमाज ना पढ़ी जाए। खूब प्रदर्शन हुए और आखिरी में थक हारकर लोगों से सार्वजनिक जगहों पर गोवर्धन पूजा कर दी। इससे AIMIM के चीफ असदुद्दीन ओवैसी इससे तिलमिला गए। वो इसे मुस्लिमों के प्रति नफरत बताने लगे लेकिन फिर सवाल वही उठता है कि क्या सड़क, चौक, चौराहों पर नमाज पढ़कर शक्ति प्रदर्शन करना भी किसी खास धर्म के प्रति नफरत का ही नतीजा है।

समुदाय जब अपनी ऐसी हरकतों के चलते अपने विरोध की जमीन भी तैयार करने लगे हैं। लोगों को आने-जाने में समस्याएँ आती हैं तो स्वाभाविक तौर पर उनका गुस्सा निकलता है और यह विरोध की वजह बन जाता है। हर धर्म, पंथ, मजहब को अपने रीति-रिवाजों का पालन करने की पूरी आजादी होनी चाहिए लेकिन यह जिम्मेदारी के साथ होनी चाहिए।

अगर एयरपोर्ट, स्टेशन या किसी सार्वजनिक स्थान पर पहले से प्रार्थना कक्ष या निर्धारित जगह है तो उसका उपयोग करना ही कानून सम्मत होना चाहिए। लोगों को यह छूट नहीं मिलनी चाहिए कि वो अपने अकीदे के नाम पर दूसरों के लिए समस्याएँ पैदा कर सकें।

हिंदू हो या मुस्लिम, दूसरी शादी/ निकाह करने पर होगी जेल-ST को छूट: जानिए कैबिनेट से पास हुए बहुविवाह निषेध विधेयक 2025 की अहम बातें

असम में ‘बहुविवाह निषेध कानून’ लागू करने की दिशा में कदम बढ़ा दिया है। इसके लागू होने के साथ ही असमवासी एक से ज्यादा शादी तब तक नहीं कर सकता, जब तक की उसका पार्टनर जिंदा है या उसने उसे तलाक नहीं दे दिया है। अगर व्यक्ति एक से ज्यादा विवाह करने का दोषी पाया गया, तो उसे 7 साल जेल की सजा हो सकती है।

बहुविवाह यानी एक से ज्यादा विवाह। पुरुष हो या स्त्री दोनों के एक ही वक्त में एक से ज्यादा विवाह प्रतिबंधित होगा। बहुविवाह पर रोक लगाने के लिए ये कानून बनाया जा रहा है। एक समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा में ये एक बड़ा कदम माना जा रहा है। सरकार के मुताबिक, कानून का उद्देश्य महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करना और धार्मिक आधार पर समाज में समानता लाना है।

सीएम हिमंता सरमा के मुताबिक, नए कानून के लागू होने के बाद, बहुविवाह के मामलों में गैर-जमानती अपराध के रूप में मुकदमा दर्ज किया जाएगा। मुख्यमंत्री ने यह भी बताया कि सरकार बहुविवाह से पीड़ित महिलाओं के लिए मुआवजे का एक विशेष कोष स्थापित करेगी, जिससे उन्हें आर्थिक सहायता दी जा सके।

असम के सीएम सरमा ने कहा, “हम चाहते हैं कि कोई भी महिला इस स्थिति में आर्थिक तंगी का सामना न करे, इसलिए सरकार उनकी मदद के लिए आगे आएगी।” हालाँकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि यह कानून छठी अनुसूची के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों और जनजातीय समुदायों पर लागू नहीं होगा।

महिला कोष बनाएगी असम सरकार

पुरुष के जेल जाने के बाद महिला का क्या होगा? या, अगर वह पुरुष की जानकारी के बिना उसकी दूसरी पत्नी है, तो महिला ही पीड़ित है। कभी-कभी, पुरुष द्वारा दूसरी महिला से शादी करने के बाद पहली पत्नी को घर से निकाल दिया जाता है। इसलिए, यह सुनिश्चित करने के लिए कि कोई महिला पीड़ित न बने, असम सरकार एक सहायता राशि महिलाओं को देगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि मुआवजे की राशि और पात्रता के मानदंड नियम बनने पर तय किए जाएँगे।

ऐसा कानून लाने वाला असम देश का पहला राज्य होगा। राज्य के बराक घाटी, मध्य असम के जमुनामुख और होजई में बांग्ला भाषी मुस्लिम की तादाद ज्यादा है। इन क्षेत्रों में बहुविवाह के केस ज्यादा आते हैं।

जनजातीय समुदाय पर लागू नहीं होगा कानून

असम कैबिनेट ने जिस ‘असम बहुविवाह निषेध विधेयक, 2025’को मंजूरी दी है, उसे 25 नवंबर को राज्य विधानसभा में पेश किए जाने की उम्मीद है। विधेयक के कानून बनने के बाद भी जनजातीय समुदाय पर ये लागू नहीं होगा। उन्हें इस कानून से छूट दी गई है। इनमें बहुविवाह हो सकता है। राज्य के बीटीएडी, दिमा हसाओ और कार्बी आंगलोंग जैसे जनजातीय समुदाय की बहुतायत है।

विधेयक के तहत छूट के बारे में सीएम सरमा ने कहा, “आदिवासी लोगों को इससे बाहर रखा जाएगा क्योंकि उनके कुछ रीति-रिवाज हैं। और छठी अनुसूची के ज़िलों में, जो बीटीसी (बोडोलैंड प्रादेशिक परिषद), दीमा हसाओ और कार्बी आंगलोंग में आते हैं, ये विधेयक तुरंत लागू नहीं होंगे… इसलिए छठी अनुसूची के क्षेत्रों में, अगर कोई अल्पसंख्यक मुसलमान 2005 से पहले वहाँ रहा है, तो उसे भी छूट दी जाएगी।”

कैसे तैयार हुआ ‘असम बहुविवाह विधेयक’ का मसौदा

राज्य में बहुविवाह की प्रथा को खत्म करने संबंधी कानून का मसौदा तैयार करने के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया गया था। इसमें राज्य के महाधिवक्ता देवजीत सैकिया, पुलिस महानिदेशक ज्ञानेन्द्र प्रताप सिंह और लिगल एडवाइजर कुंतल शर्मा शामिल थे।

जस्टिस फूकन समिति ने समान नागरिक संहिता, राज्य के नीति निदेशक तत्व और अनुच्छेद 25 में दिए गए मूल अधिकार के साथ-साथ मुस्लिम पर्सनल लॉ अधिनियम 1937 के प्रावधानों की भी जाँच की। इस दौरान समिति ने 45 दिनों में विधेयक के लिए मसौदा तैयार कर लेने की बात कही।

असम को बहुविवाह कानून बनाने का अधिकार

असम सरकार ने पहले इस बात का पता लगाया कि राज्य विधायिका को ऐसा कानून बनाने का अधिकार है या नहीं। राज्य विधायी शक्तियों की जाँच के लिए गुवाहाटी हाईकोर्ट के रिटायर पूर्व जस्टिस रूमी फूकन की अध्यक्षता में समिति बनाई गई। इस समिति ने अपनी रिपोर्ट में साफ किया कि असम सरकार को बहुविवाह पर कानून बनाने का अधिकार है।

राज्य सरकार ने बहुविवाह पर विधानसभा में ‘असम बहुविवाह निषेध विधेयक 2025’ लाने से पहले जनता से राय भी माँगी। इस पर जनता ने अपनी प्रतिक्रिया दी और सरकार के कानून बनाने का समर्थन किया।

बहुविवाह का प्रचलन

1961 में जनगणना के वक्त 1 लाख सैंपल लेकर बहुविवाह पर सर्वे किया गया था। उस वक्त ये बात सामने आई थी कि मुस्लिम में बहुविवाह का प्रतिशत 5.6 था, जो देश में सबसे अधिक था।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) के 2019-2020 के आँकड़ों से पता चलता है कि हिंदुओं की 1.3 फीसदी, मुसलमानों की 1.9 फीसदी, ईसाइयों में 2.1फीसदी और दूसरे धार्मिक समूहों की 1.6 फीसदी लोग बहुविवाह करते हैं। जनजातीय क्षेत्रों में ये ज्यादा होता है, इसलिए पूर्वोत्तर में बहुविवाह का प्रचलन ज्यादा है।

भारत में बहुविवाह पर कानूनी स्थिति

भारत में हिन्दू, सिख, ईसाई, पारसी, जैन आदि के लिए बहुविवाह प्रतिबंधित है। हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 के मुताबिक, एक वक्त पर एक पुरुष या स्त्री सिर्फ एक शादी के बंधन में रह सकता है। इस कानून के द्वारा हिंदू बहुविवाह को समाप्त कर दिया गया और इसे अपराध माना गया।

इस अधिनियम की धारा 17 और भारतीय दंड संहिता,1860 की धारा 494 और 495 के तहत बहुविवाह करने पर सजा का प्रावधान है। हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 न सिर्फ हिन्दुओं बल्कि सिखों, जैनों, बौद्धों पर भी लागू होता है। क्योंकि इनका अपना कोई अधिनियम नहीं है।

पारसी विवाह और तलाक अधिनियम 1936 के तहत पारसियों के बहुविवाह पर रोक लगा दी गई। पहले उनकी दो शादियों को समाज में मान्यता थी। लेकिन कानून लागू कर तय कर दिया गया कि कोई भी पारसी स्त्री या पुरुष एक समय पर एक शादी के बंधन में ही रह सकता है।

लेकिन मुस्लिम पुरुषों को धार्मिक कानून के तहत एक साथ 4 बीवियों को रखने का अधिकार है। मुस्लिम पर्सनल लॉ के शरिया एप्लीकेशन अधिनियम 1937 के तहत, मुस्लिम पुरुष एक ही वक्त पर चार बीवियाँ रख सकते हैं। हालाँकि उन्हें सबके साथ समान व्यवहार करने की शर्त रखी गई है। लेकिन ये कानून मुस्लिम महिलाओं पर लागू नहीं होता है। यहाँ तक कि स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 में भी बहुविवाह पर प्रतिबंध लगाया गया है। अलग-अलग धर्म के पुरुष-स्त्री की शादी इस एक्ट के अंतर्गत आते हैं।

बहुविवाह का मामला मुस्लिम पुरुषों तक ही सीमित है, जो एक से ज्यादा बीवी कानूनी तौर पर रख सकते हैं। इसलिए असम में बनने वाला कानून मुस्लिम पुरुषों को भी एक से ज्यादा निकाह करने पर प्रतिबंध लगाएगा। भारत की न्याय संहिता 2023 के तहत, बहुविवाह को एक अपराध माना ही जाता है। एक समान नागरिक संहिता की दिशा में यह एक बड़ा पहल होगा।