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भानु बनकर अमेरिका में छिपा था लॉरेंस बिश्नोई का भाई अनमोल, भारत लाने की कोशिशों में जुटी CBI: बाबा सिद्दीकी के मर्डर में तलाश, NIA ने रखा है ₹10 लाख का इनाम

अनमोल बिश्नोई अमेरिका में पकड़ा गया है। वह गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई का छोटा भाई है। बाबा सिद्दीकी की हत्या में उसकी तलाश थी। राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने उस पर 10 लाख का इनाम घोषित कर रखा है।

अनमोल को FBI (फेडरल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन) ने गुरुवार (14 नवंबर 2024) को कैलिफोर्निया से हिरासत में लिया। अमेरिकी विदेश विभाग ने इस मामले में टिप्पणी से इनकार किया है। उसे प्रत्यर्पित कर भारत लाने की कोशिशों में सीबीआई जुट गई है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक अनमोल बिश्नोई 15 मई 2022 को फर्जी कागजातों के सहारे अमेरिका चला गया था। उसने भानू नाम से पासपोर्ट बनवा रखा है। अमेरिकी एजेंसियों को उसके दस्तावेजों में एक कागज फर्जी मिला था और आखिर में उसका भांडा फूट गया। अनमोल बिश्नोई को भारत लाने के लिए CBI (केंद्रीय जाँच ब्यूरो) ने शुक्रवार (15 नवंबर 2024) को FBI के आधिकारियों से मीटिंग की है।

बताया जा रहा है कि लगभग 45 मिनट चली मीटिंग में CBI ने FBI को अनमोल बिश्नोई के खिलाफ भारत में दर्ज तमाम आपराधिक केसों के सबूत दिए गए। इन केसों में बाबा सिद्दीकी की हत्या और मुंबई में ही बॉलीवुड अभिनेता सलमान खान के घर के बाहर फायरिंग भी शामिल है।

हालाँकि अमेरिकी विदेश विभाग के अधिकारी अनमोल बिश्नोई के मुद्दे पर कुछ भी बोलने के लिए तैयार नहीं हैं। स्टेट डिपार्टमेंट के प्रवक्ता मैथ्यू मिलर से इस बावत सवाल हुआ तो उन्होंने टिप्पणी करने से इनकार दिया दिया।

बताते चलें कि अनमोल बिश्नोई पर राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने 10 लाख रुपए का इनाम भी घोषित कर रखा है। यह इनाम अक्टूबर 2024 में घोषित किया गया था। अनमोल साल 2022 में NIA द्वारा दर्ज 2 अलग-अलग केसों में वांटेड है। इन मुकदमों में उसके खिलाफ चार्जशीट भी लग चुकी है। इसी साल सितंबर महीने में राजस्थान पुलिस ने अनमोल बिश्नोई के खिलाफ कुल 31 केस दर्ज होने की जानकारी दी थी। इसमें से 22 मुकदमे राजस्थान में दर्ज हैं।

अनमोल के खिलाफ 6 दिसंबर 2022 को उसके खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस भी जारी हुआ था। साल 2023 में अनमोल को अमेरिका के कैलिफोर्निया में एक शादी समारोह में देखा गया था। दिल्ली पुलिस के भी मुताबिक जेल में बंद लॉरेंस बिश्नोई के गिरोह की कमान अनमोल बिश्नोई ही सँभालता है। यह एक संगठित अपराध वाला गिरोह है जो न सिर्फ हत्याएँ करवाता है, बल्कि दहशत बना कर उगाही भी करता है।

दावा- पंजाब में कम हुई पराली जलाने की घटना, हकीकत- नासा के भी उपग्रहों को चकमा दे रहे हैं किसान: यूँ ही नहीं घुट रहा दिल्ली का दम, जहरीली हवा के पीछे की सच्चाई जानिए

दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण की समस्या हर साल सर्दियों में गंभीर रूप ले लेती है, जिसमें पराली जलाने की घटनाओं को प्रमुख कारण बताया जाता है। हालाँकि, इस साल सैटेलाइट डेटा से संकेत मिले हैं कि पराली जलाने के मामलों में भारी गिरावट आई है। पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में 2023 के मुकाबले 2024 में पराली जलाने की घटनाओं में 71% तक की कमी बताई गई। लेकिन विशेषज्ञों ने इन आँकड़ों पर सवाल उठाए हैं। उनका दावा है कि किसान सैटेलाइट निगरानी से बचने के लिए समय बदलकर पराली जला रहे हैं।

सैटेलाइट से बचने की रणनीति?

विशेषज्ञों ने पाया है कि किसान अब दिन के ऐसे समय में पराली जला रहे हैं जब निगरानी करने वाले सैटेलाइट उस क्षेत्र के ऊपर नहीं होते। नासा की फायर इनफॉर्मेशन फॉर रिसोर्स मैनेजमेंट सिस्टम (FIRMS) और अन्य सैटेलाइट्स का उपयोग आग की घटनाओं की निगरानी के लिए किया जाता है। ये सैटेलाइट्स दिन में केवल कुछ घंटों के लिए क्षेत्र की तस्वीर लेते हैं।

नासा के वैज्ञानिक हीरेन जेठवा ने हाल ही में खुलासा किया कि किसान पराली जलाने के समय को इस तरह से बदल रहे हैं कि सैटेलाइट उनका पता नहीं लगा पाते। हिरण जेठवा ने बताया कि किसान अब दोपहर बाद और शाम को पराली जला रहे हैं, जब सैटेलाइट्स का निगरानी समय समाप्त हो चुका होता है।

यह निष्कर्ष दक्षिण कोरिया के जियो-स्टेशनरी सैटेलाइट GEO-KOMSAT 2A से मिले डेटा से पुष्टि हुआ, जिसने 2 बजे के बाद पंजाब में पराली जलने की घटनाओं में बढ़ोतरी दिखाई। कोरियाई जियोस्टेशनरी सैटेलाइट्स की मदद से पता चला कि किसान ज्यादातर पराली दोपहर बाद और शाम को जलाते हैं, जब नासा के सैटेलाइट वहां से गुजर चुके होते हैं।

जमीनी हालात और सरकारी आँकड़ों में अंतर

रिपोर्ट्स के मुताबिक, पंजाब में 2021 में लगभग 79,000 पराली जलाने की घटनाएँ दर्ज की गई थीं, जबकि 2023 में यह घटकर 32,000 रह गई। इस साल 10 नवंबर तक यह संख्या केवल 6,611 बताई गई। हरियाणा में भी मामलों में कमी आई है। लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि केवल घटनाओं की संख्या कम होने से समस्या खत्म नहीं होती।

नासा और दक्षिण कोरिया के सैटेलाइट्स से मिले डेटा में अंतर ने इन आँकड़ों को लेकर सवाल उठाए हैं। जहाँ नासा का डेटा दोपहर 1:30 से 2 बजे तक सीमित है, वहीं दक्षिण कोरियाई सैटेलाइट ने दिखाया कि पराली जलाने की ज्यादातर घटनाएँ दोपहर बाद और शाम को हुईं।

कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि आँकड़ों की गिरावट पराली जलाने के असली मामलों को नहीं दिखाती। नासा के वैज्ञानिक हिरण जेठवा के मुताबिक, “अगर पराली जलाने की घटनाओं में इतनी कमी आई है, तो एरोसोल ऑप्टिकल डेप्थ (AOD) यानी वायु में कणीय प्रदूषण के स्तर में गिरावट क्यों नहीं आई?” AOD के आँकड़े बताते हैं कि प्रदूषण का स्तर पिछले छह-सात सालों में स्थिर बना हुआ है।

दिल्ली और इसके आसपास के क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) ‘गंभीर’ श्रेणी में बना हुआ है। शुक्रवार (15 नवंबर 2024) को दिल्ली का AQI 428 रिकॉर्ड किया गया, जो इस सीजन का सबसे खराब स्तर है।

सरकारी प्रयासों पर फिरता दिख रहा है पानी

पंजाब सरकार ने पराली जलाने की समस्या के समाधान के लिए कई कदम उठाए हैं। इसमें कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG) प्लांट स्थापित करना भी शामिल है, जो पराली को ऊर्जा के रूप में उपयोग करने का स्थायी समाधान माना जाता है। लेकिन किसानों के विरोध के चलते केवल पाँच प्लांट ही काम कर रहे हैं, और वे भी पूरी क्षमता पर नहीं हैं। इसके अलावा, कृषि उपकरणों पर सब्सिडी देने और किसानों को जागरूक करने जैसे प्रयास भी किए गए। हरियाणा में इस दिशा में कुछ सफलता मिली है, लेकिन पंजाब में स्थिति में सुधार सीमित है।

सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद भी सुधार नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले में हस्तक्षेप किया है। कोर्ट ने केंद्र सरकार और वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) को निर्देश दिया कि वे स्थाई सैटेलाइट्स जैसे जियो-स्टेशनरी सैटेलाइट्स से डेटा प्राप्त करें, ताकि दिनभर के दौरान पराली जलाने की घटनाओं पर निगरानी रखी जा सके। कोर्ट ने कहा कि इस डेटा का उपयोग तुरंत कार्रवाई के लिए किया जाना चाहिए।

भले ही आँकड़ों में पराली जलाने के मामलों में कमी दिखाई गई हो, लेकिन जमीनी हकीकत और प्रदूषण के स्तर में सुधार नहीं हो सका है। किसानों द्वारा सैटेलाइट से बचने की रणनीति ने इस समस्या को और जटिल बना दिया है। दीर्घकालिक समाधान के बिना, वायु प्रदूषण से संबंधित स्वास्थ्य समस्याएँ हर साल की तरह बढ़ती रहेंगी। पराली जलाना किसानों के लिए एक सस्ता और तेज तरीका है, जिससे वे अगली फसल की बुवाई के लिए खेत तैयार कर सकते हैं। हालाँकि, पराली जलाने के लिए वैकल्पिक समाधान जैसे कि बायोडिग्रेडेबल एजेंट्स, मशीनरी, और कृषि प्रबंधन कार्यक्रम मौजूद हैं, लेकिन इनका उपयोग सीमित है।

आतंकी नजीर अहमद वानी को UP ATS ने कश्मीर से पकड़ा, 30 साल से थी तलाश: देवबंद में पुलिस पर फेंका था ग्रेनेड, जमानत मिलते ही हो गया था फरार

उत्तर प्रदेश के आतंकवाद निरोधक दस्ते (ATS) ने सहारनपुर पुलिस के साथ मिलकर 30 साल से फरार चल रहे हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकी नजीर अहमद वानी को गिरफ्तार कर लिया। नजीर, जो जम्मू कश्मीर के बड़गाम जिले का रहने वाला है, पर 1993 में उत्तर प्रदेश के देवबंद में पुलिसकर्मियों पर हमले का मामला दर्ज था। इस हमले का मकसद पुलिसकर्मियों की हत्या करना था और उस पर 25 हजार रुपए का इनाम भी घोषित था।

सहारनपुर पुलिस के मुताबिक, 26 अगस्त 1993 को देवबंद के यूनियन तिराहे पर कुछ पुलिसकर्मी सुरक्षा के लिए तैनात थे। तभी एक ग्रेनेड फेंका गया, जिससे दो पुलिसकर्मी और जय प्रकाश सैनी व सुखबीर नाम के दो नागरिक घायल हो गए थे। इस हमले के बाद पुलिस ने IPC की धारा 307 (हत्या के प्रयास) और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम के तहत केस दर्ज किया था। जाँच में पता चला कि इस हमले का आरोपित नजीर अहमद वानी था, जो फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल कर लंबे समय से देवबंद में रह रहा था।

नजीर अहमद कश्मीर के बड़गाम जिले में थानाक्षेत्र पारिमपुरा के गाँव इन्जक शरीफाबाद का रहने वाला था। वह हिजबुल मुजाहिदीन का सक्रिय आतंकी था जो फर्जी दस्तावेजों के सहारे लम्बे समय से UP के देवबंद में रह रहा था। आखिरकार 26 मई 1994 को पुलिस ने नजीर अहमद वानी को गिरफ्तार कर लिया।

तब फर्जी कागजातों के इस्तेमाल की वजह से उस पर पुलिस ने एक अन्य केस दर्ज करवाया था। यह नई देवबंद थाने में ही FIR IPC (भारतीय दंड संहिता) की धारा 467, 468 और 471 के तहत दर्ज हुई थी। साल 1994 में ही नजीर अहमद की जमानत हो गई। तब से नजीर अहमद अदालत में कभी पेश नहीं हुआ। पिछले 30 वर्षों से भी अधिक समय से वह लगातार अपना नाम और पता बदल रहा था।

सहारनपुर पुलिस प्रेसनोट

लम्बे समय से फरार वारंटी नजीर अहमद वानी के खिलाफ 20 मई 2024 को सहारनपुर की एक अदालत ने स्थाई वारंट जारी किया। इस वारंट का सहारनपुर पुलिस ने संज्ञान लिया और नजीर अहमद की गिरफ्तारी के लिए 25 हजार रुपयों का इनाम घोषित किया। आरोपित की गिरफ्तारी के लिए सहारनपुर पुलिस के साथ ATS को भी लगाया गया।

आखिरकार रविवार (17 नवंबर 2024) को पुलिस ने उसे बड़गाम जिले के हाकर मुल्ला गाँव से गिरफ्तार कर लिया, जहाँ वह रह रहा था। हाकर मुल्ला गाँव सोईबुद्ध कस्बे के पास मौजूद है। जरूरी कानूनी कार्रवाई के बाद नजीर अहमद वानी को कश्मीर से सहारनपुर लाया गया और कोर्ट के सामने पेश किया गया। अदालत ने आरोपित को जेल भेज दिया है।

मणिपुर में बिहार के लोगों से हफ्ता वसूली, हिंसा के लिए महिला ब्रिगेड: रिपोर्ट से कुकी संगठनों की साजिश उजागर, दंगाइयों को छुड़ाकर भी ले जा चुकी हैं औरतें

मणिपुर में हिंसा फैलाने के लम्बी चौड़ी साजिश रची गई थी। इसके लिए कुकी आतंकी संगठनों ने महिला ब्रिगेड तैयार की। उनको हथियार की ट्रेनिंग दी। उन्होंने मणिपुर में काम के लिए बाहर से आने वालों से वसूली का भी प्लान बनाया था। यहाँ तक कि कुकी संगठनों ने खुद का ड्रोन सिस्टम तक तैयार किया।

न्यूज18 को मिली एक खुफिया रिपोर्ट के अनुसार, मणिपुर में कांग्लीपाक नेशनल पार्टी (KNP), कुकी नेशनल फ्रंट (KNF) और यूनाइटेड पीपल पार्टी ऑफ़ कांग्लीपाक (UPPK) ने मणिपुर के कई इलाकों में हिंसा के लिए साजिश रची है। रिपोर्ट में बताया गया है कि यह अपनी आतंकी गतिविधियाँ फंड करने के लिए बाहर से आने वाले कामगारों से वसूली करना चाहते हैं।

यह संगठन नेपाल और बिहार से मणिपुर पहुँचने वाले व्यापारियों से ₹1-1.5 लाख/महीने का वसूलने की साजिश रच चुके हैं। इसके अलावा यह सुरक्षाबलों की गतिविधियों पर की जासूसी भी कर रहे हैं। इन संगठनों ने KCP और KNF ने कादतन और चिखांग में सुरक्षाबलों की जासूसी के लिए एक ड्रोन सिस्टम लगाया है।

सुरक्षाबलों की जासूसी और लोगों से पैसा वसूलने के अलावा इन संगठनों ने हमला करने कि भी नई तकनीक निकाली थी। कुकी संगठनों ने अपना नुकसान कम करने और सुरक्षाबलों के हाथ बाँधने के लिए महिलाओं की ब्रिगेड तैयार की थी। इन संगठनों ने महिलाओं को हथियार चलाने कीई ट्रेनिंग दी है।

इन महिलाओं को 45 दिन की विशेष ट्रेनिंग इसी काम के लिए दी गई। कुकी संगठनों ने यह सोच कर यह ट्रेनिंग दी थी कि यदि महिलाएँ सुरक्षाबलों पर हमला करेंगी तो वह वापस जवाब भी देने में हिचकिचाएँगे और बाद में विक्टिम कार्ड भी खेला जा सकेगा।

यह बात बीते दिनों में देखी भी गई है। कई बार महिलाओं ने सुरक्षाबलों का रास्ता रोका है। 30 अप्रैल 2024 को भारतीय सेना अपने साथ वो हथियार और गोला बारूद लेकर जा रहे थे, जो उन्होंने बिष्णुपुर में कुछ वाहनों से जब्त किए थे। लेकिन, इस बीच रास्ते में महिलाओं का एक ग्रुप आया और काफिला रोककर 11 उपद्रवियों को रिहा कराया।

मणिपुर में बीते कुछ दिनों में हालात फिर बिगड़ गए हैं। यह हिंसा 6 लाशें मिलने के बाद चालू हुई है। लाशें मिलने के बाद रविवार को मणिपुर के अलग-अलग हिस्सों में भारी हिंसा हुई। लोगों ने सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन किया। कई जगह तोड़फोड़ भी हुई। कई भाजपा विधायकों के घरों को भी निशाने पर लिया गया है।

NDTV की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि यह मणिपुर सरकार में काम करने वाले हीरोजीत का परिवार था। उनके बेटे और सास के अलावा उनकी पत्नी, एक और बच्चा, पत्नी की बहन, बहन के बच्चे की भी कुकी लड़ाकों ने हत्या कर दी है।

कुकी लड़ाकों ने यह कार्रवाई CRPF से हुई एक मुठभेड़ के दौरान की थी। उन्होंने वापस लौटते समय इन 6 लोगों को अगवा कर लिया था और बाद में मार दिया। इससे पहले CRPF के साथ हुई मुठभेड़ में 11 कुकी लड़ाके मारे गए थे।

404 एकड़ जमीन, बसे हैं 600 हिंदू-ईसाई परिवार: उजाड़ना चाहता है वक्फ बोर्ड, जानिए क्या है केरल का मुनम्बम भूमि विवाद जिसे केंद्रीय मंत्री ने बताया ‘बर्बरता’

केरल के एर्नाकुलम जिले के मुनम्बम उपनगर में 404 एकड़ जमीन के वक्फ विवाद की काफी चर्चा हो रही है। इस जमीन विवाद की वजह से राजनीतिक दलों में भी सरगर्मी है। मुनम्बम में करीब 600 हिंदू और ईसाई परिवार इस जमीन पर वक्फ बोर्ड के दावे का विरोध कर रहे हैं।

वक्फ बोर्ड का कहना है कि यह जमीन 1950 में वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज की गई थी, जबकि यहाँ रहने वाले लोगों का दावा है कि उन्होंने इस जमीन को कानूनी रूप से दशकों पहले खरीदा था। इस विवाद ने राज्य के उपचुनावों के चलते राजनीतिक पार्टियों के बीच एक महत्वपूर्ण मुद्दा बना दिया है।

विवाद की ऐतिहासिक जड़

एर्नाकुलम जिले के मुनम्बम के तटीय क्षेत्र में वक्फ भूमि विवाद करीब 404 एकड़ जमीन का है। इस जमीन पर मुख्य रूप से लैटिन कैथोलिक समुदाय के ईसाई और पिछड़े वर्गों के हिंदू परिवार बसे हुए हैं। ये परिवार यहाँ दशकों से रह रहे हैं। केरल राज्य वक्फ बोर्ड ने 1950 के एक वक्फ डीड का हवाला देते हुए इस भूमि पर अपना स्वामित्व जताया है। दूसरी ओर, स्थानीय निवासियों का कहना है कि उन्होंने यह जमीन कानूनी रूप से फारूक कॉलेज से खरीदी थी, जिसे एक समय में इस संपत्ति का प्रबंधन सौंपा गया था।

यह विवाद 1902 से जुड़ा हुआ है, जब त्रावणकोर के शाही परिवार ने इस जमीन को एक प्रमुख व्यापारी अब्दुल सत्तार मूसा सैट को लीज पर दिया था। 1950 में, मूसा सैट के दामाद, मोहम्मद सिद्दीक सैट ने इस जमीन को वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज कर दिया और इसका प्रबंधन कोझिकोड के फारूक कॉलेज की प्रबंध समिति के अध्यक्ष को सौंपा। डीड में स्पष्ट रूप से लिखा गया था कि इस जमीन का उपयोग इस्लामी कानून के तहत परोपकारी और शैक्षिक उद्देश्यों के लिए किया जाएगा।

फारूक कॉलेज ने 1960 के दशक में जमीन पर बसे लोगों को हटाने की कोशिशें शुरू की, जिससे कानूनी लड़ाई छिड़ गई। इन निवासियों के पास अपने स्वामित्व के पुख्ता दस्तावेज़ नहीं थे, क्योंकि वे कई पीढ़ियों से इस जमीन पर बसे हुए थे। अंततः, कॉलेज प्रबंधन ने लोगों के साथ कोर्ट से बाहर समझौता करने का फैसला किया और बाजार मूल्य पर उन्हें जमीन के टुकड़े बेच दिए।

केंद्रीय मंत्री ने वक्फ पर लगाए ज्यादा हस्तक्षेप के आरोप

यह मामला अब एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया है। भाजपा नेताओं खासकर केंद्रीय मंत्री सुरेश गोपी ने वक्फ बोर्ड पर ज़्यादा हस्तक्षेप का आरोप लगाया। एक चुनावी रैली में गोपी ने वक्फ के दावों को “बर्बरता” करार दिया और इसे कानूनी उपायों से रोकने का वादा किया। उन्होंने कहा, “इस बर्बरता को भारत में रोका जाएगा… सच्चे संविधान को बनाए रखने के लिए यह विधेयक संसद में पारित होगा।”

भाजपा नेता बी गोपालकृष्णन ने इसे और आगे बढ़ाते हुए कहा कि सबरीमाला और वेलंकन्नी जैसे धार्मिक स्थलों को भविष्य में इसी तरह के दावों का सामना करना पड़ सकता है। उन्होंने मतदाताओं से भाजपा का समर्थन करने का आग्रह किया ताकि ऐसे परिणामों को रोका जा सके।

मुख्यमंत्री का रुख और मुस्लिम नेताओं की प्रतिक्रिया

मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने अपनी सरकार का बचाव करते हुए कहा कि वे मुनम्बम के लंबे समय से रह रहे लोगों के साथ खड़े हैं। उन्होंने भाजपा के अभियान को लोगों को गुमराह करने का प्रयास बताया।

वहीं, मुस्लिम नेताओं जैसे समसथा समूह के सदस्यों ने वक्फ बोर्ड की तरफदारी की। ओ एम थरुवाना ने सिराज डेली में लेख लिखते हुए निवासियों के लिए न्याय और वक्फ भूमि की बिक्री में शामिल लोगों की जवाबदेही की माँग की।

‘वक्फ का मतलब वक्फ ही रहेगा’

वक्फ शब्द का मतलब है रोकना, सीमित करना और निषेध करना। इस्लामी मान्यताओं के अनुसार, जब एक बार कोई संपत्ति वक्फ के रूप में समर्पित कर दी जाती है, तो वह हमेशा के लिए धार्मिक या परोपकारी उपयोग के लिए ही रह जाती है। शरीयत कानून के अनुसार, एक बार वक्फ संपत्ति घोषित हो जाने के बाद, वह संपत्ति हमेशा वक्फ की ही मानी जाएगी।

वक्फ का तात्पर्य है कि संपत्ति का स्वामित्व व्यक्ति से हटकर अल्लाह को स्थानांतरित हो जाता है। चूँकि संपत्ति का मालिकाना हक वक्फ करने वाले व्यक्ति से अल्लाह को दे दिया जाता है, इस स्थिति में इसे कभी वापस नहीं लिया जा सकता। संपत्ति का देखभाल करने वाला ‘मुतवल्ली’ नियुक्त किया जाता है, जो वक्फ संपत्ति का प्रबंधन करता है। चूँकि ये संपत्तियाँ अल्लाह की हो चुकी है, ऐसे में जो एक बार ‘वक्फ हो गया, वो हमेशा वक्फ ही रहेगा।’

गुजरात में भी आ चुका है ऐसा मामला

कुछ समय पहले गुजरात वक्फ बोर्ड ने सूरत म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन की इमारत पर दावा किया था, क्योंकि दस्तावेज़ अपडेट नहीं किए गए थे। वक्फ के अनुसार, मुगल काल के दौरान यह इमारत एक सराय थी और हज यात्राओं के लिए उपयोग होती थी। ब्रिटिश शासन के दौरान यह संपत्ति ब्रिटिश साम्राज्य की हो गई और आजादी के बाद यह भारत सरकार के अधीन आ गई। दस्तावेज़ों के अद्यतन न होने के कारण, वक्फ बोर्ड ने दावा किया कि यह संपत्ति अब उनकी है, और जैसा कि वक्फ बोर्ड कहता है, “एक बार वक्फ, हमेशा वक्फ।”

एक और रोचक मामला गुजरात के द्वारका का है, जहाँ वक्फ बोर्ड ने देवभूमि द्वारका के बेत द्वारका के दो द्वीपों पर दावा करने के लिए गुजरात उच्च न्यायालय में अर्जी दी थी। अदालत के जज ने यह दावा सुनने से मना कर दिया और वक्फ बोर्ड को अपनी अर्जी में बदलाव के लिए कहा। कोर्ट ने बोर्ड से पूछा कि वक्फ कैसे कृष्ण नगरी की ज़मीन पर दावा कर सकता है। वहीं, केरल में एक गाँव के कई घरों पर भी वक्फ बोर्ड ने दावा ठोक दिया है।

आपकी सोसायटी में भी बन सकती है मस्जिद

वक्फ संपत्तियों के संदर्भ में एक और दिलचस्प पहलू यह है कि आपकी हाउसिंग सोसाइटी का कोई फ्लैट मालिक अपनी संपत्ति को वक्फ के रूप में दर्ज करा सकता है और वहां मस्जिद बनवा सकता है, बिना अन्य सदस्यों की सहमति के। ऐसा ही मामला सूरत की शिव शक्ति सोसाइटी में हुआ था, जहाँ एक प्लॉट मालिक ने अपने प्लॉट को गुजरात वक्फ बोर्ड में दर्ज करा दिया और वहाँ नमाज़ पढ़नी शुरू कर दी गई। ऐसे में इस तरह का मामला आपकी सोसायटी में भी आ सकता है।

36 साल की कौशल्या, 17 की मुस्कान, 6 साल का मिंटू… मोख्तार अंसारी ने कुल्हाड़ी से काटकर उजाड़ दिया छत्तीसगढ़ का एक हिंदू परिवार, डेढ़ महीने बाद मिले कंकाल

छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले में एक महिला के साथ उसके बेटी और बेटे की निर्मम हत्या कर दी गई। हत्या के पीछे की वजह प्रेम प्रसंग को माना जा रहा है। आरोपित का नाम मोख्तार अंसारी है। मोख्तार के भाई आरिफ का एक नाबालिग लड़की से अफेयर था। इसी वजह से वो अपने घर पर पैसे नहीं भेजता था। मोख्तार ने इसी गुस्से में लड़की के साथ उसकी माँ और भाई को भी मार डाला। इन तीनों के कंकाल शुक्रवार (15 नवंबर 2024) को बरामद हुए थे। आरोपित को गिरफ्तार कर लिया गया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक घटना बलरामपुर के थानाक्षेत्र दहेज़वार का है। यहाँ शुक्रवार (15 नवंबर) को एक बंद पड़े ईंटों के प्लांट से पुलिस को 3 मानव कंकाल मिले थे। कंकाल में इनकी खोपड़ी और शरीर के कुछ अन्य हिस्से थे। कंकाल के पास साड़ी, सलवार और पैंट भी बरामद हुआ। पुलिस ने इन कंकालों की जाँच करवाई तो ये 36 वर्षीया कौशल्या, 17 साल की मुस्कान और 6 वर्षीय मिंटू के निकले। कौशल्या मुस्कान और मिंटू की माँ थी। ये तीनों 27 सितंबर से लापता चल रहे थे।

पुलिस ने केस दर्ज करके जाँच शुरू की तो पता चला कि मुस्कान का झारखंड के बरगढ़ निवासी आरिफ से अफेयर था। आरिफ कुसमी इलाके में रह कर ठेकेदारी करता था। वह कौशल्या के घर आता-जाता था। पुलिस को मृतका और आरिफ के बीच चैट व लम्बी कॉल डिटेल भी मिली। इसी आधार पर पुलिस की पड़ताल आगे बढ़ी तो हत्या का राज खुल गया। तीनों की हत्या आरिफ के 38 वर्षीय भाई मोख्तार अंसारी ने उनके गाँव से 80 किलोमीटर दूर ले जाकर की थी।

पुलिस ने मोख्तार को गिरफ्तार करके पूछताछ की तो उसने अपना गुनाह कबूल कर लिया। मोख्तार ने बताया कि उसके अब्बा को कुछ दिनों पहले साँप ने काट लिया था। इस वजह से उनकी तबियत काफी खराब रहने लगी थी। मोख्तार का भाई आरिफ इलाज के लिए पैसे नहीं भेज रहा था, जिसका कारण आरोपित मुस्कान और उसके परिवार को मानता था। इसी गुस्से में उसने मुस्कान के पूरे परिवार को खत्म करने की ठान ली।

अपनी साजिश को अंजाम देने के लिए 27 सितंबर को मोख्तार कुसमी गया। यहाँ से उसने कौशल्या, मुस्कान और मिंटू को झाँसे में लिया और अपने साथ लेकर बलरामपुर पहुँच गया। उसने पहले से तय प्लान के मुताबिक तीनों को दहेज़वार के सुनसान स्थान पर मौजूद एक झोपड़ी में रखा। जब रात में माँ के साथ उनकी बेटी और बेटा सो गए तब मोख्तार ने तीनों के सिर पर इतनी तेज कुल्हाड़ी मारी कि सिर की हड्डियाँ तक टूट गईं। इसके बाद उसने सबकी लाश पानी से भरे खेत में फेंक दी और भाग निकला।

कौशल्या, मुस्कान और मिंटू की लाश खेतों में कई दिनों तक पड़ी रही। सुनसान इलाके में तीनों की लाश के अंग पानी के साथ बहते रहे। इसी वजह से ज्यादा दुर्गंध भी नहीं आई। शुक्रवार (15 नवंबर) को खेत का मालिक फसल काटने आया, तब उसे कंगाल पड़े मिले। मामले की सूचना पुलिस को दी गई। जाँच में यह भी पता चला कि कौशल्या के पति सूरजदेव ठाकुर ने अपनी पत्नी की गुमशुदगी थाने में दर्ज करवाई थी। इस केस में सूरजदेव ने आरिफ को नामजद किया था।

पुलिस पर इस शिकायत पर कार्रवाई न करने का आरोप है। तब इस मामले में मोख्तार से भी पूछताछ हुई थी लेकिन उसने सच नहीं उगला था। कुसमी थाना प्रभारी जितेंद्र जयसवाल को कार्रवाई में लापरवाही बरतने के आरोप में लाइन हाजिर कर दिया गया है। शवों के पहचान की पुष्टि के लिए उनके सैम्पल को लैब भेजा जा रहा है जिसकी रिपोर्ट 10-15 दिनों में आ सकती है। मोख्तार को 5 दिनों के रिमांड पर लिया गया है। पुलिस यह भी जानने का प्रयास कर रही है कि हत्या में कहीं मोख्तार के अलावा कोई और तो नहीं था।

जिस जमीन पर दशकों से रह रहे, पास में है दस्तावेज भी… उन जमीनों पर भी वक्फ बोर्ड ने ठोका दावा: केरल के वायनाड में नोटिस मिलने के बाद टेंशन में ग्रामीण

केरल के वायनाड जिले के तलापुझा गाँव में 28 अक्टूबर 2024 को कुछ परिवारों को अचानक एक गंभीर और चौंकाने वाला नोटिस मिला। इस नोटिस में केरल राज्य वक्फ बोर्ड ने दावा किया कि वे ज़मीनें जो इन परिवारों की मानी जा रही थीं, असल में वक्फ बोर्ड की संपत्ति हैं।

द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, तलापुझा गाँव के लोगों भेजे गए नोटिस में वक्फ संपत्ति के अतिक्रमण का आरोप लगाया गया है। जैसे ही यह खबर फैली, पूरे इलाके में हड़कंप मच गया। अब तक पाँच परिवारों को यह नोटिस मिला है, लेकिन वहाँ के निवासी चिंतित हैं कि जल्द ही पूरे गाँव के बाकी परिवारों को भी इसी तरह के नोटिस मिल सकते हैं।

इस नोटिस में क्या है?

वक्फ अधिनियम, 1995 की धारा 52 के तहत जारी इस नोटिस में कहा गया कि 4.7 एकड़ जमीन, जो सर्वे नंबर 47/1 और 45/1 में पंजीकृत है, को वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज किया गया है। नोटिस में यह बताया गया कि इस ज़मीन पर वक्फ संपत्ति का दावा है और इसके अतिक्रमण की शिकायत की गई थी। वक्फ बोर्ड ने जमीन मालिकों से कहा कि वे 16 नवंबर 2024 तक अपने लिखित जवाब पेश करें और सभी दस्तावेज़ जमा करें।

इसके अलावा, 19 नवंबर 2024 को इस मामले की ऑनलाइन सुनवाई निर्धारित की गई। नोटिस में चेतावनी दी गई कि अगर मालिकों ने जवाब नहीं दिया या सुनवाई में उपस्थित नहीं हुए, तो मामला उनकी अनुपस्थिति में ही निपटाया जाएगा। इसका सीधा मतलब यह था कि वक्फ बोर्ड अपने स्तर पर निर्णय ले लेगा और उस पर अमल कराएगा।

नोटिस साभार: द हिंदू

जमीन मालिकों ने नोटिस का किया विरोध

इस नोटिस से जमीन मालिकों में गहरी नाराज़गी है और उनमें असमंजस की स्थिति भी है। इन लोगों ने अपना वैध स्वामित्व प्रमाणित करने के लिए दशकों पुरानी कानूनी दस्तावेज़ों और निर्बाध कब्जे का हवाला दिया। इस मामले में हिंदू और मुस्लिम दोनों परिवारों ने अपनी परेशानी जाहिर की। उनका मानना है कि यह उनके भूमि अधिकारों पर अवैध दखल का प्रयास है।

नोटिस पाने वालों में तुषारा अजीत कुमार नाम की महिला भी हैं। उनका कहना है कि उनके परिवार ने 1949 से यह ज़मीन संभाली हुई है। उनके ससुर, हवलदार कुंजरमन, ने 1940 के दशक में एक ईसाई परिवार से यह ज़मीन खरीदी थी और उन्होंने इस ज़मीन के लिए सभी ज़रूरी दस्तावेज़ जमा किए थे। कुंजरमन ने पूरी प्रक्रिया के दौरान दस्तावेजों को अच्छी तरह से संभाला, जिसमें 1949 से लेकर 1960 के दशक के अंत तक के रिकॉर्ड शामिल हैं।

इस ज़मीन को बाद में उनके छह बच्चों में बाँटा गया, जिसमें तुषारा के पति, अजीत कुमार भी शामिल हैं। तुषारा ने हाल ही में इस ज़मीन का एक हिस्सा बेचने की कोशिश की थी, और उन्हें लगता है कि इसी वजह से यह विवाद खड़ा हुआ। तीन सदस्यों वाली थलापुझा हयातुल इस्लाम जमात मस्जिद समिति ने इस बिक्री पर आपत्ति जताई और दावा किया कि यह ज़मीन वक्फ बोर्ड की है। तुषारा का मानना है कि मस्जिद समिति के इन सदस्यों ने ही मामले को वक्फ बोर्ड तक पहुँचाया।

गृहिणी के तौर पर घर संभालने वाली तुषारा ने कहा कि वो इस दावे के खिलाफ मजबूती से खड़ी रहेंगी। उनका कहना था कि यह ज़मीन तभी ली जा सकती है जब वह जीवित न रहें। उनके बेटे जितुल ने वक्फ अधिनियम और उसके संशोधनों का अध्ययन करना शुरू कर दिया है और परिवार एक वकील के साथ मिलकर कानूनी लड़ाई लड़ रहा है।

हिंदुओं ही नहीं, मुस्लिम परिवारों को भी मिला नोटिस

इस नोटिस ने केवल गैर-मुस्लिम परिवारों को ही नहीं, बल्कि मुस्लिम परिवारों को भी हैरान कर दिया। 70 वर्षीय हम्सा फैज़ी भी उन्हीं में से एक हैं, जिन्हें नोटिस मिला। हम्सा फैज़ी ने बताया कि उन्होंने 1998 में यह ज़मीन 50,000 रुपये प्रति सेंट की दर से खरीदी थी और तब से सभी आवश्यक दस्तावेज़ और टैक्स रिकॉर्ड संभालते आ रहे हैं। यह ज़मीन पहले सुकीमारन और कृष्णनकुट्टी से खरीदी गई थी, जो कुनहुट्टी अलक्कंडी के बच्चे थे।

नोटिस पाने वालों में 70 साल के हमजा फैज़ी कई सालों तक जमात समिति का पद संभाल चुके हैं। उन्होंने कहा, “मेरे पास ज़मीन के सभी वैध दस्तावेज़ हैं, फिर भी मुझे नोटिस भेजा गया।” फैज़ी का घर साल 1987 में किसी अन्य व्यक्ति ने बनवाया था, जिसे उन्होंने खरीद लिया था। वो दशकों से उसी घर में रह रहे हैं। हालाँकि, स्थानीय नेताओं से उन्हें समर्थन की उम्मीद है, लेकिन उन्हें अपनी ज़मीन के भविष्य को लेकर चिंता है।

जमाल का हैरानी भरा अनुभव

जमाल के पास 15 सेंट की ज़मीन है, ने इसे एक “चौंकाने वाला अनुभव” बताया। वे पिछले 14 साल से इस संपत्ति पर रह रहे हैं और उसी जगह पर अपनी दुकान चला रहे हैं। उनके पास भी ज़मीन के सभी वैध रिकॉर्ड और टैक्स रसीदें हैं। उन्होंने बताया कि कुछ परिवारों के पास केवल 9 सेंट की ज़मीन है, जो यह दर्शाता है कि यह संपत्ति छोटे-छोटे हिस्सों में अलग-अलग मालिकों के पास बंटी हुई है।

इस विवादित ज़मीन पर सात घर और दस दुकानें हैं, जो थलापुझा पुलिस स्टेशन के पास सड़क किनारे स्थित हैं। निवासियों को चिंता है कि वक्फ बोर्ड के दावे उनके जीवन और रोज़गार को बुरी तरह से प्रभावित कर सकते हैं।

जमीनों और घरों के दस्तावेज मौजूद

तलापुझा के जमीन मालिक अपने स्वामित्व की वैधता पर जोर देते हैं। उनका कहना है कि उनके पास अपने दावे को साबित करने के लिए दशकों पुरानी दस्तावेज़ी प्रमाण हैं। थविनहाल पंचायत के रिकॉर्ड बताते हैं कि विवादित ज़मीन पर कम से कम एक इमारत का दस्तावेज़ 1948 तक का है। अधिकांश निवासियों के पास 1963 में मस्जिद समिति द्वारा उद्धृत किए गए दस्तावेज़ से पहले के टाइटल डीड हैं। इनमें से कई लोग दूसरे या तीसरे पीढ़ी के मालिक हैं, जिन्होंने नियमित रूप से ज़मीन का टैक्स चुकाया है और संपत्ति रिकॉर्ड में किसी भी वक्फ के दावे का कोई उल्लेख नहीं किया गया था।

जमीन पर रहने वाले अन्य लोगों में भी फैला डर

हालाँकि अब तक केवल पाँच परिवारों को नोटिस मिला है, लेकिन लगभग 50 अन्य परिवार जिनके पास इस 4.7 एकड़ विवादित क्षेत्र में छोटे-छोटे ज़मीन के टुकड़े हैं, वो भी आशंकित हैं कि उन्हें भी जल्द ही ऐसे नोटिस मिल सकते हैं। स्थानीय निवासियों का कहना है कि अगर वक्फ बोर्ड का यह दावा मान्य हो जाता है, तो इसका असर पूरे गाँव पर पड़ेगा और लोग अपने घरों और रोज़गार को खो सकते हैं।

एनडीए उम्मीदवार ने स्थानीय लोगों का किया समर्थन

इस विवाद ने स्थानीय नेताओं का भी ध्यान खींचा है। एनडीए उम्मीदवार नव्या हरिदास ने तलापुझा का दौरा कर प्रभावित परिवारों से मुलाकात की और उन्हें समर्थन देने का आश्वासन दिया। उन्होंने वक्फ बोर्ड को चेतावनी दी कि वह निजी संपत्ति को हड़पने नहीं देंगे। भाजपा के सूत्रों ने आरोप लगाया कि वक्फ बोर्ड, वक्फ अधिनियम में प्रस्तावित संशोधनों से पहले जल्दबाजी में जमीन पर दावे कर रहा है।

इस बीच, स्थानीय समुदाय ने एक एक्शन काउंसिल बनाई और मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन तथा मंत्री ओआर केलू को ज्ञापन सौंपा। निवासियों ने सरकार से अपने भूमि अधिकारों की सुरक्षा के लिए हस्तक्षेप की माँग की है।

‘वक्फ का मतलब वक्फ ही रहेगा’

वक्फ शब्द का मतलब है रोकना, सीमित करना और निषेध करना। इस्लामी मान्यताओं के अनुसार, जब एक बार कोई संपत्ति वक्फ के रूप में समर्पित कर दी जाती है, तो वह हमेशा के लिए धार्मिक या परोपकारी उपयोग के लिए ही रह जाती है। शरीयत कानून के अनुसार, एक बार वक्फ संपत्ति घोषित हो जाने के बाद, वह संपत्ति हमेशा वक्फ की ही मानी जाएगी।

वक्फ का तात्पर्य है कि संपत्ति का स्वामित्व व्यक्ति से हटकर अल्लाह को स्थानांतरित हो जाता है। चूँकि संपत्ति का मालिकाना हक वक्फ करने वाले व्यक्ति से अल्लाह को दे दिया जाता है, इस स्थिति में इसे कभी वापस नहीं लिया जा सकता। संपत्ति का देखभाल करने वाला ‘मुतवल्ली’ नियुक्त किया जाता है, जो वक्फ संपत्ति का प्रबंधन करता है। चूँकि ये संपत्तियाँ अल्लाह की हो चुकी है, ऐसे में जो एक बार ‘वक्फ हो गया, वो हमेशा वक्फ ही रहेगा।’

गुजरात में भी आ चुका है ऐसा मामला

कुछ समय पहले गुजरात वक्फ बोर्ड ने सूरत म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन की इमारत पर दावा किया था, क्योंकि दस्तावेज़ अपडेट नहीं किए गए थे। वक्फ के अनुसार, मुगल काल के दौरान यह इमारत एक सराय थी और हज यात्राओं के लिए उपयोग होती थी। ब्रिटिश शासन के दौरान यह संपत्ति ब्रिटिश साम्राज्य की हो गई और आजादी के बाद यह भारत सरकार के अधीन आ गई। दस्तावेज़ों के अद्यतन न होने के कारण, वक्फ बोर्ड ने दावा किया कि यह संपत्ति अब उनकी है, और जैसा कि वक्फ बोर्ड कहता है, “एक बार वक्फ, हमेशा वक्फ।”

एक और रोचक मामला गुजरात के द्वारका का है, जहाँ वक्फ बोर्ड ने देवभूमि द्वारका के बेत द्वारका के दो द्वीपों पर दावा करने के लिए गुजरात उच्च न्यायालय में अर्जी दी थी। अदालत के जज ने यह दावा सुनने से मना कर दिया और वक्फ बोर्ड को अपनी अर्जी में बदलाव के लिए कहा। कोर्ट ने बोर्ड से पूछा कि वक्फ कैसे कृष्ण नगरी की ज़मीन पर दावा कर सकता है।

आपकी सोसायटी में भी बन सकती है मस्जिद

वक्फ संपत्तियों के संदर्भ में एक और दिलचस्प पहलू यह है कि आपकी हाउसिंग सोसाइटी का कोई फ्लैट मालिक अपनी संपत्ति को वक्फ के रूप में दर्ज करा सकता है और वहां मस्जिद बनवा सकता है, बिना अन्य सदस्यों की सहमति के। ऐसा ही मामला सूरत की शिव शक्ति सोसाइटी में हुआ था, जहाँ एक प्लॉट मालिक ने अपने प्लॉट को गुजरात वक्फ बोर्ड में दर्ज करा दिया और वहाँ नमाज़ पढ़नी शुरू कर दी गई। ऐसे में इस तरह का मामला आपकी सोसायटी में भी आ सकता है।

1 किमी में 4 मस्जिद, प्रशासन ने माना नमाज के लिए एक और जगह की जरूरत नहीं; फिर भी जस्टिस मोहम्मद नियास ने ‘सुन्नी सेंटर’ की दी अनुमति: जानिए क्या है मामला

केरल के कोझिकोड में सुन्नी सेंटर में नमाज पढ़ने की हाई कोर्ट ने अनुमति दे दी है। प्रशासन ने इस इलाके में 4 मस्जिद होने की बात कहते हुए इसके लिए इजाजत नहीं दी थी। आसपास के लोग भी इसका विरोध कर रहे थे। उनका कहना था कि नमाज के नाम पर बिना अनुमति मस्जिद बनाई जा रही है।

हाई कोर्ट ने कहा कि सिर्फ दूसरे समुदाय के कुछ लोगों के विरोध के चलते नमाज पढ़ने के लिए बनाई जा रही इमारत का उपयोग करने से नहीं रोका जा सकता है। हाई कोर्ट ने इसके साथ ही मजहबी गतिविधियों की अनुमति दे दी। केरल हाई कोर्ट के जस्टिस मुहम्मद नियास सीपी ने यह फैसला सुनाया।

उन्होंने नमाज के लिए बनाए जा रहे सुन्नी सेंटर को NOC देने के लिए भी कोझिकोड के कलेक्टर को दोबारा विचार के आदेश दिए हैं। जस्टिस नियास ने इस मामले में प्रशासन की वह दलीलें भी नकार दी जिनमें कहा गया था कि यहाँ नमाज के लिए बनाई जा रही इमारत से कानून-व्यवस्था बिगड़ने का डर है।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला केरल के कोझिकोड जिले के कडलुंदी गाँव का है। यहाँ रहने वाले केटी मुजीब के पास एक इमारत है। इस इमारत में 2004 से नमाज पढ़ी जा रही है। 2014 में मुजीब ने इस इमारत की छत की मरम्मत करने के लिए ग्राम पंचायत से NOC माँगी थी। वह उसे दे दी गई थी।

इसके कुछ दिनों बाद इस इमारत के पास रहने वाले हिन्दुओं ने शिकायत की कि यहाँ अवैध निर्माण चल रहा है। इसके बाद पंचायत ने काम रोक दिया। इसके बाद यह मामला जिला प्रशासन के पास पहुँचा, उसने भी 2016 में मुजीब की इमारत में किसी भी प्रकार की नमाज या बाकी धार्मिक गतिविधि पर रोक लगा दी।

इसके खिलाफ मुजीब कोर्ट पहुँच गया। हाई कोर्ट ने प्रशासन के आदेश पर रोक लगाई और अंतरिम तौर पर मुजीब को राहत देते हुए नमाज आयोजित करने की अनुमति दे दी। हालाँकि, कोर्ट ने मुजीब को आदेश दिया कि इस दौरान लाउडस्पीकर का उपयोग नहीं होना चाहिए और ना ही यहाँ जुमे की नमाज पढ़ी जानी चाहिए।

इस मामले में कोर्ट ने जिला कलेक्टर से इस मामले में पुलिस और प्रशासन से रिपोर्ट लेकर फैसला लेने को कहा। कोझिकोड कलेक्टर ने भी आगे इस मामले में स्थानीय हिन्दुओं के विरोध के चलते NOC जारी करने से मना कर दिया। इसके बाद मुजीब फिर कोर्ट पहुँच गया।

मामले की सुनवाई के दौरान स्थानीय हिन्दुओं की तरफ से हाई कोर्ट को बताया गया कि मुजीब इस इमारत को एक मस्जिद के जैसे चला रहा है और इसकी कोई भी अनुमति नहीं ली गई है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि यहाँ संदिग्ध लोगों का आना जाना होता है। उन्होंने मुजीब पर कोर्ट के पुराने आदेश का गलत इस्तेमाल करने का आरोप भी लगाया।

इस मामले में स्थानीय पुलिस अधिकारी और तहसीलदार द्वारा कलेक्टर को भेजी गई रिपोर्ट में भी कहा गया कि इस नई इमारत के 1 किलोमीटर के दायरे में पहले से 4 मस्जिद हैं और नई कि आवश्यकता नहीं है। इस रिपोर्ट में बताया गया कि स्थानीय हिन्दू इसका विरोध कर रहे है।

सुन्नी सेंटर को मस्जिद में बदलने का विरोध इसके बाद जिले के ADM की रिपोर्ट में भी किया गया। इसके बाद कलेक्टर ने NOC देने से इनकार कर दिया। इस मामले में कोर्ट को गाँव के सचिव ने भी कमोबेश यही बात बताई। उन्होंने कोर्ट को यह भी बताया कि जिस इमारत पर विवाद है, वह एक परिवार के रहने के लिए है ना कि नमाज का हॉल बनाने के लिए।

क्या कहा हाई कोर्ट ने अपने फैसले में?

हाई कोर्ट में जस्टिस नियास ने हिन्दू पक्ष और मुजीब की दलीलों को सुनने के बाद NOC पर लगाई गई रोक को रद्द कर दिया। जस्टिस नियास ने कहा, “जिला प्रशासन के अधिकारियों की रिपोर्ट से पता चलता है कि उन्हें दूसरे समुदाय (हिन्दुओं) द्वारा की गई आपत्तियों के कारण कानून और व्यवस्था की स्थिति की आशंका है। केवल इसीलिए कि एक समुदाय दूसरे समुदाय द्वारा मजहबी स्थल की स्थापना का विरोध करता है, यह नहीं माना जा सकता कि इससे शांति भंग होगी।”

जस्टिस नियास ने आगे कहा,”एक लोकतांत्रिक देश में जहाँ नागरिकों को अपने धर्म का पालन करने और उसे मानने का मौलिक अधिकार है, किसी भी समुदाय द्वारा मजहबी स्थल की स्थापना को केवल अन्य समूहों के विरोध के कारण रोका नहीं किया जाना चाहिए।”

जस्टिस नियास ने इस मामले में जिला कलेक्टर से कहा है कि वह NOC पर दोबारा विचार करें और कोर्ट के फैसले के हिसाब से फैसला करें। जस्टिस नियास ने इसी के साथ मुजीब को अपने हॉल को नमाज के लिए उपयोग करने की इजाजत दे दी।

ATS के बाद अब IB की रडार पर भी मदरसे-मकतब, गोंडा में 286 की फंडिंग की हो रही जाँच: बिना मान्यता के ही 19 का हो रहा संचालन

उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में अवैध तौर पर संचालित हो रहे अवैध मकबतों और मदरसों को मिलने वाली फंडिंग के खिलाफ इंटेलिजेंस ब्यूरो ने अपनी जाँच शुरू कर दी है। इस जाँच में IB का साथ उत्तर प्रदेश पुलिस की आतंकवाद निरोधक टीम (ATS) भी दे रही है। ये मदरसे और मकतब मान्यता न होने की वजह से जाँच के दायरे में हैं। इन्हें मिलने वाली फंडिंग से लेकर इसमें पढ़ने-पढ़ाने वालों को लेकर भी पड़ताल होगी।

दैनिक भास्कर के मुताबिक, जिले में 286 मकतब और अवैध तौर पर चल रहे 19 मदरसे रडार पर हैं। इस क्रम में इंटेलिजेंस ब्यूरो के अधिकारी गोंडा के अल्पसंख्यक कल्याण विभाग पहुँचे। यहाँ उन्होंने मौजूद अधिकारी से राज्य में चल रहे 286 मकतबों और बिना मान्यता के संचालित 19 मदरसों की लिस्ट ली। अब खुफ़िया विभाग इन मकतबों और मदरसों में मिलने वाले पैसों के स्रोत जानने में जुटा हुआ है। इसे चलाने वालों से यह भी पूछा जाएगा कि उन्होंने संचालन के लिए सरकारी मान्यता क्यों नहीं ली।

बता दें कि उत्तर प्रदेश पुलिस की ATS विंग पहले से ही इस दिशा में जाँच कर रही थी। अब इसमें इंटेलिजेंस ब्यूरो के भी शामिल होने से जाँच में तेजी आने और कई नए खुलासों की संभावना है। इन टीमों को शासन द्वारा जरूरी दिशा निर्देश भी मिले हैं। जाँच के बाद रिपोर्ट शासन को प्रेषित की जाएगी। शासन प्राप्त बिंदुओं के आधार पर आगे की कार्रवाई तय करेगा। गोंडा जिले के जिला समाज कल्याण अधिकारी रमेश चंद्र को भी शासन ने जाँच में सहयोग का निर्देश दिया है।

गोंडा के जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी रमेश चंद्र ने मीडिया से बताया कि जाँच एजेंसियों द्वारा माँगे गए कागजात उपलब्ध करवा दिए गए हैं। प्रशासन द्वारा मदरसे और मकतबों के संचालकों को भी साफ निर्देश दिया गया है कि वो जाँच में सहयोग करें। इन संचालकों से पूछताछ की लिस्ट में मकतब-मदरसे कब से और कैसे चलाए जा रहे आदि प्रश्न शामिल हैं। इनको चंदा देने वालों की भी लिस्ट बनाई गई है जिनसे बाद में पूछताछ की जा सकती है। इन संस्थानों में पढ़ने वाले छात्रों का भी आंकड़ा जुटाया जा रहा है।

बताते चलें कि मकतब एक ऐसा स्थान होता है, जहाँ बच्चों को कोचिंग सेंटर की तरह दीनी तालीम दी जाती है, जबकि मदरसे से डिग्री मिलती है। मकतब में सिर्फ कोचिंग दी जाती है। मकतब और मदरसों में विस्तार से अंतर जानने के लिए हमारी यह रिपोर्ट पढ़ें

भीड़ ने घर में घुस माँ-बेटी को पीटा, फाड़ दिए कपड़े… फिर भी 2 दिन तक पीड़िताओं की कर्नाटक पुलिस ने नहीं सुनी: Video वायरल होने पर दर्ज किया केस

कर्नाटक के बेलगावी में एक महिला और उसकी बेटी पर वेश्यावृत्ति का आरोप लगाकर भीड़ द्वारा हमला करने का मामला सामने आया है। घटना की वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है। राज्य पुलिस ने इस मामले को दो दिन बाद दर्ज किया। वहीं भाजपा ने इस मामले के प्रकाश में आने के बाद कॉन्ग्रेस शासित प्रदेश की कानून व्यवस्था पर सवाल खड़ा किया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक घटना बेलगावी के थानाक्षेत्र मालामारुति की है। यहाँ के गाँव वड्डारावाड़ी में एक महिला अपनी बेटी के साथ पिछले 4 वर्षों से रहती है। 11 नवंबर को महिला के घर में आसपास के कुछ पड़ोसी घुसे। उन्होंने महिला पर वेश्यावृत्ति का आरोप लगाया और मकान खाली करने का दबाव बनाने लगे। वो पीड़िता को कॉलगर्ल कह कर बुला रहे थे। इन सभी का कहना था कि महिला के घर में तमाम बाहरी लोगों का आना-जाना था।

महिला ने पड़ोसियों के आरोपों से इंकार किया और मकान खाली करने से मना कर दिया। इस बात पर घर में घुसे पड़ोसी भड़क उठे। उन्होंने पहले महिला और उनकी बेटी को बेरहमी से पीटा । बाद में इन्होंने महिला के कपड़े फाड़ और उसे निर्वस्त्र कर दिया। आरोपितों ने पीड़िता की पिटाई का वीडियो भी अपने मोबाइल में बना डाला। पिटाई के बाद सभी आरोपित पीड़िता को धमकी देते हुए वापास लौट गए। कुछ देर बाद महिला अपने साथ हुई प्रताड़ना की शिकायत करने पुलिस स्टेशन पहुँची।

बताया जा रहा है कि पुलिस ने 2 दिनों तक पीड़िता की शिकयत को अनसुना किया। बाद में महिला की पिटाई और उसको निर्वस्त्र करने का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तो मामला संज्ञान में लेते हुए पीड़िता को पीटने वाले 3 पड़ोसियों के खिलाफ FIR दर्ज की। इन सभी पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 115(2), 3(5), 331, 352 और 74 के तहत कार्रवाई की गई है। मामले में जाँच व अन्य जरूरी कानूनी कार्रवाई की जा रही है। BJP ने इस घटना के बाद कर्नाटक सरकार को आड़े हाथों लिया है। भाजपा का आरोप है कि कॉन्ग्रेस सरकार के दौरान प्रदेश में महिलाएँ सुरक्षित नहीं हैं।