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600 परिवारों की जमीन पर Waqf का दावा… केरल कोर्ट ने सरकारों से जवाब माँगा, याचिकाकर्ता बोले-गैर इस्लामी लोगों की संपत्ति पर क्यो हो इनका अधिकार

केरल के मुनम्बम में 600 परिवारों की जिन जमीनों पर वक्फ बोर्ड ने अपना फर्जी दावा किया है, उस जमीन विवाद को लेकर राज्य और केंद्र सरकार को केरल हाई कोर्ट ने जवाबी हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया है। यह मामला मुनम्बम के निवासी जोसेफ बेनी और अन्य सात लोगों द्वारा दायर की गई याचिका के आधार पर सामने आया है।

याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि वक्फ बोर्ड उन्हें और लगभग 600 अन्य परिवारों को जमीन से बेदखल करने की तैयारी में है, यह दावा करते हुए कि यह जमीन वक्फ की संपत्ति है। जोसेफ और अन्य निवासियों ने फारूक कॉलेज, कोझिकोड के प्रबंध समिति से यह जमीन खरीदी थी, लेकिन अब राजस्व अधिकारियों ने वक्फ बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के अनुरोध पर जमीन के दस्तावेजों का म्युटेशन करने से इनकार कर दिया है।

याचिकाकर्ताओं ने वक्फ अधिनियम की धारा 14 को असंवैधानिक बताया है, जिसमें वक्फ बोर्ड को किसी भी ट्रस्ट या सोसायटी की संपत्ति को अपनी संपत्ति घोषित करने का अधिकार दिया गया है। उनका कहना है कि यह प्रावधान प्राकृतिक न्याय और निष्पक्षता के सिद्धांतों के खिलाफ है और गैर-इस्लामिक धर्म के लोगों की संपत्ति को लेकर वक्फ बोर्ड को इस प्रकार के अधिकार नहीं दिए जाने चाहिए। इसके अलावा, याचिका में कहा गया है कि वक्फ बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी को कब्जाधारियों को बेदखल करने का अधिकार देना संविधान के अनुच्छेद 300 ए का उल्लंघन है।

इस बीच, विपक्ष के नेता वी.डी. सतीसन ने विवादित जमीन को वक्फ संपत्ति न मानते हुए सरकार से इस मुद्दे को जल्द सुलझाने का आग्रह किया है। उन्होंने कहा कि यदि सरकार चाहे तो इस विवाद को दस मिनट में हल कर सकती है। सतीसन ने मुनम्बम में एक बैठक में हिस्सा लिया और आंदोलनरत लोगों के साथ एकजुटता व्यक्त की। उन्होंने यह भी कहा कि लोग इस क्षेत्र में पहले से बसे हुए थे, और ऐसी भूमि को वक्फ संपत्ति घोषित नहीं किया जा सकता।

सतीसन के अनुसार, नासर आयोग जिसे आच्युतानंदन सरकार ने नियुक्त किया था, ने इस जमीन को वक्फ संपत्ति के रूप में पहचाना था। उन्होंने कहा कि वक्फ संपत्ति बिना किसी शर्त के होती है, जबकि इस जमीन के दस्तावेजों में शर्तें दर्ज हैं। इसके अलावा, उन्होंने यह भी बताया कि फरूक कॉलेज प्रबंधन ने इस जमीन का कुछ हिस्सा बेच दिया था, जबकि वक्फ संपत्ति का वित्तीय लेन-देन संभव नहीं होता।

सतीसन ने यह स्पष्ट किया कि यह विवाद नए वक्फ अधिनियम से जुड़ा नहीं है, और पूर्व की यूडीएफ सरकार ने भी इस जमीन को वक्फ संपत्ति न मानने का रुख अपनाया था।

बता दें कि करीब पाँच साल पहले साल 2019 वक्फ बोर्ड ने दावा किया कि केरल में मुनम्बम, चेराई और पल्लिकाल के इलाके उसकी संपत्ति हैं। यह इलाका न केवल केरल के 600 से अधिक परिवारों का घर है, बल्कि यहाँ विभिन्न धर्मों के लोग रहते हैं, जिनके पास 1989 से जमीन के वैध कागजात हैं। इसके बावजूद, वक्फ बोर्ड ने इस इलाके पर अपना दावा ठोक दिया। इन परिवारों ने अपनी जमीन को वैध रूप से खरीदा था, लेकिन अब उन्हें जबरन खाली करने के आदेश दिए जा रहे हैं, जो उनके संवैधानिक अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन है।

दीवाली के दिन देवी माँ के मंदिर पर लिखा ‘786’, बरेली के गाँव में माहौल बिगड़ा: हाफिजगंज में पटाखे फोड़ने पर बढ़ी बात, मुस्लिम भीड़ ने हिंदू परिवार पर हमला किया

उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में दीपावली के दिन मंदिर पर 786 लिखने का मामला सामने आया है। इससे हालत तनावपूर्ण हो गए। यह मंदिर देवी माँ का है, जो आसपास के गाँवों में आस्था का बड़ा केंद्र है। आक्रोशित लोगों ने इसके दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग की है। पुलिस ने भी घटना का संज्ञान लेकर जाँच शुरू कर दी है। मंदिर की पुताई करवा दी गई है।

वहीं इसी जिले में दूसरे थाना क्षेत्र में दीवाली पर ही पटाखे फोड़ने के विवाद में पत्थरबाजी हुई है। पहला मामला बरेली जिले के थाना क्षेत्र आँवला का है। यहाँ गाँव गोठा खंडुआ में माँ गामा देवी का मंदिर है। मंदिर ग्रामीणों की आस्था का बड़ा केंद्र है दीपावली की सुबह जब यहाँ लोग पूजा पाठ के लिए पहुँचे, तब इसकी दीवाल पर लाल रंग से 786 लिखा मिला।

कुछ ही देर में खबर गाँव और आसपास फ़ैल गई। लोग इसे दीपावली में अशाँति फैलाने की साजिश बताते हुए विरोध करने लगे। पुलिस से दोषियों को चिन्हित कर के कार्रवाई की माँग की जाने लगी। मामले की जानकारी मिलते ही पुलिस फ़ौरन ही मौके पर पहुँची। लोगों को समझाबुझा कर शाँत करवाया गया।

जिस जगह 786 लिखा गया था, उसे मिटा कर मंदिर को फिर से पहले जैसी स्थिति में किया गया। हिन्दू संगठनों ने भी इस मामले में बरेली पुलिस से आरोपितों को खोजकर कार्रवाई की माँग की है। अभी तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है। पुलिस मामले की जाँच व अन्य जरूरी कानूनी कार्रवाई कर रही है।

पटाखे फोड़ने पर पथराव

दूसरा मामला बरेली के ही थाना क्षेत्र हाफिजगंज का है। यहाँ दीपावली पर पटाखे फोड़ रहे एक हिन्दू युवक के घर पर मुस्लिम भीड़ ने पथराव कर दिया। पीड़ित युवक सचिन ने 31 अक्टूबर को इस घटना की तहरीर पुलिस में दी। तहरीर में सचिन ने बताया कि दीपावली पर वह पटाखे फोड़ रहा था। तभी उसके पड़ोस में रहने वाले नासिर, इमरान अंसारी और अनस ने पटाखे फोड़ने से मना किया।

सचिन ने अपना त्यौहार और अपने घर के आगे पटाखे फोड़ने की दलील दी तो आरोपित भड़क गए। सचिन का आरोप है कि आरोपितों ने उनको धमकाते हुए कहा, “साले, हम तुझको और जितने भी तेरे साथ पटाखे फोड़ रहे हैं, उनके घरों में आग लगा देंगे।” इसके बाद इमरान, अनस और नासिर सचिन से मारपीट पर उतारू हो गए। अपनी बचत में सचिन ने भी कुछ लोगों को बुलवाया।

इस घटना के बारे में कुछ ही देर में खबर गाँव और आसपास फ़ैल गई। लोग इसे दीपावली में अशांति फैलाने की साजिश बताते हुए विरोध करने लगे। शिकायत में अंत में सचिन ने यह भी बताया है कि आरोपित आए दिन उनको व उनके परिवार को ऐसे ही प्रताड़ित करते हैं। ऑपइंडिया के पास शिकायत कॉपी मौजूद है। पत्थरबाजी की सूचना मिलते ही मौके पर पुलिस पहुँची और हालात को सामान्य किया।

इंदौर में आमिन खान ने अमन बनकर फँसाई हिंदू छात्रा, ड्रग्स देकर किया रेप, फिर मारने की धमकी: केस दर्ज होने के बाद हिंदू संगठन सड़क पर उतरे

मध्य प्रदेश के इंदौर से लव जिहाद का मामला सामने आया है। यहाँ आमिन खान पर खुद को अमन बता कर एक हिन्दू छात्रा से पहले दोस्ती फिर रेप का आरोप लगा है। बुधवार (30 अक्टूबर 2024) को इस मामले की शिकायत दर्ज होने के बाद पुलिस ने आरोपित को गिरफ्तार कर लिया है। मामले में जाँच जारी है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक घटना इंदौर के लडूसिया थानाक्षेत्र की है। यहाँ के महालक्ष्मीनगर इलाके में बीकॉम की एक छात्रा अपने परिवार के साथ रहती है। वह आजीविका चलाने के लिए शेयर मार्किट का भी काम करती है। बुधवार को पीड़िता ने अपने परिजनों संग थाने में जा कर तहरीर दी। तहरीर में पीड़िता ने बताया कि लगभग 1 महीने पहले वह एडमिशन लेने कॉलेज गई थी। यहाँ पर उसे एक युवक मिला जिसने खुद को अमन बताया।

अमन ने एडमिशन लेने में पीड़िता की मदद की। इसी दौरान दोनों के मोबाइल नंबर बँट गए और आपस में बातचीत होने लगी। बातचीत के दौरान युवक ने पीड़िता को विश्वास में लिया और उसके घर पहुँच गया। आरोप है कि यहाँ पर उसने पीड़िता से रेप किया। रेप से पहले आमिन ने पीड़िता को पेय पदार्थ में ड्रग्स मिला कर दिया था। जब पीड़िता ने इसका विरोध किया तो युवक ने शादी का झाँसा देकर उसे चुप करवा दिया। बाद में वह अपने वादे से मुकरने लगा तो पीड़िता ने उसकी खोजबीन शुरू की।

खोजबीन के ही दौरान पीड़िता को पता चला कि जिसे वो हिन्दू युवक अमन समझ रही थी वो असल में कय्यूम का बेटा आमिन खान है। अपनी पोल खुल जाने पर आमिन खान ने पीड़िता को जान से मार डालने की धमकी भी दी। धमकाने वालों में आमिन का अब्बा कय्यूम भी शामिल है। उसने पीड़िता से कहा, “यह इंदौर है। कहाँ गायब हो जाएगी तेरे परिवार को भी पता नहीं चलेगा।” आखिरकार छात्रा ने पूरी बात अपने परिजनों को बता दी।

पीड़िता के भाई ने आमिन से बात करने की कोशिश की। हालाँकि आमिन किसी भी तरह की बातचीत के मूड में नहीं था। उलटे उसने पीड़िता को धमकाते हुए कहा, “तू इंदौर की हवा से अभी वाकिफ नहीं है क्या? रोज़ लड़कियों के बारे में पेपर में आता है। पढ़ती है न? अब अंजाम भुगतने को तैयार रह।” अंत में परिजनों की ही सहमति से बुधवार को पुलिस में शिकायत दी गई। पुलिस ने आमिन को गिरफ्तार कर लिया है। मामले में जाँच व अन्य जरूरी कानूनी कार्रवाई जारी है। इस मामले की सूचना मिलते ही हिन्दू संगठनों ने भी हंगामा करना शुरू कर दिया है। बजरंग दल ने आमिन खान पर कड़ी कार्रवाई की माँग उठाई है।

बंगाल में काली पूजा मूर्ति विसर्जन के दौरान हिंदुओं पर हमला, BJP नेताओं ने CM ममता बनर्जी से माँगा इस्तीफा: कहा- ‘वोटबैंक’ बेखौफ होकर मचा रहे उत्पात

बंगाल के भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी ने शुक्रवार (1 नवंबर) को कोलकाता के राजाबाजार इलाके में माँ काली के विसर्जन जुलूस के दौरान हिंदुओं को सुरक्षा प्रदान करने में विफल रहने पर पुलिस पर निशाना साधा। सुवेंदु अधिकारी ने आरोप लगाया कि जुलूस के दौरान हिंदुओं पर हमला किया गया। उन्होंने राज्य में केंद्रीय सशस्त्र बलों की बहाली की माँग की।

सोशल मीडिया साइट X (पूर्व में ट्विटर) पर एक पोस्ट में सुवेंदु अधिकारी ने इसका एक वीडियो शेयर किया। नंदीग्राम से भाजपा विधायक ने जोर देकर कहा, “तुष्टिकरण की राजनीति अपने चरम पर है। कोलकाता के राजाबाजार में माँ काली के विसर्जन जुलूस पर हमला हुआ। नारकेलडांगा पुलिस कार्रवाई करने और भक्तों की सुरक्षा करने में विफल रही।”

उन्होंने कहा, “कोलकाता के पुलिस आयुक्त, यदि आप अभी भी अपनी गहरी नींद से नहीं जागे हैं तो आम और निर्दोष भारतीयों के हित में तुरंत केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सीएपीएफ) की तैनाती का अनुरोध करें, जो बार-बार पश्चिम बंगाल में कट्टरपंथियों के हमले का सामना कर रहे हैं।”

वहीं, भाजपा प्रवक्ता अमित मालवीय ने भी पश्चिम बंगाल सरकार की आलोचना की। उन्होंने सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) की मुखिया एवं राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर निष्क्रियता का आरोप लगाते हुए उनसे तत्काल कार्रवाई करने या मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने का आग्रह किया।

मालवीय ने पोस्ट किया, “काली पूजा के दौरान हिंदू मंदिरों और भक्तों पर हमले जारी हैं। कोलकाता के राजाबाजार में माँ काली के विसर्जन के जुलूस पर पथराव और हमला किया गया। नारकेलडांगा पुलिस भक्तों की रक्षा करने में विफल रही। ममता बनर्जी या तो तुरंत कार्रवाई करें या पद छोड़ दें। आपका ‘वोट बैंक’ बेखौफ होकर उत्पात मचा रहा है और हिंदुओं को निशाना बना रहा है। बहुत हो गया।”

वहीं, कोलकाता पुलिस ने शनिवार (2 नवंबर) को दावा किया कि विसर्जन जुलूस पर हमला नहीं हुआ था। उन्होंने आरोप लगाया कि बाइक पार्किंग को लेकर दो व्यक्तियों के बीच हाथापाई हुई थी, जो बाद में बढ़ गई। एक्स पर एक पोस्ट में कोलकाता पुलिस ने कहा, “सोशल मीडिया पर नारकेलडांगा की घटना के बारे में फर्जी कहानी बनाने की कोशिश की गई। माँ काली विसर्जन जुलूस पर हमला नहीं किया गया।”

कोलकाता पुलिस ने आगे कहा, “यह मुद्दा बाइक की पार्किंग से जुड़ा था, जिसके कारण दो व्यक्तियों के बीच झगड़ा हुआ और मामला आगे बढ़ गया। पुलिस ने समय रहते हस्तक्षेप किया और स्थिति को नियंत्रण में लाया।” पुलिस ने आगे कहा, “निर्धारित काली पूजा विसर्जन जुलूस शांतिपूर्वक और बिना किसी बाधा के पूरा हुआ।”

भीम आर्मी चीफ के गाँव के बगल दलित युवक मोंटी की लोहे की रॉड से पिटाई: सद्दाम गिरफ्तार, राकिब और फरमान की तलाश में जुटी UP पुलिस

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से दलित उत्पीड़न का मामला सामने आया है। यहाँ फरमान, सद्दाम और राकिब ने साथियों सहित मोंटी नाम के युवक की बेरहमी से पिटाई की है। पीड़ित अनुसूचित जाति से है जिसका घर भीम आर्मी चीफ रावण के मकान से महज कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर है। मोंटी को बचाने आए उसके अन्य परिजनों पर भी हमला करके चोटिल कर दिया गया है। घटना सोमवार (28 अक्टूबर 2024) की है। गुरुवार (31 अक्टूबर) को पुलिस ने सद्दाम को गिरफ्तार कर लिया है। अन्य हमलावरों की तलाश जारी है।

यह घटना सहारनपुर जिले के थानाक्षेत्र मिर्जापुर की है। यहाँ 28 अक्टूबर को मोंटी नाम के एक दलित युवक ने पुलिस में तहरीर दी है। तहरीर में मिर्जापुर पोल गाँव के मोंटी ने बताया कि सोमवार की दोपहर लगभग 4 बजे को वो चौराहे पर किसी का इंतज़ार कर रहे थे। तभी उनके ही गाँव का फरमान वहाँ आया और मोंटी को गालियाँ देते हुए बोला , “भं$, #ढा, *मार।”जब मोंटी ने फरमान की इस हरकत का विरोध किया तो वो आग बबूला हो गया।

आरोप है कि फरमान ने थोड़ी ही देर में हमलावरों की भीड़ जमा कर ली। इस भीड़ में फरमान के साथ राकिब और सद्दाम भी शामिल थे। सभी के हाथों में लाठी-डंडे और सरिया आदि थी। ये सभी मिल कर मोंटी को पीटने लगे। जब पीड़ित को बचाने उसके गाँव के लोग व कुछ अन्य परिजन आए तो हमलावरों ने उनकी भी पिटाई कर दी। खुद पर हुआ हमला साजिश बताते हुए मोंटी ने आरोपितों पर कड़ी कार्रवाई करने की माँग की है।

मोंटी की इस तहरीर पर पुलिस ने राकिब, सद्दाम और फरहान को नामज़द आरोपित बनाते FIR दर्ज कर ली है। इन सभी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 115 (2) और 352 के साथ SC/ST एक्ट के तहत केस दर्ज किया गया है। गुरुवार (31 अक्टूबर) को पुलिस ने सद्दाम को गिरफ्तार कर लिया है। वह अपने ही गाँव के पास कासमपुर पुलिस के पास छिपा था और कहीं भागने की फिराक में था।

फरार चल रहे अन्य आरोपितों की तलाश सहित मामले में जाँच व अन्य कानूनी कार्रवाई की जा रही है। ऑपइंडिया के पास FIR कॉपी मौजूद है। बताते चलें कि मोंटी का परिवार भीम आर्मी चीफ चंद्रशेखर रावण के गाँव से महज कुछ ही दूरी पर है।

अयोध्या में दीवाली के दिन ‘राम भजन’ सुन भड़के मुस्लिम पड़ोसी, कुल्हाड़ी-सरिया लेकर BJP नेता पर किया जानलेवा हमला: बबलू खान और उनके 3 बेटे घायल

अयोध्या के भाजपा नेता बबलू खान पर जानलेवा हमला किया गया है। बबलू खान अयोध्या में भगवान राम के मंदिर का समर्थन करते रहे थे। बताया जा रहा है कि दीपावली के मौके पर बबलू खान भगवान राम का भजन बजा रहे थे। इसको लेकर मुहल्ले के मुस्लिम समाज के लोगों ने उनके साथ विवाद कर दिया और फिर उन पर हमला कर दिया।

यह घटना जिले के दर्शन नगर चौकी क्षेत्र के मिर्जापुर माफी गाँव की है। बबलू खान ने अयोध्या कोतवाली में इस संबंध में शिकायत दर्ज करवाई है। अपनी शिकायत में उन्होंने कहा कि उनके कैंप कार्यालय पर भाजपा का झंडा लगा हुआ है। वहाँ दिवाली के दिन उनके कुछ मित्र आए हुए थे। उन लोगों ने इनकी गाड़ी में ‘राम आएँगे तो अंगना सजाएँगे’ भजन बजा दिया।

भजन के साथ ही वे लोग नाचने लगे। भजन बजाने और नाचने की वजह से उनके पड़ोसी नाराज हो गए और वे आकर उन्हें अपशब्द कहने लगे। बबलू खान ने आगे कहा कि जब उन्होंने इसका विरोध किया तो उन पर और उनके बेटों पर हमला कर दिया गया। उन्होंने बताया कि हमलावरों के हाथों में कुल्हाड़ी, सरिया और बंदूक थे।

बबलू खान का कहना है कि वे साल 2014 से अयोध्या में भगवान श्रीराम के मंदिर का समर्थन कर रहे हैं। इसको लेकर उनके आसपास के मुस्लिम समाज के लोग उनसे नाराज रहते हैं। इसी कारण उन्होंने दिवाली के मौके पर भजन बजाया तो उनके और उनके परिवार पर हमला कर दिया गया। बबलू खान का एक नाम अनीश खान भी है।

‘चुनाव में सलाह देने के लेता था ₹100 करोड़+’: प्रशांत किशोर ने मुस्लिमों के आगे कबूली अपनी फीस, बोले- हमें कमजोर समझते हैं क्या आप?

जन सुराज के संयोजक और चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने खुलासा किया है कि किसी भी राजनीतिक पार्टी या नेता को चुनावी सलाह देने के लिए वह 100 करोड़ रुपये से अधिक फीस लेते हैं। प्रशांत ने यह बात गुरुवार (31 अक्टूबर 2024) को बिहार विधानसभा उपचुनावों के प्रचार के दौरान कही।

बिहार के बेलागंज में एक सभा को संबोधित करते हुए प्रशांत किशोर ने बताया कि लोग अक्सर उनसे पूछते हैं कि उनके चुनावी अभियान का खर्च कैसे पूरा होता है।

प्रशांत किशोर ने कहा, “मेरी रणनीतियों पर दस राज्यों में सरकारें चल रही हैं। क्या आपको लगता है कि मुझे अपने अभियान के लिए तंबू और अन्य व्यवस्थाओं का खर्च उठाने में दिक्कत होगी? बिहार में किसी ने मेरी जैसी फीस के बारे में नहीं सुना है। एक चुनाव में सलाह देकर मैं 100 करोड़ रुपये से अधिक कमा लेता हूँ, जो मुझे अगले दो साल तक अपने अभियान को चलाने के लिए पर्याप्त है।”

जन सुराज पार्टी ने आगामी उपचुनावों के लिए चार विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं। बेलागंज से मोहम्मद अमजद, इमामगंज से जितेंद्र पासवान, रामगढ़ से सुशील कुमार सिंह कुशवाहा और तारारी से किरण सिंह को उम्मीदवार बनाया गया है। बिहार के इन चार विधानसभा क्षेत्रों – बेलागंज, इमामगंज, रामगढ़, और तारारी – में 13 नवंबर को उपचुनाव होने हैं, और इनके नतीजे 23 नवंबर को घोषित किए जाएंगे।

प्रशांत किशोर का यह बयान चुनावी रणनीतिकार के रूप में उनकी फीस और फंडिंग को लेकर चल रहे सवालों का जवाब था।

कौन हैं प्रशांत किशोर?

प्रशांत किशोर एक जाने-माने राजनीतिक रणनीतिकार हैं, जिन्होंने भारत की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों के लिए चुनावी अभियान तैयार किए हैं। उनका करियर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 2014 के लोकसभा चुनाव प्रचार से चर्चा में आया, जब उनकी बनाई रणनीतियों ने बीजेपी को ऐतिहासिक जीत दिलाने में मदद की। इसके बाद उन्होंने बिहार में नीतीश कुमार, दिल्ली में आम आदमी पार्टी, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कॉन्ग्रेस और आंध्र प्रदेश में वाईएसआर कॉन्ग्रेस जैसे कई दलों के साथ काम किया​

प्रशांत किशोर की कंपनी इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी (I-PAC) ने विभिन्न राज्यों में विधानसभा चुनावों में रणनीतियाँ तैयार कीं, जिससे वे राजनीति में एक भरोसेमंद नाम बन गए। हालाँकि वे कई बार कॉन्ग्रेस में शामिल होने की अटकलों में भी रहे हैं, लेकिन आखिर में उन्होंने खुद की राजनीतिक पार्टी बनाई है।

‘औरतों की आवाज इबादत के वक्त भी सुनाई न पड़े’ : अफगान महिलाओं के लिए तालिबान का फरमान, अल्लाह-हु-अकबर और सुभानाल्लाह कहने की भी आजादी नहीं

अफगानिस्तान में साल 2021 में सत्ता सँभालने के बाद से तालिबान महिलाओं के खिलाफ एक के बाद एक फरमान जारी कर रहा है। स्कूल-कॉलेज एवं नौकरीपेशा से निकालने के बाद तालिबान ने एक और विचित्र फरमान जारी किया है। तालिबान ने कहा कि इबादत करते समय महिलाओं की आवाज सुनाई नहीं देनी चाहिए। तालिबान ने महिलाओं की आवाज को ‘आवारा’ बताया है।

तालिबान के मंत्री मोहम्मद खालिद हनफी ने अपने फरमान में कहा कि औरतों की आवाज को आवारा माना जाता है। इसलिए उन्हें छिपकर रहना चाहिए और सार्वजनिक स्थानों पर उनकी आवाज किसी के कानों में नहीं पड़नी चाहिए। महिलाओं के भी नहीं। इसलिए कुरान पढ़ते समय भी उनकी आवाज सुनाई नहीं देनी चाहिए। पूर्वी लोगार प्रांत में एक कार्यक्रम के दौरान मंत्री खालिद हनफी ने इसकी घोषणा की।

हनफी ने कहा, “जब एक वयस्क महिला प्रार्थना करती है और दूसरी महिला उसके पास से गुजरती है तो उसे इतनी ऊँची आवाज में प्रार्थना नहीं करनी चाहिए कि वह सुन सके।” म्यूजिक को लेकर उन्होंने आगे कहा, “अगर उन्हें प्रार्थना करते समय (एक-दूसरे की) आवाज सुनने की भी अनुमति नहीं है तो उन्हें गाने की अनुमति कैसे दी जा सकती है, किसी और चीज की तो बात ही छोड़िए।”

हनफी ने कहा, “एक महिला के लिए किसी अन्य वयस्क महिला के सामने कुरान की आयतें पढ़ना वर्जित है। यहाँ तक कि तकबीर (अल्लाह हु अकबर) के नारे लगाने की भी अनुमति नहीं है।” उन्होंने कहा कि वे सुभानाल्लाह भी नहीं कह सकतीं। एक महिला को अजान देने की अनुमति भी नहीं है। हनफी की टिप्पणी का ऑडियो मंत्रालय के सोशल मीडिया मंच पर साझा किया गया था, लेकिन बाद में हटा दिया गया।

मंत्री ने कहा कि नैतिकता कानूनों के तहत ये नए प्रतिबंध लगाए गए हैं और उन्हें इसका पालन करना होगा। इन कानूनों के तहत महिलाओं को घर के बाहर बिना बुर्के के निकलना, ऊँची आवाज में बात करना और अपना चेहरा दिखाने पर प्रतिबंध लगाया गया है। इसके अलावा, लड़कियों को छठी कक्षा के बाद पढ़ाई पर रोक और महिलाओं को नौकरियों से बाहर रखा गया है।

यह फरमान तालिबान द्वारा इस साल अगस्त में लागू किए गए उस नए कानून ठीक दो महीने बाद आया है, जिसमें महिलाओं को घर से बाहर निकलते समय चेहरे सहित पूरे शरीर को ढकने का आदेश दिया गया है। तालिबान के अधिकारी महिला स्वास्थ्य कर्मियों को बात करने से मना करते हैं, खासकर पुरुष रिश्तेदारों से।

हेरात में दाई का काम करने वाली एक महिला ने एक टीवी चैनल को कहा, “जब हम काम पर जाते हैं तो वे हमें चेकपॉइंट पर बात करने की भी अनुमति नहीं देते हैं और क्लीनिकों में हमें पुरुष रिश्तेदारों के साथ चिकित्सा मामलों पर चर्चा नहीं करने के लिए कहा जाता है।” दाई ने बताया कि उसने आठ सालों तक दूरदराज के स्वास्थ्य क्लीनिकों में काम किया है।

विदेश में रहने वाले अफगान कार्यकर्ताओं ने तालिबान के इस आदेश की निंदा की है। ऑस्ट्रेलियाई हजारा एडवोकेसी नेटवर्क की ज़ोहल अज़रा ने कहा, “पिछले महीने तालिबान द्वारा सार्वजनिक रूप से महिलाओं की आवाज़ और चेहरे पर प्रतिबंध लगाने के बाद स्थिति और खराब होने की कल्पना करना कठिन है। इस आदेश के साथ हमने देखा कि महिलाओं को नुकसान पहुँचाने की तालिबान की क्षमता की कोई सीमा नहीं है।”

अज़रा ने कहा, “अफगानिस्तान में सत्ता में लौटने के बाद से तालिबान ने 105 से अधिक आदेशों और फतवों को लागू करके महिलाओं और बच्चियों के सार्वजनिक जीवन को समाप्त कर दिया है। इन्हें हिंसक और मनमाने ढंग से लागू किया जाता है, जिसमें हिरासत, यौन शोषण, यातना और क्रूरता या अपमानजनक व्यवहार एवं दंड जैसे कि महिलाओं और लड़कियों को पत्थर मारना और कोड़े मारना शामिल हैं।”

पत्थरबाजी, मारपीट, फिर गाड़ियों में आग… इंदौर में हिंदू बच्चों के पटाखा जलाने पर दो पक्षों में भड़का विवाद, सड़कों पर तोड़फोड़ और नारेबाजी

इंदौर में दिवाली के अगले दिन शुक्रवार (1 नवंबर) को दो समुदायों के बीच पटाखे फोड़ने को लेकर विवाद हो गया। यह झगड़ा इतना बढ़ गया कि दोनों तरफ से एक-दूसरे पर पत्थरबाजी शुरू हो गई, जिससे कुछ लोगों को मामूली चोटें आईं। पुलिस सूत्रों के हवाले से छपी एक रिपोर्ट के अनुसार, यह घटना छतरीपुरा थाना इलाके के रविदास पुरा में हुई।

बताया जा रहा है कि छतरीपुरा इलाके में कुछ बच्चे दोपहर में पटाखे फोड़ रहे थे। इसी दौरान “समुदाय विशेष” के कुछ लोग नाराज़ हो गए और गुस्से में आकर सड़क पर खड़ी गाड़ियों के शीशे तोड़ दिए और नुकसान पहुँचाया।

घटना की सूचना मिलते ही मौके पर भारी संख्या में पुलिस बल तैनात कर दिया गया, जिसने जल्द ही स्थिति को काबू में कर लिया। घायल लोगों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है, और पुलिस ने मामले की जाँच शुरू कर दी है। जाँच के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

जगरण की रिपोर्ट के अनुसार, डीसीपी जोन 4 ऋषिकेश मीणा ने बताया, “छतरीपुरा पुलिस थाना क्षेत्र के रविदास पुरा इलाके में कुछ बच्चे शुक्रवार (1 नवंबर 2024) दोपहर पटाखे जला रहे थे, जिस कारण दो समुदायों के पड़ोसियों के बीच विवाद हो गया। इस घटना में तीन लोग घायल हुए हैं, जिन्हें अस्पताल में इलाज दिया जा रहा है।”

उन्होंने आगे कहा, “इलाके में सुरक्षा बनाए रखने के लिए करीब 80 पुलिसकर्मी तैनात किए गए हैं, और फिलहाल स्थिति नियंत्रण में है। हम सभी से अपील करते हैं कि किसी भी अफवाह या गलत जानकारी पर ध्यान न दें। जो लोग इस झगड़े के ज़िम्मेदार पाए जाएंगे, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।”

घटना के बाद स्थानीय विधायक मालिनी गौर के बेटे एकलव्य गौर हिंदू संगठनों के सदस्यों के साथ छतरीपुरा थाने पहुँचे और दूसरी तरफ के दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की माँग की। मालहर्गंज, पंड्रिनाथ और सराफा थानों से अतिरिक्त पुलिस बल भी मौके पर भेजा गया है।

फरीदाबाद में हिंदू परिवार पर हमला, युवती से रेप की कोशिश

बता दें कि दिवाली की रात को फरीदाबाद के सुभाष कॉलोनी में एक हिंदू लड़का अपने घर के बाहर पटाखे जला रहा था, इसी दौरान पड़ोस में रहने वाले राज और आशिक की अगुवाई में इस्लामी कट्टरपंथियों के झुंड ने हमला बोल दिया। उन्होंने हिंदू परिवार की लड़की का रेप करने की भी कोशिश की। इस दौरान 40-50 इस्लामी कट्टरपंथियों ने जमकर तांडव मचाया।

जो मुस्लिम 1947 में पाकिस्तान गए, जमीन भी ‘साथ ले गए’: हिंदुओं का हक मारने के लिए Waqf के साथ ऐसे रचा गया षड्यंत्र… सरकारों के दम पर ही खड़ा हुआ यह लैंड माफिया

देश भर में वक्फ बोर्ड द्वारा एक के बाद एक करके सरकारी ही नहीं, निजी संपत्तियों पर दावा किया जा रहा है। कर्नाटक में किसानों की 1200 एकड़ जमीन पर वक्फ बोर्ड दावा करना और कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा उसे हस्तांतरित करने के लिए किसानों को नोटिस देने के बाद बवाल मच गया है। वहीं, केंद्रे की मोदी सरकार वक्फ बोर्ड की असीमित शक्तियों को नियंत्रित करने कि लिए वक्फ संशोधन बिल पेश करने जा रही है, जो फिलहाल संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास है।

वक्फ बोर्ड भारत की तीसरी सबसे अधिक संपत्ति वाली संस्था है। इसको देखते हुए कर्नाटक के भाजपा विधायक बसनगौड़ा पाटिल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर वक्फ संपत्तियों का राष्ट्रीयकरण करने की माँग की है। अपने पत्र में पाटिल ने लिखा है कि वर्तमान कानून से शक्तिशाली बना वक्फ बोर्ड व्यक्तियों का ही नहीं, लंबे समय से चली आ रहे धार्मिक संस्थाओं, जो वक्फ से संबंधित भी नहीं हैं, उन पर भी अतिक्रमण कर रहा है।

कर्नाटक में किसानों की जमीनों पर दावा करने से पहले सितंबर 2022 में तमिलनाडु में वक्फ बोर्ड ने हिंदुओं के पूरे गाँव और 1100 साल पुराने मंदिर पर दावा ठोक दिया था। तमिलनाडु में वक्फ बोर्ड ने त्रिची के नजदीक स्थित तिरुचेंथुरई गाँव को वक्फ संपत्ति घोषित कर दिया था। जब राजगोपाल नाम के व्यक्ति ने अपनी जमीन बेचने का प्रयास किया तो यह मामला समाने आया था।

क्या होता है वक्फ?

वक्फ अरबी भाषा के वकुफा शब्द से बना है। इसका अर्थ होता है ठहरना। वकुफा से ही वक्फ बना है। वहीं, वक्फ बोर्ड वो संस्था है जो अल्लाह के नाम पर दान में दी गई संपत्ति का रख-रखाव करता है। हालाँकि, मुस्लिमों की पवित्र पुस्तक कुरान में वक्फ शब्द का जिक्र नहीं है। फिर भी, मुस्लिम जब अपनी किसी चल या अचल संपत्ति को जकात के रूप में देते हैं तो वो संपत्ति ‘वक्फ’ कहलाने लगी।

जकात दिए जाने के बाद इस संपत्ति पर सिर्फ अल्लाह का हक माना जाता है और उसकी देखरेख ‘वक्फ-बोर्ड’ को दी जाती है। यह संस्थान उस संपत्ति से जुड़े सारे कानूनी काम को सँभालती है। इस संपत्ति को खरीदा-बेचा नहीं जा सकता, सिर्फ अधिकतम 30 वर्षों के किराए पर दी जा सकती है। एक बार संपत्ति वक्फ को दे देने के बाद वह संपत्ति कभी वापस नहीं मिल सकती।

भारत में वक्फ: पाकिस्तान जाने वाले मुस्लिमों की संपत्ति भी कब्जाया

भारत में वक्फ का सिद्धांत मुस्लिम आक्रांताओं के साथ आया। सारी संपत्ति पर मुस्लिम शासकों का अधिकार होता था तो वक्फ संपत्ति के प्रबंधन करने के लिए अलग से बोर्ड आदि जैसे संस्था आदि नहीं बने थे। भारत में वक्फ का विचार दिल्ली सल्तनत से शुरू होता है, जब सुल्तान मुइज़ुद्दीन सैम ग़ौर ने मुल्तान की जामा मस्जिद के लिए दो गाँव देकर इसका प्रशासन शेख उल इस्लाम को सौंपा था।

इस तरह जैसे जैसे इस्लामी शासन का प्रभाव भारत में बढ़ा वैसे-वैसे वक्फ की संपत्तियों में वृद्धि होती गई। वक्फ बोर्ड को ज्यादातर संपत्तियाँ मुस्लिम शासनकाल में मिलीं। मुगलों के शासनकाल में वक्फ संस्थाओं को मस्जिद, मदरसा, कब्रगाह के लिए बेहिसाब जमीनें मिलीं। औरंगेजब से लेकर अकबर तक तमाम बादशाहों ने मुस्लिम संस्थाओं के लिए खूब जमीनें दीं। गाँव के गाँव दे दिए।

इसके अलावा, 1947 में देश के बँटवारे के समय पाकिस्तान जाने वाले मुस्लिमों ने अपनी संपत्तियाँ या तो अपने परिवार के नाम कर दी या वक्फ के नाम कर दीं। इस तरह भारत में शत्रु संपत्ति अधिनियम के तहत सरकारी कब्जे में लेने के लिए कुछ विशेष संपत्ति नहीं बची। वो संपत्तियाँ पहले ही मुस्लिमों के हाथ से निकल मुस्लिमों के हाथ में जा चुकी थीं।

वक्फ बोर्ड ने पाकिस्तान जाने वाले मुस्लिमों की संपत्तियाँ तो वक्फ बताकर ले लीं, लेकिन पाकिस्तान से आने वाले हिंदुओं को उनके बदले कोई जमीन नहीं दी। कायदे से यह अदला-बदली का मसला था, क्योंकि भारत से पाकिस्तान जाने वाले मुस्लिमों की संपत्ति, पाकिस्तान से भारत आने वाले हिंदुओं के लिए थी। हालाँकि, ऐसा नहीं हुआ। वक्फ बोर्ड सारी संपत्ति दबाए बैठा रहा।

इस समय वक्फ बोर्ड रेलवे और कैथोलिक चर्च के बाद देश का तीसरा सबसे अधिक संपत्ति वाली संस्था है। इन संपत्तियों का क्षेत्रफल करीब 9.4 लाख एकड़ है। अल्पसंख्यक मंत्रालय के अनुसार, वक्फ बोर्ड के पास देश भर में 8,65,646 संपत्तियाँ पंजीकृत हैं। इनमें 80,000 से ज्यादा बंगाल में हैं। इसके बाद पंजाब में 70994, तमिलनाडु में 65945 और कर्नाटक में 61,195 संपत्तियाँ हैं। साल 2009 में यह जमीन 4 लाख एकड़ हुआ करती थी, जो कुछ सालों में बढ़कर दोगुनी हो गई है।

अंग्रेजों के शासन के दौरान वक्फ

मुगलों के बाद जब भारत में अंग्रेजी शासन आया, तब भी वक्फ विवाद का विषय बन गया। वक्फ की संपत्ति को लेकर विवाद इतना बढ़ा कि वह लंदन स्थित प्रिवी काउंसिल तक पहुँचा। इसके बाद ब्रिटेन में चार जजों की बेंच बैठी और वक्फ को अवैध करार दे दिया। हालाँकि, इस फैसले को ब्रिटिश भारत की सरकार ने नहीं माना और मुसलमान वक्फ वैलिडेटिंग एक्ट 1913 लाकर वक्फ बोर्ड को बचा लिया।

दरअसल, शुरुआत में अंग्रेजों ने हिंदू और मुस्लिमों के धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं किया। समय के साथ इनके नियमन के लिए कानून लाया गया। 1890 के चैरिटेबल एंडॉवमेंट्स एक्ट में चैरिटेबल संपत्तियों के लिए कोषाध्यक्षों की स्थापना की बात कही गई। 1920 में चैरिटेबल और धार्मिक ट्रस्ट अधिनियम में इच्छुक व्यक्ति को ट्रस्टों की न्यायिक निगरानी की अनुमति दी गई। इस तरह कठोर नियंत्रण रखा गया।

सन 1894 में अब्दुल फता मोहम्मद इशाक बनाम रुसोमॉय धुर मामले में एक फैसला आया। इस फैसले में कहा गया कि परिवार को लाभ पहुँचाना तब तक अमान्य है, जब तक कि वे दान के लिए समर्पित न हों। मुस्लिमों में पारिवारिक वक्फ की भी अवधारणा थी, जिसे गिफ्ट कहा जाता है। इस फैसले से मुस्लिम असंतुष्टि हो गए। इसके बाद 1913 में मुसलमान वक्फ वैधीकरण अधिनियम पारित हुआ।

आगे चलकर 1923 के मुसलमान वक्फ अधिनियम में संपत्तियों का लेखा-जोखा अनिवार्य कर दिया गया। इसके अलावा, 1934 में बंगाल वक्फ अधिनियम और बिहार वक्फ अधिनियम जैसे संशोधन पेश किए गए। इन कानूनों ने साबित कर दिया कि मुस्लिम बंदोबस्तों के प्रबंधन के लिए समर्पित कानूनों की आवश्यकता थी, जो पिछले धर्मनिरपेक्ष कानूनों के विपरीत थे।

आजादी के बाद भारत में वक्फ

सन 1947 में देश आजाद हो गया। पंडित जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री बने। उस समय तक 1923 का मुसलमान वक्फ अधिनियम लागू रहा। इसके बाद सन 1954 में तत्कालीन पंडित नेहरू की सरकार ने वक्फ अधिनियम 1954 पेश किया। इसमें वक्फ की संपत्तियों के प्रशासन को केंद्रीकृत कर दिया। इसने महत्वपूर्ण शक्तियों के साथ वक्फ बोर्ड भी स्थापित किए।

इस अधिनियम में स्वतंत्रता से पहले के कई कानूनों को निरस्त कर दिया गया था और वक्फ संपत्तियों के प्रशासन को बड़े पैमाने पर बदल दिया। इस कानून के तहत पंडित नेहरू की सरकार ने बँटवारा के बाद भारत से पाकिस्तान गए मुस्लिमों की जमीनें वक्फ बोर्डों को दे दी। इसके साथ ही पंडित नेहरू ने तुष्टिकरण की राजनीति का एक अप्रतिम उदाहरण पेश किया था।

सन 1964 में वक्फ अधिनियम 1954 के तहत केंद्रीय वक्फ परिषद की स्थापना की गई। यह केन्द्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण के अधीन एक सांविधिक निकाय है। इसे केन्द्र सरकार के सलाहकार निकाय के रूप में स्थापित किया गया था। वक्फ परिषद को केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और राज्य वक्फ बोर्डों को सलाह देने का अधिकार है। परिषद का अध्यक्ष केंद्रीय मंत्री होता है।

सन 1984 में वक्फ जाँच समिति ने एक रिपोर्ट दी, जिसके बाद वक्फ (संशोधन) अधिनियम पारित हुआ। इसका उद्देश्य वक्फ प्रशासन का पुनर्गठन करना और वित्तीय एवं परिचालन संबंधी खामियों को दूर करना था। हालाँकि, मुस्लिम समुदाय ने इसका कड़ा विरोध किया। वक्फ आयुक्त को दी गई शक्तियों के कारण इस अधिनियम को पूरी तरह से लागू नहीं किया जा सका।

नरसिम्हा राव की सरकार ने वक्फ को दी असीमित शक्तियाँ

1990 के दशक में राम मंदिर आंदोलन अपने चरम पर पहुँचने लगा। इसका परिणाम हुआ। कि 1992 में अयोध्या के बाबरी ढाँचे को गिरा दिया गया। उस समय देश में कॉन्ग्रेस की सरकार थी। इसके कारण मुस्लिम समुदाय कॉन्ग्रेस से नाराज हो गए। मुस्लिम समुदाय का कॉन्ग्रेस में विश्वास बढ़ाने के लिए नरसिम्हा राव ने वक्फ अधिनियम 1995 पारित करके कई शक्तियाँ दीं।

पीवी नरसिम्हा राव की कॉन्ग्रेस सरकार ने वक्फ एक्ट 1954 में संशोधन किया और नए-नए प्रावधान जोड़कर वक्फ बोर्ड को असीमित शक्तियाँ दे दीं। वक्फ एक्ट 1995 का सेक्शन 3(आर) के मुताबिक, अगर कोई संपत्ति, किसी भी उद्देश्य के लिए मुस्लिम कानून के मुताबिक पाक (पवित्र), मजहबी (धार्मिक) या (चैरिटेबल) परोपकारी मान लिया जाए तो वह वक्फ की संपत्ति हो जाएगी।

वक्फ अधिनियम 1995 की धारा 3 में कहा गया है कि यदि वक्फ बोर्ड को लगता है कि कोई भी भूमि किसी मुस्लिम की है तो वह उसे वक्फ की संपत्ति घोषित कर सकता है। इसके लिए वक्फ या उससे जुड़े व्यक्ति को कोई रिकॉर्ड पेश करने की जरूरत नहीं होगी। वहीं, जिस व्यक्ति की जमीन को वक्फ ने अपनी संपत्ति घोषित की है, वह अपने पक्ष में रिकॉर्ड दिखा सकता है।

इसके अलावा, वक्फ एक्ट 1995 का आर्टिकल 40 कहता है कि यह जमीन किसकी है, यह वक्फ का सर्वेयर और वक्फ बोर्ड तय करेगा। इन शक्तियों को जोड़ने के साथ ही इसमें सन 1984 के प्रमुख प्रावधानों को बरकरार रखा गया था। इस तरह वक्फ बोर्ड एक पावरफुल संस्था बनकर उभरा और वह किसी भी जमीन पर हक जमाने लगा।

UPA सरकार ने 2013 में इन शक्तियों को और बढ़ाया

इतनी शक्तियाँ मिलने के बाद भी मुस्लिम खुश नहीं दिखे। इसके बाद सन 2013 में वक्फ कानून में कॉन्ग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार ने एक और संशोधन पेश किया। इसमें वक्फ बोर्ड को स्वायत्ता और असीमित शक्तियाँ दी गईं। यहाँ तक कि कलेक्टर भी इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकता था। अगर आपकी संपत्ति को वक्फ की संपत्ति बता दी गई तो आप उसके खिलाफ कोर्ट नहीं जा सकते।

आपको वक्फ बोर्ड से गुहार लगानी होगी। जब वह नहीं मानता है तो तो वह आप वक्फ ट्रिब्यूनल में जा सकते हैं। वक्फ एक्ट की धारा 85 कहता है कि ट्रिब्यूनल के फैसले को हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती है। नए संशोधन के तहत वक्फ बोर्ड बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के अपनी संपत्तियों का प्रबंधन कर सकते हैं।

इसके अलावा, वक्फ संपत्तियों के विवादों के निपटान के लिए एक विशेष न्यायालय की स्थापना की गई। तत्कालीन सरकार ने इसे वक्फ संपत्तियों के विवादों को तेजी से निपटाने की दिशा में उठाया गया कदम बताया था। इसे वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन और निगरानी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए सक्षम बनाया गया। इसमें वक्फ संपत्तियों को विशेष दर्जा दिया गया है, जो किसी ट्रस्ट आदि से ऊपर है।

मुस्लिमों को लुभाने की कोशिश

मार्च 2014 में लोकसभा चुनाव से ठीक पहले तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार ने दिल्ली-एनसीआर की 123 प्रमुख संपत्तियाँ दिल्ली वक्फ बोर्ड को दे दीं। देश की हर सरकारों ने वक्फ बोर्ड को दिल खोलकर अनुदान दिया है। सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने नियम बनाया है कि अगर वक्फ की जमीन पर स्कूल, अस्पताल आदि बनते हैं तो इसका पूरा खर्च सरकार को देना होगा।

यह निर्णय मुख्तार अब्बास नकवी के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री रहते लिए गए थे। इस तरह हर सरकार ने वक्फ बोर्ड को फायदा पहुँचाकर मुस्लिमों को लुभाने की कोशिश की। हालाँकि, मोदी सरकार ने वक्फ की असीमित शक्तियों को कम करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। बता दें कि देश में एक सेंट्रल वक्फ बोर्ड और 32 स्टेट बोर्ड हैं। केंद्रीय अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री सेंट्रल वक्फ बोर्ड का पदेन अध्यक्ष होता है।

प्रमुख विवाद

साल 2022 में तमिलनाडु के वक्फ बोर्ड ने हिंदुओं के पूरे थिरुचेंदुरई गाँव को वक्फ संपत्ति बताते हुए उस पर अपना दावा ठोक दिया। यहाँ 1500 साल पुराना एक मंदिर है। उसे भी वक्फ बोर्ड ने अपनी संपत्ति घोषित कर दी। इस तरह वक्फ बोर्ड ने 369 एकड़ भूमि पर अपना दावा ठोका है। गाँव के लोगों का कहना है कि इन जमीनों के कागजात उनके पास मौजूद हैं।

वहीं, बेंगलुरु का ईदगाह मैदान भी एक बड़ा विवाद है। सन 1950 में वक्फ बोर्ड ने इसे वक्फ संपत्ति बताते हुए अपना दावा ठोक दिया था। वक्फ का दावा है कि यह 1850 के दशक से वक्फ की संपत्ति थी, इसलिए यह अब हमेशा के लिए वक्फ संपत्ति है। हालाँकि, यह विवाद अदालत में है और इस पर अंतिम निर्णय आना बाकी है। इसी तरह बेंगलुरु में आईटीसी विंडसर होटल पर भी वक्फ ने दावा ठोका है।

इसी तरह का मामला अप्रैल 2024 में हैदराबाद से आया था। तेलंगाना वक्फ बोर्ड ने राजधानी के एक नामी 5 स्टार होटल मैरियट को ही अपनी जागीर घोषित कर दिया था। हालाँकि, हाई कोर्ट ने उसके इस मंसूबे को धाराशायी कर दिया था। दरअसल, साल 1964 में अब्दुल गफूर नाम के एक व्यक्ति ने तब वायसराय नाम से चर्चित इस होटल पर अपना हक जताते हुए मुकदमा कर दिया था।

इसी तरह गुजरात वक्फ बोर्ड ने सूरत नगर निगम की बिल्डिंग पर ही दावा ठोक दिया। अब यह वक्फ की संपत्ति है, क्योंकि इस बिल्डिंग से जुड़े किसी भी दस्तावेज को अपडेट नहीं किया गया था। वक्फ के अनुसार, मुगल काल के दौरान सूरत नगर निगम की इमारत एक होटल थी और हज यात्रा के दौरान इस्तेमाल की जाती थी। ब्रिटिश शासन के दौरान संपत्ति तब ब्रिटिश साम्राज्य की थी। 

इसी तरह कोलकाता के टॉलीगंज क्लब और रॉयल कलकत्ता गोल्फ क्लब को भी वक्फ बोर्ड ने अपनी संपत्ति बताई है। इसके अलावा भी देश के विभिन्न हिस्सों में कई ऐसी संपत्तियाँ हैं, जिन पर वक्फ बोर्ड अपना दावा ठोकता है और उन्हें वक्फ संपत्ति बताता है। ये सारे मामले विवाद के घेरे में हैं। अब इन संपत्तियों के राष्ट्रीयकरण की माँग होने लगी है।