उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में 13 अक्टूबर 2024 को माँ दुर्गा के विसर्जन जुलूस पर मुस्लिम भीड़ ने हमला कर के रामगोपाल मिश्रा नाम के युवक की हत्या कर दी थी। इसी हिंसा में कई श्रद्धालु घायल हो गए थे। हमले के लिए अब्दुल हमीद के घर को लॉन्च पैड के तौर पर प्रयोग किया गया था। ऑपइंडिया ने जब इस हिंसा की जमीनी जानकारी जुटाई तो पता चला कि जहाँ आज अब्दुल हमीद का घर है, वो लगभग 3 दशक पहले एक हिन्दू की जमीन हुआ करती थी। आज वही हिन्दू परिवार अब्दुल हमीद से प्रताड़ित है।
यह हिंसा महराजगंज बाजार में हुई। महराजगंज सीतापुर-बहराइच मार्ग को महसी बाजार से जोड़ता है। हिन्दुओं का विसर्जन जुलूस भी इसी मार्ग से हर साल परम्परागत तौर पर गुजरता है। हिंसा से पहले महराजगंज बाजार मूल रूप से जूलरी के कारोबार के लिए प्रसिद्ध रही है। अब्दुल हमीद भी सोने-चाँदी का काम करता था। पहले वह बाजार के अंदर एक मकान में रहता था। तब मुख्य मार्ग पर अधिकतर जमीनें राम प्रसाद जायसवाल की हुआ करती थीं।
जहाँ आज अब्दुल का घर, वो पहले थी हिन्दू की जमीन
हिंसा में घायल अब्दुल हमीद के पड़ोसी संतोष तिवारी ऑपइंडिया को बताते हैं कि लगभग 30 साल पहले अब्दुल हमीद ने रामप्रसाद जयसवाल से वो जमीन खरीदी थी, जहाँ आज उसका घर है। तब रामप्रसाद जयसवाल ने अपनी मुख्य मार्ग पर मौजूद जमीन कुछ पैसों के लिए बेचने का प्रस्ताव रखा था। इसी दौरान संतोष तिवारी सहित कुछ हिन्दुओं ने इसी जमीन के कुछ हिस्से खरीदे थे। जमीन बिकने की जानकारी मिलते ही अब्दुल हमीद ने भी उसे खरीदने की इच्छा जताई।
तब अब्दुल हमीद खुद को धर्मनिरपेक्ष बता कर मीठी-मीठी बातें और हर किसी हिन्दू को उनके परम्परा के हिसाब से अभिवादन करता था। अपना नाम न छापने की शर्त पर एक स्थानीय निवासी ने बताया कि तब कई हिन्दुओं ने रामप्रसाद से अपील की थी कि वो अपनी जमीन अब्दुल हमीद के बजाय उन्हें दे दें। हालाँकि अब्दुल हमीद ने अन्य खरीदारों से अधिक दाम का ऑफर किया और जमीन का एक बड़ा हिस्सा अपने नाम करवा लिया। आज अब्दुल हमीद का घर संतोष तिवारी और खुद रामप्रसाद जायसवाल के मकानों के बीच में हैं।
‘हमसे ही जमीन लेकर हमको ही कर रहा तंग’
रामप्रसाद जायसवाल का अब देहांत हो चुका है। उनके तीन बेटे थे, जिसमें एक की मौत हो चुकी है। अब घर पर पप्पू व मून जायसवाल अलग-अलग हिस्सों में रहते हैं। ये हिस्से अब्दुल हमीद की दीवार से सटे हुए हैं। पप्पू टायर पंचर का काम करते हैं जबकि मून जयसवाल रेडीमेड कपड़ों व जूते-चप्पल के कारोबार में हैं। मून जयसवाल अब यह स्वीकार करते हैं कि भले ही किसी भी मजबूरी में ही सही पर उनके पिता द्वारा अब्दुल हमीद को जमीन बेचना एक गलत फैसला था।
मून जायसवाल हमें बताते हैं कि वो और उनके भाई अपनी बची जमीन के अलग-अलग हिस्सों में रहते हैं लेकिन दोनों ही अब्दुल हमीद द्वारा कई बार परेशान किए जा चुके हैं। पप्पू जायसवाल की पंचर वाली दुकान के सामने हमें काफी पानी जमा दिखा। पूछने पर पता चला कि यह सब अब्दुल हमीद और उसके बेटों की दबंगई के कारण है। मून जायसवाल को भी अब्दुल हमीद व उसके बेटे कई बार हड़का चुके हैं। उन्होंने हमसे कहा, “जो पहले हो गया, उसे अब सुधार नहीं सकते।”
जयसवाल परिवार को भी ध्वस्तीकरण की नोटिस
पिछले कुछ दिनों से मेन स्ट्रीम मीडिया में महराजगंज बाजार के एक हिन्दू परिवार को दिखाया जा रहा, जिसके घर को अब्दुल हमीद व कुछ अन्य मुस्लिमों के घरों के साथ सरकार की तरफ से ध्वस्तीकरण की नोटिस मिली है। यह परिवार उसी मून जायसवाल का है, जिनके पिता ने 3 दशक पहले अब्दुल हमीद को अपनी जमीन बेच कर बसा दिया था। नोटिस मून के अलावा उनके भाई पप्पू को भी मिली है। इन दोनों भाइयों ने अपनी-अपनी दुकानों से सामान खाली कर लिए हैं। नोटिस संबंधी नीचे जो वीडियो है, उसे वामपंथी, समाजवादी, इस्लामी व कॉन्ग्रेसी हैंडलों से जोर-शोर से शेयर किया जा रहा है।
अब्दुल हमीद के एक अन्य हिन्दू पड़ोसी जो सरकारी नौकरी में हैं, उन्होंने कैमरे पर न आने की शर्त पर हमसे बात की। हमें बताया गया कि अब्दुल आए दिन बंदूक निकालने का ताव दिया करता था। कुछ वर्ष पहले का जिक्र करते हुए हमसे भुक्तभोगी ने बताया कि उनके बूढ़े पिता को भी गोली मारने की धमकी अब्दुल हमीद ने दी थी। तब उस हिन्दू बुजुर्ग ने भी अब्दुल से कहा भी था कि वो ऐसी धमकियों से डरने वाले नहीं हैं।
रामगोपाल मिश्रा को भी अब्दुल हमीद के घर से सम्भवतः उसी लाइसेंसी बंदूक से मारा गया था, जिससे वो आसपास के हिन्दुओं को धमकाता था। पीड़ित इस बात की भी जाँच चाहते हैं कि अब्दुल हमीद को उस बंदूक का लाइसेंस किस अधिकारी ने कब और क्यों जारी किया था। हालाँकि लोगों का यह भी दावा है कि लाइसेंसी हथियार अब्दुल हमीद के लिए महज हाथी के दिखाने वाले दाँत हैं क्योंकि ठीक से तलाशी होने पर उस बाजार में अवैध हथियारों का जखीरा मिल सकता है।
अब्दुल के घर पड़ चुकी है नेपाल पुलिस की दबिश
ऑपइंडिया से बातचीत में कई स्थानीय लोगों का दावा है कि अब्दुल हमीद का बड़ा बेटा अंतरराष्ट्रीय अपराधी है, जिसका देश विरोधी ताकतों से संबंध हैं। लोगों ने यह भी बताया कि पिछले 10 वर्षों से उन्होंने कई बार अब्दुल हमीद के घर पर पुलिस की दबिश होते देखा है। इसमें नेपाल का पुलिस बल भी शामिल है। हमें यह भी बताया गया कि खुद को कानूनी दाँवपेंचों से बचाने के लिए अब्दुल हमीद ने दिखावे के तौर पर अपने बड़े बेटे को लिखापढ़ी करके बेदखल कर रखा है।
लोगों ने बताया कि कथित बेदखली के बावजूद अब्दुल के बेटे का आना-जाना अभी भी अपने घर पर है। उसका निकाह भी नेपाल में ही कहीं हुआ है। बाजार में अन्य स्वर्णकारों के बजाय अब्दुल हमीद की सम्पत्ति जिस तेजी से बढ़ी है, उससे लोगों को यह भी आशंका है कि अपने बेटे की काली कमाई में कहीं न कहीं उसका भी हिस्सा है। स्थानीय निवासियों का यह भी मानना है कि बिना जुगाड़ के एक इंटरनेशनल अपराधी के पिता को बंदूक का लाइसेंस नहीं मिल सकता।
चक्रवाती तूफान ‘दाना (Dana)’ ने 24 अक्टूबर की रात लगभग 12:30 बजे ओडिशा के तट पर दस्तक दी। इस दौरान इसकी अधिकतम रफ्तार 110 से 125 किलोमीटर प्रति घंटे (किमी/घंटा) थी। चक्रवाती तूफान के लैंडफॉल के कारण जोरदार आँधी और बारिश हुई। कई जगह रास्ते में पेड़ भी गिरे मिले और अन्य संरचनाओं को भी नुकसान पहुँचा।
इस तूफान का लैंडफॉल गुरुवार रात 12:45 बजे 100 किमी प्रति घंटा की रफ्तार के साथ हुआ। इसके बाद, यह धीरे-धीरे अपनी गति बढ़ाते हुए ओडिशा के धामरा और भितरकनिका के पास 120 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से गुजरा। लैंडफॉल की प्रक्रिया सुबह 8 बजे तक जारी रही, जिसके दौरान तेज हवाओं और मूसलधार बारिश ने ओडिशा और पश्चिम बंगाल के कई इलाकों में तबाही मचाई।
दाना तूफान का सबसे अधिक प्रभाव ओडिशा के मयूरभंज, भद्रक, बालेश्वर, केंद्रपाड़ा, जाजपुर, जगतसिंहपुर और कटक जिलों में देखने को मिला। इसके अलावा, पश्चिम बंगाल के पूर्व मेदिनीपुर, दक्षिण 24 परगना और उत्तर 24 परगना जैसे क्षेत्रों में भी भारी बारिश हुई।
ओडिशा में राहत बचाव कार्य जारी
बता दें कि चक्रवाती तूफान की स्थिति से निपटने के लिए ओडिशा और बंगाल का राज्य प्रशासन लाखों लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाने में जुटा है। अभी तक ओडिशा में इस चक्रवात के कारण 10 लाख से अधिक लोगों को सुरक्षित स्थानों पर शिफ्ट किया गया है। यह प्रक्रिया ओडिशा के विभिन्न जिलों में चल रही है। इसके अलावा राहत बचाव कार्य के लिए 385 बचाव दलों को तैनात किया गया है, जिसमें एनडीआरएफ, अग्निशामक दल और वन विकास निगम शामिल हैं। इसी तरह 4756 चक्रवात राहत केंद्र स्थापित किए गए हैं ताकि प्रभावित लोगों को सुरक्षित स्थान पर ले जाया जा सके।
Odisha Cyclone: पहले की सरकारों की एप्रोच आपदा के बाद राहत की होती थी आज एप्रोच आपदा से पहले की तैयारियों से जीरो Casualty की है
मोदी सरकार चक्रवात, भूकंप और बाढ़ जैसी आपदाओं से लोगों के जीवन को सुरक्षित कर रही है pic.twitter.com/WR0MTfPw2K
इस बीच मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने भी सारी स्थिति का जायजा लिया और पुष्टि की कि तूफान के कारण राज्य में लगभग 10 लाख लोगों को सुरक्षित स्थानों पर भेजा गया है। उन्होंने कहा कि चक्रवात से प्रभावित क्षेत्रों में राहत कार्य तेजी से चल रहे हैं और सभी आवश्यक उपाय किए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री ने जानकारी दी कि ओडिशा सरकार ने 7200 चक्रवात आश्रय स्थलों की व्यवस्था की है, जहाँ विस्थापित लोगों को भोजन, दवा, पानी और अन्य आवश्यक वस्तुएँ उपलब्ध कराई जा रही हैं।
#WATCH | Odisha CM Mohan Charan Majhi taking stock of the landfall situation of #CycloneDana in the presence of minister of revenue and disaster management, Suresh Pujari and Odisha's chief secretary, Manoj Ahuja at Rajiv Bhavan, in Bhubaneswar pic.twitter.com/gRImu5ha56
मुख्यमंत्री ने चक्रवात दाना से ओडिशा में आई गंभीर तबाही पर जहाँ जानकारी दी तो वहीं ये भी बताया कि राज्य सरकार इस आपदा से निपटने के लिए कैसे एहतियाती कदम उठा रही है। इस चक्रवात के प्रभाव से बचने के लिए 4,431 गर्भवती महिलाओं को स्वास्थ्य केंद्रों में स्थानांतरित किया गया। इनमें से 1,600 महिलाओं ने सुरक्षित स्थानों पर बच्चों को जन्म दिया। यह जानकारी ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी द्वारा दी गई थी।
चक्रवात दाना के दौरान, गर्भवती महिलाओं को स्वास्थ्य केंद्रों में ले जाने का निर्णय लिया गया ताकि उन्हें सुरक्षित प्रसव की सुविधा मिल सके। इन महिलाओं को 6,008 चक्रवात आश्रयों में रखा गया था, जहाँ उन्हें आवश्यक चिकित्सा देखभाल, भोजन, पानी और अन्य जरूरत की चीजें प्रदान की गईं।
STORY | 1,600 pregnant women relocated to health centres due to cyclone Dana gave birth: Odisha CM
राज्य सरकार के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग ने पुष्टि की है कि जिन गर्भवती महिलाओं को चक्रवात आश्रयों में ले जाया गया था, उनमें से माँ और नवजात दोनों स्वस्थ हैं। नियाली अस्पताल में एक महिला ने बच्चे को जन्म दिया और दोनों की स्थिति स्थिर है।
बंगाल में 16 मछुआरे गायब
चक्रवात दाना के कारण हुई मौतों की आधिकारिक संख्या अभी स्पष्ट नहीं है। मगर, इसी बीच पश्चिम बंगाल से खबर आ रही है कि दाना चक्रवात के आगमन से पहले ही, शमशेरगंज और फरक्का क्षेत्रों में आंधी-तूफान के कारण तीन नावें पलट गईं। इस घटना में 16 मछुआरे लापता हो गए हैं, जो गंगा नदी में हिलसा मछली पकड़ने गए थे। यह घटना तब हुई जब मछुआरे प्रशासन द्वारा जारी चेतावनियों के बावजूद समुद्र में गए थे। नाव में कुल 20 लोग थे। इनमें से 4 की जान बचा ली गई जबकि 16 लापता हो गए
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (24 अक्टूबर 2024) को उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और राजस्थान में बुलडोजर की कार्रवाई को अदालत की अवमानना बताने वाली याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। दरअसल, वामपंथी संगठन नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन वीमेन (NFIW) ने इस संबंध में एक जनहित याचिका दायर की थी। इसमें आरोप गया था कि कुछ राज्यों ने ध्वस्तीकरण पर रोक लगाने वाले कोर्ट के अंतरिम आदेश की अवमानना की है।
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश बीआर गवई, जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। जस्टिस गवई ने मौखिक रूप से टिप्पणी करते हुए कहा, “आप तीसरे पक्ष हैं। आपकी शिकायत क्या है? प्रभावित लोगों को आने दीजिए, हम सुनवाई करेंगे। इससे मुकदमों की बाढ़ आ जाएगी। हम भानुमती का पिटारा नहीं खोलना चाहते हैं।”
पीठ ने याचिकाकर्ता को तीसरा पक्ष बताया। अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की पीठ ने कहा, “वर्तमान मामले के तथ्यों को देखते हुए तथा वर्तमान आवेदकों के कहने पर, जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कथित कृत्यों से संबंधित नहीं हैं, हम वर्तमान याचिका पर विचार करने के लिए इच्छुक नहीं हैं।” NFIW की ओर से अधिवक्ता निजाम पाशा पेश हुए थे।
पाशा ने कहा कि अदालत ने 1 अक्टूबर को बिना पूर्व अनुमति के ध्वस्तीकरण की कार्रवाई पर रोक बढ़ा दी थी, तब से उत्तर प्रदेश के कानपुर, उत्तराखंड के हरिद्वार और राजस्थान जयपुर में अदालती आदेश का उल्लंघन करने वाली 3 घटनाएँ हुईं। पाशा ने कहा कि एक रेस्तराँ को शाकाहारी भोजन के साथ मांसाहारी भोजन मिलाने के आरोप के बाद ध्वस्त कर दिया गया था।
यूपी सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने कहा कि NFIW एक तीसरा पक्ष है जिसने अखबारों की रिपोर्ट के आधार पर जनहित याचिका दायर की है। उन्होंने आगे कहा कि कथित घटना फुटपाथ पर अतिक्रमण हटाने से संबंधित है। इस पर पाशा ने कहा कि NFIW केवल मामलों को न्यायालय के संज्ञान में ला रहा है। इन घटनाओं से प्रभावित दो लोग जेल में हैं।
पाशा के तर्क में दम नहीं पाते हुए जस्टिस गवई ने कहा, “उनका (पीड़ितों का) परिवार आ सकता है… कोई भी व्यक्ति जो उस स्थान से है, आ सकता है… हम हरिद्वार से आने वाले एक वादी की जनहित याचिका की सराहना कर सकते हैं, जिसके पास कम से कम कुछ तथ्य तो हैं… अन्यथा, केवल समाचार पत्रों की रिपोर्टों के आधार पर, हम भानुमती का पिटारा खोल देंगे।”
बता दें कि 17 सितंबर 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का प्रयोग करते हुए एक अंतरिम आदेश पारित किया था। इसमें कहा गया था कि कोर्ट की अनुमति के बिना कोई भी तोड़फोड़ नहीं की जाएगी, सिवाय सार्वजनिक सड़कों, फुटपाथों, रेलवे लाइनों या जलाशयों पर अतिक्रमण हटाने के।
सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश राज्य सरकारों द्वारा अपराध के आरोपितों के मकानों पर बुलडोजर चलाने के विरोध में दायर की गई याचिकाओं की सुनवाई के दौरान दिया था। उसने कहा था कि किसी व्यक्ति का घर सिर्फ इसलिए नहीं गिराया जा सकता, क्योंकि वह आरोपित है। शीर्ष न्यायालय ने 1 अक्टूबर को इस मामले में आदेश को सुरक्षित रख लिया था और उसने कोर्ट की अनुमति के बिना मकान गिराने पर लगाई गई रोक को अगले आदेश तक बढ़ा दिया था।
मोदी सरकार की केंद्रीय कैबिनेट की बैठक दिल्ली में हुई, जिसमें कई अहम फैसले लिए गए। ये फैसले रेलवे से लेकर स्पेस सेक्टर तक के लिए लिए गए। कैबिनेट की बैठक में फैसला लिया गया कि भारत सरकार स्पेस सेक्टर में स्टार्ट अप को बढ़ावा देने के लिए 1,000 करोड़ रुपए का वेंचर कैपिटल फंड बनाएगी। इसे पाँच साल में खर्च किया जाएगा। 2025-26 में 150 करोड़, 2026-27, 2027-28 और 2028-29 में 250-250 करोड़, 2029-30 में 100 करोड़ खर्च होंगे। इसके साथ ही मोदी सरकार अयोध्या से लेकर सीतामढ़ी तक नई रेलवे लाइन बनाएगी।
केंद्रीय मंत्री अश्विन वैष्णव ने यह जानकारी गुरुवार (24 अक्टूबर 2024) को कैबिनेट की बैठक के बाद दी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बैठक की अध्यक्षता की। उन्होंने बताया कि कैबिनेट बैठक के दौरान आर्थिक मामलों की समिति (सीसीईए) ने रेल मंत्रालय के 6,798 करोड़ रुपए के दो प्रोजेक्ट को पास किया।
इस कैबिनेट बैठक के दौरान रेलवे को लेकर अहम फैसले किए गए। इसमें नरकटियागंज-रक्सौल-सीतामढ़ी-दरभंगा और सीतामढी-मुजफ्फरपुर खंड में 256 किलोमीटर की रेल लाइन को डबल किया जाएगा। वहीं अमरावती होते हुए एर्रुपलेम और नंबुरु के बीच 57 किमी की नई रेल लाइन बिछाई जाएगी। यह आंध्र प्रदेश के एनटीआर विजयवाड़ा और गुंटूर जिलों और तेलंगाना के खम्मम जिले से होकर गुजरेगी।
वहीं, बिहार में होने वाले दोहरीकरण से नेपाल, पूर्वोत्तर भारत तक कनेक्टिविटी बढ़ेगी। मालगाड़ियों के साथ-साथ यात्री ट्रेनों की आवाजाही में सुविधा होगी। दोनों योजनाएँ तीन राज्यों आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और बिहार के 8 जिलों को कवर करेंगी।
इसके अलावा एक और परियोजना को केंद्र सरकार ने मंजूरी देते हुए अयोध्या से माँ सीता के जन्मस्थान सीतामढ़ी तक करीब 257 किलोमीटर की रेल लाइन बिछाने का फैसला किया है। यह रेल लाइन नेपाल सीमा के आसपास होगी। इससे उत्तर बिहार, मिथिलाँचल, पूर्वी चंपारण-पश्चिमी चंपारण, मुजफ्फरपुर जैसे शहर जुड़ेंगे। ये प्रोजेक्ट पूरा करने में ₹4553 करोड़ का खर्च आएगा।
#Cabinet approves railway infrastructure for North Bihar and strategic connectivity to North Eastern states
The doubling of the Narkatiaganj-Raxaul-Sitamarhi-Darbhanga & Sitamarhi-Muzaffarpur section will strengthen the connectivity to Nepal, North-east India, and Border areas… pic.twitter.com/nznyQ0KPYv
इससे पहले, 9 अक्टूबर 2024 को हुई पिछली कैबिनेट बैठक में दिसंबर 2028 तक गरीबों को मुफ्त अनाज देने पर मुहर लगाई गई थी। इसके अलावा राजस्थान और पंजाब के सीमावर्ती क्षेत्रों में 4406 करोड़ रुपए के निवेश से 2280 KM सड़क निर्माण को मंजूरी दी गई थी।
प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना (PM-GKAY) और अन्य कल्याणकारी योजनाओं के तहत जुलाई 2024 से दिसंबर 2028 तक मुफ्त फोर्टिफाइड चावल की आपूर्ति जारी रखने को भी मंजूरी दी गई थी। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा था कि इसमें 17,082 करोड़ रुपए खर्च होंगें, जिसे पूरी तरह से केंद्र सरकार उठाएगी।
उससे पहले की बात करें तो 3 अक्टूबर 2024 को हुई केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में मोदी सरकार ने रेलवे कर्मचारियों को 78 दिन के बोनस का ऐलान किया था। इसके लिए सरकार ने रेलवे कर्मचारियों के लिए 2029 करोड़ रुपए के प्रोडक्टिविटी लिंक्ड बोनस को मंजूरी दी थी। इससे रेलवे के 11,72,240 कर्मचारियों का फायदा मिलेगा।
जम्मू-कश्मीर के गांदरबल जिले में 20 अक्टूबर 2024 को जेड मोड सुरंग के निर्माण के लिए काम कर रहे वर्करों पर आतंकी हमला हुआ था। घटना में 7 लोगों की मौत हो गई थी जबकि कई घायल भी हुए थे। अब इसी घटना की सीसीटीवी फुटेज सामने आई है।
सीसीटीवी में दिखाई दे रहा है कि शाम करीब 7.25 पर रात के खाने के समय, जब सारे वर्कर डिनर के लिए इकट्ठा हो रहे थे, तभी दो आतंकी मेस में घुसे और फिर वहाँ ताबड़तोड़ गोलियाँ चलाई गईं।
रिपोर्ट्स के अनुसार, आतंकियों ने घटना को अंजाम देने के लिए अमेरिकी M4 कार्बाइन राइफल और एक AK-47 का इस्तेमाल किया था। इतना ही नहीं ऐसा भी पता चला है कि आतंकियों को वर्करों के कैंप वाली जगह के बारे में अच्छे से जानकारी भी थी। वो लोग करीबन 7 मिनट वहाँ रुके थे।
Pictures of terrorist involved in the recent attack on laborers in the Gagangeer area of Central #Kashmir's #Ganderbal. Hope our brave security forces will send him to hell v soon. pic.twitter.com/Pfpxa1N9B9
अब जम्मू-कश्मीर की पुलिस के साथ राष्ट्रीय जाँच एजेंसी और अन्य सुरक्षा एजेंसियाँ भी इस मामले की जाँच कर रही हैं। सामने आया है कि हमलावरों ने ड्राइवर को गोली मारने से पहले कैंप में खड़ी गाड़ी के अंदर ग्रेनेड फेंका था और बिजली काट दी गई थी।
ऐसे में शुरुआत में गोलियों की तड़तड़ाहट सुन अन्य मजदूरों को लगा कि लोग पटाखे फोड़ रहे है। हालाँकि बाद में उन्हें एहसास हो गया कि उनके कैंप पर हमला हुआ है।
बता दें कि गांदरबल में हुए इस हमले में जिन सात वर्करों की मौत हुई उनमें पंजाब के गुरमीत सिंह, बिहार के हनीफ,फहीम, कलीम थे और मध्यप्रदेश के अनिल कुमार शुक्ला, जम्मू के शशि भूषण अब्रोल और बड़गाम के डॉ शहनवाज भी थे। इस घटना से 2 दिन पहले भी एक गैर कश्मीरी को आतंकियों ने निशाना बनाया था और घटना के कुछ दिन बाद फिर एक यूपी का मजदूर को आतंकियों ने निशाना बनाया है।
बंगाल की खाड़ी से उठा चक्रवाती तूफान ‘दाना’ गुरुवार (24 अक्टूबर) की देर रात ओडिशा के तट से टकराएगा। इसका असर पश्चिम बंगाल में भी दिखाई देगा। दोनों राज्यों में अलर्ट जारी कर दिया गया है और विभिन्न एजेंसियों को सतर्क कर दिया गया है। दोनों राज्यों में 16 घंटों के लिए उड़ानों पर रोक लगा दी गई है। 500 से ज्यादा ट्रेनों को रद्द कर दिया गया है।
ओडिशा और बंगाल के लोगों को ‘डेंजर जोन’ छोड़ने के लिए कहा गया है। चक्रवात दाना की वजह से तटीय इलाकों में इस वक्त 70 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से हवाएँ चल रही हैं। मौसम विभाग के अनुसार, दाना 120 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से ओडिशा के उत्तरी हिस्से से गुजरेगा। इलाकों में 30 सेंटीमीटर तक बारिश हो सकती है।
स्थिति को देखते हुए ओडिशा के 14 जिलों से 10 लाख लोगों को एक से दूसरी जगह भेजा गया है। दाना का असर सिर्फ ओडिशा और पश्चिम बंगाल तक ही सीमित नहीं रहेगा। इसका असर छत्तीसगढ़ के मध्य, दक्षिण और उत्तरी हिस्से में भी देखने को मिलेगा। कई इलाकों में तेज हवाएँ चलेंगी और जमकर बारिश होगी।
दाना के विकराल रूप को देखते हुए ओडिशा डिजास्टर रिलीफ फोर्स (ODRF), नेशनल डिजास्टर रिलीफ फोर्स (NDRF) और फायर ब्रिगेड की 288 टीमों की तैनाती की गई हैं। राज्य के 14 जिलों में 25 अक्टूबर को स्कूल-कॉलेज बंद रहेंगे। ओडिशा हाईकोर्ट भी 25 अक्टूबर भी बंद रहेगा। इस बीच सरकारी कर्मचारियों की छुट्टियाँ रद्द कर दी गई हैं।
चक्रवात (Cyclone) के प्रकार
दुनिया भर में चक्रवातों को प्रमुख रूप से दो भागों में विभाजित किया गया है। उष्णकटिबंधीय चक्रवात और शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात। उष्णकटिबंधीय चक्रवात कर्क रेखा और मकर रेखा के बीच के क्षेत्र में आते हैं अर्थात भूमध्य रेखा के आस-पास के क्षेत्रों में। शीतोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में आने वाले चक्रवात शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात होते हैं। शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवातों को फ्रन्टल या वेव साइक्लोन भी कहा जाता है।
अक्सर लोगों में यह भ्रम रहता है कि साइक्लोन, हैरीकेन और टाईफून में भी क्या कोई अंतर है, तो आपको बता दें कि ये सभी उष्णकटिबंधीय चक्रवाती तूफान ही हैं। दुनिया में अलग-अलग जगह पर इन्हें इस प्रकार विभिन्न नामों से जाना जाता है। जैसे हिन्द महासागर और दक्षिणी प्रशांत क्षेत्र में आने वाले तूफ़ानों को ‘ट्रॉपिकल साइक्लोन (Tropical Cyclone)’ या सिर्फ साइक्लोन कहा जाता है।
उत्तर अटलांटिक, कैरेबियन और पूर्वोत्तर प्रशांत क्षेत्र में उठने वाले तूफ़ानों को हैरीकेन कहा जाता है। उत्तर-पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र के तूफान टाईफून कहे जाते हैं। यह क्षेत्र इस प्रकार के तूफ़ानों के लिए सबसे सुभेद्य क्षेत्र हैं। इसके अलावा पश्चिमी अफ्रीका और संयुक्त राज्य अमेरिका के दक्षिणी भागों में आने वाले तूफानों को टॉरनेडो कहा जाता है।
इन चक्रवाती तूफ़ानों में हवा की गति और तीव्रता के आधार पर भी इन्हें विभाजित किया जाता है। इन तूफ़ानों का सबसे न्यूनतम स्तर ‘डिप्रेशन (Depression)’ कहा जाता है, जहाँ हवा की गति लगभग 50 किमी या उससे भी कम होती है। इन चक्रवाती तूफ़ानों का सबसे भयानक और विनाशकारी रूप ‘सुपर साइक्लोनिक स्टॉर्म (Super Cyclonic Storm)’ कहा जाता है। इसमें हवा की गति 222 किमी से भी अधिक हो जाती है।
उष्णकटिबंधीय चक्रवाती तूफ़ानों के बनने के लिए कुछ आवश्यक शर्तें भी होती हैं। ये शर्तें पूरी होने पर ही समुद्री क्षेत्रों में किसी चक्रवाती तूफान का निर्माण हो पाता है। सबसे पहली आवश्यकता है कि समुद्र की एक विशाल सतह का तापमान 27° C से अधिक होना चाहिए। इससे होता यह है कि इस सतह के संपर्क में आने वाली हवा गर्म होती है और ऊपर उठती है।
गर्म हवा के ऊपर उठने के कारण बाहरी ठंडी हवा उस खाली स्थान को तेजी से भरने के लिए आती है। यहाँ पृथ्वी की घूर्णन गति से उत्पन्न कोरियॉलिस बल के कारण बाहर से आने वाली ठंडी हवा तेज गति से एक सर्पिलाकार पथ पर घूमने लगती है। इस हवा के घूर्णन की दिशा इस बात पर निर्भर करती है कि तूफान किस गोलार्ध में उत्पन्न हुआ है।
यदि तूफान उत्तरी गोलार्ध में है तो इसका घूर्णन घड़ी की सुई की विपरीत दिशा में अर्थात एंटी-क्लॉकवाइज होगा, लेकिन यदि यही तूफान दक्षिणी गोलार्ध में है तो इसकी घूर्णन की दिशा उत्तरी गोलार्ध के विपरीत अर्थात घड़ी की सुई की दिशा (क्लॉकवाइज) होगी। समुद्र की सतह पर पहले से बना हुआ कम दबाव का क्षेत्र भी इन चक्रवाती तूफ़ानों के निर्माण में सहायक होता है।
इसके अलावा ऊर्ध्वाधर पवनों की गति में भिन्नता को भी तूफ़ानों के निर्माण में सहायक माना जा सकता है। अब समझते हैं कि एक चक्रवात का निर्माण कैसे होता है और वो कौन से कारक होते हैं जिनसे एक तूफान की गति, उसके द्वारा प्रभावित क्षेत्र और स्थानीय मौसम में परिवर्तन निर्धारित होता है। किसी भी चक्रवात के निर्माण या प्रारम्भिक अवस्था में समुद्र से वाष्पीकृत जलवाष्प और अपेक्षाकृत अधिक तापमान ऊपरी हवा में स्थानांतरित होता है।
आप यह मान सकते हैं कि एक चक्रवात को भी ईंधन की आवश्यकता होती है और उसका यह ईंधन होती है गर्म जलवाष्प। इसके कारण समुद्र की सतह से ऊपर उठने वाली संघनित हवा के संवहन के कारण बड़े पैमाने पर क्यूमलस बादलों का निर्माण होता है। उष्णकटिबंधीय चक्रवाती तूफान का दूसरा चरण उसका सबसे खतरनाक स्तर होता है।
इस चरण में ऊपर उठने वाली हवा क्षोभमंडल (ट्रोपोपॉज) पर क्षैतिज रूप से फैल जाती है। ऊपरी क्षेत्र में हवा के फैलने के कारण एक उच्च दबाव का क्षेत्र बन जाता है। इससे संवहन क्रिया प्रारंभ होती है और उच्च दबाव से निम्न दबाव क्षेत्र की ओर हवा का तेजी से संचालन होता है जो आँधी-तूफान का कारण बनता है।
हिन्द महासागर या ऐसे ही उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में उत्पन्न होने वाले चक्रवाती तूफ़ानों का तीसरा और अंतिम चरण तब होता है, जब तूफान किसी ठंडे जल क्षेत्र अथवा जमीन से होकर गुजरते हैं। ठंडे क्षेत्र से गुजरने के कारण तूफ़ानों को जलवाष्प नहीं मिल पाती जो कि इनका मुख्य ईंधन है। ऐसा ही कुछ तब होता है जब ये तूफान तटीय क्षेत्रों से टकराते हैं।
स्थल भाग पर पहुँचने के कारण भी इन्हें जलवाष्प नहीं मिलती जिसके कारण ये कमजोर हो जाते हैं और एक समय के बाद समाप्त हो जाते हैं। तूफ़ानों के समाप्त होने में एक बड़ा कारक उनमें समाहित हवा की गति भी है। अक्सर उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में उत्पन्न होने वाले चक्रवाती तूफान समुद्री पवनों के संपर्क में आने के कारण गतिमान हो जाते हैं, जो तटीय क्षेत्रों की ओर बढ़ जाते हैं और उन क्षेत्रों में वर्षा के माध्यम से अपना जल निष्कासित करते हैं।
तूफानों के नामों का कैसे होता है निर्धारण
इन तूफ़ानों के नाम को लेकर उठता रहता है कि आखिर इन तूफ़ानों के नाम किस प्रकार निर्धारित किए जाते हैं? विभिन्न देशों के द्वारा विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की देखरेख में इन तूफ़ानों को नाम प्रदान किया जाता है। इनके नामकरण की शुरुआत साल 2000 में विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO)/एशिया और प्रशांत के लिए संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक आयोग के तहत हुई थी।
इस समझौते के तहत हिन्द महासागर क्षेत्र के आठ देशों- बांग्लादेश, भारत, मालदीव, म्यांमार, ओमान, पाकिस्तान, श्रीलंका और थाईलैंड तूफ़ानों के लिए नामों का एक समूह देंगे। इसमें से बारी-बारी से तूफान का नामकरण होगा। हालाँकि, अब इस समझौते में देशों की संख्या 8 से बढ़कर 13 हो गई है। साल 2018 में पाँच देश- ईरान, क़तर, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और यमन को इसमें शामिल किया गया।
WMO ने देशों द्वारा दिए गए नामों की सूची बना रखी है। यही वजह है कि तूफान आने से पहले तय हो जाता है कि उसका नाम क्या होगा। इस सूची को हर छह साल में बदला जाता है। वर्तमान में जिस चक्रवाती तूफान ‘दाना’ की चर्चा है, इस शब्द को अरबी भाषा से लिया गया है। इसका मतलब होता है ‘उदारता’। यह नाम कतर की तरफ से दिया गया है।
जयपुर में पुलिस ने 12 बांग्लादेशी घुसपैठियों को पकड़ा है। यह सभी फर्जी कागजों के आधार पर भारत में रह रहे थे। इनके पास से भारत और बांग्लादेश, दोनों देशों के पासपोर्ट बरामद हुए हैं। बांग्लादेश से आने वाले इन घुसपैठियों ने फर्जी कागज के आधार पर सरकारी फ़्लैट तक ले लिया था। इन बांग्लादेशी घुसपैठियों की मदद करने वाले एक व्यक्ति को भी पुलिस ने पकड़ा है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जयपुर पुलिस की एक टीम ने गुप्त सूचना पर काम करते हुए JDA कॉलोनी जयसिंहपुरा से 12 बांग्लादेशी पकड़े हैं। इनमें से 6 को गिरफ्तार कर लिया गया है जबकि बाकी 6 को नाबालिग होने के चलते बाल संरक्षण केंद्र भेजा गया है।
पुलिस को इनके पास से बांग्लादेशी और भारतीय पासपोर्ट बरामद हुए हैं। इनके पास पासपोर्ट के अलावा भारतीय ड्राइविंग लाइसेंस, आधार कार्ड, राशन कार्ड और बाकी दस्तावेज भी बरामद हुए हैं। यह सभी जाली तरीके से बनाए गए थे।
इन्होने यहाँ तक कि फर्जी कागजों के आधार पर जयपुर विकास प्राधिकरण (JDA) से एक फ्लैट तक आवंटित करवा लिया था। गिरफ्तार किए गए बांग्लादेशियों के नाम सोहाग खान, पत्नी नसरीन खानम, बेटा मोईन खान, शबनम, शीबा खान और शबनूर हैं।
इन अवैध बांग्लादेशियों के साथ ही उस्मान नाम का एक आदमी पकड़ा गया है। उस्मान ने ही इन सबको भारत में बसने में मदद की थी। उस्मान से सोहाग खान ने अपनी बेटी का निकाह भी करवा दिया था। उस्मान से पुलिस पूछताछ कर रही है कि उसने आखिर यह फर्जी कागज कैसे बनवाए। उस्मान के घर से भी कई फर्जी कागज मिले हैं।
पुलिस को यह भी पता लगा है कि सोहाग खान दिसम्बर, 2023 में ही भारत आया है। हालाँकि, सोहाग खान ने दावा किया कि वह 20 साल पहले भारत आया था। उसके यात्रा रिकॉर्ड से उसके दिसम्बर, 2023 में भारत आने की पुष्टि हुई है। पुलिस ने सोहाग समेत 6 लोगों को जेल भेज दिया है।
इस मामले की जानकारी देते हुए जयपुर के DCP अमित कुमार ने बताया, “कुछ दिन पहले एक बांग्लादेशी महिला के भांकरोटा थाना में रहने का इनपुट मिला था। उसके साथ यहाँ रहने बालों ने धोखाधड़ी की थी। महिला ने बांग्लादेश जाकर पुलिस के पास शिकायत दर्ज करवाई थी। इसके बाद हमें इस विषय में तकनीकी इनपुट मिला।”
जयपुर पश्चिम के भांकरोटा थाना और साइबर सैल ने संयुक्त कार्रवाई करते हुए 12 संदिग्ध बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान की। इनमें से 6 को गिरफ्तार किया गया है और 1 भारतीय सहयोगी को भी हिरासत में लिया गया। 6 नाबालिग और दिव्यांग व्यक्तियों को देखभाल हेतु CWC और शिशुगृह भेजा गया। pic.twitter.com/4ipNgHvVFs
अमित कुमार ने आगे बताया, “इसके बाद जब और जाँच की गई तो पता चला कि सोहाग खान और उससे जुड़े कई बांग्लादेशी लोग यहाँ भारतीय दस्तावेज बना कर रह रहे हैं। जब इस मामले में छापेमारी हुई तो कई फर्जी कागज मिले। इसके बाद इनको पकड़ कर जेल भेज दिया गया है।”
अमित कुमार ने बताया कि इनका एक साथी उस्मान भी गिरफ्तार किया गया है। उस्मान के पास से इन बांग्लादेशियों के और भी कागज मिले हैं। अमित कुमार ने बताया कि इस मामले में पुलिस ने गृह मंत्रालय को रिपोर्ट भेज दी है और पुलिस इनसे पूछताछ कर दी है।
सोवियत संघ (USSR) के विघटन (1991) के बाद संयुक्त राज्य अमेरिका खुद को दुनिया की इकलौती महाशक्ति के तौर पर पेश करता है। अमेरिका खुद को मानवाधिकार का चैंपियन, न्याय का रक्षक और अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्थाओं को लागू करने के नेता के तौर पर दिखाता है, जिसमें नैतिकता और अंतर्राष्ट्रीय कानूनों को सबसे ऊपर बताता है। वो अपने साथियों जैसे इजरायल, यूएई और भारत को भी नैतिकता पर चलने की दुहाई देता है।
अमेरिका खुद को ‘बड़ा भाई’ दिखाने के लिए अपनी ताकत का इस्तेमाल करने से नहीं चूकता, चाहे वो ओसामा बिन लादेन जैसे दुश्मन को दूसरे देश में घुसकर मारने की बात हो, या खुली व्यापारिक व्यवस्था की दुहाई देकर समंदर में निगाहबानी करने की बात हो। वो खुद तो ऐसा करता है, लेकिन भारत जैसे उभरते देश जब अपने खिलाफ खतरे को कम करने के लिए कोई कदम उठाते हैं, तो ‘ज्ञान’ देने चला आता है। ये उसके दोहरे रवैये को दिखाता है।
चीन और भारत इस समय एशिया की दो महाशक्तियों के तौर पर उभर रहे हैं। जिसमें अमेरिका भारत का सहयोगी होने का दिखावा करता है और कहता है कि दोनों देशों के समान लोकतांत्रिक मूल्य हैं। दोनों देशों के आदर्श एक जैसे हैं, तो दूसरी तरफ वो चीन की राजनीतिक व्यवस्था को कम्युनिष्ट बताकर उसका विरोध करता है। चीन और अमेरिका एक-दूसरे के कट्टर दुश्मन बन चुके हैं। दोनों एक-दूसरे के खेमे वाले देशों में अपना दबदबा बनाने की भी कोशिश करते हैं।
ऐसी ही एक जगह है पैसिफिक आईलैंड्स.. यानी प्रशांत महासागर का द्वीपीय इलाका। जहाँ कई सारे छोटे-छोटे द्वीप समूहों वाले देश बसे हुए हैं। पैसिफिक आईलैंड्स में अमेरिका के सामने चीन खड़ा हो रहा है। ये वही देश या द्वीपीय जगह हैं, जहाँ से द्वितीय विश्व युद्ध में अमेरिका ने जापान पर शिकंजा कसा था। लेकिन अब चीन वहाँ अपना प्रभाव बढ़ा रहा है, ताकि ताईवान जैसे मुद्दे पर वो अमेरिकी युद्धक नीति की काट तैयार कर सके। ये बात अमेरिका को बिल्कुल भी पसंद नहीं आ रही, क्योंकि उसकी दादागिरी को चुनौती मिल रही है।
पैसिफिक आईलैंड्स कहाँ पर स्थित हैं? क्यों ये महत्वपूर्ण हैं…
सबसे पहले ये जानिए कि प्रशांत द्वीपीय इलाका क्या है? क्योंकि इस इलाके को जाने-बगैर पूरे विवाद की जड़ को समझ पाना बड़ी चुनौती होगी। पैसिफिक आईलैंड्स प्रशांत महासागर के इलाकों में फैले द्वीपों के समूह हैं, जिन्हें मूल रूप से मेलानेशिया, माइक्रोनेशिया और पोलिनेशिया में बाँटा जाता है। ये पूरा इलाका 8 लाख वर्ग किमी से अधिक का है। इसका 9वाँ-दसवाँ हिस्सा न्यूजीलैंड और न्यू गिनी द्वीप समूह के अंदर भी आता है। इस इलाके में कई देश हैं, तो कई ऐसे द्वीप समूह हैं, जिनपर यूरोपीय देशों, अमेरिका या अन्य किसी का कब्जा है।
पैसिफिक आईलैंड्स का इलाका (फोटो साभार: InfoPlease)
इस इलाके को बेहतर तरीके से समझने के लिए सबसे पहले हमें ऑस्ट्रेलिया की तरफ नजर डालनी होगी। ऑस्ट्रेलिया के मुख्य भूभाग से पूर्व और उत्तर की तरफ, पूर्वी दिशा में विस्तार लिए सैकड़ों-हजारों द्वीप हैं। इन्हें न्यू गिनी आईलैंड, बिस्मार्क द्वीप समूह (आईलैंड्स), सोलोमन आईलैंड्स, वानुअतु देश, न्यू कैलेडोनिया हैं। जिन्होंने मोटा-मोटी मेलानेशिया की पहचान दी जाती है। इसके बगल में माइक्रोनेशिया का इलाका है, जिसमें पलाऊ, गुआम से लेकर कैरोलन आईलैंड्स, नौरू, मार्शल द्वीप समूह और किरिबाती जैसे देश आते हैं।
वहीं, पोलिनेशाई इलाके में हवाई आईलैंड्स (अमेरिका का नौसैनिक अड्डा, जिसपर जापान ने आक्रमण किया था), उसके दक्षिण पश्चिम में न्यूजीलैंड, तुवालु, वालिस, समाओ, अमेरिकन समोआ, टोंगा, फ्रेंच पॉलिनेशिया (फ्रांस द्वारा शासित) देश या इलाके आते हैं। इस पूरे में स्थानीय निवासियों के साथ यूरोपीय मूल के लोगों की संख्या अधिक है, साथ ही ईसाईयत मुख्य धर्म है। अधिकतर देशों में अंग्रेजी या फ्रेंच भाषा इस्तेमाल की जाती है, इसके बावजूद इस इलाके में सैकड़ों स्वतंत्र बोलियाँ-भाषाएँ हैं। इसी इलाके के बीच में माइक्रोनेशियाई पहचान वाले इलाके में जो मार्शल द्वीप समूह हैं, उसी पर हुई ज्यादतियों को सामने लाने के लिए ये लेख लिखा गया है।
अमेरिका के परमाणु धमाकों की विभीषिका से अब तक कराह रहे मार्शल आईलैंड्स के निवासी
चीन इस इलाके में अमेरिकी दबदबे को चुनौती दे रहा है, उसकी काट खोजने के लिए अब अमेरिका ने उस इलाके पर ध्यान देना शुरू किया है। इसके लिए उसने सितंबर में एक कानून बनाया। जिसमें अमेरिका और इस इलाके के इतिहास की दुहाई दी गई है। ये अलग बात है कि अमेरिका ने इस इलाके को वैसे ही भुला दिया था, जैसे अफगानिस्तान से निकलने के बाद पूरे देश को छोड़ दिया। ये पूरा मामला अमेरिकी नीतियों के विश्वासघात को भी सामने लाता है।
अमेरिका ने किए थे 67 परमाणु परीक्षण, हिरोशिमा पर गिराए गए बम से 1000 ज्यादा ताकतवर बम भी फोड़ा
द डिप्लोमैट की रिपोर्ट के अनुसार, संयुक्त राज्य अमेरिका ने मार्शल द्वीप पर 67 परमाणु और थर्मो न्यूक्लियर परीक्षण किए, जो 12 साल के दौरान हर दिन हिरोशिमा में हुए परमाणु बम विस्फोट से 1.6 गुना ज्यादा बड़े धमाके के बराबर रहे। यह ध्यान देने योग्य बात ये है कि किसी भी देश ने अमेरिका से अधिक परमाणु परीक्षण नहीं किए हैं, लेकिन अमेरिका के इन परमाणु परीक्षणों ने पूरे इलाके की विनाशलीला की दर्दभरी कहानियों को अनदेखा कर दिया।
मार्शल आईलैंड्स के लोग उन परमाणु परीक्षणों की वजह से आज भी कैंसर, परमाणु विकिरण जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं, लेकिन अमेरिका ने जो गलतियाँ अतीत में की, उन्हें सुलझाने की जगह, पीड़ितों से माफी माँगने की जगह, उन लोगों को उनके हाल पर छोड़ दिया है। मार्शल आईलैंड्स के निवासी आज भी अमेरिका से न्याय और नुकसान की भरपाई की माँग कर रहे हैं, लेकिन अमेरिका को इन सबसे कोई असर नहीं पड़ रहा, वो आँख-कान बंद कर अपने हितों की रक्षा करने में व्यस्त है।
फोटो साभार: प्रशांत आईलैंड्स बुलेटिन
हालाँकि अगस्त में अमेरिका की नींद तब खुली, जब प्रशांत आईलैंड्स के देशों के एक मंच से चीन की तरफ झुकाव वाले कदम उठाए गए। इसके तुरंत बाद पश्चिमी देशों की मीडिया की भी नींद खुल गई और वो उन देशों (ओशिनियाई देशों) की बुराई में जुट गया। इसके बाद ही अमेरिका की भी नींद खुली और सितंबर 2024 वाला कानून बनाया। इसके बाद अमेरिका ने मार्शल आईलैंड्स को ‘उचित’ सहायता की बात कही।
इस बीच, मार्च 2024 में अमेरिका के अब तक के सबसे बड़े परमाणु बम विस्फोट की 70वीं वर्षगाँठ भी वहाँ मनाई गई, जिसमें प्रशांत द्वीपीय देशों के संघ के महासचिव हेनरी पूना भी पहुँचे। अमेरिका ने 1945 में यहाँ ‘कैसल ब्रावो’ नाम के परमाणु बम का परीक्षण किया था, जो जापान के हिरोशिमा पर गिराए गए परमाणु बम से 1000 गुना ज्यादा ताकतवर था। इस वर्षगाँठ के मौके पर हेनरी पूना ने भाषण दिया और अमेरिका समेत उन पश्चिमी ताकतों को मार्शल आईलैंड्स की तबाही का जिम्मेदार ठहराया, जिन्होंने मार्शल आईलैंड्स पर परमाणु धमाके तो किए, लेकिन स्थानीय लोगों को मरने के लिए छोड़ दिया।
यही नहीं, अमेरिका ने अपने वैज्ञानिकों को वहाँ स्थानीय लोगों पर हो रहे परमाणु विकिरणों के अध्ययन के लिए भी भेजा, लेकिन परमाणु विकिरण से मर रहे लोगों को राहत देने के लिए कोई कदम नहीं उठाया। उन्होंने अमेरिकी कदमों को अपर्याप्त बताते हुए कहा कि इस क्षेत्र को अमेरिका ने ‘लगभग’ अनदेखा ही किया है।
वाशिंगटन डीसी के अनुसार, किसी विशेष क्षेत्र में लगातार परमाणु परीक्षण और उससे होने वाले नुकसान, पर्यावरण और भूविज्ञान के लिए ‘पूर्ण और अंतिम निपटान’ 150 मिलियन डॉलर है। यह राशि मार्शल द्वीप समूह को 1986 में अमेरिका से अलग होने पर कॉम्पैक्ट ऑफ फ्री एसोसिएशन की शर्तों के तहत दी गई थी। मुद्रास्फीति को ध्यान में रकें, तो ये समझौता आज की तारीख में 430 मिलियन डॉलर का है।
हालाँकि प्रशांत आईलैंड्स देशों का मंच और मार्शल आईलैंड्स की सरकार इस मुआवजे को अपर्याप्त बताते हैं। उनका कहना है कि एक परमाणु दावा न्यायाधिकरण ने मार्शल आईलैंड्स के लिए मुआवजे की कीमत 2.3 बिलियन डॉलर रखी थी, जिसकी वैल्यू मौजूदा समय में 3 बिलियन डॉलर से अधिक है। उन्हें इसी निर्णय के आधार पर मुआवजा चाहिए।
चूँकि परमाणु परीक्षणों से हुई तबाही का सही अनुमान तक नहीं लगाया जा सकता और न ही उसकी सही भरपाई की जा सकती है, ऐसे में अमेरिका भी अपनी जिम्मेदारी लेने की जगह राहत के ‘टुकड़े’ देकर पीड़ितों को अपमानित ही कर रहा है। मार्शल आईलैंड्स का ये भी कहना है कि वो 1986 तक अमेरिका की ही गुलामी में था, ऐेसे में मुआवजा तय करते समय अमेरिकी हितों को वरीयता दी गई।
मार्शल आईलैंड्स के लोगों पर बिना बताए अमेरिका ने किए वैज्ञानिक परीक्षण
अमेरिका ने मार्शल आईलैंड्स पर 67 परमाणु बमों के धमाके के लिए, लेकिन इसके बाद भी उसकी कारगुजारियाँ रुकी नहीं। अमेरिका ने चुपके-चुपके अपने वैज्ञानिक यहाँ भेजे और रिसर्च का काम करता रहा। खासकर परमाणु धमाके के बाद पड़ने वाले प्रभावों को लेकर। मार्शल आइलैंड्स जर्नल के संपादक और परमाणु ऊर्जा विरासत के विशेषज्ञ गिफ जॉनसन ने कहा, “प्रशांत द्वीप के नेता इस बात को अच्छे से जानते हैं कि अमेरिका ने इन धमाकों की वजह से हुए नुकसान का मुआवजा बहुत कम दिया है और न ही धमाकों की वजह से हुई समस्याओं पर ध्यान दिया है। ये सीधे तौर पर अमेरिका द्वारा मार्शल आईलैंड्स के प्रति वादाखिलाफी है।”
अमेरिका पर मार्शल आईलैंड्स ही नहीं, इस पूरे इलाके की अनदेखी के आरोप लगते रहे हैं, लेकिन अमेरिका ने चुप्पी साधे रखी। और अब जब चीन सक्रिय हो गया, तो फिर से अमेरिका की नींद खुली है। जो ये बताती है कि वो सिर्फ अपने हित-स्वार्थ के लिए ही काम करता है। चूँकि अमेरिका अब जाग गया है, तो वो कोशिश कर रहा है कि प्रशांत महासागर में स्थित ये देश चीन के पाले में न चले जाएँ। ऐसे में उन्हें खुश करने के लिए बड़ी ‘बयानबाजियाँ’ भी करने लगा है।
मार्शल आईलैंड्स में अमेरिका के राजदूत ने अगस्त 2024 में इस देश को अमेरिका का ‘सबसे करीबी साथी’ बताया। साथ ही कहा कि अमेरिका इन देशों की प्राथमिकताओं को सुन रहा है और उन्हें संतुष्ट करने वाले जवाब भी दे रहा है। यहाँ भी वो स्थिर क्षेत्र और सुरक्षित क्षेत्र की गाथा गाना नहीं भूले। ये अलग बात है कि अमेरिका अब भी परमाणु धमाकों की वजह से हुए नुकसान का पूरा मुआवजा भरने को तैयार नहीं है, ऐसे में अमेरिकी राजदूत की थोथी दलीलें मार्शल आईलैंड्स के निवासियों के लिए किसी काम की नहीं।
बेनेटिक कबुआ मैडिसन ने तो अमेरिका की ‘लेटो’ नाम के स्थानीय लोक कहानियों में प्रलचित ऐसे ‘गॉड’ से तुलना की, जो सबसे ज्यादा ‘चालाक’ और दुष्ट होता है। बेनेटिक कबुआ मैडिसिन मार्शल एजुकेशनल इनिशिएटिव के कार्यकारी निदेशक हैं जो अमेरिका में मार्शल आईलैंड्स से आए लोगों के कल्याण के लिए कहता है। उन्होंने जोर देकर कहा, “प्रशांत इलाके के लोग ऐसी जगह चाहते हैं, जो परमाणु बमों के धमाकों से मुक्त हो और चीन-अमेरिका की दादागिरी-प्रभाव की लड़ाई का हिस्सा न रहे।”
वैसे, साल 2022 में यूएन ने एक प्रस्ताव दिया, जिसमें मार्शल आईलैंड्स में परमाणु धमाकों की वजह से इंसानों पर पड़े प्रभावों पर एक रिपोर्च तैयार की जानी थी, लेकिन अमेरिका ने इस प्रस्ताव का ये कहते हुए विरोध किया कि अमेरिका अपने कर्तव्यों को स्वीकार कर उन पर काम कर रहा है। हालाँकि ये रिपोर्ट सितंबर में आई, जिसमें यूएन ने अमेरिका से मार्शल आईलैंड्स के लोगों से ‘औपचारिक माफी और पूर्ण मुआवजा’ देने का आग्रह किया।
मार्शल आईलैंड्स की राष्ट्रपति हिल्डा हेन ने भी यूएनजीए (संयुक्त राष्ट्र महासभा) में अमेरिकी अत्याचारों की याद दिलाई और कहा, “अमेरिका ने हमारे ऊपर गहरी तबाही के निशान छोड़े हैं। हमारे लोग अपने घरों से विस्थापित हैं। मुआवजे की माँग अभी तक मानी नहीं गई। मार्शल आईलैंड्स में तबाही के निशान हर तरफ हैं।” वो मार्शल आईलैंड्स में फैले परमाणु कचरे की भयावहता के बारे में दुनिया को बता रही थी।
उन्होंने कहा कि अमेरिका ने अभी तक कोई बीच का रास्ता तक नहीं निकाला और न ही पीड़ितों से कोई माफी माँगी। उन्होंने जोर देकर कहा कि मार्शल आईलैंड्स के लोगों के भोलेपन का फायदा उठाया गया। परमाणु धमाकों की वजह से उन्हें विस्थापित होना पड़ा। यही नहीं, अमेरिका ने बिना लोगों से पूछे वहाँ पर वैज्ञानिक रिसर्च भी किए।
हालाँकि अभी तक अमेरिका ने इस दिशा में जो कुछ भी किया है, वो सिर्फ बयानबाजी तक ही सीमित है। उनका लक्ष्य सिर्फ इस इलाके में चीन का प्रभाव बढ़ने से रोकने का है, ऐसे में वो परमाणु धमाकों की वजह से हुई बर्बादियों का मुआवजा देने की तरफ बात तक नहीं करता है।
मार्शल आईलैंड्स पर परमाणु धमाकों का काला इतिहास
मार्शल आइलैंड्स, प्रशांत महासागर में स्थित 29 कोरल एटोल्स (उथले द्वीपों) का एक समूह है। यह द्वीपसमूह हवाई और ऑस्ट्रेलिया के बीच स्थित है। मार्शली लोग हजारों सालों से यहाँ रहते आए हैं, लेकिन 20वीं शताब्दी में उनकी जिंदगी और इन आईलैंड्स की शांति हमेशा के लिए छिन गई। पहले जापानी सेना और फिर अमेरिकी सेना ने इन आईलैंड्स पर कब्जा जमाया। इसके बाद संयुक्त राज्य अमेरिका ने मार्शल आईलैंड्स में शक्तिशाली परमाणु हथियारों का परीक्षण करने का इरादा किया, क्योंकि वे अलग-थलग स्थिति, छोटी आबादी और अन्य अमेरिकी सैन्य प्रतिष्ठानों से निकटता में थे। अंततः यहाँ परमाणु परीक्षणों का एक भयानक दौर शुरू हुआ जिसने इस पूरे क्षेत्र को बदल कर रख दिया।
1944 में अमेरिका ने द्वीपों को जापानी कब्जे से मुक्त कराकर यहाँ सैन्य अड्डे स्थापित किए। द्वितीय विश्व युद्ध के अंत में अमेरिका ने अपनी सैन्य और परमाणु शक्तियों का विस्तार करना शुरू किया। 1946 में, संयुक्त राष्ट्र ने मार्शल द्वीपों को प्रशांत द्वीपसमूह ट्रस्ट क्षेत्र के तहत अमेरिकी प्रशासन के अधीन कर दिया। यह तब की बात है जब द्वीपों की आबादी लगभग 52,000 थी।
1946 और 1958 के बीच, अमेरिका ने मार्शल द्वीपों में 67 परमाणु परीक्षण किए, जो धीरे-धीरे मार्शल आइलैंड्स के पर्यावरण, स्वास्थ्य और समुदायों के लिए एक बड़ी त्रासदी साबित हुए। सबसे महत्वपूर्ण परीक्षणों में से एक था ‘कैसल ब्रावो’ जो 1 मार्च 1954 को बिकिनी एटोल में हुआ था। यह अमेरिकी इतिहास में सबसे बड़ा और भयानक परमाणु विस्फोट था जिसने मार्शल द्वीपों के निवासियों के लिए अकल्पनीय विनाश और पीड़ा का दौर शुरू किया।
फोटो साभार: द डिप्लोमैट
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ने अपनी परमाणु क्षमताओं को तेजी से बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए। अमेरिकी सरकार ने परमाणु ऊर्जा आयोग (Atomic Energy Commission) की स्थापना की, जिसका उद्देश्य परमाणु विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास को बढ़ावा देना था। उस समय, अमेरिका और सोवियत संघ के बीच बढ़ती परमाणु होड़ के कारण अमेरिका के लिए अधिक परमाणु हथियार विकसित करना बेहद महत्वपूर्ण माना जाता था।
“ऑपरेशन क्रॉसरोड्स” के तहत मार्शल द्वीपों में पहला परीक्षण हुआ। इसका मुख्य उद्देश्य परमाणु विस्फोटों के नौसैनिक युद्धपोतों पर प्रभाव का अध्ययन करना था। 1 जुलाई 1946 को “शॉट एबल” नामक परीक्षण बिकिनी एटोल में किया गया, जिसने परीक्षणों के दौर की शुरुआत की। इस परीक्षण ने वैश्विक परमाणु वैज्ञानिकों को यह प्रमाणित किया कि इन हथियारों की क्षमता बेहद घातक है, जिसमें एक मील दूर तक मौजूद सैनिकों को तुरंत मारने की शक्ति थी। इसके बाद 25 जुलाई को दूसरा परीक्षण हुआ।
अमेरिका के पहले परमाणु परीक्षण, जिसे “ट्रिनिटी टेस्ट” कहा गया, 1945 में किया गया था। इसके बाद हिरोशिमा और नागासाकी पर “लिटिल बॉय” और “फैट मैन” नामक बम गिराए गए थे, लेकिन इन घटनाओं के बाद यह पहला बड़ा परीक्षण था। हालाँकि, 10 अगस्त 1946 को ऑपरेशन क्रॉसरोड्स को रेडिएशन संबंधित चिंताओं के कारण बंद कर दिया गया, विशेष रूप से उन सैनिकों के लिए जो परीक्षणों में शामिल थे। 1969 में बिकिनी एटोल को साफ करने के लिए अमेरिका ने लंबे समय तक चलने वाले प्रयास शुरू किए।
साल 1950 में राष्ट्रपति हैरी एस ट्रूमैन ने अमेरिका की थर्मोन्यूक्लियर हथियारों पर शोध को बढ़ावा देने का फैसला लिया, जिससे मार्शल द्वीपों में और अधिक परीक्षणों की पूरी सीरीज शुरू हुई। 1951 में “ऑपरेशन ग्रीनहाउस” के तहत ईनेवेटक एटोल में कई परमाणु परीक्षण किए गए। इन परीक्षणों का उद्देश्य परमाणु बमों की विनाशकारी शक्ति को बढ़ाना और उनके आकार को कम करना था।
मार्शल आईलैंड्स को दिए गए चोट पर चोट
इसके बाद ‘ऑपरेशन आइवी’ नामक परीक्षणों की श्रृंखला 1952 में की गई, जिसमें पहला सफल हाइड्रोजन बम परीक्षण भी शामिल था। इसे “शॉट माइक” के नाम से जाना गया। इस परीक्षण के कुछ ही सालों बाद, 1954 में, अमेरिका ने ‘कैसल ब्रावो’ नामक परीक्षण किया, जो अब तक का सबसे बड़ा परमाणु विस्फोट था। इस विस्फोट ने ‘लिटिल बॉय’ से लगभग 1,000 गुना अधिक विनाशकारी प्रभाव डाला। इस परीक्षण से अत्यधिक मात्रा में रेडियोधर्मी पदार्थ वातावरण में फैल गए, जिससे पूरे क्षेत्र में भयावह असर हुआ।
ब्रावो परमाणु धमाका (फोटो साभार: अमेरिकी ऊर्जा विभाग)
इस परीक्षण के बाद, कई द्वीपों पर रेडियोधर्मी विकिरण फैल गया, जिसमें रंगेलप और अइलिंगिनाए जैसे एटोल भी शामिल थे, जो परीक्षण स्थल से मात्र 100 मील दूर थे। अमेरिकी सेना ने इन द्वीपों को समय पर खाली नहीं किया था, जिससे वहाँ रहने वाले लोग और विशेष रूप से बच्चे, खतरनाक रेडियोधर्मी सामग्री के संपर्क में आ गए। रेडियोधर्मी धूल के बीच खेल रहे बच्चों के कई मामलों ने इस त्रासदी की भयावहता को और बढ़ा दिया।
मार्शल आइलैंड्स के लोगों को शुरू में यह विश्वास दिलाया गया था कि ये परीक्षण अस्थायी होंगे और उनकी भूमि का प्रयोग ‘मानवता की भलाई’ के लिए किया जाएगा। बिकिनी एटोल के 167 निवासियों को उनके घरों से विस्थापित कर रोंगेरिक एटोल भेजा गया, जहाँ पर्याप्त संसाधन नहीं थे। 1948 तक लोग वहाँ भुखमरी की स्थिति में पहुँच चुके थे। इसके बाद उन्हें किली नामक द्वीप पर बसाया गया, लेकिन वहाँ भी हालात बहुत बेहतर नहीं थे।
1969 में बिकिनी एटोल के निवासियों को पुनः उनके द्वीपों में बसाने की कोशिश की गई, लेकिन 1978 में उन्हें फिर से हटा दिया गया क्योंकि रेडियोधर्मी स्तर बहुत अधिक था। बिकिनी एटोल आज भी इंसानों के रहने के लिए सुरक्षित नहीं है, और द्वीपवासी अपने घर लौटने के अमेरिकी वादे का इंतजार कर रहे हैं।
परमाणु परीक्षणों के कारण मार्शल आइलैंड्स के निवासियों के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़े। इन परीक्षणों के परिणामस्वरूप गर्भपात, मृत बच्चों का जन्म, थायरॉइड कैंसर और अन्य बीमारियों के मामलों में भारी वृद्धि हुई। विशेष रूप से रंगेलप के निवासियों को इसका भारी खामियाजा भुगतना पड़ा। बच्चों में बाल झड़ने, जलने और शरीर पर फफोलों जैसे लक्षण देखे गए, लेकिन अमेरिकी अधिकारियों ने यह दावा किया कि वे विकिरण के संपर्क में नहीं आए थे। ‘जेलीफ़िश बेबीज़’ नाम से जाने जाने वाले बिना हड्डी वाले बच्चों का जन्म भी विकिरण का दुष्परिणाम था। 1956 में परमाणु ऊर्जा आयोग के स्वास्थ्य और सुरक्षा निदेशक मेरिल ईसेनबड ने रंगेलप को ‘दुनिया में सबसे प्रदूषित जगह’ करार दिया था
अमेरिकी सरकार ने ‘प्रोजेक्ट 4.1‘ नाम का भयावह प्रोजेक्ट शुरू किया, जिसमें परमाणु विकिरण के प्रभावों का अध्ययन किया गया। इसे लेकर सबसे चिंताजनक बात यह थी कि मार्शल आइलैंड्स के निवासियों को बिना उनकी जानकारी या सहमति के इस परियोजना का हिस्सा बनाया गया। उनके स्वास्थ्य के साथ खुलेआम प्रयोग किए गए, और यह कई दशकों तक चला।
मार्शल आईलैंड्स के नेता टोनी डेब्रम ने 1996 में अमेरिकी कॉन्ग्रेस को बताया कि अमेरिकी डॉक्टरों ने शोध के नाम पर लोगों के स्वस्थ और अस्वस्थ दोनों तरह के दाँत निकाल दिए थे। मार्शल की महिलाओं को अमेरिकी वैज्ञानिकों के सामने कपड़े उतारने के लिए मजबूर किया गया। यह परियोजना कई दशकों तक चली।
मार्शल आईलैंड्स की तबाही आधुनिक उपनिवेशवाद का दुखद उदाहरण
मार्शल आइलैंड्स की कहानी एक छोटे, शांत द्वीपसमूह की है जिसे आधुनिक विश्व की शक्ति-सियासत और परमाणु हथियारों की होड़ ने तबाह कर दिया। यह कहानी आधुनिक समय के उपनिवेशवाद का एक दुखद उदाहरण है, जहाँ एक महाशक्ति ने एक छोटे से द्वीप समूह को अपने सैन्य और वैज्ञानिक प्रयोगों के लिए कुर्बान कर दिया। इन परीक्षणों ने न केवल द्वीपों के पर्यावरण को नष्ट किया, बल्कि वहाँ के निवासियों के स्वास्थ्य और जीवन को भी अपूरणीय क्षति पहुँचाई। यह एक भूला हुआ अध्याय है जिसमें अमेरिका की महाशक्ति बनने की चाहत और परमाणु शक्ति के परीक्षणों ने एक समूची सभ्यता को बर्बाद कर दिया। यह एक ऐसा उदाहरण है, जहाँ वैश्विक राजनीति और वैज्ञानिक प्रयोगों ने मानवाधिकारों की खुलेआम अनदेखी की।
आज तक, अमेरिका ने मार्शल आइलैंड्स के लोगों से माफी नहीं माँगी है। यहाँ तक कि जब अमेरिकी सरकारी समितियों ने 1994 में यह निष्कर्ष निकाला कि मार्शल आइलैंड्स के लोगों का विकिरण के संपर्क में आना रिसर्च के उद्देश्यों से जुड़ा नहीं था, तब भी इस तथ्य को न्यायोचित ठहराने का प्रयास किया गया। मार्शल आइलैंड्स के लोग आज भी अपनी खोई हुई भूमि, स्वास्थ्य और भविष्य को पुनः प्राप्त करने की लड़ाई लड़ रहे हैं। अमेरिका ने इन परीक्षणों के दीर्घकालिक प्रभावों को नकारने का प्रयास किया। विकिरण के फैलने का क्षेत्र इतना विशाल था कि इसके अंश यूरोप, जापान, भारत और ऑस्ट्रेलिया तक पाए गए। इसने वैश्विक स्तर पर परमाणु परीक्षणों के खिलाफ एक आंदोलन को भी जन्म दिया।
अमेरिका की यह तथाकथित “नियम-आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था” वास्तव में उसके अपने हितों को पूरा करने के लिए बनाई गई व्यवस्था है, जो दुनिया के अन्य देशों, विशेष रूप से स्वतंत्र फैसले लेने वाले देशों को दबाव में लेकर अपने साथ लाने का प्रयास करती है। मार्शल आइलैंड्स के मामले में यह पूरी तरह से साफ है कि अमेरिका ने अपनी ताकत और सत्ता को बनाए रखने के लिए इंसानी जिंदगियों और इंसानी अधिकारों की पूरी तरह से अनदेखी की है।
मूल रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित की गई है, मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
वस्तु एवं सेवा कर (GST) खुफिया विभाग ने एक बड़ी कार्रवाई के तहत केरल के त्रिशूर में सोने के आभूषण निर्माताओं के यहाँ से 120 किलोग्राम से अधिक (कुछ रिपोर्ट में 100Kg और कुछ में 105Kg) बेहिसाबी सोना जब्त किया है। GST विभाग के लगभग 700 अधिकारियों ने 78 केंद्रों और दुकानों पर छापेमारी की। जाँचकर्ताओं ने पाँच साल की कर चोरी के सबूतों का खुलासा किया है।
GST विभाग ने छापेमारी की यह कार्रवाई बुधवार (23 अक्टूबर 2024) की शाम को शुरू की, जो अगले दिन भी जारी रही। इस छापेमारी अब तक 35 आभूषण निर्माताओं एवं दुकान मालिकों के 78 परिसरों (कुछ रिपोर्ट में 75 और कुछ में 73) को कवर किया गया है। छापे राज्य जीएसटी विभाग के त्रिशूर स्थित खुफिया और प्रवर्तन विंग द्वारा महीनों तक की गई जाँच के आधार पर शुरू किए गए।
यह कार्रवाई राज्य में जीएसटी विभाग द्वारा की गई अब तक की गई सबसे बड़ी छापेमारियों में से एक है। इसमें करीब 700 अधिकारी शामिल हैं। छापेमारी गुरुवार की दोपहर खबर लिखे जाने तक जारी थी। छापेमारी में आभूषण कारखानों की तलाशी ली गई, जहाँ सोना पिघलाया और तैयार किया जाता है। इसके साथ ही कारोबारी मालिकों के घरों की भी तलाशी ली गई।
जीएसटी के विशेष आयुक्त रेन अब्राहम इस रेड की निगरानी कर रहे हैं, जो शहर भर में चल रहा है। गोपनीयता को बनाए रखने के लिए अधिकारियों को घूमने, जीएसटी प्रशिक्षण या स्थानीय मंदिरों के दर्शन के बहाने बसों और कारों सहित विभिन्न साधनों से त्रिशूर लाया गया। छापे का नाम ‘टोरे डेल ओरो’ रखा गया है, जो स्पेन के एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्मारक ‘द गोल्डन टॉवर’ के नाम से जाना जाता है।
अब्राहम रेन ने कहा, “इसका मुख्य उद्देश्य पाँच वर्षों की अवधि में आभूषण निर्माताओं और आभूषण मालिकों के बीच हुए बेहिसाब लेन-देन का पता लगाना था।” अधिकारियों के अनुसार, जाँच से पता चला है कि कई निर्माता बिना कर चुकाए सोने के लेन-देन में लगे हुए हैं। कुछ मालिकों ने कर चोरी की है। अधिकारियों ने बताया कि छापेमारी में कर चोरी के सबूत मिले हैं।
त्रिशूर में लगभग 3,000 स्वर्ण आभूषण बनाने वाली इकाइयाँ हैं। त्रिशूर का सोने से जुड़ाव तब शुरू हुआ जब रोमन और अरब व्यापारी कोडुंगल्लूर के अब लुप्त हो चुके बंदरगाह शहर मुजिरिस में अक्सर आते थे। हालाँकि, आर्थिक उदारीकरण, स्वर्ण नियंत्रण अधिनियम को निरस्त करने और अनिवासी भारतीयों को 5 किलोग्राम तक सोना लाने की अनुमति देने से स्वर्णकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।
दिल्ली मेट्रो में छपे एक विज्ञापन पर विवाद हो गया है। विज्ञापन कथिततौर पर ब्रेस्ट कैंसर पर जागरूकता फैलाने के लिए युवराज सिंह के एनजीओ ‘YouWeCan फाउंडेशन’ का था। इस विज्ञापन में महिलाओं की ब्रेस्ट के लिए संतरा शब्द इस्तेमाल हुआ है। इसमें कहा गया है- महीने में एक बार अपने संतरों को चेक करते रहे। इससे जिंदगी बच सकती है।
नीचे पोस्टर का स्क्रीनशॉट लगा है। देख सकते हैं कि तस्वीर AI द्वारा निर्मित है और हर महिला को ब्रेस्ट कैंसर से सचेत करने के लिए संतरे दिखाए गए हैं। फोटो देखने के बाद अब हर कोई इस विज्ञापन की आलोचना कर रहा है।
लोगों का कहना है कि आखिर कैसे कोई ब्रेस्ट कैंसर पर जागरूकता फैलाने के नाम पर ऐसी अभद्रता कर सकता है। ये भी पूछा जा रहा है कि अगर पोस्टर ब्रेस्ट कैंसर पर था तो संतरे दिखाने की जरूरत क्या थी। क्या स्तन को स्तन कह सकें हमारा समाज इतना भी नहीं सहज है। दिल्ली मेट्रो से सवाल हो रहा है कि किस मानसिक रोगी ने ऐसे विज्ञापन लगाए और किसने इसे लगाने की अनमुति दी? ब्रेस्ट कैंसर घातक है जिसने 2022 में 670000 महिलाओं की जान लेली और ये लोग मजाक बनाने पर लगे हैं।
Shame on @OfficialDMRC. Which Psycho- sexist- sicko designed this ad and then which “metro official” approved it ? Your marketing head should be sacked for this cheap thrill sexist ad approval ! The creative agency must be named and shamed too ! Breast cancer is deadly, it… pic.twitter.com/ZxfnzyqVau
एक यूजर ने इस विज्ञापन को लेकर दिखाई गई असंवेदनशीलता पर आपत्ति जताते हुए कहा कि वो इस तरह ब्रेस्ट कैंसर के मुद्दे को सेक्सुलाइज करने के खिलाफ हैं। उनकी माँ का इस बीमारी से देहांत हुआ ता और वह जानते हैं कि ये कितना गंभीर मामला है।
I hv a problem with this ad at Delhi Metro. My own loving dear mother died of Breast Cancer, which was Stage 4 at diagnosis. The irony was her son(me) ws a Breast Surgeon at that time, & out of modesty, she did not even tell her own son, when it ws a small lump, that ws… pic.twitter.com/U32P2euu6Z
इतनी आलोचनाओं के बाद दिल्ली मेट्रो ने अपनी प्रतिक्रिया दी और कहा कि वो लोग विज्ञापन देने वाले के साथ संपर्क में हैं। ऐसे विज्ञापन मेट्रो परिसर से हटवाने के लिए एक्शन लिया जा रहा है। उन्होंने ये भी बताया कि जिस विज्ञापन को लेकर विवाद हुआ है वो विज्ञापन येलो लाइन की सिर्फ एक ट्रेन पर लगा था जिसे अब हटवा दिया गया है।
वहीं यूवीकैन फाउंडेशन की ट्रस्टी पूनम नंदा का कहना है कि हमने 300000 महिलाओं को इसे लेकर शिक्षित किया है। अगर संतरा के इस्तेमाल से लोगों के स्वास्थ्य पर बात हो सकती है तो इसका इस्तेमाल एकदम सही है। भारत में ब्रेस्ट के बारे में बात करना संवेदनशील हो सकता है। इसलिए ऐसे विजुअल बनाए जाते हैं कि बात भी रखी जा सके और लोगों को आपत्ति भी न हो।