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केरल में GST विभाग का बड़ा ऑपरेशन, 120 किलोग्राम सोना जब्त: 78 जगह पर रेड, ट्रेनिंग से लेकर घूमने-दर्शन के नाम पर बुलाए गए थे 700 अधिकारी

वस्तु एवं सेवा कर (GST) खुफिया विभाग ने एक बड़ी कार्रवाई के तहत केरल के त्रिशूर में सोने के आभूषण निर्माताओं के यहाँ से 120 किलोग्राम से अधिक (कुछ रिपोर्ट में 100Kg और कुछ में 105Kg) बेहिसाबी सोना जब्त किया है। GST विभाग के लगभग 700 अधिकारियों ने 78 केंद्रों और दुकानों पर छापेमारी की। जाँचकर्ताओं ने पाँच साल की कर चोरी के सबूतों का खुलासा किया है।

GST विभाग ने छापेमारी की यह कार्रवाई बुधवार (23 अक्टूबर 2024) की शाम को शुरू की, जो अगले दिन भी जारी रही। इस छापेमारी अब तक 35 आभूषण निर्माताओं एवं दुकान मालिकों के 78 परिसरों (कुछ रिपोर्ट में 75 और कुछ में 73) को कवर किया गया है। छापे राज्य जीएसटी विभाग के त्रिशूर स्थित खुफिया और प्रवर्तन विंग द्वारा महीनों तक की गई जाँच के आधार पर शुरू किए गए।

यह कार्रवाई राज्य में जीएसटी विभाग द्वारा की गई अब तक की गई सबसे बड़ी छापेमारियों में से एक है। इसमें करीब 700 अधिकारी शामिल हैं। छापेमारी गुरुवार की दोपहर खबर लिखे जाने तक जारी थी। छापेमारी में आभूषण कारखानों की तलाशी ली गई, जहाँ सोना पिघलाया और तैयार किया जाता है। इसके साथ ही कारोबारी मालिकों के घरों की भी तलाशी ली गई।

जीएसटी के विशेष आयुक्त रेन अब्राहम इस रेड की निगरानी कर रहे हैं, जो शहर भर में चल रहा है। गोपनीयता को बनाए रखने के लिए अधिकारियों को घूमने, जीएसटी प्रशिक्षण या स्थानीय मंदिरों के दर्शन के बहाने बसों और कारों सहित विभिन्न साधनों से त्रिशूर लाया गया। छापे का नाम ‘टोरे डेल ओरो’ रखा गया है, जो स्पेन के एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्मारक ‘द गोल्डन टॉवर’ के नाम से जाना जाता है।

अब्राहम रेन ने कहा, “इसका मुख्य उद्देश्य पाँच वर्षों की अवधि में आभूषण निर्माताओं और आभूषण मालिकों के बीच हुए बेहिसाब लेन-देन का पता लगाना था।” अधिकारियों के अनुसार, जाँच से पता चला है कि कई निर्माता बिना कर चुकाए सोने के लेन-देन में लगे हुए हैं। कुछ मालिकों ने कर चोरी की है। अधिकारियों ने बताया कि छापेमारी में कर चोरी के सबूत मिले हैं।

त्रिशूर में लगभग 3,000 स्वर्ण आभूषण बनाने वाली इकाइयाँ हैं। त्रिशूर का सोने से जुड़ाव तब शुरू हुआ जब रोमन और अरब व्यापारी कोडुंगल्लूर के अब लुप्त हो चुके बंदरगाह शहर मुजिरिस में अक्सर आते थे। हालाँकि, आर्थिक उदारीकरण, स्वर्ण नियंत्रण अधिनियम को निरस्त करने और अनिवासी भारतीयों को 5 किलोग्राम तक सोना लाने की अनुमति देने से स्वर्णकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।

‘हर महीने अपने संतरों की जाँच कराएँ’: ब्रेस्ट कैंसर को लेकर जागरूकता फैलाने निकला था युवराज सिंह का NGO, महिलाओं के अंग का बना दिया मजाक

दिल्ली मेट्रो में छपे एक विज्ञापन पर विवाद हो गया है। विज्ञापन कथिततौर पर ब्रेस्ट कैंसर पर जागरूकता फैलाने के लिए युवराज सिंह के एनजीओ ‘YouWeCan फाउंडेशन’ का था। इस विज्ञापन में महिलाओं की ब्रेस्ट के लिए संतरा शब्द इस्तेमाल हुआ है। इसमें कहा गया है- महीने में एक बार अपने संतरों को चेक करते रहे। इससे जिंदगी बच सकती है।

नीचे पोस्टर का स्क्रीनशॉट लगा है। देख सकते हैं कि तस्वीर AI द्वारा निर्मित है और हर महिला को ब्रेस्ट कैंसर से सचेत करने के लिए संतरे दिखाए गए हैं। फोटो देखने के बाद अब हर कोई इस विज्ञापन की आलोचना कर रहा है।

लोगों का कहना है कि आखिर कैसे कोई ब्रेस्ट कैंसर पर जागरूकता फैलाने के नाम पर ऐसी अभद्रता कर सकता है। ये भी पूछा जा रहा है कि अगर पोस्टर ब्रेस्ट कैंसर पर था तो संतरे दिखाने की जरूरत क्या थी। क्या स्तन को स्तन कह सकें हमारा समाज इतना भी नहीं सहज है। दिल्ली मेट्रो से सवाल हो रहा है कि किस मानसिक रोगी ने ऐसे विज्ञापन लगाए और किसने इसे लगाने की अनमुति दी? ब्रेस्ट कैंसर घातक है जिसने 2022 में 670000 महिलाओं की जान लेली और ये लोग मजाक बनाने पर लगे हैं।

एक यूजर ने इस विज्ञापन को लेकर दिखाई गई असंवेदनशीलता पर आपत्ति जताते हुए कहा कि वो इस तरह ब्रेस्ट कैंसर के मुद्दे को सेक्सुलाइज करने के खिलाफ हैं। उनकी माँ का इस बीमारी से देहांत हुआ ता और वह जानते हैं कि ये कितना गंभीर मामला है।

इतनी आलोचनाओं के बाद दिल्ली मेट्रो ने अपनी प्रतिक्रिया दी और कहा कि वो लोग विज्ञापन देने वाले के साथ संपर्क में हैं। ऐसे विज्ञापन मेट्रो परिसर से हटवाने के लिए एक्शन लिया जा रहा है। उन्होंने ये भी बताया कि जिस विज्ञापन को लेकर विवाद हुआ है वो विज्ञापन येलो लाइन की सिर्फ एक ट्रेन पर लगा था जिसे अब हटवा दिया गया है।

वहीं यूवीकैन फाउंडेशन की ट्रस्टी पूनम नंदा का कहना है कि हमने 300000 महिलाओं को इसे लेकर शिक्षित किया है। अगर संतरा के इस्तेमाल से लोगों के स्वास्थ्य पर बात हो सकती है तो इसका इस्तेमाल एकदम सही है। भारत में ब्रेस्ट के बारे में बात करना संवेदनशील हो सकता है। इसलिए ऐसे विजुअल बनाए जाते हैं कि बात भी रखी जा सके और लोगों को आपत्ति भी न हो।

बांग्लादेश ने अवामी लीग के छात्र विंग पर लगाया प्रतिबंध, शेख हसीना की पार्टी पर भी संकट: जानिए अब राष्ट्रपति के खिलाफ क्यों हो रहा प्रदर्शन, क्यों माँग रहे इस्तीफा

बांग्लादेश में प्रधानमंत्री शेख हसीना का तख्ता पलटने के बाद वहाँ के छात्रों ने राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन के खिलाफ़ विरोध प्रदर्शन शुरू किया है। मंगलवार (22 अक्टूबर 2024) को सैकड़ों प्रदर्शनकारियों ने बंगभवन पर कब्जा करने की कोशिश की। हालाँकि, पुलिस ने उन्हें खदेड़ दिया। वहीं, छात्रों के दवाब में बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने शेख हसीना से जुड़ी ‘बांग्लादेश छात्र लीग’ पर प्रतिबंध लगा दिया है।

यह विरोध उस समय शुरू हुआ, जब इस सप्ताह की शुरुआत में राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन ने कहा कि उनके पास शेख हसीना की इस्तीफा वाला पत्र नहीं है। 20 अक्टूबर 2024 को प्रकाशित एक साक्षात्कार में राष्ट्रपति ने कहा कि उन्होंने सुना है कि शेख हसीना ने इस्तीफा दे दिया है, लेकिन उनके पास इसका कोई दस्तावेजी सबूत नहीं है।

साक्षात्कार में राष्ट्रपति ने कहा कि 5 अगस्त को सुबह 10:30 बजे प्रधानमंत्री कार्यालय से फोन आया कि शेख हसीना राष्ट्रपति से मिलने राष्ट्रपति भवन बंगभवन आएँगी, लेकिन एक घंटे बाद फिर फोन आया कि वह नहीं आएँगी। राष्ट्रपति शहाबुद्दीन ने कहा कि वह प्रधानमंत्री का इंतजार कर रहे थे। उन्हें नहीं पता था कि देश में क्या हो रहा है।

राष्ट्रपति शहाबुद्दीन ने कहा, “एक बार मैंने सुना कि वह देश छोड़कर चली गई हैं। उन्होंने मुझे कुछ नहीं बताया। मैंने आपको वही बताया जो सच है। वैसे, जब सेना प्रमुख जनरल वकार बंगभवन आए तो मैंने जानना चाहा कि क्या प्रधानमंत्री ने इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने मुझे वही जवाब दिया- मैंने सुना है कि उन्होंने इस्तीफा दे दिया है।”

‘जनतार चोख’ पत्रिका के मुख्य संपादक मतिउर रहमान चौधरी को साक्षात्कार देते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि उन्होंने त्यागपत्र लेने की कोशिश की, लेकिन ऐसा नहीं कर पाए। उन्होंने आगे कहा, “शायद उन्हें समय नहीं मिला। जब चीजें नियंत्रण में आ गईं तो एक दिन कैबिनेट सचिव त्यागपत्र की प्रति लेने आए। मैंने उनसे कहा कि मैं भी इसकी प्रति ढूंढ रहा हूँ।”

हालाँकि, उस समय यह खबर आई थी कि शेख हसीना भारत रवाना होने से पहले राष्ट्रपति भवन गईं और अपना इस्तीफा सौंप दिया। उनके जाने के बाद राष्ट्रपति ने घोषणा की थी कि हसीना ने इस्तीफा दे दिया है। राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में कहा, “आप जानते हैं कि प्रधानमंत्री शेख हसीना ने राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा सौंप दिया है और मैंने इसे स्वीकार कर लिया है।”

राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि कानूनी तौर पर सुनिश्चित होने के लिए उन्होंने मुख्य सलाहकार की नियुक्ति से पहले सुप्रीम कोर्ट की राय ली थी। सुप्रीम कोर्ट ने 8 अगस्त को इस मामले पर अपनी राय देते हुए कहा था कि राष्ट्रपति अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार और अन्य सलाहकारों की नियुक्ति कर सकते हैं, ताकि कार्यपालिका का सुचारू संचालन सुनिश्चित हो सके।

अब शेख हसीना के त्याग पत्र दिए बिना अंतरिम सरकार के गठन को लेकर सवाल उठ रहे हैं। बांग्लादेश की निर्वासित लेखिका तस्लीमा नासरीन ने भी इसको लेकर सवाल उठाया है। उन्होंने अपने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए कहा, “शेख हसीना ने अपने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा नहीं दिया है और वह अभी भी जीवित हैं। इसलिए, यूनुस सरकार अवैध है।”

कानून सलाहकार आसिफ नजरूल ने बुधवार (23 अक्टूबर 2024) को मीडिया के सामने अदालत की राय पेश की, जिसमें अदालत ने कहा कि प्रधानमंत्री ने इस्तीफा दे दिया है और राष्ट्रपति के पास मुख्य सलाहकार और अन्य सलाहकारों की नियुक्ति का अधिकार है। इसलिए, अब सवाल अंतरिम सरकार की वैधता के बारे में कम और इस्तीफे के पत्र को लेकर राष्ट्रपति के यू-टर्न के बारे में ज़्यादा है।

विधि सलाहकार आसिफ नजरुल ने राष्ट्रपति पर झूठ बोलने का आरोप लगाते हुए कहा, “यदि आप पूरे देश के सामने कही गई किसी बात का खंडन करते हैं तो यह कदाचार के समान है। फिर सवाल उठता है कि क्या आपमें राष्ट्रपति के रूप में सेवा करने की मानसिक क्षमता है। ये सवाल उठ सकते हैं… आपने इसके लिए गुंजाइश बनाई है।” अब छात्र राष्ट्रपति से इस्तीफे की माँग कर रहे हैं।

छात्रों के दबाव के बीच मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने शेख हसीना की पार्टी ‘बांग्लादेश अवामी लीग’ की छात्र शाखा ‘बांग्लादेश छात्र लीग’ पर प्रतिबंध लगा दिया है। बांग्लादेश के गृह मंत्रालय ने एक आधिकारिक आदेश में कहा कि सरकार ने ‘आतंकवाद विरोधी अधिनियम 2009’ की धारा 18 की उपधारा (1) में प्रदत्त शक्तियों के तहत ‘बांग्लादेश छात्र लीग’ पर प्रतिबंध लगा दिया है।

आंदोलनकारी छात्रों ने 22 अक्टूबर को अंतरिम सरकार के सामने पाँच सूत्री माँग रखी थी, जिसमें बांग्लादेश के राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन का इस्तीफा भी शामिल है। इन माँगों में अवामी लीग के छात्र संगठन ‘बांग्लादेश छात्र लीग’ पर प्रतिबंध लगाना भी शामिल था। माना जा रहा है कि अंतरिम सरकार छात्रों के दबाव में राष्ट्रपति शहाबुद्दीन का इस्तीफा ले सकती है।

भारत को घुड़की देने वाले जस्टिन ट्रूडो की कुर्सी पर संकट, कनाडा के सांसदों का अल्टीमेटम- 4 दिन के भीतर PM पद से इस्तीफा दो

कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। उनकी कुर्सी पर भी अब संकट गहरा गया है। विपक्षियों के हमले के बीच उनकी खुद की ही पार्टी के सांसदों ने उन्हें इस्तीफा देने का अल्टीमेटम थमा दिया है। इस्तीफा ना देने पर उनके खुलाफ विद्रोह की चेतावनी भी दी गई है।

कनाडाई मीडिया के अनुसार, जस्टिन ट्रूडो का विरोध करने वाले लिबरल पार्टी के सांसदों ने उन्हें 28 अक्टूबर, 2024 तक पद छोड़ देने को कहा है। पद ना छोड़ने पर इन सांसदों ने खुली बगावत की चुनौती दी है। ट्रूडो के खिलाफ इस मुहिम में कम से कम 30 सांसद शामिल हैं।

ट्रूडो को हटाने को लेकर एक पत्र भी यह सांसद अपने साथियों को थमा रहे हैं। इस पत्र पर कई सांसदों के हस्ताक्षर भी करवाए गए हैं। बुधवार (23 अक्टूबर, 2024) को कनाडाई संसद के भीतर हुई एक बैठक में विरोध करने वाले सांसदों ने जस्टिन ट्रूडो को इस्तीफा देने को कह दिया। उनके सामने विरोध वाला पत्र भी पढ़ा गया।

लिबरल पार्टी के सांसद सीन केसी ने कहा कि यह कनाडा के हित में होगा कि जस्टिन ट्रूडो अपना इस्तीफा सौंप दें। उन्होंने कहा कि इसी से लिबरल पार्टी की सरकार बच सकती है। उन्होंने कहा कि अगर ऐसा नहीं होता होता तो कंजर्वेटिव पार्टी आसानी से जीत दर्ज कर लेगी।

लिबरल पार्टी के सांसदों ने कहा है कि ट्रूडो के इस्तीफे के बाद नए नेता की तलाश की जाएगी, इससे पार्टी के खिलाफ देश में बने माहौल को ठंडा करने में मदद मिलेगी। एक सांसद केन मैकडोनाल्ड ने कहा है कि ट्रूडो को अब लोगों की बात सुननी ही पड़ेगी।

कनाडा की संसद में लिबरल पार्टी के लगभग 150 सांसद हैं और इनमें से लगभग 30 खुले तौर पर ट्रूडो के विरोध में उतर आए हैं। यदि यह संख्या बढ़ती है तो ट्रूडो को कुर्सी छोड़नी पड़ सकती है। ट्रूडो की सरकार पहले बैसाखियों के सहारे चल रही है।

वहीं दूसरी तरफ ट्रूडो के कई कैबिनेट मंत्रियों ने भी दोबारा चुनाव ना लड़ने का मन बना लिया है। उनके चुनाव ना लड़ने के पीछे ट्रूडो के चलते लिबरल पार्टी की अलोकप्रियता कारण बताई जा रही है। कनाडा के सर्वे भी ट्रूडो और उनकी पार्टी की बुरी हालत बयाँ कर रहे हैं।

कनाडा के सरकारी चैनल CBC के सर्वे में लगातार एक वर्ष से कंजर्वेटिव नेतृत्व, लिबरल पार्टी से 19% आगे चल रहा है। जहाँ 42% लोग कंजर्वेटिव पार्टी और पियरे पोलिवर को पसंद कर रहे हैं तो वहीं मात्र 23% की पसंद लिबरल पार्टी और ट्रूडो हैं। सर्वे से यह भी पता चल रहा है कि आगामी चुनावों में 95% संभावना है कि वह कंजर्वेटिव पार्टी बहुमत हासिल कर लेगी।

इसके उलट इस बात की केवल 1% संभावना है कि लिबरल पार्टी सत्ता में आए। प्रधानमंत्री के तौर पर भी ट्रूडो की अप्रूवल रेटिंग रसातल को जा रही हैं। ट्रूडो को वर्तमान में कनाडा के प्रधानमंत्री के तौर 65% लोग पसंद नहीं करते हैं। इसमें सुधार भी नहीं हो रहा है।

प्रधानमंत्री ट्रूडो की यह मुश्किलें भारत से राजनयिक झगड़ा मोल लेने के बाद और बढ़ गई हैं। उन्होंने हाल ही में अपने पुराने आरोप दोहराए थे कि भारत ने खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या करवाई। इसको लेकर भारत ने अपने राजनयिक भी कनाडा से वापस बुला लिए थे और कनाडाई राजनयिकों को देश से निकलने को कहा था।

प्रधानमंत्री ट्रूडो ने यह आरोप लगाने के बाद संसद की एक कमिटी की सुनवाई में खुद कबूला था कि उनके पास भारत के खिलाफ कोई सबूत मौजूद नहीं हैं। इस बीच कनाडा में इस मामले में सबूत दिखाने की माँग भी उठ चुकी है। ऐसे में ट्रूडो के लिए यह नया राजनीतिक संकट और बड़ी चुनौती है और अगर वह इससे पार नहीं पाते तो उनके राजनीतिक करियर का अंत भी हो सकता है।

शिमला की अवैध मस्जिद को तोड़ने का काम रुका, मुस्लिम बोले- पैसे नहीं हैं: हिन्दू संगठनों ने दिया ‘कारसेवा’ का ऑफर, कहा- फ्री में कर देंगे

शिमला की अवैध संजौली मस्जिद को तोड़ने का काम फिर एक बार रुक गया है। मस्जिद कमिटी के मुखिया ने तोड़ने का काम चालू करने के बाद रोकने को लेकर पैसे की कमी का हवाला दिया है। वहीं दूसरी तरफ स्थानीय संगठनों ने बिना पैसे लिए ही अवैध ढाँचा तोड़ने के लिए कारसेवा का ऑफ़र दिया है।

संजौली की अवैध मस्जिद तोड़ने का काम सोमवार (21 अक्टूबर, 2024) से चालू हुआ था। इस दौरान मस्जिद की छत हटाई जा रही थी लेकिन यह काम अब अधर में लटक गया है। मंगलवार आते-आते यह काम ठप ही हो गया। मंगलवार को मात्र दो-तीन मजदूर ही मस्जिद तोड़ने का काम करते दिखे जो कि इसके आकार के हिसाब से पर्याप्त नहीं है।

इसके बाद मस्जिद तोड़ने का यह काम पूरी तरीके से रुक गया। मस्जिद कमिटी के मुखिया मोहम्मद लतीफ़ ने इस बारे में पूछे जाने पर मीडिया को बताया कि उन्होंने पैसे की कमी के चलते यह काम रोका है। उन्होंने कहा कि जब फिर से फंड इकट्ठा हो जाएगा तो मस्जिद को तोड़ने की कार्रवाई की जाएगी।

मोहम्मद लतीफ़ ने कहा कि जब मस्जिद का अवैध निर्माण किया जा रहा था तब सभी मुस्लिम आगे बढ़ चढ़ कर पैसा दे रहे थे लेकिन जब इस अवैध निर्माण को तोड़ने का काम चालू हुआ तो कोई भी पैसा देने को तैयार नहीं है। मोहम्मद लतीफ़ ने कहा है कि मस्जिद तोड़ने में ₹10-15 लाख का खर्च आने वाला है। उन्होंने मजदूरों की कमी भी एक कारण बताया है।

वहीं अवैध ढाँचा गिराने के लिए पैसे की कमी वाली बात पर हिमाचल के संगठन भी आगे आए हैं। हिमाचल प्रदेश में अवैध मस्जिदों को लेकर आंदोलन कर रहे संगठनों ने बिना पैसे लिए मस्जिद तोड़ने का ऑफर दिया है। देवभूमि संघर्ष समिति के लोगों ने कहा है कि मस्जिद तोड़ने के नाम पर खानापूर्ति की जा रही है।

संजौली सिविल सोसायटी ने कहा है कि यदि मस्जिद कमिटी के पास पैसे की कमी है तो वह सहयोग देने को तैयार हैं। कमिटी ने कहा कि वह मस्जिद तोड़ने के लिए कारसेवा करेंगे और इसके लिए कोई पैसा भी नहीं लेंगे। उन्होंने यहाँ तक कहा कि वह इसे तोड़ने के दौरान खाना भी घर से ही लाएँगे।

स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया कि मस्जिद कमिटी नगर निगम कोर्ट के आदेश का सही से पालन नहीं कर रही है। उन्होंने इसको लेकर चेतावनी भी दी है। उन्होंने कहा है कि हाई कोर्ट ने भी मस्जिद को लेकर जल्द निर्णय की बात कही है।

हिमाचल प्रदेश सरकार में मंत्री अनिरुद्ध सिंह ने भी यही ऑफर दिया है। उन्होंने कहा है कि यदि मस्जिद कमिटी उनसे मिलने आती है तो वह आर्थिक सहयोग और श्रमदान दोनों ही देंगे। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस सबकी मदद करने के लिए ही जानी जाती है और वह इस मामले में भी मदद देंगे। हिमाचल सरकार में मंत्री विक्रमादित्य सिंह ने भी निगम से सहायता लेने की बात कही थी।

गौरतलब है कि मस्जिद तोड़ने का आदेश मस्जिद कमिटी के आवेदन पर ही दिया था। इस मस्जिद का निर्माण 2010 से हो रहा था। तब से लगातार नगर निगम शिमला इसे नोटिस भेज रहा था लेकिन इसका निर्माण नहीं रोका गया और पाँच मंजिले खड़ी कर दी गईं। सितम्बर, 2024 में मस्जिद को लेकर विवाद चालू होने से पहले तक इस मस्जिद को 38 नोटिस भेजे जा चुके थे।

जब सितम्बर, 2024 में एक स्थानीय युवक के साथ मारपीट की खबर के बाद संजौली मस्जिद के विरुद्ध प्रदर्शन चालू हुए तो सब पिटारा बाहर आया। इसके बाद मस्जिद कमिटी ने विरोध प्रदर्शन बढ़ता देख इसे गिराने की बात कह दी। इसको लेकर उन्होंने खुद ही आवेदन दिया।

संजौली मस्जिद को जल्दी गिराए जाने को लेकर मुस्लिमों में दो फाड़ भी हो चुका है। 9 अक्टूबर, 2024 को मुस्लिमों के एक संगठन ने बैठक कर मस्जिद गिराए जाने के खिलाफ हाई कोर्ट जाने की बात कही थी। हालाँकि, संजौली मस्जिद कमिटी ने ऐसी किसी बात से इनकार किया था।

डॉक्टर अंबेडकर और ‘भारत का विचार’: जानिए संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष’ शब्द शामिल करने के विरोध में क्यों थे बाबासाहेब?

राष्ट्र की पहचान और भविष्य की दिशा के बारे में गहन चर्चा और बहस भारत के संविधान के निर्माण की आधारशिला थी। भारत की स्वतंत्रता के बाद कई वर्षों तक चले इस वृहत् कार्य में कुछ सबसे उल्लेखनीय प्रमुख बहसें शामिल थीं। ऐसी ही एक बहस प्रस्तावना में ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘समाजवादी’ शब्दों को शामिल करने को लेकर थी।

प्रोफेसर केटी शाह ने 15 नवंबर 1948 को भारतीय संविधान के मसौदे में एक संशोधन का एक प्रस्ताव रखा, जिसमें भारत को ‘धर्मनिरपेक्ष, संघीय, समाजवादी राज्यों का संघ’ के रूप में लेबल करने की माँग की गई। हालाँकि, मसौदा समिति के अध्यक्ष डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने इस प्रस्ताव को दृढ़ता से खारिज कर दिया।

केटी शाह द्वारा रखे गए उस स समय रखे गए प्रस्ताव पर डॉक्टर अंबेडकर को दो आपत्तियाँ थीं, जो भारत के बारे में उनकी दृष्टि की समझ का आधार बनीं। उनकी दृष्टि लोकतंत्र और देश के लोगों की इच्छा को निश्चित वैचारिक पदों से ऊपर रखती थी।

पहली आपत्ति: संविधान को कोई विचारधारा नहीं थोपनी चाहिए

डॉक्टर अंबेडकर का मुख्य तर्क लोकतंत्र के प्रति उनकी प्रतिबद्धता में निहित था। उनका दृढ़ विश्वास था कि संविधान राज्य के कामकाज को विनियमित करने का एक तंत्र है। अंबेडकर ने स्पष्ट रूप से कहा कि संविधान को ऐसे दस्तावेज़ के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए जो देश की भावी पीढ़ियों पर एक विशेष सामाजिक या आर्थिक विचारधारा थोपता हो।

केटी शाह के प्रस्ताव पर प्रतिक्रिया देते हुए अंबेडकर ने कहा था, “राज्य की नीति क्या होनी चाहिए, समाज को उसके सामाजिक और आर्थिक पक्ष में कैसे संगठित किया जाना चाहिए, ये ऐसे मामले हैं जिनका निर्णय लोगों को समय और परिस्थितियों के अनुसार स्वयं करना चाहिए।”

अंबेडकर के अनुसार, भारत के संविधान में समाजवाद जैसी विचारधारा को संहिताबद्ध करने में एक बुनियादी विरोधाभास था। उन्होंने तर्क दिया कि अगर समाजवाद को प्रस्तावना में जोड़ दिया गया तो यह भविष्य की पीढ़ियों को अपना रास्ता चुनने की स्वतंत्रता को प्रतिबंधित करेगा। उन्होंने कहा, “इसे संविधान में नहीं रखा जा सकता, क्योंकि यह लोकतंत्र को पूरी तरह से नष्ट कर देगा।”

उन्होंने पहले ही इस बात को समझ लिया था कि अलग-अलग कालखंड नई चुनौतियाँ आ सकती हैं। वे देश की भावी पीढ़ियों को किसी निर्दिष्ट प्रणाली से बांधने के लिए तैयार नहीं थे। इतिहास में एक समय समाजवाद लोकप्रिय था। जिस समय संविधान तैयार किया गया था, तब यह विकसित हो रहा था। इसे संविधान में जोड़ने से इनकार करना प्रासंगिक हो गया।

दूसरी आपत्ति: संविधान में पहले से ही समाजवादी सिद्धांत मौजूद

प्रस्ताव को खारिज करते हुए अंबेडकर ने दूसरा तर्क दिया कि संविधान के मसौदे में पहले से ही ऐसे प्रावधान हैं, जिन्हें राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के माध्यम से समाजवादी सिद्धांतों के रूप में देखा जा सकता है। उन्होंने मसौदे के अनुच्छेद 31 की ओर इशारा किया और कहा कि इसमें धन के संकेन्द्रण को रोकने और समान काम के लिए समान वेतन जैसे उपायों की रूपरेखा दी गई है, जो एक समाजवादी प्रावधान है।

उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में पूछा, “यदि ये निर्देशक सिद्धांत… अपनी दिशा और विषय-वस्तु में समाजवादी नहीं हैं तो मैं यह नहीं समझ पा रहा हूँ कि समाजवाद और क्या हो सकता है।” उन्होंने आगे तर्क दिया कि समाजवादी आदर्श पहले से ही निर्देशक सिद्धांतों में अंतर्निहित हैं, जिससे संवैधानिक रूप से भारत को अधिक समतापूर्ण समाज की ओर ले जाना संभव हो गया।

अंबेडकर के अनुसार, प्रस्तावना में स्पष्ट रूप से ‘समाजवादी’ शब्द जोड़ना निरर्थक होगा, क्योंकि सामाजिक और आर्थिक न्याय के सिद्धांत पहले से ही मसौदा पाठ का हिस्सा हैं। इसके अलावा, उनका मानना ​​था कि नीति निर्देशक तत्वों में शामिल समाजवादी शब्द सरकार को देश को अधिक लचीलेपन के साथ चलाने की अनुमति देंगे।

उनका मानना था कि यह सरकार को समय के साथ बदलती आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों के अनुकूल होने में सक्षम बनाएगा। इस विचार के विपरीत, यदि प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ शब्द जोड़ा गया तो यह देश की भावी पीढ़ियों को अधिक कठोर वैचारिक ढाँचे में बाँध देगा, जिससे कई तरह की बाधाएँ पैदा होंगी।

धर्मनिरपेक्षता पर बहस: एक सूक्ष्म दृष्टिकोण

डॉक्टर भीमराव अंबेडकर धर्म को राजनीति से दूर रखने के प्रबल समर्थक थे। सिर्फ़ वे ही नहीं, बल्कि भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू भी यही मानते थे। उन दोनों ने तर्क दिया कि प्रस्तावना में ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द का स्पष्ट रूप से उल्लेख करने की आवश्यकता नहीं है। अंबेडकर ने तर्क दिया कि संविधान ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि भारत एक ऐसा देश होगा, जो किसी भी धर्म को मान्यता नहीं देगा।

डॉक्टर भीमराव अंबेडकर का कहना था कि धर्मनिरपेक्षता के विचारों को विभिन्न अनुच्छेदों में लागू किया गया है, जो धार्मिक स्वतंत्रता और राज्य के किसी विशेष धर्म के साथ गैर-संरेखण (Non-alignment) से संबंधित थे, जैसे अनुच्छेद 19 और अनुच्छेद 16। ये अनुच्छेद धर्म के आधार पर किसी भी व्यक्ति के साथ भेदभाव को प्रतिबंधित करते हैं।

दूसरी ओर, नेहरू का मानना ​​था कि भारत में धर्मनिरपेक्षता अपने पश्चिमी समकक्षों से अलग है। पश्चिम में धर्मनिरपेक्षता मुख्य रूप से चर्च और यूरोप के देशों के बीच ऐतिहासिक संघर्ष को संबोधित करती है। नेहरू का मानना था कि इसके विपरीत भारत का धार्मिक परिदृश्य राजनीति से अधिक जुड़ा हुआ है। इस प्रकार धर्मनिरपेक्षता को अधिक लचीली और कार्यात्मक अवधारणा के रूप में समझा जाना चाहिए।

इंदिरा गाँधी का 42वाँ संविधान संशोधन और ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्दों का समावेश

आपातकाल के दौरान 1976 में भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने संविधान में 42वें संशोधन के माध्यम से भारत की प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द जोड़ दिए। प्रस्तावना में इतना बड़ा बदलाव करने के लिए इंदिरा गाँधी की बार-बार आलोचना की गई। इसे गाँधी की शक्ति को मजबूत करने के उद्देश्य से एक राजनीतिक रूप में देखा गया।

किए गए बदलावों को अगर हम भीमराव अंबेडकर के दृष्टिकोण से देखें तो वे लोकतंत्र और स्वतंत्रता की उस भावना के विपरीत हैं, जिसकी वे रक्षा करना चाहते थे। अंबेडकर का मानना ​​था कि समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता के बारे में फैसले लोगों की इच्छा को दर्शाने वाले होने चाहिए। ये किसी सत्तारूढ़ सरकार की वैचारिक प्राथमिकताएँ नहीं होनी चाहिए।

हाल में इसे भारतीय मूल्यों के प्रतिबिंब करने वाले के बजाय एक असुरक्षित सरकार का प्रतिबिंब माना गया। सितंबर 2024 में तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि ने कहा कि धर्मनिरपेक्षता एक यूरोपीय अवधारणा है, न कि भारतीय। उन्होंने कहा कि यह चर्च और यूरोप के राजा के बीच संघर्ष को समाप्त करने के लिए अस्तित्व में आया था।

भारत में ‘धर्मनिरपेक्षता’ को गैर-जरूरी बताते हुए उन्होंने बताया कि संविधान के मूल निर्माताओं ने इसे दस्तावेज़ में शामिल नहीं किया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी का जिक्र करते हुए आरएन रवि ने उन्हें ‘एक सुरक्षित प्रधानमंत्री’ कहा था, जिन्होंने संविधान में ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द जोड़ा था।

अंबेडकर का दीर्घकालिक दृष्टिकोण: विचारधारा से ऊपर लोकतंत्र

संविधान की प्रस्तावना में ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘समाजवादी’ शब्दों को शामिल करने के बारे में अंबेडकर के विचार और अनिच्छा लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाती है। उनका मानना ​​था कि अगर इन आदर्शों को संविधान के ज़रिए लागू किया गया तो यह लोगों की स्वतंत्रता के लिए प्रतिकूल होगा। उन्होंने तर्क दिया कि संविधान एक लचीला दस्तावेज़ होना चाहिए, जो समाज की बदलती ज़रूरतों के हिसाब से ढलने में सक्षम हो।

उनके अनुसार, एक लोकतांत्रिक देश को अपने नागरिकों को देश की परिस्थितियों के आधार पर अपनी सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था चुनने की स्वतंत्रता प्रदान करनी चाहिए। धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद कठोर आदर्श हैं, जो लोगों की स्वतंत्रता को सीमित करते हैं। लोकतंत्र, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और राज्य की अनुकूलनशीलता के प्रति अंबेडकर की प्रतिबद्धता ने उन्हें इन शब्दों को शामिल करने का विरोध करने के लिए प्रेरित किया।

(इस लेख को मूल रूप से अंग्रेजी में अनुराग ने लिखा है। आप इस लिंक पर क्लिक करके इसे पढ़ सकते हैं।)

भगवान राम-माता सीता पर नाबालिग मुस्लिम ने की अभद्र टिप्पणी, गुजरात में सड़क पर उतरे हिंदू: बताया- 6 महीने से हो रही तनाव पैदा करने की कोशिश

गुजरात के गाँधीनगर जिले के सादरा गाँव में एक मुस्लिम नाबालिग द्वारा भगवान राम और माता सीता पर की गई अभद्र टिप्पणी से पूरे गाँव में आक्रोश फैल गया। इस घटना के विरोध में सैकड़ों ग्रामीण सड़कों पर उतर आए और पुलिस स्टेशन तक रैली निकाली। पुलिस ने भी तत्परता दिखाते हुए आरोपित नाबालिग को हिरासत में ले लिया है। इस विवाद के बाद गाँव में पूर्ण बंद की घोषणा की गई है।

बजरंग दल के प्रमुख गणपत सिंह ने ऑपइंडिया से बातचीत में पूरे घटनाक्रम की जानकारी दी। उन्होंने बताया, “यह घटना रविवार (22 अक्टूबर 2024) को हुई, जब सादरा गाँव के 16 वर्षीय मुस्लिम लड़के (नाबालिग की पहचान कानूनी कारणों से छिपाई गई) ने इंस्टाग्राम पर भगवान राम और माता सीता के खिलाफ बेहद आपत्तिजनक और अश्लील टिप्पणी की। इसका स्क्रीनशॉट गाँव में वायरल हो गया, जिससे पूरे हिंदू समाज में गुस्सा फैल गया।” गणपत सिंह ने कहा कि बजरंग दल और अन्य संगठनों के कार्यकर्ता लोगों को शांत करने के लिए तुरंत मौके पर पहुँचे और कानूनी रास्ता अपनाने का सुझाव दिया।

आपत्तिजनक स्क्रीनशॉट

घटना के बाद गाँव के लगभग 200 से 300 लोग चिलोडा पुलिस स्टेशन पहुँचे और आरोपित के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग की। पुलिस को स्क्रीनशॉट्स और अन्य सबूत सौंपे गए। गाँव के एक निवासी राजेश पटेल ने कहा, “इस घटना ने हमारे धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाई है। हम चाहते हैं कि दोषी के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई की जाए ताकि भविष्य में कोई इस तरह की हरकत न कर सके।”

चिलोडा पुलिस स्टेशन के निरीक्षक, PI परमार ने कहा, “हमने स्थिति को गंभीरता से लिया और तुरंत आरोपित नाबालिग को हिरासत में लिया। गाँव में स्थिति नियंत्रण में है, और हम शांति बनाए रखने के लिए सभी जरूरी कदम उठा रहे हैं।” पुलिस ने गाँव में शांति व्यवस्था कायम रखने के लिए सुरक्षा बढ़ा दी है और ग्रामीणों से शांति बनाए रखने की अपील की है।

गाँव में बंद और रैली का आयोजन

घटना के बाद 23 अक्टूबर को बजरंग दल के आह्वान पर सादरा गाँव में एक दिन का बंद रखा गया। गाँव के व्यापारी संघ के अध्यक्ष, रमेश चौधरी ने कहा, “हमारे धर्म का अपमान हुआ है, इसलिए हमने स्वेच्छा से अपनी दुकानें बंद रखी हैं। यह विरोध प्रदर्शन धर्म और आस्था की रक्षा के लिए है।” इसके अलावा, गाँव में हिंदू संगठनों द्वारा एक रैली भी निकाली गई, जिसमें ‘जय श्रीराम’ और ‘जय शिवाजी’ के नारे लगाए गए।

आरोपित के माता-पिता ने माँगी माफी

घटना के बाद आरोपित नाबालिग के माता-पिता ने गाँव के सरपंच और हिंदू संगठनों से माफी की अपील की। उन्होंने कहा कि उनका बेटा कम उम्र का है और यह हरकत उसने अनजाने में की है। सरपंच रमेश भाई चौहान ने बताया, “मुस्लिम नाबालिग के माता-पिता ने माफी माँगी है और आश्वासन दिया है कि ऐसी गलती दोबारा नहीं होगी। हम इस पर विचार कर रहे हैं।” हिंदू और मुस्लिम समुदाय के बीच शांति बनाए रखने के लिए पुलिस की मध्यस्थता में एक शांति समिति की बैठक आयोजित की गई। बजरंग दल के गणपत सिंह ने कहा, “यदि मुस्लिम समुदाय आश्वासन देता है कि भविष्य में ऐसी घटनाएँ नहीं होंगी, तो हम भी कार्रवाई को रोकने के लिए तैयार हैं। शांति बनाए रखना हमारी प्राथमिकता है।”

पिछले 6 महीनों से गाँव में बढ़ी आक्रामकता

हिंदू संगठनों ने दावा किया है कि सादरा गाँव में पिछले 6 महीनों से स्थिति तनावपूर्ण हो रही है। गणपत सिंह ने बताया, “गाँव में एक मस्जिद है जहाँ लाउडस्पीकर से अज़ान 5 बार की जाती है, जिससे पहले कभी ऐसा नहीं होता था। इससे गाँव में तनाव बढ़ा है।” उन्होंने यह भी कहा कि घटना के बाद से गाँव में तनाव की स्थिति बनी हुई है और शांति समिति की बैठक के बाद आगे की कार्रवाई तय की जाएगी। बताया जा रहा है कि इस गाँव में 8000 घर हैं, लेकिन मुस्लिमों के घरों की संख्या महज 250 के आसपास ही है। इसके बावजूद ऐसी हरकतें की जा रही हैं।

PI परमार ने कहा, “हम स्थिति पर नजर रखे हुए हैं और किसी भी प्रकार की अशांति या हिंसा को रोकने के लिए सभी आवश्यक कदम उठा रहे हैं। गाँव में शांति बनाए रखने के लिए सुरक्षा बलों की तैनाती की गई है, और हम सुनिश्चित करेंगे कि किसी भी समुदाय के साथ अन्याय न हो।” फिलहाल, शांति बनाए रखने की कोशिश की जा रही है, और गाँव में सुरक्षा कड़ी कर दी गई है। शांति समिति की बैठक के बाद आगे की दिशा तय की जाएगी।

मूल रूप से ये रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित की गई है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

आतंकवादी हैं अल जजीरा के 6 पत्रकार, हमास और फिलिस्तीनी इस्लामिक जिहाद से हैं जुड़े: इजरायली सेना के हाथ लगे दस्तावेजों से खुली असली पहचान

इजरायल ने खुलासा किया है कि क़तर के पैसे से चलें वाले अल जजीरा के 6 पत्रकार असल में आतंकी हैं। इजरायल ने बताया है कि यह 6 पत्रकार इस्लामी आतंकी संगठन हमास और फिलिस्तीनी इस्लामिक जिहाद (PIJ) के आतंकी है। इजरायल को इससे जुड़े दस्तावेज भी मिले हैं।

इजरायली सुरक्षा बल (IDF) ने बुधवार को एक्स (पहले ट्विटर) पर यह जानकारी दी है। IDF ने बताया, “IDF ने गाजा में मिली खुफिया जानकारी और अनेक दस्तावेजों का खुलासा किया है कि अल जजीरा के छह पत्रकार हमास और इस्लामिक जिहाद आतंकवादी संगठनों के साथ जुड़े हुए हैं। उनके टेबलेट्स, आतंकी ट्रेनिंग कोर्स और उनकी तनख्वाह के कागज इसकी पुष्टि करते हैं।”

IDF ने आगे बताया, “ये दस्तावेज कतरी अल जजीरा मीडिया नेटवर्क के हमास आतंकियों के साथ गठजोड़ का सबूत हैं। IDF ने हमास की हथियारबंद गतिविधियों में शामिल होने वाले कई पत्रकारों को उजागर किया है, ये लोग गाजा में हमास का प्रचार करते घूमते हैं।”

IDF ने कहा कि उसके दस्तावेज साफ तौर पर साबित करते हैं कि यह पत्रकार हमास और इस्लामिक जिहाद के संबंधित हथियारबंद विंग के सदस्य थे। इन आतंकी पत्रकारों की पहचान अनस जमाल महमूद अल-शरीफ, अला अब्दुल अजीज मुहम्मद सलामा, होसम बसल अब्दुल करीम शबात, अशरफ सामी अहसूर सराज, इस्माइल फरीद मुहम्मद अबू अमर और तलाल महमूद अब्दुल रहमान अरुकी के तौर पर हुई है।

IDF ने बताया कि अनस अल-शरीफ रॉकेट लॉन्चिंग स्क्वॉड का प्रमुख था और हमास की नुसीरत बटालियन में नुखबा फोर्स कंपनी का आतंकी था। वहीं अला सलामा इस्लामिक जिहाद की शाबूरा बटालियन की प्रोपेगेंडा इकाई का काम देखता था । शाबत हमास की बेत हनून बटालियन में स्नाइपर था और अशरफ सराज इस्लामिक जिहाद की बुरीज बटालियन का आतंकी था।

अबू अमर खान यूनिस बटालियन में ट्रेनिंग कंपनी कमांडर के तौर पर काम करता था। एक और पत्रकार अब्दुल रहमान अरुकी हमास की नुसीरत बटालियन में टीम कमांडर था। अल जजीरा का ही पत्रकार इस्माइल अबू अमर इस साल फरवरी में गाजा में इजरायली ऑपरेशन में घायल हो गया था।

इजरायल के ऑपरेशन में घायल होने पर अल जजीरा ने दावा किया था कि उसके पत्रकार का आंतकी संगठनों से कोई संबंध नहीं है। लेकिन अब IDF को इस बारे में दस्तावेज मिले हैं। अल जजीरा लगातार इजरायल को लेकर दुष्प्रचार करता रहा है।

अल जजीरा इस साल मई में बेंजामिन नेतन्याहू सरकार ने हमास का प्रोपेगेंडा चलाने के कारण इजरायल के भीतर अल जजीरा को बंद कर दिया था। सितम्बर, 2024 में इजरायल सरकार ने वेस्ट बैंक के रामल्लाह में अल जजीरा ब्यूरो को भी बंद कर दिया था।

सोना-चाँदी, जमीन-कैश सब, फिर भी 2010-11 से टैक्स नहीं भर रहे रॉबर्ट वाड्रा, प्रियंका गाँधी पर भी ₹11 लाख बकाया: वायनाड से भरा पर्चा तो खुली पोल

कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी ने बुधवार (23 अक्टूबर, 2024) को केरल की वायनाड लोकसभा सीट उपचुनाव के लिए पर्चा दाखिल कर दिया। उनके नामांकन के दौरान भाई राहुल गाँधी भी मौजूद रहे। प्रियंका गाँधी के दाखिल किए गए चुनावी हलफनामे में उनकी करोड़ों की सम्पत्ति और उन पर इनकम टैक्स के बकाए की जानकारी सामने आई है। सामने आया है कि प्रियंका गाँधी और उनके पति रॉबर्ट वाड्रा ने लगभग ₹78.5 करोड़ का इनकम टैक्स नहीं चुकाया है। इसको लेकर मुकदमे भी चल रहे हैं।

प्रियंका गाँधी द्वारा दाखिल किए गए हलफनामे के अनुसार, उन्होंने साल 2012-13 का ₹15.75 लाख का इनकम टैक्स नहीं चुकाया है और इसको लेकर इनकम टैक्स ट्रिब्यूनल मुकदमा चल रहा है। उन्होंने CBDT के पास मात्र ₹3.15 लाख जमा किए हैं। वर्तमान कार्रवाई के अनुसार, उनके ऊपर ₹11.11 लाख की रकम का इनकम टैक्स बकाया और उन्हें यह चुकाना है।

प्रियंका गाँधी के पति रॉबर्ट वाड्रा ने इनकम टैक्स की बड़ी रकम दबा रखी है। उन्होंने 2010-11 के बाद से 2020-21 तक का इनकम टैक्स नहीं भरा है। यानि वह लगभग 12 सालों का इनकम टैक्स नहीं जमा कर रहे हैं। अब यह धनराशि लगभग ₹78.5 करोड़ पहुँच चुकी है।

हलफनामे के अनुसार, रॉबर्ट वाड्रा पर साल 2010-11 के लिए ₹7.15 करोड़, साल 2011-12 के लिए ₹3.02 करोड़, साल 2012-13 के लिए ₹3.39 करोड़, साल 2013-14 के लिए ₹11.05 करोड़, साल 2014-15 के लिए ₹10.02 करोड़ और 2015-16 का ₹8.98 करोड़ बकाया है।

इसके अलावा 2016-17 के ₹4.12 करोड़, 2017-18 के ₹3.06 करोड़, 2018 के लिए 2.39 करोड़ और 2019-20 के इए ₹24.16 करोड़ भी बकाया हैं। रॉबर्ट वाड्रा ने 2020-21 का ₹1 करोड़ का इनकम टैक्स भी नहीं जमा किया है।

इस हलफनामे में प्रियंका गाँधी और उनके पति रॉबर्ट वाड्रा की संपत्तियों की जानकारी भी सामने आई है। हलफनामे में प्रियंका गाँधी ने बताया है कि उनके पास 60 किलो से अधिक सोना चाँदी है। इसके अलावा उनके पास करोड़ों की जमीन भी है।

प्रियंका गाँधी वाड्रारॉबर्ट वाड्रा
आय साल 2023-2469,31,660₹55,58,000
आय साल 2022-23₹19,89,420 ₹11,38,710
आय साल 2021-22₹45,56,940 ₹9,03,810
आय साल 2020-21₹47,21,820 ₹9,35,530
आय साल 2019-20₹46,39,100₹15,09,220
बैंक सेविंग्स अकॉउंट₹3,67,281 ₹13,95,604
बैंक करंट अकॉउंटजीरो₹2,95,251
बैंक फिक्स्ड डिपोजिटजीरो₹35,60,245
शेयरजीरो₹65,72,012
म्यूचुअल फंड₹2,24,93,988₹32,79,998
PPF/LIC₹17,38,265₹6,00,000
विभिन्न कंपनियों को दिया गया पैसाजीरो₹35,38,89,724
सोना-चाँदी-जेवरात2.509 किलो सोना (₹1,15,79,065) 59.830 किलो चाँदी (₹29,55,581)जीरो
कुल चल संपत्ति₹4,24,78,689 ₹37,91,47,432
दिल्ली में जमीन3.78 एकड़ (₹2,10,13,598)जीरो
व्यावसायिक भवनजीरो₹27,64,38,633
आवासीय भवन₹7,74,12,598जीरो

ऊपर प्रियंका गाँधी और उनके पति की संपत्तियों का हर एक ब्योरा देखा जा सकता है। प्रियंका गाँधी और रॉबर्ट वाड्रा के पास कोई नई गाड़ियाँ भी नहीं हैं। इस हलफनामे में बताया गया है कि दोनों के पास 3 कारें और 1 मोटरसाइकिल है। यह सभी गाड़ियाँ 15 वर्ष से अधिक पुरानी हैं।

यानी अगर देखा जाए तो रॉबर्ट वाड्रा- प्रियंका गाँधी पर इनकम टैक्स का बकाया उनकी कुल सम्पत्ति से भी ज्यादा है। हलफनामे के अनुसार, दोनों की कुल सम्पत्ति लगभग ₹77.5 करोड़ है जबकि उनके ऊपर ₹78 करोड़ से ज्यादा का इनकम टैक्स बकाया है। प्रियंका गाँधी और रॉबर्ट वाड्रा का कुल इनकम टैक्स बकाया लगभग ₹78.5 करोड़ पहुँचता है।

प्रियंका गाँधी चुनावी राजनीति में उतरने वाली गाँधी परिवार की सबसे नई सदस्य हैं। यदि वह चुनाव जीतती हैं तो गाँधी परिवार के सभी सदस्य सांसद होंगे। उनके भाई राहुल गाँधी वर्तमान में रायबरेली जबकि माँ सोनिया गाँधी राज्यसभा की सांसद हैं।

जिस देश में सबसे ज्यादा मुस्लिम, उसने अपनी जमीन पर रोहिंग्या मुस्लिमों को उतरने नहीं दिया: लकड़ी की नाव में 140 थे सवार, बोले स्थानीय- ये जहाँ भी गए, वहाँ फैलाई अशांति

इंडोनेशिया के आचे प्रांत के तट पर 140 रोहिंग्या मुस्लिम घुसपैठियों का एक समूह पहुँचा, लेकिन स्थानीय मछुआरा समुदाय के लोगों ने उन्हें जमीन पर कदम रखने ही नहीं दिया। इस घटना की वजह से तनाव की स्थिति बनी, रोहिंग्या मुस्लिमों का यह समूह, जिनमें ज्यादातर महिलाएँ और बच्चे शामिल थे, मलेशिया की ओर बढ़ने की कोशिश कर रहा था। स्थानीय समुदाय ने सुरक्षा और शांति के नाम पर उनका विरोध किया और उन्हें नाव से उतरने नहीं दिया।

एपी की रिपोर्ट के मुताबिक, यह घटना इंडोनेशिया के उत्तरी प्रांत आचे के दक्षिणी हिस्से में लाबुहान हाजी के पास की है। 140 भूखे और थके हुए रोहिंग्या मुस्लिमों ने लकड़ी की नाव में सवार होकर बांग्लादेश के कॉक्स बाजार से लगभग दो हफ्ते की समुद्री यात्रा की थी। इस दौरान तीन लोगों की मौत हो गई थी। जब यह नाव आचे के तट से लगभग 0.60 किलोमीटर दूर पहुँची, तो स्थानीय मछुआरों और निवासियों ने उनका विरोध किया।

स्थानीय मछुआरा समुदाय के मुखिया मोहम्मद जबल ने साफ तौर पर कहा कि उनका समुदाय इन्हें उतरने की अनुमति इसलिए नहीं देगा क्योंकि पहले के अनुभवों के अनुसार, रोहिंग्या मुस्लिम जहाँ भी गए हैं, वहाँ स्थानीय लोगों के साथ संघर्ष और अशांति फैलाने की स्थिति उत्पन्न हुई है। जबल ने कहा, “हमने उन्हें खाना दिया, लेकिन हम यह नहीं चाहते कि यहाँ वही समस्या हो, जो अन्य स्थानों पर हुई है।”

अपने विरोध को जताने के लिए मछुआरों ने समुद्र के किनारे बड़ा बैनर लगाया है, जिसमें लिखा है, “साउथ आचे रीजेंसी के लोग इस क्षेत्र में रोहिंग्या शरणार्थियों के आगमन को अस्वीकार करते हैं।” स्थानीय लोगों का विरोध इसलिए भी है कि जहाँ-जहाँ रोहिंग्या मुस्लिम पहुँचे हैं, वहाँ संघर्ष और अशांति फैली है।

आचे पुलिस की रिपोर्ट के अनुसार, रोहिंग्या मुस्लिमों का यह समूह 9 अक्टूबर को बांग्लादेश के कॉक्स बाजार से रवाना हुआ था और उनका मूल लक्ष्य मलेशिया पहुँचना था। इस यात्रा के दौरान, नाव पर सवार कुछ यात्रियों ने कथित तौर पर दूसरे देशों में पहुँचने के लिए पैसे भी दिए थे। हालाँकि, जब नाव इंडोनेशिया पहुंची, तब तक नाव पर कुल 216 लोग सवार थे, जिनमें से 50 लोग इंडोनेशिया के रियाउ प्रांत में उतर चुके थे। स्थानीय निवासियों ने हालाँकि घुसपैठियों को खाना दिया और संयुक्त राष्ट्र के शरणार्थी मामलों के उच्चायुक्त ने भी भोजन सामग्री प्रदान की, लेकिन उन्हें जमीन पर कदम रखने की अनुमति नहीं दी गई।

सरकारी अधिकारियों द्वारा 11 रोहिंग्या मुस्लिमों को अस्पताल में भर्ती कराया गया, क्योंकि उनकी तबियत बिगड़ चुकी थी। ये लोग लम्बी यात्रा के कारण कमजोर हो चुके थे, जिसमें अधिकतर महिलाएँ और बच्चे शामिल थे। हालाँकि, स्थानीय मछुआरों और पुलिस के विरोध के कारण बाकी घुसपैठियों को वापस नाव पर ही रहना पड़ा। आचे पुलिस ने मानव तस्करी के संदेह में तीन लोगों को गिरफ्तार किया है। यह आरोप लगाया जा रहा है कि इन तीनों ने रोहिंग्या मुस्लिमों से पैसा लेकर उन्हें दूसरे देशों में पहुँचाने का वादा किया था।

रोहिंग्या मुस्लिमों का म्यांमार से पलायन पिछले कुछ वर्षों से दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में एक संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है। म्यांमार के सुरक्षा बलों द्वारा 2017 में किए गए क्रूर आतंकवाद विरोधी अभियानों के बाद, करीब 740,000 रोहिंग्या मुस्लिम म्यांमार से भागकर बांग्लादेश में शरण लिए हुए हैं। म्यांमार में रोहिंग्या मुस्लिमों को लंबे समय से व्यापक भेदभाव और अत्याचार का सामना करना पड़ा है, और वहाँ की सरकार ने उन्हें नागरिकता देने से भी इनकार कर दिया है।

बता दें कि इंडोनेशिया, थाईलैंड और मलेशिया जैसे अन्य देशों की तरह संयुक्त राष्ट्र के 1951 शरणार्थी सम्मेलन का हस्ताक्षरकर्ता नहीं है, इसलिए इन्हें शरणार्थियों को स्वीकार करने की बाध्यता नहीं है। इंडोनेशिया की आबादी में 87% लोग मुस्लिम मजहब से हैं, लेकिन वो लगातार रोहिंग्या मुस्लिमों को वापस भेजता रहा है।

बीते साल नवंबर 2023 में 250 लोगों से भरी नाव को भी वापस समंदर में लौटा दिया गया था, जिसके बारे में बात में आशंकाएँ जताई कि गई वो नाव दुर्घटना का शिकार हो गई। वहीं, मार्च 2024 में भी इंडोनेशिया के अधिकारियों और स्थानीय मछुआरों ने आचे के तट पर एक नाव से 75 लोगों को बचाया था, क्योंकि वो विरोध प्रदर्शन की वजह से वो नाव तट पर नहीं आ सकी थी और दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी, उस घटना में नाव पलटने से 67 लोगों की मौत हो गई थी, जिनमें से कई महिलाएँ और बच्चे थे।