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हैदराबाद में हिन्दुओं का नरसंहार करने वाले, बांग्लादेश में क्या? समझिए PM शेख हसीना ने दंगाइयों को क्यों कहा ‘रजाकार’, आरक्षण विरोधी हिंसा से कनेक्शन

बांग्लादेश में आरक्षण विरोधी प्रदर्शनों से जुड़ी हिंसा की वजह से अब तक 130 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं। पूरा देश थम गया है। हालाँकि बांग्लादेश के सुप्रीम कोर्ट ने उस 30 प्रतिशत के आरक्षण पर रोक लगा दी है, जो सरकारी नौकरियों में बांग्लादेश की आजादी के लिए लड़ने वाले लोगों के परिजनों, आश्रितों को दिया जाता था। अब बांग्लादेश के सुप्रीम कोर्ट ने देश में 7 प्रतिशत का आरक्षण लागू किया है और 93 प्रतिशत नौकरियों को अनारक्षित कर दिया है। ये उन प्रदर्शनकारी युवाओं (राजनीतिक कार्यकर्ताओं की नहीं) की जीत है, जिनकी प्रधानमंत्री शेख हसीना ने ‘रजाकारों’ से तुलना कर दी थी।

शेख हसीना के ‘रजाकार’ वाले बयान के बाद प्रदर्शनों में शामिल भीड़ ने अराजकता का प्रदर्शन किया। भीड़ ने नारे लगाए, “तुई के? अमी के? रजाकार, रजाकार! के बोलेचे? के बोलेचे? सैराचार- सैराचार ।” इस बंगाली लाइन का मतलब है, “तुम कौन? मैं कौन? रजाकार, रजाकार! कौन कहता है? कौन कहता है? तानाशाह, तानाशाह!” इस नारे में प्रदर्शनकारी युवाओं की भीड़ ने शेख हसीना को ‘तानाशाह’ करार दिया और खुद को ‘रजाकार’ कहने पर तीखा व्यंग किया।

भारत में रजाकार किन्हें कहा जाता था, ये तो आप जानते ही होंगे? अगर नहीं-तो हैदराबाद के भारत में विलय के ऐतिहासिक पन्ने को खोल लें। हैदाराबाद के निजामी रियासत में हिंदुओं पर अत्याचार करने वाली मिलिशिया रजाकार कहलाती थी, जिसने हैदराबाद की रियासत को भारत में मिलाने के लिए चलाए गए ऑपरेशन पोलो के खिलाफ हथियार भी उठाए थे। ठीक उसी तरह 1971 तक पूर्वी पाकिस्तान यानी अब के बांग्लादेश में ‘रजाकार’ एक प्राइवेट मिलिशिया की तरह थी, इसके लिए पाकिस्तानी सेना बकायदा कानून यानी बिल लेकन भी आई थी। इसी तरह से 2 अन्य कट्टरपंथी मुस्लिमों के मिलिशिया अल-बद्र और अल-शम्स भी थे। ये संगठन पूर्वी पाकिस्तान पर पश्चिमी पाकिस्तान के कब्जे को बनाए रखना चाहते थे और बंग भाषियों की आजादी की लड़ाई को कुचलने में पाकिस्तानी सेना का साथ दे रहे थे।

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, बांग्लादेश यानी तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में करीब 50 हजार रजाकार थे। जो बांग्लाभाषियों को सताने में न सिर्फ पाकिस्तानी सेना की मदद करते थे, बल्कि हिंदुओं का सफाया करने में, बांग्ला भाषियों की घरों की तलाशी लेने में, महिलाओं का बलात्कार करने में, बांग्लादेश के सेनानियों की जासूसी करने में सबसे आगे रहते थे। वैसे, रजाकारों को बनाने में पाकिस्तानी सेना का हाथ था, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है स्वयंसेवक होना। वो स्वयंसेवक जो पाकिस्तानी सेना के सहयोगी थे। बांग्लादेश में आज भी रजाकार शब्द का इस्तेमाल बंग विरोधियों और पाकिस्तान समर्थकों के लिए किया जाता है।

रजाकारों ने अल-बद्र और अल-शम्स जैसे कट्टरपंथी धार्मिक मिलिशिया के साथ मिलकर उन नागरिकों, छात्रों, बुद्धिजीवियों और धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया, जिन्होंने पाकिस्तान के कब्जे का विरोध किया था। रजाकारों की मदद से पाकिस्तानी सेना ने बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के सिपाहियों और उनके परिवार पर जो जुल्म ढाया, उसकी वजह से 1970-71 में 3-30 लाख बांग्लाभाषियों की मौत हुई, करीब 4 लाख महिलाओं का पाकिस्तानी सेना और रजाकारों ने बलात्कार किया, जिसमें करीब 1.95 महिलाएँ गर्भवती भी हुई। इनके अत्याचारों की वजह से 60 लाख से अधिक बांग्ला भाषी लोग भारत में आश्रय लेने को मजबूर हुए और भारत को मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा। जिसके परिणाम स्वरूप बांग्लादेश नाम का नया देश अस्तित्व में आया।

बांग्लादेश की आजादी के लिए बांग्लादेश के आजादी के दीवानों ने जमकर खून बहाए। बाद में जब देश को आजादी मिली, तो आजादी के नायकों का खूब सम्मान हुआ। उन्हें तमाम तरह की सुविधाएँ देने की कोशिश की गई। इसी क्रम में उनके परिजनों, आश्रितों को सरकारी नौकरियों में 30 प्रतिशत का आरक्षण भी दिया गया।

शेख मुजीबुर्रहमान बांग्लादेश के राष्ट्रपति बनें। बांग्लादेश की बड़ी जनसंख्या जो पश्चिमी पाकिस्तान की समर्थक थी, उसका दमन भी हुआ। देश से कट्टरपंथी तत्वों को हटाया गया। वो भाग कर पाकिस्तान चले गए, लेकिन जमात-ए-इस्लामी जैसे पाकिस्तान परस्त कट्टरपंथी, रजाकार, अल बद्र, अल शम्स से जुड़े सारे आताताई पाकिस्तान नहीं जा पाए। वो वहीं रह गए। शेख मुजीबुर्रहमान की हत्या कर दी गई। सेकुलर सरकार का पतन कर दिया गया।

बांग्लादेश में तानाशाही आई। पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के शौहर जियाउर रहमान देश के राष्ट्रपति बन बैठे। जियाउर रहमान मुक्ति वाहिनी की कमान संभालने वालों में से थे। चूँकि वो पैदा भी हुए थे, तो पश्चिमी पाकिस्तान के एबटाबाद में ही, ऐसे में सत्ता की लालच में वो धीरे-धीरे धार्मिक कट्टरपंथ की ओर झुक गए और फिर देश विरोधी कट्टरपंथी तत्व धीरे-धीरे बांग्लादेश में समाहित हो गए। एक समय बाद देश में तानाशादी का दौर समाप्त हुआ, तो बांग्लादेश की राजनीति भी 2 धड़ों में बँट गई।

हैरानी की बात ये है कि बांग्लादेश की आजादी के 53 साल हो चुके हैं। बीच के देढ़ दशक बांग्लादेश में तानाशाही रही, फिर लोकतंत्र लौटा। लेकिन देश की अगुवाई सिर्फ 2 महिलाओं ने की। पहली- खालिदा जिया, जो जियाउर रहमान की विधवा हैं। तो दूसरी हैं मौजूदा प्रधानमंत्री शेख हसीना- शेख हसीना बांग्लादेश के निर्माता शेख मुजीबुर्रहमान की बेटी हैं। पहली की पार्टी है बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी यानी बीएमपी और दूसरे की पार्टी है आवामी लीग।

खैर, हम रजाकारों के बारे में बता रहे थे। पश्चिमी पाकिस्तान में पैदा हुए जियाउर रहमान ने जब देश की कमान संभाली, तो बांग्लादेश में रह गए ‘बिहारी, उर्दू भाषी और कट्टरपंथी तत्वों, जो पहले पश्चिम पाकिस्तान के साथ थे’ बांग्ला विरोधी खेमे के लोग जिया के साथ आ गए। आज भी वो खालिदा जिया की पार्टी बीएनपी को ही सपोर्ट करते हैं। ऐसे में शेख मुजीब के जमाने से ही बांग्लादेश में लंबे समय तक बांग्लाभाषियों की पहली पसंद की पार्टी आवामी लीग ही रही। उसी ने देश की आजादी के लिए लड़ने वालों के लिए कोटा तय किया था, जिसमें समय-समय पर बदलाव लाया गया।

साल 1998 तक ये सुविधा सिर्फ आंदोलन में हिस्सा लेने वालों को मिलती थी, बाद में ऐसे कैंडिडेट न मिलने की वजह से उनके परिजनों को ये कोटा दे दिया गया। और अब चूँकि 2006 से शेख हसीना ही प्रधानमंत्री हैं और उनकी पार्टी आवामी लीग ही बांग्लादेश की आजादी की लड़ाई की सबसे बड़ी हिस्सेदार थी, ऐसे में आरोप लगाए जाने लगे कि इस खास कोटा का इस्तेमाल शेख हसीना की पार्टी से जुड़े लोग ही करते हैं। ऐसे में इस कोटा का विरोध बढ़ने लगा। खालिदा जिया की पार्टी लंबे समय से सत्ता से बाहर है। उसे भी मुद्दा चाहिए था। लेकिन 2006 के बाद से ही सत्ता से बाहर रही बीएनपी ने अगले चुनाव में हार के बाद से चुनावों का बहिष्कार करना शुरू कर दिया। देश में सिविल अनरेस्ट की हालत पैदा कर दी गई। बीते चुनाव में भी उस पार्टी ने चुनाव का बहिष्कार किया और बीते 18 साल से पार्टी सत्ता से बाहर है।

इस बीच, बांग्लादेश की आजादी की लड़ाई लड़ने वालों के परिजनों को मिलने वाली सुविधाओं खासकर का विरोध शुरू हुआ। इस आरक्षण पर साल 2018 में रोक लगा दी गई, लेकिन हाल ही में एक कोर्ट ने इस आरक्षण को फिर से शुरू करने की राह खोल दी थी। इसके बाद पूरे बांग्लादेश में उबाल आ गया। तिस पर शेख हसीना का “रजाकार” बयान आग में घी का काम कर गया। जगह-जगह प्रदर्शन होने लगे, यूनिवर्सिटी बंद कर दी गई। सेना फ्लैग मार्च करने लगी। उपद्रव को दबाने के लिए गोलीबारी भी हुई। अब तक बांग्लादेश में इस हिंसा की वजह से 130 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं। सैकड़ों लोग घायल हैं, तो 2000 से अधिक लोग गिरफ्तार किए जा चुके हैं।

हसीना ने क्यों कहा रजाकार?

बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना लंबे समय से सत्ता में हैं। जाहिर तौर पर देश में असंतोष बढ़ रहा था। विपक्षी किसी भी तरह उन्हें सत्ता से हटाने के लिए व्याकुल हो रहे थे। उनके पास ‘जवानी’ की ताकत यानी नौजवानों के प्रदर्शन की ताकत आई। ठीक उसी तरह से, जैसे 1971 में नौजवानों ने मुक्ति बाहिनी बनाकर पाकिस्तान को भारत की मदद से घुटने टेकने पर मजबूत कर दिया था। इस बार ये ताकत विपक्ष के पास आई, जिसमें रजाकार हों या अन्य कट्टरपंथी ताकत, जो पहले से ही उसमें समाहित थे। उन्हें चोट पहुँचाने के लिए शेख हसीना ने उनका नाम लिया, तो वो तत्व नौजवानों के विरोध प्रदर्शन की आड़ में खुलकर सामने आ गए। कथित रजाकारों ने पूरे बांग्लादेश को आग के ही हवाले कर दिया है। प्रदर्शनकारियों की शक्ल में सड़कों पर मौजूद कट्टरपंथी भीड़ खुद को ‘रजाकार’ तो कह रही है, सहानुभूति पाने के लिए, लेकिन शेख हसीना को भी ‘तानाशाह’ की संज्ञा दे रही है।

खास बात ये है कि जिस शेख हसीना के पिता के नेतृत्व में आज का बांग्लादेश बना है, जिन्होंने बांग्लादेश के लिए खून बहाया, उनका खून बहाने में पाकिस्तानियों का सहयोग करने वाले रजाकारों के नाम पर आज फिर से देश को लहूलुहान किया जा रहा है। ऐसे में बांग्लादेश की फिजा में कट्टरपंथी ताकतों का प्रभाव कितना ज्यादा हो चुका है, इस बात को आसानी से समझा जा सकता है। क्योंकि जिन रजाकारों ने बांग्ला महिलाओं का दामन रौंदा, जिन्होंने बांग्लादेश की लड़ाई में बंगालियों से घात किया, उन्हें ‘क्रांति’ का प्रतीक बनाना कहीं से भी सही नहीं लगता। ऐसे में इन रजाकारों की आड़ में विदेशी ताकतें और कट्टरपंथी तत्व बांग्लादेश में किस तरह का हस्तक्षेप कर रहे हैं, इसे समझने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए।

वैसे, अब जबकि बांग्लादेश का सुप्रीम कोर्ट आरक्षण को महज 7 प्रतिशत पर समेट चुका है, तो देर-सबेर देश में फैली हिंसा पर भी रोक लग जाएगी, क्योंकि पढ़ाई लिखाई और नौकरी वाले युवा अपने लक्ष्य में जुट जाएँगे और बाकी उपद्रवी ‘रजाकार’ तत्व सरकार की जड़ में खोदने में जुट जाएँगे। ऐसे में शेख हसीना जरूर चाहेंगी उन ताकतों का पता लगाना, जिन्होंने आरक्षण की आड़ में देश को जलाने का काम किया।

सपा नेता चौधरी अब्दुल नईम के अवैध मैरिज हॉल पर चला ‘बाबा का बुलडोजर’: कब्जा ली थी तालाब की ढाई करोड़ रुपए की जमीन, अखिलेश यादव के विधानसभा क्षेत्र का मामला

सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के गृह क्षेत्र मैनपुरी में ‘बाबा का बुलडोजर’ गरजा है। करहल नगर पंचायत के अध्यक्ष चौधरी अब्दुल नईम के मैरिज हॉल को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आदेश के बाद ध्वस्त कर दिया गया। इस मैरिज हॉल को सरकारी तालाब को कब्ज़ा कर बनाया गया था। बता दें कि 2022 में अखिलेश यादव करहल विधानसभा से ही विधायक बने थे, लेकिन कन्नौज से सांसद सांसद चुने जाने के बाद उन्होंने ये सीट छोड़ दी है, यहाँ अब उपचुनाव होगा।

ध्वस्त किए गए ‘आयजा मैरिज हॉल’ का निर्माण चौधरी अब्दुल नईम ने अपनी बीवी फरजाना बेगम के नाम पर करवाया था। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए ध्वस्तीकरण की कार्रवाई के दौरान PAC की 4 कंपनियाँ और साथ-साथ पूरे जिले की पुलिस फ़ोर्स को लगाया गया था। कई पुलिस इंस्पेक्टर, थाना प्रभारी और SDM इस दौरान मौजूद रहे। रविवार (21 जुलाई, 2024) को सुबह 10 बजे कार्रवाई शुरू की गई। तालाब की जमीन को घेर कर निर्माण कार्य कराया गया था।

इस मामले में संजीव यादव ने शिकायती पत्र सौंपा था, जो नगर पंचायत अध्यक्ष रहे हैं। इसमें आरोप लगाया गया है कि नोटरी स्टाम्प पर चौधरी अब्दुल नईम ने कई लोगों को प्लॉट बेचा है। उन्होंने खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से इसकी शिकायत की थी। इसके बाद मुख्यमंत्री कार्यालय की तरफ से जिलाधिकारी को इस मामले की जाँच कर कार्रवाई का निर्देश दिया गया था। पुलिस ने कार्रवाई से पहले मैरिज हॉल की तरफ जाने वाले रास्तों पर पहरा बिठा दिया था।

इस मैरिज हॉल से 300 मीटर की दूरी तक किसी को प्रवेश नहीं दिया जा रहा था। आसपास की छतों पर भी किसी को तमाशबीन बनने की अनुमति नहीं थी। मैरिज होम का मेन गेट, 8 फ़ीट ऊँची बाउंड्री और बाथरूम को ध्वस्त किया गया। इसके बाद ऊपरी कमरों को तोड़ा गया। सामान पहले ही निकलवा दिया गया था। इस मामले में दिसंबर 2022 में ही शिकायत दर्ज कराई गई थी। एक सप्ताह पहले तहसीलदार की तरफ से नोटिस जारी किया गया। 0.283 हेक्टेयर जमीन घेर कर कब्जाया गया था, जो ढाई करोड़ रुपए की है। न्यायालय में सपा नेता अब्दुल नईम की अपील ख़ारिज हो गई थी।

काँवड़ यात्रा मार्ग के दुकानों पर नेम प्लेट लगाने के निर्देश को चुनौती, NGO ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की याचिका: जमीयत का मदनी बोला- यह मौलिक अधिकारों का हनन​

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा काँवड़ यात्रा मार्ग में पड़ने वाले होटल-ढाबों और ठेलों पर नेम प्लेट लगाने की अनिवार्यता वाले निर्देश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स (APCR) नाम की एनजीओ ने यूपी सरकार के आदेश के खिलाफ याचिका दी है। सुप्रीम कोर्ट ने याचिका स्वीकार कर ली है और सोमवार (22 जुलाई) को इस पर सुनवाई करेगा।

सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका शनिवार (20 जुलाई) को सुबह 6:00 बजे ऑनलाइन दाखिल की गई। इसके बाद 20 जुलाई को ही सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री ने मामले को सुनवाई के लिए लिस्ट कर लिया। इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस ऋषिकेश रॉय और जस्टिस एसवीएन भट्टी की बेंच सोमवार 22 जुलाई को सुनवाई करेगी। 

सबसे पहले यह आदेश उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर पुलिस ने सिर्फ जिले के काँवड़ यात्रा मार्गों पर पड़ने वाली दुकानों, भोजनालयों और ठेलों के लिए जारी किया था। बाद मे विरोध होने लगा तो राज्य सरकार ने इसे पूरे प्रदेश में लागू कर दिया। 22 जुलाई से शुरू हो रही काँवड़ यात्रा से पहले वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर के दुकानदारों को भी नेमप्लेट लगाने के लिए कहा गया है।

उत्तराखंड के हरिद्वार और मध्य प्रदेश के उज्जैन में भी यह नियम लागू कर दिया गया है। इतना ही नहीं, बिहार के बोधगया स्थित महाबोधि मंदिर परिसर में स्थित दुकानदारों ने स्वेच्छा से अपनी दुकानों के आगे नाम प्लेट लगा लिया है। उनका कहना है कि इससे उन्हें किसी तरह की परेशानी नहीं है। कई दुकानदारों का कहना है कि वे ऐसा पिछले 20 वर्षों से करते आ रहे हैं।

बता दें कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार के इस निर्देश का विपक्ष दल विरोध कर रहे हैं। वे यूपी सरकार के इस आदेश को सांप्रदायिक बता रहे है और भाजपा पर विभाजनकारी राजनीति करने का आरोप लगा रहे हैं। वहीं, भाजपा का कहना है कि हिंदुओं को भी अपनी आस्था की शुद्धता बनाए रखने का वैसे ही पूरा हक है, जैसे अन्य धर्मों के लोगों को है।

समाजवादी पार्टी से लेकर AIMIM के असदुद्दीन ओवैसी तक इसका विरोध कर रहे हैं। मुस्लिम संगठन जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने भी इसे ‘भेदभावपूर्ण और साम्प्रदायिक’ बताया है। वहीं, भाजपा के नेता इस बिहार सहित अन्य राज्यों में लागू करने की माँग कर रहे हैं। इंदौर से भाजपा विधायक रमेश मेंदोला ने एमपी के सीएम को पत्र लिखकर इसे पूरे राज्य में लागू करने की माँग की है।

उधर, जमीयत उलेमा-ए-हिंद के प्रमुख मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि इस निर्देश से संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों का हनन होता है। अरशद मदनी ने आगे कहा, “देश के सभी नागरिकों को संविधान में इस बात की पूरी आजादी दी गई है कि वे जो चाहें पहनें, जो चाहें खाएँ। उनकी व्यक्तिगत पसंद में कोई बाधा नहीं डालेगा, क्योंकि यह नागरिकों के मौलिक अधिकार के विषय हैं।”

बांग्लादेश में आरक्षण खत्म: सुप्रीम कोर्ट ने कोटा व्यवस्था को रद्द किया, दंगों की आग में जल रहा है मुल्क

इस्लामी मुल्क बांग्लादेश में सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण के अधिकतर बड़े प्रावधानों को निरस्त कर दिया है। बता दें कि आरक्षण के खिलाफ पड़ोसी देश कई दिनों से भारी हिंसा में जल रहा था। अब तक 100 लोग मारे जा चुके हैं। अब सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी नौकरियों में कोटा के अधिकतर प्रावधानों को हटा दिया है। निचली अदालत ने आरक्षण को फिर से बहाल कर दिया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उस आदेश को पलट दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट का फैसला अवैधानिक था।

हालाँकि, बांग्लादेश की आज़ादी के लिए जिन परिवारों ने लड़ाई लड़ी, उनके लिए सिविल सर्विस की नौकरियों में 5% सीटें आरक्षित रहेंगी। वहीं अन्य नौकरियों में उन्हें 2% कोटा दिया जाएगा। इससे पहले बांग्लादेश की आज़ादी का युद्ध लड़ने वालों के बच्चों के लिए सरकारी नौकरियों में 30% आरक्षण का प्रावधान था। प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार ने 2018 में ही आरक्षण के इस नियम को खत्म कर दिया था। लेकिन, पिछले महीने हाईकोर्ट ने इसे फिर से लागू कर दिया था।

इसके बाद से ही दंगे शुरू हो गए थे और सरकार को कड़ा बल-प्रयोग करना पड़ा। विरोध प्रदर्शन में अधिकतर छात्र ही शामिल थे। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि कोटा व्यवस्था से शेख हसीना के समर्थकों को फायदा था, क्योंकि उनकी पार्टी ‘आवामी लीग’ बांग्लादेश की आज़ादी की लड़ाई का नेतृत्व कर रही थी। प्रदर्शनकारियों ने इसकी जगह मेरिट आधारित व्यवस्था की माँग की थी। शेख हसीना ने भी आरक्षण का बचाव करते हुए कहा था कि पाकिस्तान से लड़ चुके स्वतंत्रता सेनानियों को सम्मान देना चाहिए, भले ही वो किसी भी राजनीतिक पार्टी के हों।

पुलिस ने दंगों को शांत करने के लिए आँसू के गोले, रबर बुलेट्स और स्मोक ग्रेनेड्स तक का सहारा लिया था। नरसिंगडी में तो प्रदर्शनकारी लोहे के रॉड हाथों में लेकर सेन्ट्रल डिस्ट्रिक्ट जेल पहुँच गए और 800 कैदियों को रिहा कर दिया। साथ ही जेल को आग के हवाले कर दिया गया। शेख हसीना को बांग्लादेश में लगातार चौथी बार चुना गया है। पूरे देश में कर्फ्यू लागू कर दिया गया था। फ़ोन और इंटरनेट कनेक्शन काट दिए गए थे। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद प्रदर्शनकारियों का रुख क्या होगा, ये देखना पड़ेगा।

वहीं सुप्रीम कोर्ट के बाहर भी एक सैन्य टैंक को खड़ा देखा गया था। पूरे ढाका में सेना को तैनात कर दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट के आसपास के इलाके में लोगों का घर से निकलना भी मना है।

‘कमाल का है PM मोदी का एनर्जी लेवल, अनुच्छेद-370 हटाने के लिए चाहिए था दम’: बोले ‘दृष्टि’ वाले विकास दिव्यकीर्ति – आर्य समाज और RSS से जुड़ा रहा है परिवार

UPSC की तैयारी कराने वाली जानी-मानी कोचिंग संस्था ‘दृष्टि’ के संस्थापक विकास दिव्यकीर्ति ने बताया है कि उनका परिवार आर्य समाजी था, साथ ही RSS से भी ठीक-ठाक जुड़ाव था। विकास दिव्यकीर्ति ने कहा कि पंजाब, हरियाणा और पश्चिम उत्तर प्रदेश में आर्य समाज के नियम-कायदे वही हैं, जो पश्चिम बंगाल में ब्रह्मो समाज का था। उन्होंने कहा कि ये संगठन अंग्रेजी संस्कृति से लड़ रहे हैं, उसके हिसाब से ये हिन्दू धर्म को पुनः परिभाषित कर रहे थे – जैसे जाति व्यवस्था और महिला विरोधी परंपरओं को ख़ारिज किया जाए।

ANI पर स्मिता प्रकाश के साथ पॉडकास्ट में विकास दिव्यकीर्ति ने बताया कि स्वामी दयानन्द सरस्वती गुजरात से आए थे, उनका मूल नाम मूलशंकर तिवारी था लेकिन उनका प्रभाव यहाँ ज़्यादा पड़ा। उन्होंने बताया कि इस बेल्ट में हिन्दू-मुस्लिम की टकराहट थी, इस कारण आर्य समाज और मुस्लिम समाज के बीच संघर्ष शुरू हुआ। आर्य समाज के शुद्धि आंदोलन (घर-वापसी) का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि स्वामी श्रद्धानन्द ने ये आंदोलन चलाया था, इसीलिए इतिहास देखें तो आर्य समाज में एक मुस्लिम विरोधी रुख और मुस्लिम समाज में आर्य समाज विरोधी रुख नज़र आता है।

विकास दिव्यकीर्ति ने कहा कि RSS 1925 में बना लेकिन आर्य समाज 1875 से चल रहा था। उन्होंने कहा कि संघ में अधिकतर महाराष्ट्र का ही नेतृत्व रहा, लेकिन उसे राष्ट्रीय आधार मिला। उन्होंने समझाया कि इस कारण ये संगठन आपस में जुड़ने लगे, इस कार्य आर्य समाजी सामाजिक रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और राजनीतिक रूप से भाजपा से सम्बद्ध रखता है। उन्होंने बताया कि उनके परिवार में और स्कूल में राम मंदिर के पक्ष में विचार था, वो भी यही विचार रखते थे।

विकास दिव्यकीर्ति ने बताया कि कई मुस्लिम दोस्त उनसे झगड़ा करते थे, क्योंकि उन्हें RSS के पक्ष से बहस करने वाला माना जाता था। उन्होंने बताया कि अगर वो UPSC की तरफ नहीं आते तो वो नेता होते। लोकसभा चुनाव 2024 के संबंध में उन्होंने कहा कि ग्रहणबोध के हिसाब से माहौल बनता है और उत्तर प्रदेश में ‘संविधान बदल देने’ और ‘आरक्षण खत्म करने’ वाले विपक्ष के प्रचार पर लोगों ने भरोसा किया। बकौल विकास दिव्यकीर्ति, लोगों ने ये नहीं समझा कि संविधान बदलने के लिए 400 सीटों की ज़रूरत ही नहीं है, 355 ही चाहिए।

अयोध्या में भाजपा की हार पर उन्होंने कहा कि OBC, दलित और मुस्लिम वहाँ 60% हैं जिनका वोट सपा के दलित उम्मीदवार को मिले। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबंध में विकास दिव्यकीर्ति ने कहा कि उनका एनर्जी लेवल कमाल का है, 75 की उम्र में, हमलोग 50 की उम्र में इतनी एनर्जी में नहीं रहते हैं। विकास दिव्यकीर्ति ने कहा कि तकनीक को लेकर जो खुलापन है, जो इस उम्र में दुर्लभ है, वो युवाओं से बेहतर तकनीक की समझ रखते हैं। उन्होंने ये भी कहा कि वैश्विक नेताओं के साथ पीएम मोदी के अच्छे संबंध हैं। उन्होंने ये भी कहा कि इंफ्रास्ट्रक्चर में काम हुआ है, अनुच्छेद-370 हटाने जैसे फैसले के लिए बहुत दम चाहिए, ये हर पीएम नहीं कर सकता।

हर दिन 14 घंटे करो काम, कॉन्ग्रेस सरकार ला रही बिल: कर्नाटक में भड़का कर्मचारियों का संघ, पहले थोपा था 75% आरक्षण

कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु को भारत की सिलिकन वैली के रूप में जाना जाता रहा है। लेकिन, जब से वहाँ कॉन्ग्रेस पार्टी सत्ता में लौटी है तभी से वहाँ के IT सेक्टर को झटके पर झटके दिए जा रहे हैं। अब कर्नाटक सरकार नया कानून लेकर आ रही है, जिसके तहत IT कर्मचारियों को प्रतिदिन 14 घंटे काम करना होगा। यानी, मुख्यमंत्री सिद्दारमैया की सरकार इसे कानून का रूप देती है तो इंजीनियरों को दफ्तर में अधिक समय गुजारना पड़ेगा, इससे उनका वर्क-लाइफ बैलेंस बिगड़ेगा।

अभी ज़्यादा दिन नहीं हुए जब कर्नाटक सरकार एक ऐसा बिल लेकर आई थी, जो अगर कानून बन जाता तो मैनेजमेंट की नौकरियों में राज्य के नागरिकों को 50% और नॉन-मैनेजमेंट की नौकरियों में 75% आरक्षण मिलता। इसके बाद IT कंपनियों के संघ NASSCOM ने कहा था कि किसी भी महानगर को आईटी हब बनने के लिए अलग-अलग क्षेत्र की प्रतिभाओं को आकर्षित करना पड़ेगा। इसके बाद आंध्र प्रदेश के मंत्री नारा लोकेशन ने इन कंपनियों को हैदराबाद और विशाखापत्तनम आने का न्योता तक दे दिया था।

जहाँ पहले वाले फैसले से कंपनियों को दिक्कत होती, नए फैसले से कर्मचारियों का जीवन तबाह होगा। कर्नाटक के ‘IT/ITeS Employees Union (KITU)’ ने कॉन्ग्रेस सरकार पर निशाना साधा है। KITU ने कहा कि लेबर डिपार्टमेंट ने इंडस्ट्री के विभिन्न हितधारकों की एक बैठक में प्रस्ताव दिया कि कर्नाटक शॉप्स एन्ड कमर्शियल इस्टैब्लिशमेंट एक्ट में संशोधन किया जाए। इसके लिए विधानसभा में बिल लाने की भी तैयारी है। हालाँकि, कर्नाटक सरकार ने फ़िलहाल इस पर चुप्पी साध रखी है।

मौजूदा नियमों की बात करें तो ओवरटाइम मिला कर एक दिन में किसी कर्मचारी से अधिकतम 10 घंटे काम लिया जा सकता है। यूनियन का कहना है कि नए आदेश के बाद वर्क ऑवर्स अनिश्चित समय के लिए भी बढ़ाया जा सकता है। KITU ने इसे इस काल में वर्किंग क्लास पर सबसे बड़ा हमला करार दिया। संघ ने कहा कि इसके बाद कंपनियाँ 3-शिफ्ट व्यवस्था की जगह 2-शिफ्टव्यवस्था पर व्यवस्था पर आ जाएगी और बड़ी संख्या में कर्मचारियों को नौकरी से बाहर फेंक दिया जाएगा।

उक्त बैठक में लेबर डिपार्टमेंट के मंत्री संतोष S लाड के अलावा IT व बायोटेक्नोलॉजी विभाग के कई अधिकारी भी मौजूद थे। KITU ने कहा कि ये फैसला लागू होता है तो IT सेक्टर में काम करने वालों के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ेगा। आँकड़े कहते हैं कि पहले से ही 45% IT कर्मचारी मानसिक समस्याओं से जूझ रहे हैं, 55% शारीरिक रूप से दुष्प्रभाव का सामना कर रहे हैं। WHO-ILO का अध्ययन कहता है कि वर्क ऑवर्स बढ़ाने से स्ट्रोक से मौत का खतरा 35% और दिमाग-हृदय रोगों से मौत का खतरा 17% बढ़ जाएगा।

यूनियन ने कहा कि ये बिल ऐसे समय में लाया जा रहा है जब दुनिया मान रही है कि वर्क ऑवर्स बढ़ाने से उत्पादन क्षमता पर गलत असर पड़ता है। कई देशों में ‘राइट टू डिस्कनेक्ट’ का कानून लाया जा रहा है, जिसके तहत नॉन-वर्क ऑवर्स में कर्मचारी खुद को काम से एकदम दूर रख सकेंगे और ईमेल वगैरह की रिप्लाई देने की भी बाध्यता नहीं होगी। पिछले साल इनफ़ोसिस के अध्यक्ष NR नारायणमूर्ति ने 70 घंटे प्रति सप्ताह काम करने की सलाह देकर विवाद पैदा कर दिया था।

आजादी के वक्त थे 3 मुस्लिम बहुल जिले, अब 9 हैं: बंगाल BJP प्रमुख ने कहा- असम और बंगाल में डेमोग्राफी बदलाव सोची-समझी रणनीति, सीएम हिमंता के बयान का किया समर्थन

बंगाल भाजपा के अध्यक्ष एवं केंद्रीय मंत्री सुकांत मजूमदार ने असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के उस बयान का समर्थन किया है, जिसमें उन्होंने असम में डोमोग्राफी बदलाव की बात कही थी। मजूमदार ने कहा कि असम में बायोलॉजिकल तरीके से डेमोग्राफी बदलाव नहीं हुआ है। यह बदलाव घुसपैठ का नतीजा है। उन्होंने बंगाल को भी इस समस्या से पीड़ित बताया।

सुकांत मजूमदार ने कहा कि बंगाल में भी इसी तरह अवैध घुसपैठ कराकर डेमोग्राफी को बदला गया है। ऐसा सिर्फ असम और बंगाल में ही नहीं, बल्कि पूरे पूर्वी भारत हुआ है, खासकर सीमा से सटे राज्यों में स्वतंत्रता के 70 से 75 सालों में बड़ा डेमोग्राफिक परिवर्तन देखने को मिला है। उन्होंने कहा कि ये सबके लिए चिंता का विषय है, क्योंकि बायोलॉजिकल तरीके से ये आबादी नहीं बढ़ी है।

मजूमदार ने आगे कहा कि अगर बायोलॉजिकल तरीके से आबादी बढ़ती तो बच्चे पैदा होते, बड़े होते और देश के नागरिक बनते। इस तरह से अगर डेमोग्राफी में परिवर्तन हुआ होता तो चिंता की बात नहीं रहती। लेकिन, बाहर से लाकर बसाए गए लोग चिंता के विषय हैं। उन्होंने कहा कि योजनाबद्ध तरीके से डेमोग्राफी चेंज हुई है। इसकी योजना देश के बाहर कहीं से हो रही है।

सुकांत मजूमदार ने कहा कि पश्चिम बंगाल में आजादी के पहले और आजादी के बाद भी तीन जिले मुस्लिम बहुल थे। अब नौ जिले मुस्लिम बहुल हो गए हैं। उन्होंने कहा, “ये कहाँ से हो रहा है? कैसे हो रहा है? इतनी जनसंख्या कैसे बढ़ रही है? प्राकृतिक तरीके से इस तरह से जनसंख्या नहीं बढ़ सकती है।”

उन्होंने कहा, “आप डेटा देख लिजिए, डेटा तो साइंस है, आपको उसको अपनाना पड़ेगा, मतलब डेमोग्राफी चेंज हुई है और पूरी योजनाबद्ध तरीके से हुई है। और इसका प्लानिंग यदि देश के बाहर से कहीं से हो रहा है और भविष्य में यदि ऐसा कुछ निकल… तो मैं आश्चर्य नहीं करूँगा।”

दरअसल, असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने राँची में एक सभी को संबोधित करते हुए कहा असम में डेमोग्राफी बदलाव पर चिंता जाहिर की। उन्होंने कहा कि यह विषय उनके लिए राजनीतिक नहीं, बल्कि जीवन और मरण का विषय है। सीएम सरमा ने कहा कि अगर ऐसा ही रहा तो असम साल 2041 तक मुस्लिम राज्य बन जाएगा। 

राँची में हिमंता ने कहा, “असम की आबादी का हमने विश्लेषण किया तो पाया कि साल 1951 के राज्य में मुस्लिम आबादी 12 प्रतिशत थी, जो आज बढ़कर 40 फीसदी पर पहुँच गई है। बता दें कि हिमंता बिस्वा सरमा झारखंड विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा के सह-प्रभारी हैं। इसी के मद्देनजर वो राँची में एक आम सभा को संबोधित कर रहे थे।

हिमंता सरमा के इस बयान पर कई मुस्लिम नेताओं ने प्रतिक्रिया दी। हैदराबाद से लोकसभा सांसद और AIMIM के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी समेत कई मुस्लिम नेताओं ने सरमा पर जुबानी हमला बोल दिया। ओवैसी ने कहा कि हिमंता सरमा मुस्लिमों की आबादी को लेकर गलत आँकड़ा दे रहे हैं।

बता दें कि आजादी के बाद से असम और बंगाल की जनसंख्या संतुलन में भारी बदलाव हुआ है। इन दोनों राज्यों में मुस्लिमों की जनसंख्या अचानक बढ़ गई है। यह बदलाव खास तौर पर 1961 से 1991 के बीच हुई। साल 1961 से 2011 के बीच में असमिया लोगों की जनसंख्या में बायोलॉजिकल तरीके से गिरावट दर्ज की गई जबकि राज्य की जनसंख्या लगातार बढ़ रही थी।

शुक्र है मीलॉर्ड ने भी माना कि वो इंसान हैं! चाइल्ड पोर्नोग्राफी देखने को कर्नाटक हाई कोर्ट ने नहीं माना था अपराध, अब बदला फैसला

कर्नाटक हाईकोर्ट ने ऑनलाइन चाइल्ड पोर्नोग्राफी देखने देखने को लेकर दिए अपने आदेश को वापस ले लिया है। जस्टिस एम. नागप्रसन्ना की पीठ ने कहा कि जज भी मानव हैं, उनसे भी गलतियाँ हो सकती हैं। दरअसल, हाई कोर्ट ने 10 जुलाई को दिए अपने आदेश में कहा था कि ऑनलाइन चाइल्ड पोर्नोग्राफी देखना सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 67B के तहत अपराध नहीं हो सकता है।

न्यायमूर्ति एम नागप्रसन्ना की एकल पीठ ने शुक्रवार (19 जुलाई 2024) को निर्णय वापस लेते हुए कहा, “हम भी इंसान हैं और हमसे भी गलतियाँ होती रहती हैं। सुधार का मौका हमेशा मिलता है। इस संबंध में जाँच की जाएगी और नया ऑर्डर दिया जाएगा। यह ऑर्डर रद्द किया जाता है।” उन्होंने आगे कहा, “इस न्यायालय ने धारा 67B (B) पर ध्यान दिए बिना आदेश पारित कर दिया, यह एक त्रुटि है।”

जस्टिस नागप्रसन्ना ने एन. इनायतुल्ला के खिलाफ आरोपों को खारिज कर दिया था। जस्टिस नागप्रसन्ना ने कहा था कि केवल ऑनलाइन अश्लील सामग्री को देखने भर से कोई आरोपित नहीं हो जाता है। उन्होंने कहा था कि सूचना प्रौद्योगिकी की धारा 67B के तहत मुकदमा चलाने के लिए सामग्री को प्रकाशित या प्रसारित करना जरूरी होता है। अदालत के इस फैसले की काफी आलोचना हुई थी।

राज्य सरकार ने अदालत में एक रिकॉल आवेदन दायर किया। इसके बाद अदालत ने पाया कि उसके फैसले में सूचना प्रौद्योगिकी की धारा 67B के उपबंध (B) पर ध्यान ही नहीं दिया गया था। इस उपबंध में कहा गया है कि बच्चों को अश्लील या यौन रूप से चित्रित करने वाली सामग्री का निर्माण, संग्रह, खोज, ब्राउज, डाउनलोड, विज्ञापन, प्रचार, आदान-प्रदान या वितरण करना धारा 67B के दायरे में आता है।

कर्नाटक हाई कोर्ट ने कहा कि धारा 67B(B) इस मामले के लिए प्रासंगिक है। इसके साथ ही यह भी कहा कि प्रारंभिक निर्णय में इस प्रावधान पर विचार नहीं करके गलती की गई थी। इसके कारण कार्यवाही को निरस्त किया गया है। इसके बाद हाई कोर्ट के न्यायाधीश एम प्रसन्ना ने अपने पुराने आदेश को रद्द कर दिया।

क्या है मामला?

दरअसल, एम इनायतुल्ला ने 23 मार्च 2023 को दोपहर 3.30 से 4.40 बजे के बीच अपने मोबाइल फोन पर बच्चों की अश्लील तस्वीरें देखी थीं। इस संबंध में महिलाओं और बच्चों के खिलाफ यौन हिंसा को रोकने के लिए केंद्र सरकार द्वारा शुरू किए गए पोर्टल के जरिए राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) ने जानकारी प्राप्त की। इसके बाद बेंगलुरु के साइबर क्राइम स्टेशन को एक रिपोर्ट भेजी।

इस रिपोर्ट की पुष्टि होने के बाद जाँच में बच्चों के अश्लील वीडियो देखने वाले व्यक्ति का नाम इनायतुल्ला पाया गया। इनयातुल्ला के खिलाफ सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 67B (B) के तहत 3 मई 2023 को बेंगलुरु साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज की गई। इसके बाद आरोपित ने शिकायत रद्द करने की माँग करते हुए हाईकोर्ट का रुख किया था।

चाइल्ड पोर्नोग्राफी पर सुप्रीम कोर्ट भी कर चुका है टिप्पणी

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट में भी एक ऐसा ही मामला आया था। इस पर सुनवाई करते हुए इस साल अप्रैल में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि बच्चों द्वारा अश्लील वेबसाइट देखना अपराध नहीं है, लेकिन इस प्रकार की सामग्री में बच्चों का इस्तेमाल किया जाना अपराध है। दरअसल, यह मामला मद्रास हाई कोर्ट के एक फैसले को चुनौती देने से संबंधित थी।

दरअसल, मद्रास हाई कोर्ट के न्यायाधीश N आनंद वेंकटेश ने 11 जनवरी 2024 को एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा था कि चाइल्ड पॉर्न डाउनलोड करना और इसे प्राइवेट में देखना पॉक्सो एक्ट (यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम) और IT (सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम) के तहत अपराध नहीं है। पॉर्नोग्राफी के लिए बच्चे का इस्तेमाल किया जाता है, तभी पॉक्सो के तहत मामला बनेगा।

मद्रास हाई कोर्ट जाति-वर्ण पर अपने फैसले में कर चुका है संशोधन

इससे पहले मद्रास हाई कोर्ट ने इस साल अपने और निर्णय में संशोधन किया था। यह निर्णय जाति प्रथा और वर्ण आश्रम से संबंधित था। मद्रास हाई कोर्ट की न्यायमूर्ति अनीता सुमंत ने कहा था कि जाति व्यवस्था में समस्या है लेकिन यह व्यवस्था एक सदी से भी कम पुरानी है और इसका दोष पुरातन वर्ण व्यवस्था पर नहीं मढ़ा जा सकता।

इसको लेकर सवाल उठने लगे तो मद्रास हाई कोर्ट ने इस फैसले में संशोधन किया। अपने नए फैसले में हाई कोर्ट ने लिखा गया है, “जातियों का वर्गीकरण, जैसा कि हमें आज दिखता है, काफी नई और हालिया सोच है।” यह आदेश हिंदू मुन्नानी संस्था द्वारा उदयानिधि स्टालिन, तमिलनाडु के राज्यमंत्री पीके शेखरबाबू सांसद ए राजा के खिलाफ दायर एक याचिका की सुनवाई के दौरान दिया गया था।

इस याचिका में विवादित बयानों के बावजूद उनके पद पर बने रहने पर प्रश्न उठाए गए थे। गौरलतब है कि 2 सितंबर 2023 को चेन्नई में एक कार्यक्रम में उदयानिधि स्टालिन ने कहा था कि कुछ चीजों का न केवल विरोध होना चाहिए बल्कि उन्हें समाप्त कर दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा था, “जिस तरह डेंगू, मच्छर, मलेरिया और कोरोनो वायरस को खत्म किया जाना चाहिए, उसी तरह हमें सनातन धर्म को भी खत्म करना होगा।” 

आरक्षण के खिलाफ बांग्लादेश में धधकी आग में 115 की मौत, प्रदर्शनकारियों को देखते ही गोली मारने के आदेश: वहाँ फँसे भारतीयों को वापस ला रही है मोदी सरकार

आरक्षण के खिलाफ सड़कों पर उतरे छात्रों की हिंसा के कारण बांग्लादेश के हालात बिगड़ते जा रहे हैं। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए सेना को उतारा गया है। इसके साथ ही उपद्रवियों को देखते ही गोली मारने के भी आदेश जारी किए गए हैं। वहाँ हिंसा में अब तक 115 लोगों की जान जा चुकी है और 1500 से अधिक लोग घायल हैं।

बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार ने रविवार (21 जुलाई) और सोमवार (22 जुलाई) को सार्वजनिक अवकाश घोषित किया है। सिर्फ आपातकालीन सेवाओं को ही चालू रखने की अनुमति दी गई है। वहीं, पूरे देश में कर्फ्यू लगा दिया गया है। इंटरनेट सेवा और रेल सेवा को बंद कर सेना पर तैनात किया गया है। राजधानी ढाका की सड़कों पर सैनिक और पुलिस गश्त कर रहे हैं।

वहाँ के कई टेलीविजन समाचार चैनलों ने न्यूज का प्रसारण बंद कर दिया है। वहीं, ज़्यादातर स्थानीय अख़बारों की वेबसाइटें बंद हो गई हैं। इस बीच, बांग्लादेश के केंद्रीय बैंक और प्रधानमंत्री कार्यालय सहित कुछ प्रमुख सरकारी वेबसाइटों को हैक कर लिया। इसके साथ ही 19 जुलाई को ढाका के नरसिंगडी जेल पर हमला करके उसमें बंद 800 कैदियों को भगा दिया गया और जेल को आग लगा दी गई।

हालात का समाधान निकालने के लिए शुक्रवार (19 जुलाई) की देर रात दोनों पक्षों के प्रतिनिधियों ने बैठक की। इस दौरान कम-से-कम तीन छात्र नेता मौजूद थे। उन्होंने सरकार के प्रतिनिधि कानून मंत्री अनीसुल हक से मौजूदा कोटा प्रणाली में सुधार, झड़पों के बाद पुलिस द्वारा बंद किए गए छात्र छात्रावासों को फिर से खोलने और कुछ विश्वविद्यालय को अधिकारियों को पद से हटाने की माँग की।

बांग्लादेश की हालात को देखते हुए भारत सरकार ने वहाँ फँसे अपने नागरिकों को सुरक्षित वापसी का रास्ता तैयार कर लिया है। विदेश मंत्रालय के अनुसार, शनिवार (20 जुलाई) तक 978 भारतीय स्वदेश लौट आए हैं। इनमें से 778 लोग भूमि सीमा के माध्यम से और 200 से अधिक विमान के माध्यम से वापस लौटे। भारत ने बांग्लादेश की हालत को ‘आंतरिक मामला’ बताते हुए टिप्पणी से परहेज किया है।

पीएम हसीना ने 14 जुलाई को कहा, “अगर स्वतंत्रता सेनानियों के पोते-पोतियों को कोटा का लाभ नहीं मिलता तो क्या रजाकारों के पोते-पोतियों को इसका लाभ मिलना चाहिए?” हसीना ने कोटा प्रणाली का बचाव करते हुए कहा है कि पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध में अपने योगदान के लिए दिग्गजों को सर्वोच्च सम्मान मिलना चाहिए, चाहे उनकी राजनीतिक संबद्धता कुछ भी हो।

इस बयान के बाद बांग्लादेश के छात्र कोटा प्रणाली को समाप्त करने की माँग करते हुए सड़कों पर उतर आए। दरअसल, 1971 में पाकिस्तान के खिलाफ़ आजादी की लड़ाई लड़ने वाले सेनानियों के परिजनों को 30% आरक्षण दिया जाता है। प्रदर्शनकारियों को बांग्लादेश की विपक्षी और कट्टर इस्लामी खालीदा जिया का समर्थन हासिल है।

हिंसा का कारण

दरअसल, बांग्लादेश में सरकारी नौकरियों में कुछ समूहों के लिए 2018 तक 56% आरक्षण का प्रावधान था। इन्हें बांग्लादेश में बेहद आकर्षक माना जाता है। इन समूहों में विकलांग व्यक्ति (1%), स्वदेशी समुदाय (5%), महिलाएँ (10%), अविकसित जिलों के लोग (10%) और 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के स्वतंत्रता सेनानियों के परिवार (30%) शामिल हैं।

इससे योग्यता के आधार पर चयन के लिए केवल 44% सीटें बचीं। साल 2018 में छात्र समूहों द्वारा बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए, जिसके कारण हसीना सरकार ने कोटा पूरी तरह से खत्म कर दिया। फिर जून 2024 में हाई कोर्ट फिर बांग्लादेश के सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के फैसले को पलट दिया और स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों के लिए 30% आरक्षण को खत्म करने को अवैध ठहराया।

काशी विश्वनाथ मंदिर और महाकालेश्वर मंदिर परिसर के दुकानदारों को लगाना होगा नेम प्लेट: बिहार के बोधगया की दुकानों में खुद ही लगाया बोर्ड, बोले- व्यवसाय पर कोई फर्क नहीं

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में काँवड़ मार्ग में पड़ने वाले दुकानों पर नेम प्लेट लगाने के योगी सरकार के निर्देश के बाद भले विपक्षी दल इस पर विवाद कर रहे हों, लेकिन यह नियम धीरे-धीरे पूरे उत्तर भारत में लागू हो रहा है। यूपी की तर्ज पर उत्तराखंड सरकार के बाद यह मध्य प्रदेश के उज्जैन, बिहार के गया आदि जगहों पर नेम प्लेट लगने लगे हैं। इसे पूरे मध्य प्रदेश में लागू करने की माँग उठ रही है।

उज्जैन में नेम प्लेट का आदेश

उज्जैन नगर निगम ने शनिवार (20 जुलाई 2024) को दुकान मालिकों को अपनी दुकानों के बाहर अपना नाम और मोबाइल नंबर की प्लेट लगाने का निर्देश दिया। उज्जैन के मेयर मुकेश ततवाल ने कहा कि इस आदेश का पहली बार उल्लंघन करने पर 2,000 रुपए और दूसरी बार 5,000 रुपए का जुर्माना देना होगा। उन्होंने कहा कि इस आदेश का उद्देश्य सुरक्षा और पारदर्शिता सुनिश्चित करना है।

ततवाल ने कहा कि उज्जैन की मेयर-इन-काउंसिल ने 26 सितंबर 2002 को दुकानदारों को अपना नाम प्रदर्शित करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। बाद में इसे आपत्तियों और औपचारिकताओं के लिए राज्य सरकार को भेज दिया गया था। अब इस प्रस्ताव को लागू किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि मेयर ने कहा कि यह कदम एमपी दुकान स्थापना अधिनियम या गुमास्ता लाइसेंस में निहित है।

मेयर ने कहा, “उज्जैन एक धार्मिक और पवित्र शहर है। लोग यहाँ धार्मिक आस्था के साथ आते हैं। उन्हें उस दुकानदार के बारे में जानने का अधिकार है, जिससे वे सामान खरीद रहे हैं। अगर कोई ग्राहक असंतुष्ट है या उसके साथ धोखा हुआ है तो दुकानदार के बारे में जानकारी होने से उसकी समस्या हल हो सकती है।”

वहीं, इंदौर से भाजपा विधायक रमेश मेंदोला ने मुख्यमंत्री मोहन यादव को पत्र लिखकर इस व्यवस्था को पूरे प्रदेश में लागू करने की माँग की है। उन्होंने कहा कि प्रदेश में दुकानों के बाहर दुकानदार का नाम लिखा जाना चाहिए। उनका तर्क है कि हर छोटा-बड़ा व्यक्ति अपना नाम बढ़ाने के लिए हरसंभव प्रयास करता है। उन्होंने इसे आस्था के साथ-साथ व्यापार के लिए महत्वपूर्ण बताया।

काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर के दुकानों पर भी नेम प्लेट

वाराणसी के प्रसिद्ध काशी विश्वनाथ धाम के आसपास स्थित दुकानदारों को भी अपने नाम का बोर्ड लगाना होगा। गोदौलिया में शनिवार (20 जुलाई 2024) को पुलिस ने दुकानदारों से बात की और उन्हें अपना नाम लिखने के लिए कहा। काशी विश्वनाथ परिक्षेत्र में लगभग 500 दुकानें हैं। इन दुकानों में लगभग 15 प्रतिशत दुकानें मुस्लिमों की हैं।

वहीं, राष्ट्रीय हिंदू दल के पदाधिकारियों ने भी दुकानों पर भगवा झंडा और आधार कार्ड रखने के लिए कहा है। उधर, उत्तर प्रदेश सरकार में राज्यमंत्री रविंद्र जायसवाल ने मंदिर के बाहर दुकानदारों को नाम लिखने की अपील की है। बता दें कि सावन में काशी विश्वनाथ मंदिर में जल चढ़ाने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। इस बार लगभग 1 करोड़ लोगों के आने के अनुमान है।

प्रशासन के मुताबिक, इस आदेश के बाद अब मंदिर के बाहर स्थित दुकानदार श्रद्धालुओं को गुमराह करके पूजा सामग्री की बिक्री नहीं कर पाएँगे। दुकान मालिक का नाम लिखकर किराएदार दुकान संचालित नहीं कर सकेंगे। उन्हें बाहर अपना असली नाम-पता लिखना होगा। मंदिर के सामने देवी-देवताओं के नाम लिखकर गैर-धर्म के दुकानदार व्यवसाय करते मिले हैं। पुलिस ने उन्हें नोटिस थमाया है।

मंत्री रवींद्र जायसवाल ने कहा, “यह आदेश सरकार के नहीं हैं। पुलिस विभाग ने दुकानदारों की पहचान के लिए सख्ती की है। सोशल मीडिया पर अक्सर ये दिखता है कि एक वर्ग के लोग मांस भी खा रहे हैं और शाकाहारी खाने का सामान भी बेच रहे हैं। ऐसे भी वीडियो देखने में आए हैं कि खाने पर पहले थूकते हैं, फिर बेच रहे हैं। ऐसे में एक वर्ग, जो सामान खरीद रहा है, उसकी आस्था को चोट पहुँचती है।”

बिहार के गया स्थित महाबोधि मंदिर के दुकानदारों ने लगाए नेम प्लेट

उत्तर प्रदेश में शुरू हुए इस नियम को लेकर भले ही विपक्ष राजनीति करे, लेकिन श्रद्धालुओं और दुकानदारों ने इसे सही बताया है। यही कारण है कि बिहार के गया स्थित प्रसिद्ध महाबोधि मंदिर के बाहर स्थित दुकानदारों ने अपने मन से दुकानों पर नेम प्लेट लगा ली है। हिंदू और मुस्लिम दुकानदारों ने अपनी स्वेच्छा से फल की दुकानों के आगे ये नेमप्लेट लगा रखा है।

सावन के महीने में बोधगया के महाबोधि मंदिर में भी काँवड़िया पहुँचते हैं और गर्भगृह में स्थापित भगवान शिव पर जल और बेल पत्र चढ़ाते है। इसको देखते हुए स्थानीय दुकानदारों ने आपसी सहमति से दुकान के आगे नेम प्लेट लगाने का फैसला लिया है। यहाँ पर कुछ फल दुकानदार तो बीते 20 सालों से अपने दुकान पर अपना नाम लिखे हैं। उनका कहना है कि इससे उनके व्यापार पर फर्क नहीं पड़ता।