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घर के बाहर खड़ी महिला की ली तस्वीर, कलकत्ता हाईकोर्ट ने दी राहत: कहा – ये आपराधिक मामला नहीं

कलकत्ता हाई कोर्ट ने साल 2016 के एक मामले में उस व्यक्ति को राहत दी है, जिसपर महिला ने आरोप लगाया था कि वो उसका आते-जाते पीछा करता है और फोटो खींचता है। महिला ने आरोप लगाया था कि वो जब अपने घर के बाहर अपनी स्कूल से आने वाली बेटी का इंतजार कर रही थी, तभी उसे फ्लैश लाइट दिखाई दी। जब उसके आरोपित व्यक्ति को रोका, तो वो अपने घर में भाग गया। इस मामले में महिला ने पुलिस में आईपीसी की धारा 354सी के तहत एफआईआर दर्ज कराई थी, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, इस मामले की सुनवाई जस्टिस बिभास रंजन डे की कोर्ट में हुई, जहाँ उन्होंने आरोपित व्यक्ति को राहत दे दी। कोर्ट ने कहा, “किसी महिला को निजी क्रियाकलाप करते हुए देखना और उसकी तस्वीर लेना भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 345सी के तहत ताक-झांक के अपराध के अंतर्गत आता है, लेकिन पीछा करने के अपराध के लिए भी मोटिव मिलना जरूरी है, जिसे अभियोजन पक्ष साबित नहीं कर पाया है।”

कोर्ट ने कहा, “यह भी आरोप लगाया गया है कि जब शिकायतकर्ता ने फ्लैश देखा तो आरोपी उसकी बिल्डिंग में घुस गया। इस तरह के आरोप आईपीसी की धारा 354सी या 354डी के तहत किसी भी क्रिमिनल प्रोसीडिंग के तहत नहीं आता, जो कि धारा 345सी के तहत वर्जित है।”

अभियुक्त ने तर्क दिया कि शिकायतकर्ता ने केवल “प्रॉपर्टी डेवलपर पर प्रेशर बनाने के लिए मामला दर्ज कराया था, ताकि उसे कार की पार्किंग की जगह मिल जाए, लेकिन आरोपित व्यक्ति का इस बात से कोई लेना-देना नहीं है।” हालाँकि, शिकायतकर्ता ने तर्क दिया कि सिविल विवाद के लंबित रहने से आरोपी को आपराधिक कार्यवाही से छूट नहीं मिलेगी। राज्य ने यह भी तर्क दिया कि प्रथम दृष्टया मामला स्थापित करने के लिए पर्याप्त सबूत मौजूद हैं। लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया।

कोर्ट ने कहा कि आईपीसी की धारा 354सी के लिए 4 बिंदुओं पर ध्यान देना जरूरी होता है। कोर्ट ने कहा, “आईपीसी की धारा 354सी का उद्देश्य महिलाओं की शील और शालीनता की रक्षा करना तथा सार्वजनिक व्यवस्था को सुरक्षित रखना है। इसका उद्देश्य महिलाओं की शील भंग करने वाले कृत्यों को दंडित करके तथा उनमें भय पैदा करके सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं के लिए सुरक्षित वातावरण बनाना है। प्रावधान की व्याख्या इसके उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिए व्यापक रूप से की जानी चाहिए।”

इस मामले में आरोपित का पुरुष एवं पीड़ित का महिला होना सिर्फ एक शर्त है। दूसरी शर्त अवाँछित संपर्क का होता है। तीसरा- इस पीछा करने या संपर्क करने की कोशिश के दोहराव या बारम्बार का होना है, तो चौथा- महिला की ‘न’ का होना भी है। इस मामले में सिर्फ पहली शर्त पूरी होती है। कोर्ट ने कहा कि जमीन या पार्किंग का मामला सिविल कोर्ट का है, ऐसे में उस मामले का किसी बहाने से आपराधिक मामला बनाना सही नहीं है और कोर्ट ने याचिका को खारिज करने के साथ ही आरोपित व्यक्ति को बरी कर दिया।

दिल्ली हाईकोर्ट ने शिव मंदिर के ध्वस्तीकरण को ठहराया जायज, बॉम्बे HC ने विशालगढ़ में बुलडोजर पर लगाया ब्रेक: मंदिर की याचिका रद्द, मुस्लिमों की याचिका पर इंस्पेक्टर तलब

अतिक्रमण ध्वस्त करने को लेकर दिल्ली और मुंबई स्थित उच्च न्यायालयों ने अलग-अलग किस्म का फैसला सुनाया है। जहाँ दिल्ली उच्च न्यायालय ने ध्वस्तीकरण का आदेश सही ठहराया, वहीं बॉम्बे हाईकोर्ट ने प्रशासन को ध्वस्तीकरण रोकने के लिए कहा। दिल्ली वाला मामला एक शिव मंदिर का है, महाराष्ट्र वाला मामला विशालगढ़ का है जहाँ अधिकतर मुस्लिमों की दुकानें और घर हैं। अब सवाल तो उठ सकते हैं कि दोनों जगह एक तरह के ही मामलों में अलग-अलग किस्म के फैसले क्यों?

‘शिव मंदिर का ध्वस्तीकरण सही, अवैध रूप से बना था’: दिल्ली हाईकोर्ट

सबसे पहले चलते हैं दिल्ली, जहाँ हाईकोर्ट ने कहा कि यमुना किनारे स्थित मैदानी इलाके में शिव मंदिर को ध्वस्त करना सही है। अदालत ने इसे इको-सेंसेटिव जोन बताते हुए कहा कि इसे संरक्षित किया जाना चाहिए। DDA (दिल्ली विकास प्राधिकरण) से ये मामला जुड़ा है। दिल्ली हाईकोर्ट की एकल पीठ ने जो फैसला सुनाया था, उसे जारी रखा गया। ‘प्राचीन शिव मंदिर’ की तरफ से इस आदेश के खिलाफ याचिका डाली गई थी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि पहले से उन्हें कोई नोटिस नहीं दिया गया था, जो स्वभाविक न्याय के सिद्धांत के विरुद्ध है।

साथ ही कहा गया था कि ये जमीन उत्तर प्रदेश की है, अतः दिल्ली प्रशासन का इस पर अधिकार नहीं बनता। मंदिर पहले ही ध्वस्त किया जा चुका है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश मनमोहन और जस्टिस तुषार राव गगेडेला की खंडपीठ ने कहा कि सोसाइटी मंदिर के स्वामित्व संबंधित दस्तावेज नहीं पेश कर पाई, साथ ही इसके खिलाफ भी कोई साक्ष्य नहीं दे पाई कि मंदिर यमुना जलक्षेत्र में बना हुआ है। अदालत ने कहा कि बिना किसी अनुमति के इसे बनाया गया, साथ ही कहा कि यमुना फ्लडप्लेन्स को ऐसे अतिक्रमणों से बचाना होगा भले ही संरचना धार्मिक क्यों न हो।

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि दिल्ली और उत्तर प्रदेश के बीच अतिक्रमण हटाने को लेकर MoU पर हस्ताक्षर किया गया था। DDA को अवैध अतिक्रमण हटाने के लिए अनुमति दे दी गई थी। हाईकोर्ट ने कहा कि किसी भी तरह का दस्तावेज मंदिर सोसाइटी पेश नहीं कर पाई। बता दें कि जहाँगीरपुरी में जब अवैध अतिक्रमण पर बुलडोजर चल रहा था तो सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी थी। जहाँगीरपुरी में अधिकतर मुस्लिम हैं। कचरा कारोबारियों से सड़कों से लेकर पार्क तक कब्जा रखा है।

‘एक भी संरचना नहीं गिराई जाए’ बॉम्बे हाईकोर्ट

वहीं महाराष्ट्र के विशालगढ़ में किले पर कब्ज़ा को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट ने ध्वस्तीकरण की कार्रवाई रोकने का आदेश दिया। मकबूल अहमद मुजवर व अन्य ने इस मामले में याचिका दायर की थी। बर्गेस कोलाबावाला और फिरदोश पूनीवाला ने इस याचिका पर सुनवाई की। जजों ने पूछा कि ध्वस्तीकरण की कार्रवाई बारिश के मौसम में क्यों की गई? हाईकोर्ट ने कहा, “हम यह स्पष्ट कर देते हैं कि अगले आदेश तक एक भी संरचना, चाहे वह वाणिज्यिक हो या घरेलू, नहीं गिराई जाएगी।”

राज्य सरकार की तरफ से उच्च न्यायालय को बताया गया कि केवल कमर्शियल संरचनाओं को ध्वस्त किया गया है, अदालत के स्टे ऑर्डर में जो संरचनाएँ आती हैं उनमें से एक को भी छुआ तक नहीं गया है। वहीं अदालत ने कहा कि अगर इस बयान के हिसाब से काम नहीं हुआ होगा तो अधिकारियों को जेल भेजने से भी गुरेज नहीं किया जाएगा। मुस्लिम याचिकाकर्ताओं ने कहा कि प्रतिबंध के आदेश के बावजूद हथौड़ा लेकर प्रदर्शनकारी किले के ऊपर चढ़ गए थे।

उन्होंने इस दौरान सांप्रदायिक नारेबाजी का भी आरोप लगाया। महिलाओं-बच्चों को परेशान किए जाने और गाड़ियों को क्षतिग्रस्त किए जाने का भी आरोप लगाया गया। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि ‘दक्षिणपंथी शिवभक्तों’ ने गजपुर स्थित ‘रज़ा सुनील जामा मस्जिद’ को तबाह करने की कोशिश की, जबकि पुलिस देखती रही। वीडियो देखते के बाद हाईकोर्ट ने शाहूवाड़ी पुलिस थाने के इंस्पेक्टर को अगली सुनवाई में मौजूद रहने का आदेश दिया। हाईकोर्ट ने पूछा कि क्या कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस का काम नहीं है?

अलग-अलग है हिन्दुओं का स्वस्तिक और नाजी वाला ईसाई क्रॉस: अब अमेरिका के शिक्षा विभाग ने भी दी मान्यता

संयुक्त राज्य अमेरिका और दुनिया भर में रहने वाले हिंदू समुदाय के लिए एक बड़ी जीत मिली है, जिसमें यूएस के ओरेगन शिक्षा विभाग ने आधिकारिक तौर पर हिंदुओं के पवित्र धार्मिक प्रतीक स्वस्तिक और नाजी के ‘हेकेनक्रूज़’ के बीच अंतर को मान्यता दी है। हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन ने गुरुवार (18 जुलाई) को एक्स पर इसे “ऐतिहासिक निर्णय” बताया है। हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन ने कहा कि यह भविष्य की पीढ़ियों के लिए हमारे प्रतीकों की पवित्रता को संरक्षित करने में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में काम करेगा।

हिंदू अमेरिका फाउंडेशन ने लिखा, “हमारे समुदाय के लिए एक ऐतिहासिक जीत! ओरेगन में हमारे समर्थकों की अथक परिश्रम के लिए धन्यवाद। ओरेगन शिक्षा विभाग ने आधिकारिक तौर पर नाजी हेकेनक्रूज़ और हमारे पवित्र स्वस्तिक के बीच अंतर को मान्यता दी है। यह ऐतिहासिक निर्णय भविष्य की पीढ़ियों के लिए हमारे प्रतीकों की पवित्रता को संरक्षित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह जीत आपके अटूट समर्थन और समर्पण के बिना संभव नहीं होती। आइए हम अपने पवित्र स्वस्तिक के असली संदर्भ और अर्थ के बारे में लोगों को शिक्षित करना और जागरूकता फैलाना जारी रखें।”

आधिकारिक वेबसाइट ओरेगन.जीओवी के अनुसार, शिक्षा विभाग ने एक आधिकारिक संदेश जारी किया है जिसका शीर्षक है , “प्रत्येक छात्र का दायित्व – प्रतीकों के बीच अंतर सीखना”। इसमें ओरेगन शिक्षा विभाग ने स्वस्तिक को “एक संस्कृत शब्द के रूप में वर्णित किया है, जिसका उपयोग हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म, यहूदी धर्म, जैन धर्म और कुछ मूल अमेरिकी धर्मों और संस्कृतियों सहित कई धर्मों और संस्कृतियों में शुभता और प्राकृतिक दुनिया के तत्वों के प्रतीक के रूप में किया जाता है।”

इस आधिकारिक जानकारी में बाताया गया है कि झुके हुए क्रॉस को अक्सर गलत तरीके से स्वस्तिक बताया जाता है, लेकिन असलियत में ये झुका हुआ क्रॉस नाजियों का हेकेनक्रूज़ है, जो घृणा के प्रतीक के रूप में कुख्यात है। शिक्षा विभाग ने कहा, “हुक वाले क्रॉस की छवि को आम तौर पर ‘स्वास्तिक’ के रूप में संदर्भित किया जाता है, वास्तविक नाजी और नव-नाजी प्रतीक को ‘हेकेनक्रेज़’ के रूप में सही ढंग से लेबल किया गया है, जो ‘हुक वाले क्रॉस’ के लिए जर्मन शब्द है।” सही शब्दों के माध्यम से सही अर्थ को समझें और गलत चीजों के बारे में जानकारियों को जोड़ें…

डॉक्यूमेंट्री में स्वस्तिक बनाम Hakenkreuz की पड़ताल

बता दें कि अमेरिका में बार-बार ‘स्वस्तिक’ से घृणा के कारण इसे प्रतिबंधित करने की माँग की गई, जबकि हिन्दू संगठन इसका विरोध करते रहे। एक डॉक्यूमेंट्री में पश्चिमी मीडिया के इस नैरेटिव का पोस्टमॉर्टम किया था, जिसमें वो ‘स्वस्तिक’ को नाज़ी जर्मन तानाशाह हिटलर और उसके कत्लेआम से जोड़ कर देखते हैं। डॉक्यूमेंट्री में ‘शांति के चिह्न’ को ‘शैतान का प्रतीक’ बनाने वालों की पोल खोलते हुए इसका जवाब दिया गया है कि क्या सचमुच हिटलर ने जिस चिह्न का उपयोग किया, वो ‘स्वस्तिक’ ही था? इस डॉक्यूमेंट्री पर बनी हमारी रिपोर्ट यहाँ पढ़ सकते हैं, जिसमें समझाया गया है कि किस तरह से हिटलर का निशान Hakenkreuz ईसाईयत से जुड़ा है। ये ईसाईयों के क्रॉस से ही जुड़ा निशान है, जबकि स्वस्तिक का इन सबसे कोई लेना-देना नहीं।

लंबे समय से चलाया जा रहा था अभियान

ओरेगोन प्रशासन ने स्वस्तिक को लेकर जो आदेश जारी किया है, उसका लंबे समय से इंतजार था। अमेरिका में ‘हिन्दू अमेरिका फाउंडेशन (HAF)’ ने हिंदुओं के पवित्र प्रतीक चिन्ह ‘स्वास्तिक’ को बैन किए जाने के विरोध में कैम्पेन चला रहा था। इस संगठन ने अमेरिका के राज्य मैरीलैंड में हाउस ऑफ डेलीगेट्स के एक बिल पर आपत्ति जताई थी, जिसमें स्वास्तिक को ‘घृणा’ की निशानी के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इस बिल में कपड़ों, किताबों, स्कूल और ऐसी ही अन्य जगहों पर स्वास्तिक के उपयोग को बैन करने की बात कही जा रही है। हालाँकि अब ओरेगन प्रशासन के निर्णय से दूध का दूध और पानी का पानी हो चुका है।

TMC के जो मंत्री गैर-मुस्लिमों को बताते हैं बदकिस्मत, उन्हें दुकानों-ठेलो पर मालिकों के नाम लिखे जाने से दिक्कत: ‘हलाल’ पर चुप, यूपी सरकार के फैसले को बता रहे अन्याय

उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार ने सावन के महीने में काँवड़ यात्रा की रूट में पड़ने वाले सभी दुकानों-ठेलों के संबंध में आदेश दिया है कि डिस्प्ले बोर्ड पर इनके मालिक का नाम भी लिखा जाए। ये फैसला सभी मजहब-जाति के लोगों के लिए है, लेकिन इस्लामी कट्टरपंथियों को इससे मिर्ची लग गई। पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी TMC के नेता फिरहाद हकीम ने भी इस पर आपत्ति जताई है। फिरहाद हकीम दिसंबर 2021 से ही कोलकाता के मेयर हैं।

फिरहाद हकीम ने यूपी सरकार के फैसले को गलत बताते हुए कहा कि राज्य में अन्याय हो रहा है। कोलकाता के मेयर ने कहा कि कौन हिन्दू है और कौन मुस्लिम, ये हम क्यों लगाएँगे? उन्होंने कहा कि इंसान, इंसान की सेवा करेंगे। फिरहाद हकीम ने कहा कि कोई फल बेच रहा है तो वो इंसान है, जिसे मन करेगा वो उससे खरीदेगा। उन्होंने कहा कि ‘इधर धर्म का खरीदेंगे, इस धर्म का नहीं खरीदेंगे’, ये गलत हो रहा है। उन्होंने इसे हिंदुस्तान की संस्कृति पर प्रहार करार दिया।

ये वही फिरहाद हकीम हैं, जिन्होंने 2 हफ्ते पहले सार्वजनिक तौर पर उन्हें इस्लाम कबूल करने का आह्वान किया था। बता दें कि वो कोलकाता के मेयर होने के साथ-साथ पश्चिम बंगाल सरकार में शहरी विकास एवं नगरपालिका मामलों के मंत्री भी हैं। वो एक बार अलीपुर और तीसरी बार कोलकाता पोर्ट से MLA बने हैं। उन्होंने कहा था, “जो लोग इस्लाम में पैदा नहीं हुए, वे बदकिस्मत हैं। अगर हम उन्हें दावत (इस्लाम कबूल करने को कहना) दे सकें और उनमें ईमान (इस्लाम के प्रति निष्ठा) ला सकें, तो हम अल्लाह को खुश कर पाएँगे।”

बता दें कि विपक्षी दल भी योगी सरकार के इस फैसले पर उँगली उठा रहे हैं। बता दें कि हाल ही में ऐसे कई वीडियो सामने आए हैं जहाँ मुस्लिमों को खाने में थूकते हुए और फलों को पेशाब वाले पानी में धोते हुए देखा गया। जो लोग ‘हलाल’ के मुद्दे पर चुप रहते हैं, वो भी विरोध कर रहे हैं। मुस्लिम अक्सर ‘हलाल’ सर्टिफाइड खाद्य पदार्थ खोजते हैं। काँवड़ियों के लिए तीर्थयात्रा में शुद्धता आवश्यक है और इसीलिए योगी सरकार ने ये फैसला लिया है।

आरक्षण पर बांग्लादेश में हो रही हत्याएँ, सीख भारत के लिए: परिवार और जाति-विशेष से बाहर निकले रिजर्वेशन का जिन्न

बांग्लादेश जल रहा है। हर तरफ हिंसा और आफरा-तफरी का माहौल है। हिंसा को नियंत्रित करने के लिए सेना को सड़कों पर उतारा गया है। देश में इंटरनेट, रेल सेवा, बस सेवा आदि ठप है। जेलों से कैदी भाग रहे हैं। सरकारी भवनों में आग लगाई जा रही है। अब तक 105 लोग अपनी जान गँवा चुके हैं। ये सब कुछ हो रहा है आरक्षण के विरोध में। इस घटना से पड़ोसी देश भारत को भी शिक्षा लेने की जरूरत है।

दरअसल, बांग्लादेश की सरकारी नौकरियों में कुछ समूहों के लिए साल 2018 तक 56% आरक्षण का प्रावधान था। इन आरक्षण को बांग्लादेश में बेहद आकर्षक माना जाता है। इन समूहों में विकलांग व्यक्ति (1%), स्वदेशी समुदाय (5%), महिलाएँ (10%), अविकसित जिलों के लोग (10%) और 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के स्वतंत्रता सेनानियों के परिवार (30%) शामिल हैं।

इसमें योग्यता के आधार पर चयन के लिए केवल 44% सीटें बचीं। साल 2018 में छात्र समूहों द्वारा बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए, जिसके कारण हसीना सरकार ने कोटा खत्म कर दिया। फिर जून 2024 में हाई कोर्ट और फिर बांग्लादेश के सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के इस फैसले को पलट दिया और स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों के लिए 30% आरक्षण को खत्म करने को अवैध ठहराया।

इसके बाद प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार ने आरक्षण की व्यवस्था को फिर से लागू कर दिया। इससे बांग्लादेश के छात्र-छात्राएँ भड़क गए और सड़कों पर उतर आए। बांग्लादेश के विद्यार्थी पिछले एक महीने से अधिक समय से इसके खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। उनका कहना है कि योग्यता के आधार पर चयन सिर्फ 44 प्रतिशत सीटों पर होता है, जो सामान्य वर्ग के मुश्किलें पैदा कर रही हैं।

बांग्लादेश में बेरोजगारी दर साल 2023 में 4.7 प्रतिशत थी। इसके पहले साल 2019 में यह दर 5.32 प्रतिशत थी। किसी भी देश के लिए लगभग 5 प्रतिशत बेरोजगारी दर भले देखने में कम लगे, लेकिन जीवकोपार्जन के लिए आस लगाए नाराज-हताश युवकों की यह बहुत बड़ी जनसंख्या है। अगर ये सड़कों पर उतर आएँ तो क्या हो सकता है, इसका असर बांग्लादेश में दिख रहा है।

अब इससे भारत को सीख क्यों लेनी चाहिए, ये एक महत्वपूर्ण प्रश्न हो सकता है। इससे भारत को इस संदर्भ में सीख लेनी चाहिए कि युवकों के आक्रोश को शांत रखने के लिए शिक्षा एवं रोजगार के व्यापक प्रबंध किए जाने चाहिए। इसके साथ ही उन्हें मिलने वाले अवसरों की सीमितता को भी समय के साथ समीक्षा के दायरे में लाना जाना चाहिए, ताकि युवाओं में असंतोष ना उपजे।

भारत बहुत बड़ा देश है। यहाँ किसी तरह का असंतोष देश के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है। केंद्र में कुल आरक्षण 63.5 प्रतिशत है। इसका बँटवारा कुछ इस तरह है- अनुसूचित जनजाति के लिए 7.5%, अनुसूचित जाति के लिए 15%, पिछड़ा वर्ग के लिए 27%, आर्थिक रूप से पिछड़ा वर्ग 10% और दिव्यांगता के लिए 4 प्रतिशत। कुछ-कुछ राज्यों में तो आरक्षण की सीमा और अधिक है।

ऐसे में भारत में 36.5 प्रतिशत सीटें ही ऐसी हैं, जिस पर योग्यता के आधार पर विद्यार्थी फाइट कर सकते हैं। भारत में लगभग हर साल 10 लाख नए स्नातक निकलते हैं और वे विभिन्न परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। इनमें कुछ को सफलता मिलती है और अधिकांश को नहीं है। इस तरह साल-दर-साल बेरोजगारों की एक नई फौज खड़ी होती जा रही है।

देश में जिन वर्गों को आरक्षण दिया जाता है, उनकी कुछ जातियाँ ही उसका फायदा उठा पाती हैं। निचले स्तर तक इसका फायदा नहीं पहुँच पाता है। जैसे कि ओबीसी वर्ग में अहीर, कोइर, कुर्मी आदि कुछ ऐसी जातियाँ हैं जो शिक्षा और नौकरी में आरक्षण का सीधा फायदा ले लेती हैं। इस वर्ग के अन्य लोगों को इसका फायदा नहीं मिल पाता और वे गरीबी रेखा से खुद को बाहर नहीं निकाल पाते।

इसी तरह अनुसूचित जनजाति में मीणा जैसी कुछ जाति है, जो बेहद संपन्न एवं समृद्ध हैं। इनमें शिक्षा और नौकरी का स्तर काफी ऊँचा है। उसी आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग (EWS) वर्ग में सभी जातियों को इसका समान रूप लाभ नहीं मिल पा रहा है। इसी तरह अनुसूचित जाति (SC) में भी इस वर्ग का लाभ कुछ वर्गों तक सिमटकर रह गया है।

ऐसे हर वर्ग में जिन जाति समुदाय को लोगों को इसका कोई फायदा नहीं मिल पा रहा है, उनके युवाओं के मन में देर-सबेर असंतोष पनपेगा। इस असंतोष को पनपने से पहले ही इसका समाधान आवश्यक है। भारत में लगभग 3,000 जातियाँ और 25,000 उपजातियाँ हैं। ऐसे में किसी वर्ग का फायदा सिर्फ दो-तीन जातियों तक सीमित रहना असंतोष को बढ़ावा देना ही है।

सरकार को चाहिए कि जिन जातियों में शिक्षा, नौकरी और आय में वृद्धि होने के साथ-साथ सामाजिक चेतना आ गई है, उन्हें सामान्य वर्ग में डाल दिया जाए। इससे हर वर्ग को देर सबेर लाभ मिलेगा और आखिरकार आरक्षण के लागू करने के उद्देश्यों की पूर्ति होगी, अन्यथा भारत में आरक्षण राजनीतिक ब्लैकमेल का हथियार बनकर रह जाएगा और इसके लाभार्थी सीमित रह जाएँगे।

इसका सबसे अनोखा मामला महाराष्ट्र की ट्रेनी IAS अधिकारी पूजा खेडकर हैं। पूजा खेडकर ओबीसी कोटा का इस्तेमाल करते हुए UPSC परीक्षा पास की हैं। महत्वपूर्ण बात ये है कि उनके पिता भी IAS अधिकारी रहे हैं। इसके बावजूद उन्होंने ओबीसी कोटा का फायदा लिया। ऐसा ही मामला IAS अधिकारी टीना डाबी और उनकी बहन रिया डाबी हैं। दोनों अनुसूचित जाति से ताल्लुक रखती हैं।

उनके पिता भारतीय दूरसंचार सेवा और माँ भारतीय इंजनीयरिंग सेवा से ताल्लुक से संबद्ध हैं। ऐसे में सवाल उठेगा कि अगर रिया और टीना डाबी की जगह यह आरक्षण किसी और को मिलता तो दो अन्य परिवारों का कल्याण हो सकता था। माता-पिता के इतने उच्च पदस्थ अधिकारी होने के बावजूद उनकी अगली पीढ़ी द्वारा आरक्षण का लाभ लेना उस वर्ग के वंचित जाति/लोगों के प्रति अन्याय है।

भारत में बांग्लादेश जैसी स्थिति कभी ना पैदा हो, इससे सरकार को सीख लेने की जरूरत है। असंतोष का पनपना किसी राज्य के लिए सबसे दुष्कर होता है। राजनीतिक दलों के चाहिए कि वे मिलकर बैठकर इसका कुछ इस तरह समाधान निकालें कि जारी आरक्षण के अस्तित्व को चुनौती निकट भविष्य में चुनौती ना मिल सके और यह समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े परिवार को भी इसका लाभ मिल सके।

कर्नाटक के बाद अब तमिलनाडु में YouTuber अजीत भारती के खिलाफ FIR, कॉन्ग्रेस नेता सैमुअल MC ने की शिकायत: राहुल गाँधी से जुड़ा है मामला

कर्नाटक के बाद अब तमिलनाडु पुलिस ने YouTuber एवं पत्रकार अजीत भारती के खिलाफ FIR दर्ज की है। उन पर ‘X’ (पूर्व में ट्विटर) पर आपत्तिजनक सामग्री पोस्ट करने का आरोप लगाया गया है। M सैमुअल द्रवियन MC की शिकायत पर ये केस दर्ज किया गया है, जो चेन्नई ईस्ट में कॉन्ग्रेस पार्टी के क्षेत्रीय अध्यक्ष हैं। शिकायत में उन्होंने आरोप लगाया है कि अजीत भारती ने दावा किया था कि राहुल गाँधी अयोध्या के राम मंदिर को ध्वस्त कर उसकी जगह फिर से बाबरी मस्जिद को खड़ी कर देंगे।

FIR में यूट्यूबर पर धार्मिक भावनाएँ भड़काने और जनता के बीच घृणा फैलाने के लिए द्वेषपूर्ण भावना के साथ भ्रामक सूचना फैलाने का आरोप मढ़ा गया है। इसके लिए ‘X’ को ‘भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता’ (BNSS) के तहत नोटिस भी जारी किया गया है। सोमवार (15 जुलाई, 2024) को चेन्नई के वेपेरी स्थित सेन्ट्रल क्राइम ब्रांच के साइबर क्राइम पुलिस थाने के इंस्पेक्टर ने इस पर हस्ताक्षर किया। जिस पोस्ट को लेकर ये मामला दर्ज किया गया है, वो 13 जून, 2024 का है।

अजीत भारती के खिलाफ पूर्ववर्ती IPC (भारतीय दंड संहिता) की धारा-153A (मजहब-भाषा इत्यादि का रआधार पर विभिन्न समूहों को लड़ाने के उद्देश्य से काम करना) के तहत मामला दर्ज किया गया है। साथ ही उनके खिलाफ IPC की धारा-505(1)(b) भी लगाई गई है, जो जनता के बीच डर बनाने के उद्देश्य से कोई बयान जारी करने पर दर्ज की जाती है। ‘X’ से अजीत भारती के हैंडल के संबंध में कई जानकारियाँ माँगी गई हैं, जैसे उनके डिवाइस, लॉगिन-लॉआउट का समय और ईमेल-फोन नंबर।

अजीत भारती ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए सवाल किया कि जिस केस में कर्नाटक उच्च न्यायालय ने स्थगन का आदेश दे रखा है, उस पर कथित घटना और केस पर स्टे के बाद, वापस दूसरे राज्य में केस करना क्या बताता है? बता दें कि कर्नाटक सरकार ने उनके NCR स्थित फ़्लैट के पास अपने कुछ पुलिसकर्मी भेजे थे। बाद में यूपी पुलिस इन पुलिसकर्मियों को ले गई थी। इसके बाद हाईकोर्ट ने अजीत भारती को राहत दी थी। अब तमिलनाडु में केस हुआ है, जहाँ DMK अध्यक्ष MK स्टालिन मुख्यमंत्री हैं और कॉन्ग्रेस सत्ता में साझीदार है।

हिंदू बन मुस्लिम लड़कियों ने की शादी, एक सप्ताह बाद फरार: 2-2 लाख रुपए लेकर धर्मशाला में दलाल ने कराए फेरे, लेकिन इलाका था मुस्लिम बहुल

राजस्थान के राजगढ़ में 2 हिंदू युवकों ने बिहार में पैसे देकर 2 युवतियों से शादी की और उन्हें राजस्थान ले आए। लेकिन एक ही सप्ताह बाद दोनों युवतियाँ फरार हो गईं। उन्हें जब पकड़ा गया, तो दोनों युवतियों ने कहा कि वो मुस्लिम हैं और उन्हें पैसे लेकर यहाँ लाया गया था। युवकों ने जब रिश्ते की दुहाई दी, तो मुस्लिम युवतियों ने कहा कि वो रेप का केस लगा देंगी। इस मामले में पुलिस भी बुलाई गई, लेकिन आखिर में दोनों युवकों को दोनों युवतियों को जाने देना पड़ा और पैसे भी डूब गए।

खास बात ये है कि दोनों युवकों से इस शादी के 2-2 लाख रुपए लिए गए और बिहार की जिस धर्मशाला में ये शादी कराई गई, वो भी मुस्लिम बहुल इलाके में थी। दोनों मुस्लिम लड़कियों ने हिंदू रीति-रिवाजों के साथ शादी की, और अब पैसे भी लेकर जा चुकी हैं। इधर दोनों दूल्हे सिर्फ हाथ मलते रह गए।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये मामला राजगढ़ जिले के सुल्तानिया गाँव का है। जहाँ प्रेम सिंह नागर और पड़ोस के गाँव के रहने वाले मुकेश की शादी एक दलाल ने बिहार में कराई। उस दलाल ने दोनों से 2-2 लाख रुपए भी लिए थे। लेकिन ये दुल्हनें 1 सप्ताह भी नहीं टिकी और अपने परिजनों के साथ बिहार लौट गईं। जानकारी के मुताबिक, एक दुल्हन का भाई राजगढ़ पहुँचा और आरोप लगाया कि उसकी बहन को जबरदस्ती यहाँ लाया गया है। वो मुस्लिम हैं। युवतियों ने भी अपनी मुस्लिम आईडेंटिटी वाले आई कार्ड दिखाए। यही नहीं, एक युवती ने तो यहाँ तक भी कह दिया कि अगर उसके भाई के साथ उसे नहीं जाने दिया गया, तो वो कथित दूल्हों पर रेप का केस कर देंगी। ऐसे में उन्हें पैसे भूलकर जाने दिया जाए।

पुलिस के सामने भी दुल्हन ने मुस्लिम होने की जानकारी दी। इस मामले में डरे हुए दोनों युवकों ने थाने में समझौता कर लिया और रुपए भी छोड़ दिए। उन्होंने बताया कि बिहार की जिस धर्मशाला में उनकी शादी दलाल ने कराई थी, वो धर्मशाला भी मुस्लिम इलाके की थी और उसका मालिक भी मुस्लिम ही था। वहाँ उन्होंने 15 हजार की रसीद भी कटाई थी। इस पूरे मामले में पुलिस भी मूकदर्शक बनी नजर आई। क्योंकि थाने में समझौते के बाद लुटेरी दुल्हनें बिहार चली गई, जबकि पैसा-इज्जत सबकुछ गवाँ कर दूल्हे सिर्फ हाथ मलते रह गए।

गौरतलब है कि राजस्थान में लिंगानुपात अन्य राज्यों की तुलना में कहीं ज्यादा खराब है। ऐसे में बहुत सारे युवकों के घर नहीं बस पाते, तो वो गरीब राज्यों से शादी कर अपने लिए दुल्हन लाते हैं। कई बार युवकों के साथ ठगी की वारदातें भी सामने आती रही हैं। उन्हीं ठगी के मामलों में ये नया मामला भी जुड़ गया। हालाँकि उस कथित दलाल के खिलाफ पुलिस ने क्या कार्रवाई की, इस बात का पता नहीं चल पाया है।

आकिब ने ‘आकाश’ बन हिन्दू युवती को फाँसा, तमंचे के बल पर 2 साल करता रहा बलात्कार: इकलौते भाई की हत्या की धमकी, तस्वीरें भी खींच ली

उत्तर प्रदेश इ अलीगढ़ से ‘लव जिहाद’ का मामला सामने आया है। हिन्दू युवती ने आरोप लगाया है कि आकिब ने ‘आकाश’ बन कर उसके साथ बलात्कार किया है। जब युवती ने शादी करने के लिए कहा, तब वो इस्लामी धर्मांतरण का दबाव बनाने लगा। युवक ने बंदूक दिखा कर उसे उसके पूरे परिवार समेत खत्म करने की धमकी दी। बन्नादेवी थाना पहुँच कर पीड़िता ने शिकायत दर्ज कराई। इस दौरान कई हिन्दू कार्यकर्ता भी उसके साथ थे। पुलिस ने FIR दर्ज कर ली है।

राहत खलील का बेटा आकिब के बारे में बताया गया है कि वो सराय रहमान मछली वाली गली का निवासी है। व्हाट्सएप्प पर उसने हिन्दू पीड़िता से दोस्ती के लिए खुद का नाम ‘आकाश’ बताया। दोनों में नज़दीकियाँ बढ़ती चली गईं और उन्होंने शारीरिक संबंध भी बनाए। पीड़िता का कहना है कि जब उसे ‘आकाश’ के मुस्लिम होने का पता चला तो उसके होश उड़ गए। जब उसने विरोध किया तो उसे और उसके परिवार को धमका कर आकिब तमंचे के बल पर बलात्कार करता रहा।

लगभग 2 वर्षों तक ये सिलसिला चला। उसे कई बार नशीली दवाएँ भी दी गईं। वो कहने लगा कि निकाह के लिए धर्म-परिवर्तन करो। जब पीड़िता ने हिन्दू संगठनों को इसकी जानकारी दी तो भाजपा की पूर्व महापौर शकुंतला भारती के संज्ञान में मामला लाया गया। वो पीड़िता और हिन्दू कार्यकर्ताओं को लेकर बन्नादेवी थाना पहुँचीं। पूर्व मेयर ने कहा कि हिन्दू बहन-बेटियों को फँसा कर मुस्लिम बनाया जाना बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

थानाधिकारी RK सिसौदिया ने कहा कि पहचान छिपा कर युवती को शादी का झाँसा दिए जाने का मामला सामने आया है। उन्होंने बताया कि शिकायत के आधार पर FIR दर्ज कर ली गई है। साथ ही आरोपित की गिरफ़्तारी के लिए 3 टीमों का गठन किया गया है। पीड़िता की तस्वीरें भी उसके पास है, जिनके सहारे वो ब्लैकमेल कर रहा था। वो इन्हें वायरल करने की धमकी दे रहा था। गुरुवार (18 जुलाई, 2024) की रात वो पीड़िता को धमकाने के लिए उसके घर भी पहुँच गया था। पीड़िता का इकलौता भाई है, जिसकी हत्या की वो धमकी देता है।

सरकारी स्कूल में क्रिश्चियन मिशनरी वाली बाँट रही थी मजहबी किताबें: ‘पवित्र शास्त्र भजन संहिता और नीति वचन’, हिंदू बच्चों को भ्रम में रखने के लिए नाम भी फर्जी

मध्य प्रदेश के विदिशा में क्रिश्चियन मिशनरी सक्रिय हैं। मिशनरी से जुड़े लोग एनजीओ की आड़ लेकर ईसा मसीह की कहानियों से जुड़े मजहबी पुस्तकें बाँट रहे हैं। इन पुस्तकों के नाम भी शास्त्र, संहिता की तरह हैं, जबकि अंदर की कहानियाँ ईशु की महिमा से भरी हैं। ये मामले सीधे तौर पर लोगों को धर्म परिवर्तन के लिए प्रेरित करने के लगते हैं।

ताजा मामला विदिशा के लायरा का है, जहाँ शुक्रवार (19 जुलाई 2024) को पांड़ोछा मिडिल स्कूल में एक युवती पहुँची और खुद को एनजीओ से जुड़ा बताकर स्कूली बच्चों को मुफ्त में ईशु महिमा से जुड़ी पुस्तकें बाँटने लगी। पुस्तक का नाम ‘पवित्र शास्त्र भजन संहिता और नीति वचन’ था। इन पुस्तकों के नाम से एक बार में भ्रम होता है कि इस पुस्तक में हिंदू धर्म से बातें होंगी, लेकिन असल में ये पुस्तक ईसा मसीह की चमत्कारिक कहानियों से भरी पड़ी थी। यही नहीं, उसमें हिंदू संतों की निंदा की गई थी, जबकि क्रिश्चियानिटी का बखान। युवती द्वारा पुस्तक बाँटने का शिक्षकों ने विरोध किया, तो वो शिक्षकों से ही भिड़ गई। जब पुलिस बुलाने की बात की गई, तो वो फरार हो गई।

भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, युवती ने खुद को हैदराबाद से आया हुआ बताया। उसने कई बार पूछने पर भी अपना नाम नहीं बताया, सिर्फ इतना कहा कि वो एनजीओ के लिए मुफ्त में ये काम करती है। बताया जा रहा है कि वो बीना से ऑटो में सवार होकर 2 अन्य महिलाओं के साथ आई थी। उन महिलाओं पर भी अलग-अलग गाँवों में ऐसी पुस्तकें बाँटने का शक जताया जा रहा है।

घटना वाले स्कूल में ही तैनात संजय लोधी नाम के शिक्षक ने युवती को रोका था। स्थानीय मीडिया से बातचीत में संजय लोधी ने बताया कि युवती आसपास के गाँवों में भी पुस्तक मुफ्त में बाँट रही थी और ज्यादा उन घरों तक पुस्तक पहुँचाने की कोशिश कर रही थी, जो गरीब और अनुसूचित जाति वर्ग के हैं। युवती ने दावा किया कि वो सागर और इटारसी में भी पुस्तकें बाँट चुकी है।

इस मामले में बजरंग दल के सह संयोजक रवि लोधी और संगठन के अन्य पदाधिकारियों ने कहा है कि वो स्थानीय पुलिस थाने में शनिवार (20 जुलाई 2024) को शिकायत दर्ज कराएँगे। इस पूरे मामले में शिक्षक ने वीडियो भी बनाया है, जो सोशल मीडिया पर भी वायरल हो रहा है।

टीम से बाहर होने पर मोहम्मद शमी का वायरल वीडियो, कहा – किसी के बाप से कुछ नहीं लेता हूँ, बल्कि देता हूँ

तेज़ गेंदबाज़ मोहम्मद शमी को T20 विश्व कप 2024 में भारतीय टीम में न चुने जाने का मलाल है। भारत ये वर्ल्ड कप रोहित शर्मा की कप्तानी में जीतने में कामयाब रहा। मोहम्मद शमी ने YouTube पर शुभंकर मिश्रा के साथ पॉडकास्ट में 1 घंटे से भी अधिक समय तक कई मुद्दों पर बातचीत की। उन्होंने कहा कि वो हमेशा देश के लिए योगदान करने के लिए सोचते हैं और उन्हें चुनौतीपूर्ण परिस्थितियाँ पसंद हैं। तेज़ गेंदबाज ने बताया कि उन्होंने ज़्यादातर न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका और इंग्लैंड व वेस्टइंडीज जैसी शीर्ष टीमों के खिलाफ ही खेला है।

मोहम्मद शमी ने कहा कि छोटी टीमों का नाम आता है तो वो आराम करने चले जाते हैं, इससे शरीर भी रिकवर हो जाता है और फ्रेश भी महसूस होता है, आप परिवार से मिलते हैं। उन्होंने याद किया कि 2023 के ODI वर्ल्ड कप में नॉनस्टॉप 10 मैच जीत कर भारत फाइनल में पहुँचा था, इस बार भी वो फाइनल मैच देख रहे थे तो एक समय उनके भीतर वही दुःख था। उन्होंने कहा कि 2023 में किसी को भारत की जीत को लेकर शक नहीं था। विश्व विजेता टीम का हिस्सा होने को लेकर शमी ने कहा कि वो वास्तविकता में विश्वास रखते हैं।

उन्होंने कहा कि इस टीम में जो भी था, वो डिजर्व करता है। उन्होंने कहा कि वो अनफिट थे तो सिर्फ एक फैन की तरह मैच देख सकते हैं, कुछ गलत लगे तो मैसेज डाल सकते हैं। उन्होंने 2015 वनडे वर्ल्ड कप याद किया, जहाँ उन्होंने सबसे अधिक विकेट लिया था। वहीं उन्होंने बताया कि 2019 में भी उनका प्रदर्शन अच्छा रहा। उन्होंने कहा कि अगर आप मुझे चांस दोगे तो मैं परफॉर्म करूँगा, आप नहीं लेते मुझे तो ये आपका निर्णय है। मोहम्मद शमी ने कहा कि जब-जब उन्हें चांस मिला वो टॉप पर बैठे हैं।

रिटायरमेंट पर मोहम्मद शमी ने कहा कि न तो वो किसी के बाप से कुछ लेते हैं, देते हैं। उन्होंने कहा कि वो बुढ़ापे में भी यही आत्मविश्वास रखेंगे और तब उन्हें कोई नहीं हरा सकता। उन्होंने कहा कि मोहम्मद शमी और जसप्रीत बुमराह साथ में खेलते हुए दिखेंगे। ‘गुजरात टाइटंस’ अगर उन्हें हटा दे तो? तो उन्होंने कहा कि जो उन्हें लेगा वो उसके साथ खेल लेंगे। उन्होंने कहा कि अगर आपको परफॉर्मर चाहिए तो रखो, वहीं अगर शक्ल पसंद है तो मॉडल ढूँढ कर लाओ।

क्या भारतीय टीम में पक्षपात होता है? इस सवाल पर मोहम्मद शमी ने कहा कि उन्होंने कभी ऐसा नोटिस नहीं किया। उन्होंने कहा कि आप जिसको अधिक देखते हो, उसकी स्किल पर आपको अधिक भरोसा होता है। मोहम्मद शमी ने कहा कि IPL में शुभमन गिल ने अच्छी कप्तानी की थी। कप्तान बनने के सवाल पर उन्होंने कहा कि वो मना नहीं करेंगे, लेकिन बल्लेबाजों को अधिक प्राथमिकता दी जाती है। बकौल मोहम्मद शमी, विकेटकीपर सबसे अच्छा कप्तान होता है क्योंकि उसे सब दिखता रहता है और वो विकेट के पीछे खड़ा रहता है।

मोहम्मद शमी ने कहा, “एक चीज मुझे समझ नहीं आती, मेरे दिमाग में भी एक सवाल रहता है। आपको वैसे खिलाड़ी चाहिए जो परफॉर्म कर रहे हों। 3 मैच में 13 विकेट लिए हैं, और क्या चाहिए आपको? मेरे पास न तो सवाल है न इसका जवाब है। मुझे मौका दोगे तभी तो मैं अपनी स्किल दिखाऊँगा, जब आप हाथ में गेंद दोगे। मैंने 7 मैच में 24 विकेट लिया। मैं सवाल नहीं पूछता। जिसे मेरी ज़रूरत है, वो मुझे मौका देगा।” पाकिस्तान द्वारा बॉल टेम्परिंग के आरोप पर उन्होंने कहा कि सब गेंदें रखी हुई हैं जिनसे उन्होंने विकेट लिए, वो जाकर दिखा देंगे कि कहाँ गड़बड़ है।

तलाक पर मोहम्मद शमी ने कहा कि एक व्यक्ति के आने-जाने से कोई फर्क नहीं पड़ता। उन्होंने बताया कि वो अपनी बेटी से बात करते हैं। मोहम्मद शमी ने कहा कि समय का इंतज़ार करना होता है, धैर्य रखना होता है। उन्होंने कहा कि वो भारत के लिए खेलेंगे, उसके बाद कुछ देखा जाएगा। सानिया मिर्जा से जुड़ने के खबरों पर उन्होंने कहा कि ये अजीब है, किसी को ऐसे नहीं खींचना चाहिए। उन्होंने कहा कि मीम्स आपके लिए मजाक होंगे, लेकिन ये किसी के जीवन का सवाल होता है।