बेतुके बयानों से भारतीय विज्ञान कॉन्ग्रेस की धूमिल होती छवि

प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में जय जवान-जय किसान-जय विज्ञान के साथ 'जय अनुसंधान' का भी नारा दिया परन्तु कुछ विचित्र और अवैज्ञानिक शोधपत्र प्रस्तुत किए जाने से मीडिया में प्रधानमंत्री का इतना महत्वपूर्ण संदेश दब गया।

विगत कुछ वर्षों से भारतीय विज्ञान कॉन्ग्रेस एक विवादास्पद आयोजन बनकर रह गया है। तीन वर्ष पूर्व विज्ञान कॉन्ग्रेस में प्राचीन भारत में विमान तकनीक पर शोधपत्र पढ़ा गया था जिसपर बवाल हुआ था। रॉयल सोसाइटी के अध्यक्ष नोबेल पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिक वेंकी रामकृष्णन ने तब विज्ञान कॉन्ग्रेस को सर्कस कहा था। 

इस वर्ष जालंधर में संपन्न हुई 106वीं विज्ञान कॉन्ग्रेस में भी वही हुआ जिसकी आशंका थी।विज्ञान कॉन्ग्रेस में प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में देश को उन्नति के पथ पर चलने के लिए जय जवान-जय किसान-जय विज्ञान के साथ ‘जय अनुसंधान’ का भी नारा दिया परन्तु कुछ विचित्र और अवैज्ञानिक शोधपत्र प्रस्तुत किए जाने से मीडिया में प्रधानमंत्री का इतना महत्वपूर्ण संदेश दब गया।

विज्ञान कॉन्ग्रेस में तमिलनाडु स्थित वर्ल्ड कम्युनिटी सर्विस सेंटर नामक संस्थान से आए कनन जेगाथाला कृष्णन ने एक से बढ़कर एक दावे किए। कृष्णन ने दावा किया कि उनके सिद्धांतों के सामने न्यूटन और आइंस्टीन द्वारा प्रतिपादित भौतिकी के सिद्धांत बौने हैं। कृष्णन ने कहा कि समूचा भौतिक विज्ञान सैद्धांतिक रूप से गलत है किन्तु उन सिद्धांतों के आधार पर जो प्रयोग किए हैं वे सही हैं और यदि कृष्णन के सिद्धांतों को वैज्ञानिक जगत स्वीकार कर लेता है तो भौतिकी की सारी गुत्थियाँ सुलझ जाएँगी।

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विचित्र और निराधार बातें करते हुए कृष्णन यहीं नहीं रुके, उन्होंने यह भी कहा कि जल्दी ही अंतरिक्ष में खोजी गई गुरुत्व तरंगों का नाम ‘मोदी तरंग’ और आइंस्टीन द्वारा खोजे गए ‘गुरुत्वाकर्षण लेंस प्रभाव’ का नाम केंद्रीय मंत्री हर्षवर्धन के नाम पर ‘हर्षवर्धन प्रभाव’ रखा जाएगा। कृष्णन के अनुसार सौर मंडल में सारे ग्रह सूर्य की परिक्रमा गुरुत्वाकर्षण बल के कारण नहीं करते बल्कि इसलिए करते हैं क्योंकि अन्तरिक्ष (space) उन्हें संकुचित करता है।

दुखद यह रहा कि न्यूटन और आइंस्टीन को अल्पज्ञानी सिद्ध करने जैसी विचित्र बातें कृष्णन ने भारतीय विज्ञान कॉन्ग्रेस में भाग लेने आए बच्चों के सम्मेलन में कही। विज्ञान कॉन्ग्रेस में राष्ट्रीय किशोर वैज्ञानिक सम्मेलन का आयोजन किया गया था जिसमें कृष्णन को आमंत्रित किया गया था। इसी सम्मेलन में आंध्र विश्वविद्यालय के कुलपति नागेश्वर राव ने महाभारत का संदर्भ देते हुए कहा कि कौरवों का जन्म टेस्ट ट्यूब तकनीक से हुआ था।

उन्होंने यह निष्कर्ष महाभारत के आदिपर्व के उस प्रसंग से निकाला जिसमें कौरवों के जन्म की कथा है। उस कथा में वर्णन है कि वेद व्यास ने गांधारी के गर्भ के सौ भागों को सौ घड़ों में भर दिया था जिससे कौरवों का जन्म हुआ था। नागेश्वर राव ने यह भी कहा कि रावण के पास केवल पुष्पक विमान ही नहीं बल्कि चौबीस अन्य प्रकार के विमान भी थे।

ऐसे विचार जिनकी प्रमाणिकता आज के समय में प्रयोगों द्वारा सिद्ध न की जा सके, उन्हें बच्चों के सामने प्रकट करने पर क्या संदेश गया होगा यह विचारणीय है। वह भी तब जबकि विज्ञान कॉन्ग्रेस में प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में 2022 तक अंतरिक्ष में गगनयान भेजने का संकल्प लिया। ऐसा ही संकल्प केनेडी ने 1962 में लिया था और अमेरिका का निर्धारित समय से पहले चन्द्रमा पर जाने का अभियान पूरा हुआ था। संकल्प से सिद्धि की यह यात्रा केवल भाषणों से नहीं बल्कि कर्मठ वैज्ञानिकों की मेहनत से पूर्ण हुई थी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में इसी प्रेरणा को बल दिया किन्तु दुर्भाग्य से कुछ ऊटपटांग तथा अवैज्ञानिक विचारों वाले व्यक्तियों के चलते विगत तीन-चार वर्षों से निरंतर भारतीय विज्ञान कॉन्ग्रेस की छवि धूमिल हो रही है।विज्ञान कॉन्ग्रेस में इस प्रकार के अनर्गल प्रलापों पर भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार के विजय राघवन ने आपत्ति करते हुए अपने ब्लॉग पर लिखा कि छद्म-विज्ञान को प्रसारित करने वाले जिन गुरिल्लों को कचरे के डिब्बे में होना चाहिए वे मुक्त होकर घूम रहे हैं।

प्रोफेसर राघवन ने अपने ब्लॉग में तीन महत्वपूर्ण बिंदुओं को रेखांकित किया है। पहला यह कि विज्ञान कॉन्ग्रेस में केंद्र सरकार की महत्वपूर्ण भूमिका है यद्यपि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा इस आयोजन की पूरी फंडिंग नहीं की जाती। भारतीय विज्ञान कॉन्ग्रेस एसोसिएशन द्वारा विभिन्न स्रोतों से अनुदान एकत्रित कर विगत सौ वर्षों से विज्ञान कॉन्ग्रेस का आयोजन किया जाता रहा है।

प्रधानमंत्री तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री इस आयोजन में सम्मिलित होते रहे हैं इसलिए विज्ञान कॉन्ग्रेस में प्रधानमंत्री का संबोधन देश की विज्ञान नीति की दिशा निर्धारित करता है। प्रोफेसर राघवन लिखते हैं कि इस संदर्भ में हमें प्रधानमंत्री के पूर्व में दिए संबोधनों को ध्यान में रखना चाहिए। 2015 से अब तक सभी विज्ञान कॉन्ग्रेस में प्रधानमंत्री के संबोधन हमारी आकांक्षाओं को परिलक्षित करते हैं।

इसका अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि इस वर्ष आयोजित विज्ञान कॉन्ग्रेस में प्रधानमंत्री ने बड़ी महत्वपूर्ण बात कही कि विज्ञान वैश्विक है किन्तु तकनीक क्षेत्रीय है। इसका अर्थ यह हुआ कि विज्ञान भले ही देशों की सीमाओं में न बंधा हो किन्तु तकनीक किसी भी देश की आर्थिक उन्नति हेतु आवश्यक है इसलिए तकनीकी विकास की दिशा में हमें स्वावलंबन पर ध्यान केंद्रित करना होगा।

प्रधानमंत्री ने यह भी याद दिलाया कि आज समय अंतर्विषयक शोध करने का है जिसमें विषयों में बँधकर शोध नहीं किया सकता। हमें अब विश्व के पीछे चलने की अपेक्षा शोधकार्य में उसका नेतृत्व करने की आवश्यकता है। प्रधानमंत्री का संबोधन उनके उस संकल्प को पुष्ट करता है जिसमें उन्होंने कहा था कि हमें अब ‘रिसर्च एन्ड डेवलपमेंट’ नहीं बल्कि ‘रिसर्च फॉर डेवलपमेंट’ के बारे में सोचना चाहिए। प्रोफेसर राघवन के अनुसार हमें प्रधानमंत्री के विचारों का अनुकरण करते हुए विज्ञान के नवीन विषयों पर छोटे राज्य स्तरीय विश्विद्यालयों में शोध को बढ़ावा देना चाहिए।  

दूसरी महत्वपूर्ण बात जो प्रोफेसर राघवन ने कही वह यह कि विज्ञान कॉन्ग्रेस में बच्चों की भागीदारी बढ़ चढ़कर होती है ऐसे में वक्ताओं का चयन महत्वपूर्ण है। वक्ताओं के चयन में सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं होता और यदि भारतीय विज्ञान कॉन्ग्रेस एसोसिएशन कृष्णन और नागेश्वर राव जैसे वक्ताओं को आमंत्रित करता है तो उसे समाज से विरोध झेलना पड़ेगा।

इस पूरे प्रकरण में अनदेखा पहलू यह भी है कि विज्ञान कॉन्ग्रेस में किए जाने वाले छद्म-वैज्ञानिक दावों से न केवल देश की छवि को नुकसान पहुँचता है बल्कि लिबरल-मार्क्सवादी विचारकों को भारतीय सनातन संस्कृति पर हमले करने का मौका भी मिल जाता है। ऐसा वे कई बार कर चुके हैं, उदाहरण के लिए जब केंद्रीय मंत्री सत्यपाल सिंह ने डार्विन के सिद्धांत पर प्रश्न उठाए थे तब उन्हें लिबरल-मार्क्सवादी विचारकों की आलोचना झेलनी पड़ी थी।

मार्क्सवादी आलोचक प्रायः इसी ताक में रहते हैं कि जैसे ही सरकार के किसी मंत्री अथवा सरकार द्वारा प्रायोजित किसी आयोजन में छद्म-वैज्ञानिक वक्तव्य दिए जाएँ वैसे ही सनातन संस्कृति का उपहास किया जाए। ऐसी आलोचनाओं का उत्तर देते हुए एक बार प्रख्यात लेखक अरविंदन नीलकंदन ने अपने एक लेख में लिखा था कि कैसे बालासाहेब देवरस से लेकर रमन महर्षि तक सनातन संस्कृति के कई संवाहकों ने डार्विन के सिद्धांत से असहमत होते हुए भी कभी अवैज्ञानिक बातें नहीं कही।

अंत में प्रोफेसर राघवन लिखते हैं कि प्रतिवर्ष विज्ञान कॉन्ग्रेस की एक विशेष थीम होती है। इस वर्ष का विषय भविष्य की तकनीक था। विज्ञान कॉन्ग्रेस में वक्ताओं का एक बार चयन हो जाने के बाद वे क्या कहते हैं इस पर नियंत्रण नहीं रखा जा सकता। आयोजकों के पास वक्ताओं की अर्हता निर्धारित करने का ऐसा कोई प्रावधान भी नहीं है जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि वे छद्म-वैज्ञानिक विषयों पर न बोलें।

वैज्ञानिक सिद्धांतों से असहमति का भी एक इतिहास रहा है। एक जमाने में सोवियत रूस के वैज्ञानिक जेनेटिक्स को नकारते थे, आज जेनेटिक्स के जनक जेम्स वॉटसन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की महत्ता को नकारते हैं। इसलिए विज्ञान की व्याख्या और उसका प्रयोग करने में अत्यंत सावधानी से चिंतन करने तथा जनसामान्य को साथ लेकर चलने की महती आवश्यकता है।

प्रोफेसर राघवन और अन्य संगठनों की तीखी आलोचना के पश्चात इस प्रकरण की पुनरावृत्ति न हो यह सुनिश्चित करने के लिए विज्ञान कॉन्ग्रेस एसोसिएशन ने तत्काल प्रभाव से निर्णय लिया है कि आगामी विज्ञान कॉन्ग्रेस में सम्मिलित होने के पहले ही वक्ताओं से उनके शोधपत्र अथवा व्याख्यान के एब्स्ट्रैक्ट ले लिए जाएँगे।

यही नहीं, यदि कोई वक्ता अपने मूल विषय से हटकर अवैज्ञानिक अथवा छद्म वैज्ञानिक विचार प्रस्तुत करेगा तो उसे तुरंत मंच से हटा दिया जाएगा। यह स्वागत योग्य निर्णय है और वैज्ञानिक जगत ने आशा प्रकट की है कि इससे विज्ञान कॉन्ग्रेस जैसे प्रतिष्ठित आयोजन की विश्वसनीयता बनी रहेगी।

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