Thursday, July 29, 2021
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एक पत्रकार जिसे धारदार हथियारों से काट डाला गया… आज अपराधियों की मजहबी पहचान छिपाने पर करते सवाल

गणेश शंकर 'विद्यार्थी' पत्रकारों की उस जमात से प्रश्न करते जो मुसलमान अपराधी का नाम लिखने से डरती है, जो किसी मजहबी नुमाइंदे के बलात्कारी होने पर खबरों के शीर्षक और फीचर इमेज में हिन्दू साधु के नाम और फोटो का प्रयोग करती है।

इतिहास लिखने वालों के अपने स्वार्थ होते हैं। वे अपने हित के हिसाब से ड्राफ्ट बनाते हैं और उस पर अतीत की कहानियों को छाप देते हैं। इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करने वाले बहुत हैं। ये कोई भी हो सकते हैं। लेखक, इतिहासकार, कहानीकार एवं कलाकार… कोई भी। ये कुंठा से ग्रसित होकर बदनाम करेंगे। तथ्यों की हत्या कर देंगे। सत्य को लेखनी की मशाल से जलाकर निष्पक्ष होने का ढोंग करेंगे। इनके लिए निष्पक्ष होना कठिन नहीं, क्योंकि ये निष्पक्षता की एक ही सीधी गली में चलते हैं जो मजहबी दुकानों के सामने से गुजरती है।

आज 25 मार्च है। भारत के एक ऐसे पत्रकार की पुण्यतिथि जिसके जीवन की व्याख्या अपने नैरेटिव के हिसाब से सबने की। हिन्दी पत्रकारिता हो या अंग्रेजी, स्वार्थ और तुष्टिकरण के अँधेरे में सभी अपने हितों की खोज करते रहे। गणेश शंकर ‘विद्यार्थी’, एक ऐसा नाम जो आज लिया तो जाता है किन्तु किस परिप्रेक्ष्य में, यह किसी को ज्ञात नहीं। वर्तमान समय के स्वघोषित निष्पक्ष पत्रकार आज कलम उठाएँगे और उसी बने-बनाए ड्राफ्ट पर अपनी कहानी छापेंगे।

धर्मनिरपेक्षता, निष्पक्षता और प्रश्न करने का अभिनय करने वाले पत्रकार गणेश शंकर ‘विद्यार्थी’ का नाम लेकर उन्हें उलाहना देंगे जो उनकी तरह नहीं हैं। जिस गणेश शंकर ने समाज के हित के लिए कलम उठाई और तत्कालीन समय में उत्पीड़न एवं अन्याय के विरोध में खड़े रहे, उनका नाम लेकर आज वो पत्रकार भी पत्रकारिता पर ज्ञान बाँटते हैं जो पीड़ित के नाम, उसकी मजहबी पहचान और उसकी कुछ विशेष निशानियों के आधार पर अपराध की इन्टेन्सिटी को तौलते हैं।

गणेश शंकर ‘विद्यार्थी’ वास्तविकता में निष्पक्ष थे। गाँधीवादी विचारों एवं क्रांतिकारी व्यक्तित्व का सम्मिश्रण थे वे। उन्होंने कभी नहीं देखा कि जिसकी आलोचना वे कर रहे हैं, वह किस धर्म का है, किस वर्ग का है। अमीर है अथवा गरीब। जमींदार है या पूँजीपति। उनके लिए तो बस अन्याय, अन्याय था और अन्याय करने वाला दोषी। यही होती है निष्पक्षता।

आज मात्र निष्पक्षता शब्द लिखने योग्य ही कौन है? वो जिनके लिए सेना के गरीब जवान के जीवन का कोई मूल्य नहीं और आतंकवादी, हेडमास्टर का बेटा, क्रिकेट फैन और गणित-भूगोल का शानदार विद्यार्थी हो जाता है। या फिर वो जो आपसी रंजिश में मरे मुसलमान की मौत को लेकर असहिष्णुता का नंगा नाच करते हैं और दिल्ली में मरने वाले अंकित शर्मा, रतनलाल, दिलबर नेगी को एक लाश मानकर दूर से ही निकल जाते हैं। डासना में ‘थप्पड़’ पर तो पत्रकारों की कलमें हिलने लगती हैं, स्याही समुद्री लहरों की भाँति आसमान छूने लगती है, लेकिन कमलेश तिवारी के गले को रेत दिए जाने पर इन्हीं पत्रकारों की आँखों के सामने इनकी कलमों की स्याही सूख जाती है। आजकल डिजिटल माध्यमों का जमाना है। स्याही की आवश्यकता भी नहीं, किन्तु कीबोर्ड पर उँगलियाँ भी नहीं चल पाती हैं। 

कौन निष्पक्ष, कौन धर्मनिरपेक्ष   

जो वन वे वाली धर्मनिरपेक्षता की आदर्श व्यवस्था की कल्पना करते हैं, मजहबी जिहाद पर आँखों को मूँदकर रखते हैं और जो झुंड बनाकर राष्ट्रवाद की पवित्र धारा को मलिन करने का प्रयास करते हैं, क्या ऐसे पत्रकार गणेश शंकर ‘विद्यार्थी’ का नाम भी लेने के अधिकारी हैं?

लेकिन ये ‘पत्रकार’ ऐसा करते हैं। वे गणेश शंकर का नाम लेकर अपने पापों को धोते हैं। ये ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि इन्हें इतिहास का अपने अनुसार उपयोग करना सिखाया गया है। ये लंबे लेखों और सुंदर शब्दों से गणेश शंकर को श्रद्धांजलि देते हैं और आँसू बहाते हैं। प्रश्न करते हैं कि यदि आज गणेश शंकर ‘विद्यार्थी’ होते तो कहाँ होते? तब इन्हीं की जमात का एक और स्वघोषित निष्पक्ष पत्रकार उत्तर देता है, ‘जेल में’।

इन पत्रकारों ने तब प्रश्न नहीं किया जब घोटालों से भारत बर्बाद हो रहा था। ये पत्रकार तब भी प्रश्न नहीं करते, जब इस्लामी आतंकवादी भारत के शहरों में घुसकर सैकड़ों काफिरों को मार देता है। इन पत्रकारों ने तब भी प्रश्न नहीं उठाए, जब हिन्दू आतंकवाद शब्द गढ़ा जा रहा था और मुंबई हमलों में पाकिस्तान की भूमिका को धुँधला किए जाने के षड्यंत्र किए जा रहे थे।

गणेश शंकर ‘विद्यार्थी’ की कलम और उनका अखबार ‘प्रताप’ आज भी पत्रकारों और पत्रकारिता के लिए आदर्श है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उन्होंने सत्य पर अडिग रहते हुए अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध लेखन का कार्य किया। अपने ओजस्वी लेखों से उन्होंने अंग्रेजी सरकार की जड़ें हिलाकर रख दी। वो तब का समय था। आज का समय अलग है।

अपने जीवन को गरीबों और मजदूरों के लिए समर्पित करने वाले गणेश शंकर आज क्या उज्ज्वला और पीएम आवास जैसी योजनाओं पर सरकार के समर्थन में नहीं होते? आर्थिक असमानता के विरुद्ध लेख लिखने वाले गणेश शंकर क्या रोजगार देने वाली मुद्रा योजना की सराहना नहीं करते? गणेश के ही उत्तर प्रदेश में जहाँ कानून-व्यवस्था का कोई नाम नहीं था और जहाँ डकैती, लूट, बलात्कार, अपहरण और फिरौती आम घटनाओं की तरह ही थी, उस प्रदेश में कानून-व्यवस्था का राज स्थापित कर अंग्रेजों जैसी शोषक प्रवृत्ति के समाजवादियों को खदेड़ने वाले योगी आदित्यनाथ का साधुवाद क्या गणेश नहीं करते?

गणेश शंकर प्रश्न पूछते। जरूर पूछते। लेकिन बंगाल और केरल में हो रही राजनैतिक हत्याओं पर। महाराष्ट्र के सियासी नाटक और महामारी की रोकथाम की असफलता पर। धार्मिक केंद्रों के रखरखाव और प्रबंधन में हिंदुओं के साथ हो रहे छल और अन्याय पर। गणेश शंकर ‘विद्यार्थी’ पत्रकारों की उस जमात से प्रश्न करते जो मुसलमान अपराधी का नाम लिखने से डरती है, जो किसी मजहबी नुमाइंदे के बलात्कारी होने पर खबरों के शीर्षक और फीचर इमेज में हिन्दू साधु के नाम और फोटो का प्रयोग करती है। गणेश शंकर हर उस पत्रकार से प्रश्न करते जो हिंदुओं को उनके धर्म के कारण दोयम दर्जे का मानता आया है। तब यही निष्पक्ष और क्रांतिकारी पत्रकार गणेश शंकर ‘विद्यार्थी’ को भी ‘भक्त’ कह देते।

उपद्रवियों की एक भीड़ को समझाने की कोशिश कर रहे गणेश शंकर विद्यार्थी को आज ही के दिन, 25 मार्च 1931 को तेज धार वाले हथियारों से काट डाला गया था। यही वो दिन था जब कानपुर में सांप्रदायिक दंगे हो रहे थे। भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी दिए जाने के विरोध में तत्कालीन काँग्रेस सदस्यों द्वारा जुलूस निकाला जा रहा था। यह जुलूस जब एक समुदाय विशेष के क्षेत्र से गुजरा तब अचानक ही दंगे भड़क उठे। जब गणेश को दंगों की जानकारी मिली तो वे अकेले ही उस मुस्लिम बहुल इलाके में दंगों को रोकने के लिए निकल पड़े किन्तु दंगों को रोकने के इस प्रयास का परिणाम हुआ उनकी हत्या। कानपुर के चौबे गोला चौराहे के पास चाकू घोंप कर गणेश शंकर ‘विद्यार्थी’ की हत्या कर दी गई। हत्या किस समुदाय के लोगों ने की इसका अंदाजा हत्या की क्रूरता से लगाया जा सकता है। गणेश शंकर एक सुधारवादी व्यक्ति थे, किन्तु बड़े धर्मपरायण और ईश्वरभक्त भी थे। जब तत्कालीन समाज में धर्मनिरपेक्षता के बीज पड़ रहे थे, तब गणेश अपनी धार्मिक पहचान को बनाए हुए थे।

समाज में शांति की इच्छा रखने वाला एक धर्मपरायण पत्रकार सही मायनों में क्रांतिकारी था। लिहाजा आप उन पत्रकारों को देखें और उनका नाम याद रखें जो गणेश शंकर का नाम लेकर धर्मनिरपेक्षता का ढोंग करते हैं। उनके नाम का उपयोग अपने स्वार्थ और अपनी झूठी पहचान को साधने का कार्य के लिए करते हैं। हम आपको गणेश शंकर विद्यार्थी की जीवनी भी उपलब्ध करा सकते थे, लेकिन हमने वर्तमान भारत के कुछ दोगले और छद्म पत्रकारों के उस झुंड से आपका परिचय कराया जो इतिहास के ऐसे ही कुछ पात्रों को अपने नैरेटिव के हिसाब से याद करता है और उनके नाम पर आपको भ्रमित करता है। 

याद रखिए सिर्फ प्रश्न पूछना ही पत्रकारिता नहीं है, अपितु सही प्रश्न पूछना और जिम्मेदार से प्रश्न पूछना ही वास्तविक पत्रकारिता है।

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ओम द्विवेदी
Writer. Part time poet and photographer.

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