Thursday, April 15, 2021
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पहली बार प्रधानमंत्री बने काशी की ‘देव दीपावली’ का हिस्सा, जानिए इस महापर्व का इतिहास…

ऐसा कहा जाता है कि काशी की उत्तर वाहिनी गंगा के तट पर कार्तिक पूर्णिमा को मनाई जाने वाली देव दीपावली को पूरा देवलोक धरती पर होता है। काशी के घाट पर मनाई जाने वाली देव दीपावली का इतिहास लगभग साढ़े तीन दशक पुराना है। शुरुआत हुई थी काशी के ही पंचगंगा घाट से और तब सिर्फ स्थानीय लोग घाट पर दीया जलाते थे।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सोमवार (30 नवंबर 2020) को दीप प्रज्वलित कर कशी में देव दीपावली महोत्सव का शुभारंभ किया। इस दौरान उनके साथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी थे।

देश समेत पूरी दुनिया की निगाहें आज काशी के इस भव्य आयोजन पर टिकी हुई हैं। इस अवसर पर बोलते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, “कोरोना काल ने भले ही बहुत कुछ बदल दिया है लेकिन काशी की ये ऊर्जा, काशी की ये भक्ति, ये शक्ति उसको थोड़े कोई बदल सकता है।” प्रधानमंत्री मोदी ने इसके अलावा संस्कृति, आस्था और मूल्यों को विरासत बताते हुए कई अहम बातें कहीं। यह भारत के इतिहास में पहला ऐसा मौक़ा है जब देश का कोई प्रधानमंत्री देव दीपावली के अवसर पर काशी में मौजूद है।

ऐसा कहा जाता है कि काशी की उत्तर वाहिनी गंगा के तट पर कार्तिक पूर्णिमा को मनाई जाने वाली देव दीपावली को पूरा देवलोक धरती पर होता है। काशी के घाट पर मनाई जाने वाली देव दीपावली का इतिहास लगभग साढ़े तीन दशक पुराना है। शुरुआत हुई थी काशी के ही पंचगंगा घाट से और तब सिर्फ स्थानीय लोग घाट पर दीया जलाते थे, लेकिन पहली बार साल 1985 के दौरान मंगला गौरी मंदिर के महंत नारायण गुरु ने देव दीपावली को विस्तृत करने का प्रयास किया। अस्सी के दशक में भी स्वच्छता गंगा के घाटों के लिए बड़ी समस्या थी जिसको मद्देनज़र रखते हुए महंत नारायण गुरु ने कहा कि घाटों पर दिया जलाया जाना चाहिए। उन्होंने पंचगंगा के अलावा कुल 5 घाटों पर दीप प्रज्वलित करना शुरू किया। 

(साभार – सोशल मीडिया)

नारायण गुरु ने इस आयोजन के लिए लोगों से सहयोग माँगना भी शुरू किया, दुकानदारों से तेल और घी माँगा। धीरे-धीरे जनता इस आयोजन की सार्थकता को देखते हुए सहयोग के लिए आगे आई। एक समाचार समूह में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक नारायण गुरु का कहना था कि उस दौर में 100 दीयों पर लगभग 12 रुपए खर्च होते थे। कालान्तर में इस आयोजन का दायरा 6 घाटों से बढ़ कर मुख्य घाटों तक बढ़ गया। मंगला गौरी मंदिर के महंत नारायण गुरु की अगुवाई में 90 के दशक तक देव दीपावली का यह आयोजन काशी के 84 में से 31 घाटों तक विस्तृत हो गया था। 

इसके बाद एक और मुहिम छेड़ी गई जिसके तहत इसे काशी के हर घाट पर आयोजित करने का प्रयास हुआ और केंद्रीय देव दीपावली महासमिति का गठन हुआ। आने वाले कुछ वर्षों में काशी की देव दीपावली का स्वरूप दिव्य हो गया। इसी बीच काशी के तालाबों और जलाशयों पर भी देव दीपावली मनाने की शुरुआत हुई। कथित तौर पर 1992 के दौरान विवादित ढाँचा गिराए जाने के बाद भी काशी की देव दीपावली का विस्तार हुआ और नब्बे का दशक ख़त्म होते होते इस आयोजन की ख्याति पूरे विश्व में प्रचलित ही गई। एक मान्यता के अनुसार देवता भी देव दीपावली में शामिल होते हैं और इसके पीछे की पौराणिक कथा भी बेहद चर्चित है।

(साभार – सोशल मीडिया)

कहा जाता है कि भगवान शिव के ज्येष्ठ पुत्र और देवताओं के सेनापति कार्तिकेय ने तारकासुर का वध कर दिया था। इसके बाद उसके तीनों बेटों तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली (त्रिपुरासुर) ने देवताओं से प्रतिशोध लेने का प्रण किया। उन्होंने कठोर तपस्या की और तपस्या के बाद ब्रह्मा प्रकट हुए तब उनसे अमरता का वरदान माँगा। ब्रह्मा ने कहा यह संभव नहीं है कुछ और माँगो। तब त्रिपुरासुर ने कहा हमारे लिए तीन पुरी (नगर) का निर्माण कर दें। यह तीनों पुरी जब अभिजित नक्षत्र में एक पंक्ति में खड़ी हों और कोई क्रोधजित अत्यंत शांत अवस्था में असंभव रथ और असंभव बाण का सहारा लेकर हमारा वध करना चाहे तभी हमारी मृत्यु हो। ब्रह्मा ने उन्हें यह वरदान दे दिया। 

वरदान के अनुसार त्रिपुरासुर को तीन पुरी प्रदान की गई। तारकाक्ष के लिए स्वर्णपुरी, कमलाक्ष के लिए रजतपुरी और विद्युन्माली के लिए लौहपुरी। इसके बाद तीनों ने ऋषि-मुनियों और देवताओं पर अत्याचार करना शुरू कर दिया, देवता भी इनका कुछ नहीं कर पाए। सभी देवता शिव की शरण में गए और उन्होंने देवताओं के कहा कि सब मिल कर प्रयास क्यों नहीं करते हैं? देवताओं ने कहा हम ऐसा कर चुके हैं लेकिन हम असफल रहे हैं। फिर शिव ने त्रिपुरासुर के वध का संकल्प लिया और देवताओं ने उन्हें अपना आधा बल दे दिया। शिव ने पृथ्वी को रथ बनाया, सूर्य और चंद्रमा इस रथ के पहिये बने, सृष्टा सारथी बने, विष्णु बाण, मेरुपर्वत धनुष और वासुकी बने धनुष की डोर। 

(साभार – सोशल मीडिया)

अंत में शिव ने उस असंभव रथ पर सवार होकर धनुष चढ़ाया और अभिजित नक्षत्र में तीनों पुरी के एक पंक्ति में आते ही कठोर प्रहार किया। प्रहार के ठीक बाद तीनों पुरी जल कर भस्म हो गई और त्रिपुरासुर का भी अंत हो गया। ऐसा माना जाता है कि यह दिन कार्तिक पूर्णिमा का था। त्रिपुरासुर का अंत होते ही सभी देवता प्रफुल्लित होकर शिव की नगरी काशी पहुँचे और सभी ने गंगा के घाट पर दीप प्रज्वलित किए। यह भी एक कारण है कि कार्तिक पूर्णिमा को त्रिपुरारी पूर्णिमा भी कहा जाता है। इस बार की देव दीपावली कई मायनों में विशेष है, जिसमें सबसे उल्लेखनीय है कि पहली बार देश के प्रधानमंत्री इस महापर्व का हिस्सा बन रहे हैं।   

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ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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