Thursday, April 15, 2021
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भगवान बिना मंदिर, मिट्टी में दफन हैंडपंप… ओडिशा के सतभाया (7 गाँवों का समूह) को कौन निगल र​हा

“जमीन का टुकड़ा और एक घर जाहिर है हमारे लिए बहुत महत्व रखता है। हमने बहुत इंतजार किया। लेकिन हमारा जीवन, हमारा घर सब समुद्र ने ले लिया। पिछले 4 सालों में चौथी बार हम अपना घर बदल रहे हैं।‘

ओडिशा के केंद्रपाड़ा जिले में तटीय क्षेत्र में बसे 7 गाँव धीरे-धीरे नक्शे से गायब हो रहे हैं। 17 किलोमीटर के रास्ते पर कभी सतभाया पंचायत (सात गाँवों का समूह) थी। लेकिन अब यहाँ बस रेत की चादर, कुछ ताड़ के पेड़, आवारा पशु, मिट्टी में धँस चुका हैंड पंप और बिन भगवान की मूर्ति का एक मंदिर है।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट बताती है कि मृदा अपरदन (जमीन का कटाव) के कारण ये 7 ग्राम नक्शे से गायब होते जा रहे हैं। रास्ते में बना एक मंदिर है, जहाँ कभी कई परिवार आते थे, मगर अब इस जगह प्रफुल्ल लेंका ही आते-जाते हैं। लेंका उन्हीं 571 लोगों में से हैं जिन्हें 2018 में पुनर्वास के लिए जिला प्रशासन ने 12 किमी दूर बागपटिया भेज दिया था। हालाँकि, 40 साल के लेंका वापस लौट आए क्योंकि उन्हें अपनी 20 भैंसों की देखभाल करनी थी।

रिपोर्ट बताती है कि इलाके में कोई बुनियादी सुविधाएँ नहीं हैं, जिसके चलते प्रशासन ने हाल में 148 परिवारों में से 118 परिवारों के पुनर्वास के आदेश दिए हैं, वही बाकी बचे 30 परिवारों के लिए कहा है कि उनके लिए कागजी कार्रवाई होना अब भी बाकी है।

एडिशनल डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट बसंत कुमार राउत ने बताया कि प्रशासन, बीजू पक्का घर योजना के तहत 10 डिसिमल जमीन और डेढ़ लाख रुपए इन लोगों को घर निर्माण के लिए देगा।

बाबू मलिक नाम के स्थानीय हालातों को बयाँ करते हुए कहते हैं, “जमीन का टुकड़ा और एक घर जाहिर है हमारे लिए बहुत महत्व रखता है। हमने बहुत इंतजार किया। लेकिन हमारा जीवन, हमारा घर सब समुद्र ने ले लिया। पिछले 4 सालों में चौथी बार हम अपना घर बदल रहे हैं।‘

उल्लेखनीय है कि 2018 में पहली बार इस क्षेत्र में लोगों के पुनर्वास पर काम हुआ था। जो लोग इस दौरान छूट गए उन्हें इन ग्रामों के अलावा अन्य गाँवों में किराए पर जाकर रहना पड़ा। रिपोर्ट बताती है कि लगभग एक दशक पहले तक, खेती और मछली पालन यहाँ के लोगों की आजीविका के मुख्य स्रोत थे। लेकिन समुद्र ने तेजी से कई घरों और कृषि भूमि को निगल लिया और मिट्टी की लवणता में वृद्धि हुई, जिससे जमीन उपजाऊ नहीं रही।

पवित्र कुमार साहू कहते हैं, “जैसे ही गाँव वाले गए। मैं भी अपने परिवार को लेकर दूसरे गाँव में चला गया। स्कूल भी नई कॉलोनी में शिफ्ट हो गया क्योंकि वहाँ रहने का कोई मतलब नहीं था। हम किराए पर रहने लगे। मैं केरल चला गया और लॉकडाउन के बाद यहाँ लौटा। मुझे आना ही पड़ा। तब से मैं यहाँ अकेला हूँ। मैं मछली पकड़कर उन्हें बेचता हूँ। इससे पहले भी मैं यही करता था।”

रिपोर्ट में नेशनल सेंटर फॉर कोस्टल रिसर्च की एक स्टडी का जिक्र है। इसके मुताबिक ओडिशा ने 1990 से 2016 के बीच 550 किमी तटीय सीमा का 28 प्रतिशत खोया है। अकेले केंद्रपाड़ा की 31 किमी जमीन खत्म हुई है।

बता दें कि केंद्रपाड़ा जिले की सतभया पंचायत में हो रहे मृदा अपरदन के कारण इलाका अब रेगिस्तान होता जा रहा है। ऐसे में उनके पुनर्वास की माँग लंबे समय से सरकार से हो रही थी। 2018 के बाद अभी हाल में प्रशासन ने 118 परिवारों के पुनर्वास के निर्देश दिए हैं। पहले इस इलाके को बचाने के लिए यहाँ सदाबहार जंगल बनाने की बात हुई थी, लेकिन लगातार हो रहे क्षय के कारण इलाके में बहुत तेजी से मिट्टी का स्तर बढ़ा है। समुद्र भी नजदीक आ गया है और माँ पंचुबारही का मंदिर मिट्टी में जा चुका है। इस इलाके के हालत देख किसी प्रकार का विकास कार्य भी संभव नहीं है, इसलिए 2017 से यहाँ ऐसे कामों पर रोक है।

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ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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