Thursday, October 29, 2020
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UNSC में भारत की दावेदारी: जिस स्थायी सीट के ऑफर को नेहरू ने ठुकराया, उसके लिए PM मोदी चला रहे मुहिम

कई विशेषज्ञों का मानना है कि G-4 देशों को यूएन सुरक्षा परिषद के चुनावों में वोट का ही बहिष्कार कर देना चाहिए और जब परमाणु बम रखने के आधार पर या अन्य मामलों में किसी देश को प्रतिबंधित करने की बात आए तो इसका विरोध करना चाहिए। पीएम मोदी के नेतृत्व में भारत ने इसकी शुरुआत भी कर दी है।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) उस संस्था का नाम है, जिसका गठन 1945 में ‘अंतरराष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा’ बनाए रखने के लिए हुआ था। संयुक्त राष्ट्र की छः प्रमुख अंगों में से एक सुरक्षा परिषद (UNSC) में फ़िलहाल 15 देश हैं। इनमें पाँच सदस्य स्थायी होते हैं। 130 करोड़ की जनसंख्या वाला भारत इसमें शामिल नहीं है।

UNSC का कहना है कि उसका उद्देश्य ‘शांति पर खतरों अथवा आक्रामक कृत्यों’ की पहचान करने में नेतृत्व करना है। साथ ही ये दो पक्षों के बीच शांति से मामले को निपटाने पर जोर देता है और इसके तरीके निकालता है। इसे संयुक्त राष्ट्र की तरफ से बलपूर्वक शांति-स्थापना के लिए प्रतिबन्ध लगाने के भी अधिकार प्राप्त हैं। 15 देशों में से 5 स्थायी सदस्य हैं- अमेरिका, यूके, चीन, रूस और फ़्रांस। अब जब इसमें सुधार की माँग हो रही है, भारत की दावेदारी सबसे तेज़ी से उभरी है।

भारत और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC)

24 अक्टूबर 1945 में अस्तित्व में आए इस संस्था की स्थायी सदस्यता के लिए भारत ने औपचारिक तौर पर दावा 3 अक्टूबर 1994 को पेश किया था। लेकिन जब बात भारत की विदेश नीति बात की आती है तो प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा की गई बड़ी गलतियों को उसमें न जोड़ा जाए, तो वो अधूरी है। कॉन्ग्रेस के ही नेता और वर्षों तक यूएन में सेवा देने के बाद भारत के विदेश राज्यमंत्री रहे शशि थरूर अपनी पुस्तक ‘Nehru: The Invention of India’ में यूएन के भारतीय अधिकारियों के द्वारा देखी गई फाइलों के हवाले से लिखा है कि जब जब नेहरू को अमेरिका ने भारत के UNSC में स्थायी सदस्य बनने का ऑफर दिया, तो उन्होंने कहा कि ये सीट चीन को दे दी जाए।

तो एक तरह से जवाहरलाल नेहरू ने एक बड़ा मौका गँवा दिया और उसके बाद से भारत कभी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) का स्थायी सदस्य नहीं बन सका। अब जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विश्व भर में भारत का डंका बजाया है तो भारत की UNSC में स्थायी दावेदारी कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उनकी प्रमुख माँगों में से एक रही है। उनका कहना है कि भारत के बिना ऐसी किसी संस्था का कामकाज कैसे चल सकता है?

हाल ही में संयुक्त राष्ट्र की जनरल असेंबली को सम्बोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट कहा कि बदलते घटनाक्रम और आज की परिस्थितियों को देखते हुए यूएन में सुधर की सख्त ज़रूरत है। उन्होंने पूछा कि आपदा के इस वक़्त में यूएन कहाँ है? साथ ही उन्होंने UNSC में भारत के लिए स्थानीय सदस्यता की माँग दोहराई। उन्होंने कहा कि दुनिया के हित के लिए ‘संतुलन और सशक्तिकरण’- दोनों आवश्यक है।

भारत की बढ़ती शक्ति का ही नतीजा है कि जून 2020 में हमारा देश 8वीं बार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) का अस्थायी सदस्य चुना गया। इससे पहले 1950-1951, 1967-1968, 1972-1973, 1977-1978, 1984-1985, 1991-1992 और 2011-12 में भारत UNSC का अस्थायी सदस्य रहा है। ताज़ा चुनाव में भारत को 184 मत (95.8%) मिले। इससे ज्यादा सिर्फ 2011-12 में भारत को 187 वोट मिले थे।

संयुक्त राष्ट्र अमेरिका में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में भी भारत की UNSC में स्थायी सदस्यता की माँग की धमक सुनाई पड़ रही है। अमेरिका के पूर्व डिप्लोमेट रिचर्ड वर्मा ने कहा कि डेमोक्रेट उम्मीदवार जो बिडेन अपनी जीत के बाद संयुक्त राष्ट्र में सुधारों को आगे बढ़ाएँगे और भारत जैसे देश को UNSC में स्थायी सदस्यता दिलाने में मदद करेंगे, इसमें कोई दो राय नहीं है। उन्होंने कहा कि उनके काल में भारत-अमेरिका सबसे करीबी दो देश होंगे।

2015 में यूएन की जनरल असेम्ब्ली में भी भारत ने साफ़ कर दिया था कि संयुक्त राष्ट्र में कोई भी सुधार तब तक अपूर्ण रहेगा, जब तक भारत को UNSC का स्थायी हिस्सा न बनाया जाए, क्योंकि ऐसा न किया जाना 21वीं सदी की वैश्विक चुनौतियों के अनुरूप नहीं होगा। भारत की माँग है कि न सिर्फ स्थायी, बल्कि UNSC की अस्थायी सदस्यों की संख्या भी बढ़ाई जाए। भारत ने 1994 में पहली बार UNSC की स्थायी सदस्यता के लिए अपनी दावेदारी पेश की थी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आने के बाद से बदल रहा है परिदृश्य

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब बोलते हैं तो पूरी दुनिया उन्हें सुनती है। इसका कारण है कि वो न सिर्फ वैश्विक समस्याओं के समाधान के लिए तकनीक के इस्तेमाल पर जोर देते हुए रोचक उपाय सुझाते हैं, बल्कि पक्षपात के लिए अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को उनकी गलतियाँ याद दिलाने से भी नहीं चूकते। जब यूएन का गठन हुआ था, तभी महात्मा गाँधी का मानना था कि भारत को UNSC में वीटो पावर रखने वाला सदस्य होना चाहिए।

चाहे दुबई हो या फिर अमेरिका का न्यूयॉर्क, नरेंद्र मोदी जहाँ भी गए- उन्होंने वहाँ रह रहे भारतीयों में एकता की अलख जगाई। उन्हें एहसास दिलाया कि वो एक हैं और एक होकर आवाज़ उठाएँगे तो किसी भी देश को सुनना पड़ेगा। भारत ने UNSC में अपनी अनौपचारिक दावेदारी तो इसके गठन के बाद से ही शुरू कर दी थी, लेकिन पीएम मोदी के आने के बाद जिस तरह से कई छोटे-बड़े देशों ने इसका समर्थन किया है, उससे भारत का मनोबल बढ़ा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस तरह से G-4 (भारत, जापान, ब्राजील और जर्मनी) को नई ऊँचाइयाँ देते हुए यूएन में एकता दिखाई है और सितम्बर 2015 में जिस ऐतिहासिक ‘टेक्स्ट बेस्ड नेगोशिएशन्स’ की यूएन में शुरुआत हुई, उसके पीछे भारत का बड़ा रोल था। यूएन में भारत ने अपनी धमक ऐसी बढ़ा ली है कि UNSC में स्थायी सदस्यता मिलना बस अब समय की बात है। चीन के साथ तनाव को देखते हुए चीन-विरोधी देशों को भी लग रहा होगा कि भारत को इसमें होना चाहिए।

हालाँकि, अभी इस मामले में बहुत कुछ किया जाना है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि G-4 देशों को यूएन सुरक्षा परिषद के चुनावों में वोट का ही बहिष्कार कर देना चाहिए और जब परमाणु बम रखने के आधार पर या अन्य मामलों में किसी देश को प्रतिबंधित करने की बात आए तो इसका विरोध करना चाहिए। पीएम मोदी के नेतृत्व में भारत ने इसकी शुरुआत भी कर दी है। यहाँ एक उदाहरण देखना ज़रूरी है।

यूएनएससी ने सूडान के खिलाफ ‘इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट’ के साथ सहयोग न करने का आरोप लगा कर प्रस्ताव पारित किया। लेकिन, भारत ने 2015 में निर्भयतापूर्वक वहाँ के राष्ट्रपति उमर हसन अल-बशीरस का इंडो-अफ्रीकन समिट के दौरान स्वगात किया। सूडानी राष्ट्रपति ने भी UNSC में भारत की दावेआरी का स्वागत किया और साथ ही समझाया कि कैसे यूएन में अफ्रीका का प्रतिनिधत्व काफी कम है।

UNSC (संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद) में भारत की स्थायी सदस्यता: अब आगे क्या?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार पेरिस में भारतीय समुदाय को सम्बोधित करते हुए कहा था कि भारत एक ऐसा देश है जो हमेशा शांति के लिए खड़ा रहता है और विश्व में शांति की स्थापना में मदद करता है- फिर भी UNSC में एक स्थायी सीट के लिए हमें संघर्ष करना पड़ रहा है। अब जब प्रथम विश्वयुद्ध के 100 वर्ष हो चुके हैं, पीएम ने कहा था कि महात्मा गाँधी और बुद्ध की भूमि को उसका ‘हक़’ मिलना चाहिए।

पीएम मोदी कहते हैं कि अब वो समय चला गया जब भारत मदद के लिए कहता था, अब ऐसा समय है जब देश सिर्फ अपना अधिकार माँग रहा है, कोई एहसान करने नहीं बोल रहा। क्लाइमेट चेंज के विषय में भारत पूरी दुनिया के नेतृत्व की ओर आगे बढ़ रहा है। सोलर अलायन्स ओर एक बड़ा कदम था। पेरिस में क्लाइमेट चेंज पर हुए समिट में भारत की धमक पूरी दुनिया ने काफी अच्छी तरह देखी।

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अनुपम कुमार सिंहhttp://anupamkrsin.wordpress.com
चम्पारण से. हमेशा राइट. भारतीय इतिहास, राजनीति और संस्कृति की समझ. बीआईटी मेसरा से कंप्यूटर साइंस में स्नातक.

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