Friday, October 7, 2022
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साल 2020 का अंतिम सूर्यग्रहण है आज: जानिए कैसे वैदिक ऋषियों ने पृथ्वी के गोल होने का पता लगाया

सूर्यग्रहण 3 प्रकार के होते हैं। पूर्ण, आंशिक और चक्राकार। जानिए क्यों लगता है सूर्यग्रहण और इस दौरान आकाशीय पिंडों की स्थिति क्या होती है?

सोमवार (दिसंबर 14, 2020) को साल 2020 का अंतिम सूर्यग्रहण (Solar Eclipse) लग रहा है, लेकिन ये भारत में नहीं दिखेगा। इस दिन लगने वाले सूर्यग्रहण का विस्तार 1.02 होगा, अर्थात चाँद (Moon) अपनी छाया से सूर्य (Sun) को पूर्णरूपेण ढक लेगा और पृथ्वी (Earth) के कुछ हिस्सों पर अँधेरा छाएगा। ये सूर्यग्रहण 2 मिनट 10 सेकेंड्स तक रह रह सकता है। चिली, अर्जेंटीना, दक्षिण अटलांटिक महासागर और दक्षिण प्रशांत महासागर से ये देखा जा सकेगा। दक्षिणी अमेरिका के लोगों को ये आंशिक रूप से दिखेगा।

हालाँकि, ये सूर्यग्रहण एशिया के किसी भी देश से नहीं देखा जा सकेगा। अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, यूरोप और दक्षिण अमरीका महाद्वीपों के अधिकतर हिस्सों से लोग इसे नहीं देख सकेंगे। इससे पहले जो जून 21, 2020 को सूर्यग्रहण आया था, उसका विस्तार 0.99 था। ये एक चक्राकार सूर्यग्रहण था। अब अगला सूर्यग्रहण सीधा जून 10, 2021 में ही देखा जा सकेगा। आज के सूर्यग्रहण को ब्राजील, पेरू और उरुग्वे के लोग भी देखेंगे।

क्या होता है सूर्यग्रहण (What is Solar Eclipse?)

आखिर सूर्यग्रहण होता क्या है और ये कैसे लगता है? जैसा कि हमें पता है, चाँद (Moon) पृथ्वी का चक्कर लगाता है और पृथ्वी (Earth) सूर्य का। चाँद ऐसे करते-करते कभी-कभी पृथ्वी और सूर्य के बीच आ जाता है। जब ऐसा होता है तो स्वाभाविक है कि सूर्य की किरणों को चाँद पृथ्वी तक पहुँचने से रोक लेता है। इसी कारण सूर्यग्रहण लगता है। सूर्यग्रहण के दौरान पृथ्वी पर जो अँधेरा होता है, वो असल में चाँद की ही छाया होती है।

सूर्यग्रहण भी 3 प्रकार के होते हैं। ‘टोटल’ (पूर्ण) सूर्यग्रहण (Total Solar Eclipse) उसे कहते हैं, जिसे पृथ्वी के एक छोटे हिस्से से ही देखा जा सकता है। जो लोग इसे देख पाते हैं, समझिए कि वो पृथ्वी पर पड़ने वाली चाँद की छाया के मध्य के क्षेत्र में रहने वाले लोग हैं। आकाश में अँधेरा छा जाता है, जैसे रात हो गई हो। इस दौरान सूर्य, चाँद और पृथ्वी एकदम सीधी रेखा में होते हैं। जबकि दूसरे प्रकार के सूर्यग्रहण को आंशिक (Partial Solar Eclipse) सूर्यग्रहण कहते हैं।

इस दौरान इस दौरान सूर्य, चाँद और पृथ्वी एक सीधी रेखा में नहीं होते। देखने पर प्रतीत होता है कि सूर्य के एक छोटे हिस्से पर कोई गहरी छाया प्रदर्शित हो रही है। जबकि तीसरे प्रकार का सूर्यग्रहण है चक्राकार (Annular Solar Eclipse) सूर्यग्रहण। ऐसे सूर्यग्रहण के समय चाँद, पृथ्वी से अपनी अधिकतम दूरी पर रहता है। स्पष्ट है कि तब ये यहाँ से छोटा दिख रहा होता है। तब ये सूर्य को पूरी तरह से नहीं ढक पाता है।

बड़े सूर्य के सामने छोटा का चाँद ऐसा लगता है, जैसे किसी सफ़ेद डिस्क के ऊपर एक छोटा सा काला डिस्क रखा हुआ हो। यही कारण है कि हमें चाँद के चारों तरफ एक रिंग दिखाई देता है। सूर्यग्रहण के दौरान पृथ्वी पर चाँद की दो छायाएँ पड़ती हैं, जिनमें से पहली को ‘Umbra’ कहते हैं। पृथ्वी पर आते-आते ये छाया छोटी पड़ जाती है। दूसरी वाली छाया को ‘Penumbra’ कहते हैं, और पृथ्वी पर आते-आते ये बड़ी होती चली जाती है।

जो लोग ‘Umbra’ छाया में होते हैं, उन्हें पूर्ण (Total) सूर्यग्रहण दिखाई देता है। ये दुर्लभ है और पृथ्वी के किसी भी हिस्से में औसतन प्रति 18 महीने में एक बार ही देखा जा सकता है। वैज्ञानिक अभी भी ग्रहण पर लगातार अध्ययन कर रहे हैं। चाँद का दिन वाला हिस्सा (जो हमेशा पृथ्वी की तरफ रहता है) कैसे ग्रहण के समय ठंडा पड़ जाता है, इस पर NASA ने अध्ययन किया है। हजारों वर्ष पूर्व वैदिक ऋषियों ने ग्रहण के दौरान ही पृथ्वी, सूर्य और चाँद के गोलाकार होने का पता लगाया होगा।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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