Thursday, January 27, 2022
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एक शक्तिपीठ जहाँ गर्भगृह में नहीं है प्रतिमा, जहाँ हुआ श्रीकृष्ण का मुंडन संस्कार: गुजरात का अंबाजी मंदिर

गर्भगृह में एक गुफा उपस्थित हैं जहाँ स्वर्ण निर्मित 'श्री यंत्र' स्थापित है। इस श्री यंत्र को इस प्रकार से सजाया जाता है कि उसे देखने पर ऐसा प्रतीत होता है कि साक्षात श्री अंबा माई विराजमान हैं।

भारत और उसके आसपास के दूसरे देशों में स्थित शक्तिपीठों का महत्व देश के दूसरे देवस्थानों से कहीं अधिक माना जाता है। ऐसा ही एक शक्तिपीठ गुजरात के बनासकांठा जिले में राजस्थान की सीमा पर अरासुर पर्वत पर स्थित है। हम बात कर रहे हैं श्री अरासुरी अंबाजी मंदिर की, जहाँ गर्भगृह में कोई प्रतिमा स्थापित नहीं है। इस पौराणिक स्थान की मान्यता इसलिए भी है क्योंकि यहाँ भगवान श्री कृष्ण का मुंडन संस्कार सम्पन्न हुआ था।

इतिहास

अंबाजी मंदिर का इतिहास युगों पुराना है क्योंकि यह वही स्थान है जहाँ माता सती का हृदय गिरा था, जिस कारण यह शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। इस दिव्य स्थान का वर्णन तंत्र चूड़ामणि में भी मिलता है। मंदिर के निर्माण के बारे में कोई पुख्ता जानकारी उपलब्ध नहीं है। लेकिन हाल में हुए कुछ अध्ययनों से यह पता चला है कि मंदिर का निर्माण वल्लभी शासक सूर्यवंश सम्राट अरुण सेन के चौथी शताब्दी में कराया गया था। हालाँकि मंदिर का वर्तमान स्वरूप 1975 में शुरू हुए जीर्णोद्धार के बाद प्राप्त हुआ है।

शक्ति के उपासकों के लिए यह मंदिर बहुत महत्व रखता है क्योंकि इसे ब्रह्मांड की शक्ति का केंद्र माना जाता है। श्री अरासुरी अंबाजी मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता है कि यहाँ मंदिर के गर्भगृह में कोई प्रतिमा नहीं है। गर्भगृह में एक गुफा उपस्थित हैं जहाँ स्वर्ण निर्मित ‘श्री यंत्र’ स्थापित है। इस श्री यंत्र को इस प्रकार से सजाया जाता है कि उसे देखने पर ऐसा प्रतीत होता है कि साक्षात श्री अंबा माई विराजमान हैं। माँ के इसी स्वरूप को देश भर से आने वाले श्रद्धालु पूजते हैं। मंदिर का महत्व इसलिए भी और बढ़ जाता है क्योंकि यहाँ भगवान श्री कृष्ण का मुंडन संस्कार संपन्न हुआ था।

संरचना

अंबाजी मंदिर में होने वाले सभी प्रकार के पूजा अनुष्ठान चाहर चौक में सम्पन्न कराए जाते हैं। इसी चाहर चौक के दक्षिण-पश्चिमी भाग में एक प्रमुख हवन कुंड एवं 8 छोटे कुंड स्थित हैं जहाँ हवन कार्य सम्पन्न होते हैं। मंदिर 103 फुट ऊँचा है और मंदिर के शिखर पर स्वर्ण कलश स्थापित किया गया है। इस स्वर्ण कलश का वजन 3 टन है और यह एक ही मार्बल पत्थर से बनाया गया है। इस स्वर्ण कलश के निर्माण के लिए अरासुर पर्वत की खदानों से ही मार्बल उत्खनित किया गया। इसके बाद मार्बल से कलश का निर्माण किया गया जिस पर स्वर्ण परत चढ़ाई गई। मंदिर तक पहुँचने के लिए 999 सीढ़ियों की चढ़ाई चढ़नी होती है।

अंबाजी मंदिर से 3 किमी की दूरी पर गब्बर पर्वत है जहाँ एक प्राचीन माँ दुर्गा का मंदिर स्थापित है। कहा जाता है कि मंदिर में एक पत्थर में माँ दुर्गा के पदचिह्न और रथचिह्न बने हुए हैं। अंबाजी के दर्शन करने के बाद श्रद्धालु हमेशा ही गब्बर पर्वत पर स्थित माता के दर्शन करने जरूर जाते हैं। गुजरात में एक तरह से यह परंपरा बन चुकी है है कि गब्बर पर्वत पर माता के दर्शन किए बिना अंबाजी के दर्शन पूरे नहीं होते हैं।

त्योहार

गुजरात के इस प्रसिद्ध अंबाजी मंदिर का प्रमुख त्योहार नवरात्रि है। इस दौरान न केवल गुजरात से बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु माँ का आशीर्वाद लेने के लिए पहुँचते हैं। इस दौरान मंदिर प्रांगण में ही गरबा का आयोजन होता है। गुजरात भर से किसान अपने परिवार के साथ माता के दर्शन के लिए आते हैं। नवरात्रि के दौरान गरबा के साथ भवई का भी प्रबंध किया जाता है और साथ ही मंदिर में दुर्गा सप्तशती के पाठ का भी आयोजन किया जाता है।

इसके अलावा भाद्रपद मास की पूर्णिमा को भी यहाँ त्योहार जैसा ही माहौल होता है। साथ ही प्रत्येक महीने की पूर्णिमा एवं अष्टमी तिथि को भी मंदिर में श्रद्धालुओं की काफी भीड़ देखने को मिलती है।

कैसे पहुँचे

बनासकांठा स्थित श्री अरासुरी अंबाजी मंदिर पहुँचने के लिए नजदीकी हवाई अड्डा अहमदाबाद का सरदार वल्लभ भाई पटेल इंटरनेशनल एयरपोर्ट है। यह अंबाजी मंदिर से करीब 186 किलोमीटर दूर है। इस दिव्य स्थान से नजदीकी रेलवे स्टेशन अबू रोड स्टेशन है जो मंदिर से मात्र 20 किमी की दूरी पर है। अबू रोड रेलमार्ग से दिल्ली, अहमदाबाद समेत देश के प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है। राजस्थान की सीमा में स्थित इस मंदिर तक पहुँचने के लिए सड़क मार्ग से भी कई साधन उपलब्ध हैं। गुजरात एवं राजस्थान के प्रमुख शहरों से अंबाजी मंदिर तक पहुँचने के लिए दोनों ही राज्यों की परिवहन सेवाएँ यात्रियों की सुविधा के अनुसार संचालित होती हैं।

 

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ओम द्विवेदी
Writer. Part time poet and photographer.

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