फटा घाव लेकर जब वो लड़की स्कूल पहुँची, ताकि आगे शादी में दिक्कत न आए!

लड़की से ज़्यादा हमारे परिवेश में पनप रही कुंठित मानसिकता का बदलना ज़रूरी है। ऐसा इसलिए क्योंकि हर लड़की स्कूल जाते वक्त शिक्षा को अपना लक्ष्य रखे न कि समाज की थोपी बातों पर।

धर्मों से परे और जाति से परे हर लड़की की कहानी अपने आप में ही इतिहास का समकालीन ज़िंदगी के साथ समावेश है। हम जिस दौर में जी रहे हैं, वहाँ कार की स्टेयरिंग हाथ में लिए हर लड़की आज के समाज का आईना नहीं है। स्कूल जाती लड़की को देखकर कभी भी इस बात का अंदाज़ा नहीं लगाना चाहिए कि उसके भीतर पढ़ने का बहुत जोश है या फिर उसके घर के लोगों में उसे पढ़ाने की मंशा है। हो सकता है ‘लाडली योजना’ के तहत मिलने वाली 1 लाख की राशि की चमक ने उसे स्कूल के क्लासरूम तक लाकर खड़ा दिया हो… या फिर ‘बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ’ के बैनर तले उसका नाम दर्ज़ करने के लिए घर की बेटी को स्कूल तो भेजा जा रहा हो, लेकिन घर में उसे शिक्षा उन्हीं लोगों द्वारा दिलाई जा रही हो, जो आज भी औरत का सबसे बड़ा कर्म रोटी को गोल बनाना बताते हैं। हो सकता उसकी डिग्रियों की आड़ में सिर्फ शादी के लिए एक परफ़ेक्ट ‘रेज़्युमे’ तैयार किया जा रहा हो।

ये ऊपर लिखी बातें निराधार नहीं हैं, और न ही मैं महिलाओं की शिक्षा का विरोध कर रही हूँ। मैं बस उस व्यथा को ज़ाहिर करना चाहती हूँ, जो अपने माहौल में देखते सब हैं लेकिन महसूस कोई-कोई ही करता है। ऊपर की बातें लिखते समय मैं कुछ वैसी लड़कियों का चेहरा याद कर रही हूँ, जिनके जीवन को और रहन-सहन को हमेशा से मुझे जानने की इच्छा हुई। लेकिन जब जाना तब सहम गई। इन लड़कियों में एक नाम अन्नू (बदला हुआ नाम) भी है। नीचे की कहानी (सच्ची घटना) है तो अन्नू की लेकिन इस कहानी के पात्र आपको अपने आस-पास देखने को अक्सर मिलेंगे।

बात 2009 की है। 8वीं पास करके मैंने नए स्कूल में 9वीं में एडमिशन लिया था। वो स्कूल मेरे लिए बहुत बड़ा अनुभव था। मैं पहली बार इतनी सारी लड़कियों को एक साथ पढ़ते हुए देख रही थी। इनमें कुछ बहुत पढ़ाकू थीं और कुछ बहुत ही बिंदास… मैं एवरेज वाली सूची में थी। घर में हमेशा से पढ़ाई के लिए दबाव रहता था, इसलिए मुझे पढ़ाकू लड़कियों को न देखने का मन करता था और न ही मैं उनसे प्रभावित होती थी।

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क्लास में कुछ ऐसी भी लड़कियों का ग्रुप था, जो बहुत बिंदास था। नम्बर चाहे कम आएँ, लेकिन हेयरस्टाइल हर रोज़ नया रहता था। हम कुर्ता घुटने से नीचे तक का पहनते थे और वो घुटने से ऊपर पहन कर भी कुर्ते की लंबाई को ज़्यादा बताती थीं। उन्हें देखकर मुझे लगता था कि इनके घर का माहौल कितना गज़ब होगा कि ये लोग टीचर की डाँट खाने के बाद भी मस्तमौला होकर घूमती हैं। उन्हें न होमवर्क की चिंता होती थी और न ही यूनिट टेस्ट की। इस ग्रुप की हर लड़की के पास अपनी एक फ़ाइल थी, जिसमें पसंदीदा हिरोइनों की अखबार से काटी हुई तस्वीरें थी। बैक बेंच पर वो भी बैठती थीं और मैं भी। फ़र्क़ बस ये था वो खुलकर हँसती थीं और अपनी तरह से क्लास रूम को जीती थीं और मैं पढ़ाई के साथ उनके लाइफ़स्टाइल को देखने में ही उलझी रहती थीं। इस ग्रुप ने मुझे बहुत प्रभावित किया था।

इस स्कूल में मेरे दिन बीतते जा रहे थे और मैं अपनी एवरेज परफॉर्मेंस के साथ दूर से ही इनमें घुलती जा रही थी। घर आकर भी मैं इसी ग्रुप के बारे में सोचती रहती थी। इनमें एक लड़की अन्नू भी थी। बेहद सुंदर और मस्तमौला… लेकिन उसका पढ़ाई में डब्बा गोल था। इसलिए टीचर ज़्यादा पसंद नहीं करते थे। हालाँकि, इस बात से उसे भी कोई ज़्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ता था। उसके लिए तो उपलब्धि ये थी कि स्कूल के बाहर खड़े लड़के उसके ग्रुप की किसी लड़की को न देखकर सिर्फ़ उसे देखते हैं। मुझे लगता था जैसे उसने न पढ़ने की ही ठान रखी है। लेकिन फिर भी मुझे वो पसंद थी।

उसके जन्मदिन वाले दिन उस ग्रुप में बहुत हल्ला था। सबको पता था अन्नू का जन्मदिन है, बस इंतज़ार हो रहा था उसके आने का। प्रार्थना से लेकर पहला पीरियड खत्म हो गया, लेकिन वो नहीं आई। उसकी सहेलियाँ बेहद नाराज़ थीं। मानो अब से अन्नू से दोस्ती बिल्कुल ख़त्म कर लेंगी। स्कूल की घंटी बजी और मैं भी अपने घर आकर यह सोचती रही कि आज आखिर अन्नू क्यों नहीं आई?

अगले दिन वो आई तो हाथ में पट्टी बंधी थी। तब पता चला कि जन्मदिन पर ही कार से उसका एक्सीडेंट हो गया था, जिससे उसके हाथ में गहरी चोट आई थी। क्योंकि चोट गहरी थी, तो सबको लगा टाँके लगे होंगे। लेकिन उसने इस बात को झट से नकारते हुए कहा, “मैंने कोई टाँके नहीं लगवाए।” सहेलियों के ज़्यादा पूछने पर उसने बड़े चिंता-भाव में कहा, “टाँके लग जाते हैं तो निशान पड़ जाता है न यार! फिर शादी में दिक्कत आती है। इसलिए मम्मी ने टाँके नहीं लगवाए। भले ही टेम (समय) लगेगा लेकिन घाव ऐसे ही सही हो जाएगा।”

इस बात को सुनकर अभी मैं हैरान हुई ही थी कि तब तक उस ग्रुप से ही किसी लड़की की आवाज़ आई, “हाँ, ये तो आंटी ने सही किया, शादी में इन सबसे बहुत दिक्कतें आती हैं।” आश्चर्य कि उस ग्रुप में सबने इस बात पर हामी भरी!

इस बात को सुनने से पहले मेरे भीतर कभी भी लड़की होने पर सवाल नहीं उठे थे, लेकिन इस घटना के बाद मानो मैं सहम गई। मैं कई दिनों तक सवालों से जूझती रही कि क्या एक लड़की का शरीर शादी का मटेरियल मात्र है! जो जितना साफ़ रहेगा, उसकी माँग उतने बढ़िया लोग करेंगे?

फिर एक ख़्याल यह भी आया कि क्या अन्नू के जन्मदिन पर हुए एक्सीडेंट में जो चोट उसे लगी, उसे देखकर उसकी मम्मी का मन नहीं पसीजा होगा, जो उन्होंने चोट में बहता ख़ून नकार कर उसके न मिटने वाले निशान को ज़रूरी समझा?

अपनी मम्मी की इस बात को मानकर अन्नू खुले घाव के साथ स्कूल आ गई। मतलब वो भी इस उम्र से ही खुद को शादी के लिए ही तैयार कर रही है?

क्या सच में चोट लगने से ज्यादा शरीर पर निशान का दिखना खतरनाक है?

निशान को लेकर परेशान हो जाने वाली अन्नू की मम्मी कभी भी उसके पढ़ाई में कम नम्बर देखकर परेशान नहीं हुई होंगी?

अन्नू की मम्मी वाली बात पर सहमति भरने वाली उसकी सहेलियों को भी क्या यही सिखाया जा रहा होगा उनके घरों में?

ये वो सवाल थे जो आज भी मुझे कुरेदते हैं। इस घटना के बाद मैं खुद को बेहद ख़ुशनसीब मानती हूँ कि मैंने बतौर लड़की एक ऐसे घर में जन्म लिया, जहाँ मुझे पहला थप्पड़ पढ़ाई न करने पर पड़ा था। मेरे शरीर पर एलर्जी से हुए कई निशानों के बावजूद भी मेरे घर में किसी ने कभी मुझे उसे छुपाने को नहीं कहा, न ही उसे देखकर कभी चिंता जताई। अन्नू को देखकर मेरे मन में इस तरह के सवाल आना शायद मेरी परवरिश का नतीजा है और शायद उसका अपनी मम्मी की बात को मान जाना उसकी परवरिश का… ऐसे में अगर हम ये कहें कि स्कूल जाती हर लड़की शिक्षित होगी तो शायद यह गलत होगा क्योंकि लड़की से ज़्यादा हमारे परिवेश में पनप रही कुंठित मानसिकता का बदलना ज़रूरी है। ऐसा इसलिए क्योंकि हर लड़की स्कूल जाते वक्त शिक्षा को अपना लक्ष्य रखे न कि समाज की थोपी बातों पर।

उम्मीद यही है कि देश में आने वाली हर सरकार बेटी बचाने के साथ समाज को शिक्षित करने का भी काम करे। सिर्फ एक निश्चित समाज या तबके की लड़कियाँ ही कार की स्टेयरिंग पर हाथ न घुमाएँ। बल्कि अन्नू जैसी लड़कियों को भी पता चल सके कि वो साइड में बैठने के अलावा गाड़ी खुद भी चला सकती हैं और मंजिल तक पहुँचा भी सकती हैं।

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