Wednesday, July 28, 2021
Homeराजनीति12वीं की NCERT पॉलिटिकल साइंस किताब में जोड़ा गया अनुच्छेद 370 हटाने का अध्याय,...

12वीं की NCERT पॉलिटिकल साइंस किताब में जोड़ा गया अनुच्छेद 370 हटाने का अध्याय, हटाया J&K से ‘अलगाववाद’

"जम्मू कश्मीर और लद्दाख भारत के विविध समाज का असल उदाहरण हैं। वहाँ केवल हर तरह की विविधता (धार्मिक, सांस्कृतिक, भाषिक, सामाजिक आदि) ही नहीं है। बल्कि पिछले कुछ समय में इन्हीं के चलते राज्य में विविधता के आधार पर कई बड़े बदलाव हुए हैं।"

एनसीआरटी ने कक्षा 12 की राजनीति विज्ञान की किताब में जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने पर एक अध्याय शामिल किया गया है। वहीं दूसरी तरफ ‘Separatism and beyond’ नाम के हिस्से को हटा कर ‘2002 and Beyond’ जोड़ दिया गया है। किताब का नाम ‘Politics in India since Independence’ है और उस अध्याय का नाम ‘Regional Aspirations’ है।

5 अगस्त साल 2019 के दिन केंद्र सरकार ने जम्मू कश्मीर को अनुच्छेद 370 के तहत मिला विशेष राज्य का दर्जा वापस ले लिया था। राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बाँट दिया गया था, जम्मू -कश्मीर और लद्दाख। ‘2002 and Beyond’ नाम के हिस्से में ऐसा लिखा है “महबूबा मुफ़्ती के शासन में सबसे ज़्यादा आतंकवाद और आतंरिक – बाहरी स्तर पर तनाव भी देखा गया। जून 2018 में जैसे ही भारतीय जनता पार्टी ने अपना समर्थन वापस लिया वैसे ही राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया। इसके बाद जम्मू कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम तैयार किया गया और उसके अंतर्गत उसे दो केंद्र शासित राज्यों में बाँट दिया गया, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख।

कुल मिला कर ‘2002 and Beyond’ नाम का अध्याय जम्मू कश्मीर की गठबंधन सरकार और राज्य से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बारे में बात करता है। अध्याय के मुताबिक़ जुलाई साल 2008 के दौरान राज्य में राष्ट्रपति शासन लग जाने के बाद कॉन्ग्रेस के ग़ुलाम नबी की सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई थी। समझौते के तहत मुफ़्ती मोहम्मद सईद ने गठबंधन में हुए समझौते के तहत शुरू के तीन साल सरकार चलाई थी।

इसके बाद साल 2008 के नवंबर दिसंबर महीने में चुनाव हुए। अध्याय के मुताबिक़ “एक बार फिर गठबंधन की सरकार सत्ता में आई। जिसके मुखिया थे उमर अब्दुल्ला लेकिन राज्य के भीतर हुर्रियत कॉन्फ्रेंस की तरफ से तनाव जारी था। साल 2014 में एक बार फिर विधानसभा चुनाव हुए। इस चुनाव में बीते 25 सालों की तुलना में सबसे ज़्यादा मतदान हुए।” 

इस बार पीडीपी और भाजपा की गठबंधन सरकार सत्ता में आई। इस अध्याय के मुताबिक “साल 2016 के अप्रैल महीने में मुफ़्ती मोहम्मद सईद की मृत्यु के बाद उनकी बेटी महबूबा मुफ़्ती सईद जम्मू कश्मीर की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं।” अध्याय में इस कार्यकाल को हिंसक भी बताया गया है।

जम्मू कश्मीर और यहाँ होने वाली हिंसा का ज़िक्र करने वाला अध्याय कुछ ऐसे शुरू होता है। “जैसा कि आपने पिछले हिस्से में पढ़ा होगा, अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा मिला हुआ है। जम्मू कश्मीर में हुई हिंसा, सीमा पार से होने वाला आतंकवाद और राजनीतिक अस्थिरता ने राज्य को भीतर और बाहर दोनों तरफ से प्रभावित किया।” 

इसके अलावा अध्याय में यह भी लिखा हुआ है, “इसकी वजह से राज्य के निर्दोष नागरिक और सुरक्षाकर्मी समेत बहुत से लोगों की जान गई। इतना ही नहीं, बहुत बड़े पैमाने पर कश्मीरी पंडितों का विस्थापन भी हुआ।” इसके अलावा अध्याय में राज्य का इतिहास, अनुच्छेद 370 की वजह से हुई हिंसा को हटा कर बताया गया है। अध्याय में लिखा है, “अपने जम्मू कश्मीर में हुई हिंसा के बारे में ज़रूर सुना होगा। इसकी वजह से बहुत से मासूम जानें गईं और तमाम परिवारों को अपना घर तक छोड़ना पड़ा। कश्मीर विवाद भारत और पाकिस्तान के बीच हमेशा से ही एक बड़ा विवाद रहा है। लेकिन राज्य की राजनीति के कई पहलू हैं।”

एक और बदलाव, इस बात का ज़िक्र करता है जब कश्मीर विवाद संयुक्त राष्ट्र में रखा गया था। अध्याय में लिखी हुई जानकारी के मुताबिक, “यह विवाद संयुक्त राष्ट्र संघ में पेश किया गया था। फिर संयुक्त राष्ट्र ने इस मुद्दे का हल निकालने के लिए 21 अप्रैल 1948 के प्रस्ताव के आधार पर 3 चरणों की प्रक्रिया का सुझाव दिया। सबसे पहले पाकिस्तान को कश्मीर में मौजूद अपने सारे नागरिक वापस बुलाने होंगे। दूसरा, भारत को वहाँ सुरक्षाबलों की संख्या घटानी चाहिए, जिससे वहाँ शांति स्थापित हो। तीसरा, इतना कुछ होने के बाद राज्य में निष्पक्ष होकर एक जनमत संग्रह कराया जाए। लेकिन अफ़सोस इसमें से किसी भी सुझाव पर काम नहीं हो पाया।”

इसके बाद नई और पुरानी किताबों को पढ़ने और तुलना करने के बाद एक और बात पता चलती है। नई किताब में जम्मू कश्मीर के तीन नए सामाजिक/राजनीतिक हिस्सों (जम्मू, कश्मीर और लद्दाख) को परिभाषित करने के दौरान “Heart of kashmir region is the kashmir valley” जैसी पंक्ति हटा दी गई है। “जम्मू का इलाका तलहटी और मैदानों का मिश्रण है। यहाँ मूल रूप से हिन्दू, मुस्लिम, सिख समेत कुछ अलग समुदाय के लोग भी रहते हैं।”

किताब के नए संस्करण में यह भी लिखा है, “कश्मीर इलाके में महज़ कश्मीर घाटी ही है। इसमें मुख्य रूप से कश्मीरी मुस्लिम रहते हैं और कुछ हिन्दू, सिख, बौद्ध समुदाय के लोग रहते हैं। लद्दाख ज़्यादातर पहाड़ों से घिरा हुआ है, यहाँ की आबादी बहुत कम है। जिसमें लगभग आधे मुस्लिम और आधे बौद्ध हैं।” 

कुल मिला कर किताब के नए और संशोधित संस्करण में कश्मीरियत को बहुत अच्छे से परिभाषित किया गया है। लेकिन ‘कश्मीरियत’ का ज़िक्र नहीं किया गया है। जिसका उल्लेख किताब के पुराने संस्करण में था। पुराने संस्करण के मुताबिक, ‘कश्मीर मुद्दा’ सिर्फ भारत और पाकिस्तान के बीच का विवाद नहीं है। इस मुद्दे के भीतर और बाहर भी कई आयाम हैं। विवाद की एक बड़ी वजह ‘कश्मीरियत’ और यहाँ के राजनेताओं की राजनीतिक आकांक्षाएँ हैं। 

वहीं नए बदलावों के मुताबिक कश्मीर की व्याख्या ही विवादों की असल जड़ रहा है। पाकिस्तान के नेताओं का ऐसा मानना था कि कश्मीर उनका हिस्सा है क्योंकि वहाँ की ज़्यादातर आबादी मुस्लिम थी। जबकि लोग ऐसा नहीं सोचते थे, लोगों के हिसाब से कश्मीरी सबसे ऊपर थे। इस पूरे विवाद को ‘कश्मीरियत’ नाम दिया गया था। अंत में किताब का नया संस्करण बहुलवाद की बात करता है।

“जम्मू कश्मीर और लद्दाख भारत के विविध समाज का असल उदाहरण हैं। वहाँ केवल हर तरह की विविधता (धार्मिक, सांस्कृतिक, भाषिक, सामाजिक आदि) ही नहीं है। बल्कि पिछले कुछ समय में इन्हीं के चलते राज्य में विविधता के आधार पर कई बड़े बदलाव हुए हैं।”

  सहयोग करें  

एनडीटीवी हो या 'द वायर', इन्हें कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

‘बद्रीनाथ नहीं, वो बदरुद्दीन शाह हैं…मुस्लिमों का तीर्थ स्थल’: देवबंदी मौलाना पर उत्तराखंड में FIR, कभी भी हो सकती है गिरफ्तारी

मौलाना के खिलाफ़ आईपीसी की धारा 153ए, 505, और आईटी एक्ट की धारा 66F के तहत केस किया गया है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि उसके बयान से हिंदू भावनाएँ आहत हुईं।

बसवराज बोम्मई होंगे कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री: पिता भी थे CM, राजीव गाँधी के जमाने में गवर्नर ने छीन ली थी कुर्सी

बसवराज बोम्मई के पिता एस आर बोम्मई भी राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके हैं, जबकि बसवराज ने भाजपा 2008 में ज्वाइन की थी।

प्रचलित ख़बरें

- विज्ञापन -

 

हमसे जुड़ें

295,307FansLike
111,571FollowersFollow
394,000SubscribersSubscribe