Monday, July 15, 2024
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प्रवीण नेट्टारू की हत्या से लेकर प्रोफेसर का हाथ काटने तक: PFI और शरिया कोर्ट, इस्लामीकरण के विरोधी हिंदुओं के कत्लेआम का फरमान

विश्वलोचन मदन बनाम भारत संघ एवं अन्य (2014) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि शरिया अदालतों द्वारा दिए गए फतवों का 'स्वतंत्र भारत में कोई स्थान नहीं है' और इन्हें मासूमों को दंडित करने के लिए उपयोग नहीं किया जाना चाहिए। इन अदालतों को अवैध ठहराने से शीर्ष अदालत ने इनकार कर दिया था।

अफगानिस्तान (Afghanistan) में सजा के तौर पर हाथ काटने, आँख निकालने, गला काटने, पत्थर मारकर मौत के घाट उतारने, सरेआम फाँसी देने और मृतक के शवों को सार्वजनिक जगहों पर खुलेआम लटकाने जैसी घटनाओं के बारे में अक्सर हम पढ़ते और सुनते हैं। ये सजाएँ इस्लामी नियमों और कानूनों के तहत दी जाती हैं। इसका निर्धारण इस्लामी कोर्ट यानी शरिया अदालतें करती हैं, जिन्हें दारुल कजा (Darul Khada) कहा जाता है।

दारुल कजा का अर्थ होता है, न्याय का घर या अल्लाह का घर। यह वही दारुल कजा उर्फ शरिया कोर्ट है, जिसने साल 2010 में केरल के थोडुपुझा में स्थित न्यूमैन कॉलेज के ईसाई प्रोफेसर टीडी जोसेफ का हाथ काटने का आदेश दिया था। प्रोफेसर जोसेफ पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने इस्लाम के पैगंबर का अपमान किया है। दारुल कजा की भूमिका का खुलासा PFI के गिरफ्तार सदस्य अशरफ ने किया था।

कुछ दिन पहले कर्नाटक में भाजयुमो (BJYM) के नेता प्रवीण नेट्टारू की जिस तरह से हत्या की गई है, उसमें ऐसे में PFI और दारुल कजा संदेह के घेरे में है। कर्नाटक के मुख्यमंत्री बसावाराज बोम्मई ने कहा था कि हत्यारे केरल से आकर घटना को अंजाम दिए और वापस भाग गए, ऐसा संदेह है।

NIA ने कुछ साल पहले केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक में PFI की आतंकी गतिविधियों और उसके मजबूत आधार पर एक रिपोर्ट दी थी। हाल के दिनों में कथित ईशनिंदा के नाम पर देश के अलग-अलग हिस्सों में दंगा करने और हत्या करने की घटनाओं के लिंक PFI से जुड़े हुए पाए गए हैं। इसमें में इसके कंगारू कोर्ट को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।

देश भर में दारुल कजा, AIMPLB ने हर जिले के लिए की थी वकालत

देश के न्यायिक व्यवस्था के समानांतर ये दारुल कजा आज देश के तमाम राज्यों में अवैध रूप से चल रही हैं। साल 2018 में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने इन शरिया अदालतों को बढ़ाकर देश के हर जिले में खोलने की वकालत की थी। हालाँकि, उस वक्त इसका काफी विरोध हुआ था, लेकिन यह काम रूका नहीं।

छह महीना पहले एदार-ए-शरिया झारखंड के चीफ मैनेजिंग डायरेक्टर मौलाना कुतुबुद्दीन रिजवी ने कहा था कि राज्य के सभी जिलों में दारुल कजा या शरिया कोर्ट स्थापित किया जाएगा। मार्च 2022 तक राज्य के डाल्टनगंज, गोड्डा, मधुपुर और जामताड़ा में इसकी शाखाएँ खोलने का लक्ष्य रखा था।

उस दौरान रिजवी ने बताया था कि जमशेदपुर, राँची, धनबाद, दुमका, हजारीबाग, कोडरमा, लोहरदग्गा, राजमहल (साहिबगंज) और बोकारो में पहले से ही शरिया कोर्ट संचालित हैं। उन्होंने तर्क दिया था कि मुस्लिमों की माँग पर इसे खोला जा रहा है।

मुस्लिम स्कॉलर द्वारा आमतौर पर तर्क दिया जाता है कि दारुल कजा में मुस्लिमों के छोटे-मोटे और घरेलू मुकदमों को देखा जाता है और उनमें सुलह कराकर कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाने से बचाया जाता है। इससे देश की न्यायिक व्यवस्था पर से भार कम होता है।

हालाँकि, देश में बढ़ते इस्लामी कट्टरपंथ और इन शरिया अदालतों के संबंध स्पष्ट रूप से सामने आए हैं। कट्टरपंथी संगठनों ने भी शरिया कोर्ट स्थापित की है और मुस्लिमों को कोर्ट के बदले इन दारुल कजा में जाने के लिए प्रेरित किया है।

PFI ने साल 2009 में बनाई अपनी दारुल कजा

पिछले कुछ वर्षों से आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट (ISIS) और तालिबान की स्टाइल में लोगों को मारने के कारण चर्चा में आए चरमपंथी संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) ने भी शरिया कोर्ट स्थापित की है।

राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) को पता चला है कि ये अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में समानांतर न्याय-व्यवस्था चलाते हैं और मुस्लिमों से जुड़े मुद्दों को सुलझाती है। रिपोर्टों के अनुसार, PFI की राजनीतिक शाखा सोशल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ इंडिया (SDPI) के राष्ट्रीय प्रमुख और संस्थापक ई अबूबकर ने साल 2009 में अपनी शरिया कोर्ट यानी दारुल कजा की स्थापना केरल में की थी।

इसमें उसने मुस्लिम विद्वानों के साथ-साथ अधिवक्ताओं को शामिल किया था। हालाँकि, बाद के वर्षों में धर्मांतरण का विरोध करने वाले हिंदुओं और कई नेताओं की हत्याओं में इस शरिया कोर्ट की भूमिका पाई गई।

धर्मांतरण का विरोध करने वाले हिंदू नेताओं की ‘दावा’ टीम द्वारा हत्या

रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह भी पता चला है कि PFI का दारुल कजा केरल में ना सिर्फ मुस्लिमों को न्यायालयों में जाने रोकता है, बल्कि ये उन हिंदू नेताओं की हत्या करने का भी निर्देश भी देता है, जो इन शरिया कोर्ट का विरोध करते हैं। इसके साथ ही यह मुस्लिमों से जुड़े मामलों में यह हिंदुओं की टारगेट किलिंग करने का निर्देश देता है।

कई हिंदू नेताओं की हत्या से जुड़े मामलों की जाँच के दौरान NIA को यह भी पता चला कि PFI ने हत्याओं के जरिए हिंदुओं में डर पैदा करने के लिए ‘दावा’ टीम का गठन किया है। इस टीम का मुख्य काम सामाजिक कार्य के नाम पर हिंदुओं का इस्लाम में धर्मांतरण है और जो इस धर्मांतरण का विरोध करे उसकी हत्या करना है।

PFI का सत्यसारणी केंद्र इसका प्रमुख उदाहरण है, जहाँ हिंदुओं लड़कियों को लव जिहाद में फँसाकर लाया जाता है और उनका ब्रेनवॉश कर उन्हें इस्लाम में धर्मांतरित किया जाता है। लव जिहाद के अलावा कई तरह के प्रलोभन और डर पैदा करके भी ये धर्मांतरण का काम करते हैं।

NIA ने साल 2017 में गृह मंत्रालय को सौंपे अपने डोजियर में कहा था कि केरल के मंजेरी स्थित सत्यसारणी इस्लामिक दावा इंस्टीट्यूट उर्फ मरकज-उल-हिदया धर्मांतरण केंद्र के रूप में काम करता है। इतना ही नहीं, यहाँ आने वाले लोगों को धर्मांतरण के लिए बड़े पैमाने पर प्रशिक्षण दिया जाता है और उनका ब्रेनवॉश किया जाता है।

ईसाई प्रोफेसर का हाथ काटकर ‘ईशनिंदा’ की सजा

साल 2010 में केरल के थोडुपुझा स्थित न्यूमैन कॉलेज के ईसाई प्रोफेसर टीडी जोसेफ ने B.Com कक्षा के लिए एक प्रश्न-पत्र तैयार किया था। क्लास के मुस्लिम छात्रों ने हंगामा कर दिया कि इसमें इस्लाम के पैगंबर मुहम्मद का अपमान किया गया है।

इसके बाद PFI से जुड़े 8 मुस्लिमों के एक समूह ने प्रोफेसर जोसेफ का दाहिना हाथ काटकर उस समय अलग कर दिया, जब वे मुवत्तुपुझा के निर्मला चर्च में रविवार की प्रार्थना सभा से भाग लेकर अपनी माँ और बहन के साथ वापस घर लौट रहे थे।

इस मामले में गिरफ्तार अशरफ नाम के एक आरोपित ने बताया था कि शरिया कोर्ट उर्फ दारुल कजा ने ईशनिंदा के आरोप में प्रोफेसर जोसेफ का हाथ काटने की सजा सुनाई थी और ऐसा करने के लिए उसे निर्देश दिया गया था। उस दौरान केरल के शरिया कोर्ट का समन्वयक मौलवी ईसा था और उसी के अंतर्गत आने वाले कोर्ट ने यह सजा सुनाई थी।

धर्मांतरण का विरोध करने पर हुई थी रामालिंगम की हत्या

फरवरी 2019 में तमिलनाडु के तंजावूर में रामलिंगम की PFI के ‘दावा’ दल ने धारदार हथियार से काटकर हत्या कर दी थी। रामलिंगम ने PFI द्वारा किए जा रहे धर्मांतरण का विरोध किया था। इसके बाद चरमपंथी संगठन ने उनकी हत्या कर दी थी।

NIA को पता चला कि PFI की विचारधारा से मेल खाने के कारण कुख्यात आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट ने भी उसकी मदद की। इसके बाद PFI ने केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक में अपने आधार को खूब मजबूत किया। उसने बड़े पैमाने पर हथियार खरीदे और लोगों को प्रशिक्षित किया।

देश में हत्याओं का एक ही पैटर्न और PFI का जनाधार

आज प्रवीण नट्टारे ही नहीं, राजस्थान में कन्हैया लाल की हत्या, अमरावती में उमेश कोल्हे की हत्या, कानपुर में सांप्रदायिक दंगों का मुख्य आरोपित जफर हयात हाशमी और अजमेर के चिश्ती दरगाह के खादिम द्वारा PFI का सदस्य होने की स्वीकृति इसके फैलाव की ओर इशारा करती हैं।

हाल ही में बिहार के फुलवारी शरीफ में छापेमारी के बाद PFI की ‘विजन 2047’ दस्तावेज का खुलासा हुआ और उसके प्रशिक्षण स्थलों के बारे में जानकारी मिली। जाँच के दौरान यह बात भी खुल कर सामने आ रहा है कि बिहार में PFI के कैडर बड़ी संख्या में मौजूद हैं। बिहार में इस संगठन ने 25 हजार से अधिक लोगों को हथियार चलाने की ट्रेनिंग दी है।

NIA ने अपनी रिपोर्ट में बताया था PFI को कट्टरपंथी संगठन

आतंकी गतिविधियों में शामिल होने को लेकर NIA ने PFI की जाँच की थी। साल 2017 में अपने डोजियर (रिपोर्ट) में NIA ने कहा था कि पीएफआई के आतंकी संपर्कों को लेकर उसके पास पर्याप्त साक्ष्य हैं।

गृह मंत्रालय को सौंपे गए इस डोजियर में NIA ने PFI द्वारा प्रोफेसर जोसेफ का हाथ काटने से लेकर हथियार चलाने एवं देशी बम बनाने के लिए चलाए जा रहे शिविर तक का जिक्र किया था। इसके अलावा बंगलुरु में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के नेता रुद्रेश की हत्या का भी जिक्र किया गया था।

NIA ने यह भी कहा था कि PFI अपने कैडरों को इस्लामी मूल्यों के रखवाले के रूप में संदर्भित करता है। इसलिए वह लोगों को कोर्ट में जाने के बजाए शरिया कोर्ट में जाने के लिए कहता है। उसने दारुल कजा की भी स्थापना की थी, जो मुस्लिमों के मामलों की सुनवाई करता था।

शरिया कोर्ट और सरकार एवं सुप्रीम कोर्ट

देश में संवैधानिक न्यायिक व्यवस्था के समानांतर न्यायिक व्यवस्था चलाई जा रही है। यह खुलेआम हो रहा है। स्वत: संज्ञान लेकर मामले की सुनवाई करने वाले संविधान के रखवाले सुप्रीम कोर्ट ने शरिया कोर्ट और इसके फैसले अथवा फतवे को लेकर एक मामले की सुनवाई की थी।

विश्वलोचन मदन बनाम भारत संघ एवं अन्य (2014) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि शरिया अदालतों द्वारा दिए गए फतवे या इस्लामी आदेशों का ‘स्वतंत्र भारत में कोई स्थान नहीं है’ और इन्हें मासूमों को दंडित करने के लिए उपयोग नहीं किया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने आगे यह भी कहा था कि इन अदालतों का सलाह मानना बाध्यकारी नहीं है और कोई भी पक्ष इसे स्वीकार या अस्वीकार करने के लिए स्वतंत्र है। हालाँकि, दारुल कजा को अवैध घोषित करने से सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट मना कर दिया था।

साल 2010 में जब केरल में प्रोफेस जोसेफ का हाथ काट दिया गया था, तब केरल के तत्कालीन गृहमंत्री कोडियेरी बालकृष्णन ने विधानसभा को बताया था कि सरकार शरिया अदालतों के कामकाज की जाँच करेगी। हालाँकि, वह जाँच हुई या नहीं, यह स्पष्ट नहीं है। हाँ, केरल सरकार की तुष्टिकरण की खबरें समय-समय पर सामने आती रहती हैं।

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सुधीर गहलोत
सुधीर गहलोत
इतिहास प्रेमी

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