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जब लॉबी के पसंद का फैसला हो तभी जज ‘सही’ और ‘स्वतंत्र’: पूर्व CJI गोगोई ने बताया उनसे क्यों चिढ़ा है विपक्ष

अयोध्या मामले में आए फैसले पर उन्होंने कहा, "यह 5 न्यायाधीशों की पीठ द्वारा एक सर्वसम्मत निर्णय था। इसके अलावा राफेल भी तीन न्यायाधीशों की पीठ द्वारा लिया एक सर्वसम्मत निर्णय था। इस तरह के आरोप लगाकर वे उन न्यायधीशों की सत्यनिष्ठा पर भी सवाल उठा रहे हैं, जो इन फैसलों का हिस्सा रहे।"

पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने कल (मार्च 19, 2020) बतौर राज्यसभा सांसद शपथ ली थी। इस दौरान विपक्ष ने जमकर हंगामा किया। सदन का बहिष्कार किया। उनका विरोध राष्ट्रपति द्वारा उच्च सदन के लिए मनोनीत किए जाने के बाद से ही शुरू हो गया था। इस मसले पर अब गोगोई ने अपना पक्ष रखा है। इससे पता चलता है कि आखिर क्यों विपक्ष और लिबरल गिरोह उनसे चिढ़ा हुआ है।

गोगोई के मुताबिक एक ‘लॉबी’ के चलते न्यायपालिका की आजादी खतरे में है। यह लॉबी अपने मुताबिक फैसला चाहता है। ऐसा नहीं होने पर जजों की छवि खराब करने की कोशिश की जाती है। उन्होंने कहा कि कुछ लोगों ने न्यायपालिका को बंधक बना रखा है। सोचते हैं जब निर्णय उनके मतलब का है तभी वो स्वतंत्र और सही निर्णय है। बाकी टाइम में वही जज, वही न्यायपालिका भ्रष्ट और समझौतावादी दिखने लगती है।

टाइम्स ऑफ इंडिया से बातचीत में उन्होंने कहा कि न्यायपालिका वास्तविक अर्थों में पूरी तरह तब तक स्वतंत्र नहीं होगी जब तक इन लोगों का गढ़ नहीं टूटता। ये जजों को फिरौती देने के लिए पकड़ते हैं। अगर कोई फैसला उनके मनमुताबिक नहीं आता तो वह जज की छवि को खराब करने की हरसंभव कोशिश करते हैं।

गौरतलब है कि राज्यसभा में राष्ट्रपति द्वारा नामित किए जाने के बाद कई विरोधियों ने ये आरोप लगाया था कि चूँकि पूर्व सीजेआई ने अयोध्या में राम मंदिर के पक्ष में अपना फैसला सुनाया इसलिए उन्हें राज्यसभा भेजा गया। गोगोई ने कहा है कि उन्होंने इस लॉबी को खारिज किया था, इसलिए उनकी इतनी आलोचना हुई।

उन्होंने ये भी कहा कि अगर एक जज आधे दर्जन लोगों की बातें सुनकर अपना फैसला लेता तो वह अपनी शपथ के प्रति ईमानदार नहीं होता। अयोध्या मामले में आए फैसले पर उन्होंने कहा, “यह 5 न्यायाधीशों की पीठ द्वारा एक सर्वसम्मत निर्णय था। इसके अलावा राफेल भी तीन न्यायाधीशों की पीठ द्वारा लिया एक सर्वसम्मत निर्णय था। इस तरह के आरोप लगाकर वे उन न्यायधीशों की सत्यनिष्ठा पर भी सवाल उठा रहे हैं, जो इन दोंनो फैसलों का हिस्सा रहे।”

उन्होंने राज्यसभा में मिले पद को ‘मुआवजे’ की तरह देखने वाली बातों को खारिज करते हुए कहा कि अगर वे फायदा चाहते तो इससे अधिक बड़े और बेहतर पदों की तलाश करते। राज्यसभा सांसद के लाभ एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश के समान होते हैं। उन्होंने कहा कि अगर नियम उन्हें इस चीज की अनुमति दें, तो वे सांसद को मिलने वाले वेतन और भत्ते नहीं लेंगे और उसे छोटे शहरों में पुस्तकालयों को पुनर्जीवित करने के लिए दे देंगे।

जनवरी 2018 के ऐतिहासिक प्रेस कॉन्फ्रेंस में शामिल होने का जिक्र करते हुए गोगोई ने याद किया कि उस समय उनका किस तरह स्वागत किया गया था। उन्होंने बताया, “साल 2018 में जब मैं प्रेस कॉन्फ्रेंस में गया था तो लॉबी का प्रिय था। लेकिन उस समय भी मैं चाहता था कि निर्णय एक निश्चित प्रक्रिया के अनुसार हो।”

पूर्व सीजेआई ने इंडिया टुडे को भी इंटरव्यू दिया है। इसमें उन्होंने कहा है कि यदि भारत का राष्ट्रपति आपको अनुच्छेद 80 के तहत एक प्रस्ताव देता है और आपको कहता है कि राष्ट्र को आपकी सेवा की आवश्यकता है, तो आपको मना नहीं करना चाहिए। अपने ऊपर लगते आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि यदि बात केवल फायदा लेने की होती, तो मैं कभी राज्यसभा की सदस्यता नहीं स्वीकार करता।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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