इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कब्जे वाले वेस्ट बैंक में सेना को गाँवों में घुसकर तलाशी लेने, हथियार जब्त करने और गिरफ्तारियाँ करने का आदेश दे दिया है। पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा कि इजरायल ‘आतंकी ठिकानों’ के खिलाफ और भी बड़े पैमाने पर कार्रवाई करने के लिए पूरी तरह तैयार है।
उनका यह बयान इलाके में सैन्य अभियान और तेज होने के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
दरअसल, शुक्रवार (24 जुलाई 2026) को एक गोलीबारी की घटना सामने आई, जिसमें 4 फिलिस्तीनी और 2 इजरायली सैनिक मारे गए थे। यह घटना नाबुलुस के पास स्थित ‘ताल’ गाँव में हुई, जहाँ बसने वालों यानी सेटलर्स औऱ फिलिस्तीनियों के बीच झड़प हुई। एक वीडियो में हथियारबंद सेटलर भीड़ का सामना करते नजर आए, वहीं दूसरे वीडियो में एक फिलिस्तीनी व्यक्ति सेटलर से बंदूक छीनकर गोली चलाता दिखा, जिसमें एक सेटलर की मौत हो गई।
इसके बाद इजरायली सैनिकों ने उस फिलिस्तीनी को गोली मारकर मार डाला, साथ ही तीन अन्य फिलिस्तीनी भी इसी झड़प में मारे गए। इसी हमले के जवाब में नेतन्याहू और रक्षा मंत्री इस्राइल काट्ज ने पूरे वेस्ट बैंक के फिलिस्तीनी गाँवों में ‘बड़े स्तर के सैन्य अभियान’ का आदेश दिया।
इस कार्रवाई में अब तक कई इलाकों में सेना उतर चुकी है। शनिवार (25 जुलाई 2026) सुबह इजरायली सेना ने ताल गाँव में करीब 50 फिलिस्तीनियों को गिरफ्तार किया और करीब 70 घरों पर छापेमारी की। इसके अलावा जेनिन शहर और आसपास के इलाकों में भी कई गिरफ्तारियाँ हुईं। तुबास शहर और उसके पास स्थित फराह शरणार्थी शिविर में सेना ने करीब 3 घंटे तक घर-घर जाकर छापेमारी की।
फिलिस्तीनी स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, इस साल की शुरुआत से अब तक वेस्ट बैंक में इजरायली हमलों में 87 फिलिस्तीनी मारे जा चुके हैं, जिनमें से 21 लोग सेटलरों द्वारा मारे गए हैं।
रामल्लाह के मानवाधिकार कार्यकर्ता उबई अल अबूदी ने बताया कि सेटलरों के हमले कोई इक्का-दुक्का घटना नहीं हैं, बल्कि यह पूरे वेस्ट बैंक में लगातार और बिना किसी रोक-टोक के हो रहे हैं। अबूदी ने बताया कि ताल गाँव पर 18 जुलाई को भी हमला हुआ था, जिसमें एक परिवार के घर में आग लगा दी गई थी और परिवार के लोग बड़ी मुश्किल से बचाए जा सके। वहीं ‘यूथ अगेंस्ट सेटलमेंट्स’ संस्था के संस्थापक ईसा अमरो के मुताबिक, हाल के सालों में लगातार हमलों के डर से 20 से ज्यादा फिलिस्तीनी अपने गाँव छोड़ चुके हैं, और सैकड़ों परिवार अपनी जमीन व घर छोड़ने को मजबूर हुए हैं, जिसे उन्होंने ‘जातीय सफाए’ जैसा बताया।

