Homeदेश-समाजराम-कृष्ण-शिव भी हैं, लेकिन सबसे ऊपर स्वामीनारायण: समझिए- BAPS की शुरुआत से बड़ा बनने...

राम-कृष्ण-शिव भी हैं, लेकिन सबसे ऊपर स्वामीनारायण: समझिए- BAPS की शुरुआत से बड़ा बनने की पूरी कहानी

BAPS को सिर्फ उसके संगमरमर के मंदिरों से मत देखिए। इसकी असली कहानी उन विचारों में छिपी है, जिन पर इसका पूरा ढांचा खड़ा है।

आख़िर कैसे ब्रिटेन का एक चर्च BAPS का मंदिर बन गया था और क्यों इस संगठन के मंदिरों में भगवान की प्रतिमाएं तो होती हैं लेकिन इनके अपने स्वनिर्मित भगवान की मूर्तियों के सामने बहुत छोटा रखा जाता है? और कैसे ये संगठन इतना ताक़तवर है कि अमेरिका में इसके ख़िलाफ़ मुक़दमा होता है, अदालत में बहस चलती है, दुनिया में हंगामा होता है और एक दिन बिना किसी सजा के इसे छोड़ दिया जाता है?

सितंबर 2026, फ्रांस का एफिल टॉवर एक दिन के लिए बंद होता है और अचानक चर्चा के केंद्र में आ जाते हैं भारत से पहुँचे कुछ ‘भगवाधारी संत’। वजह उनके कपड़े नहीं थे, न कोई राजनीतिक बयान। चर्चा थी उनके उन सख्त धार्मिक नियमों की, जिनके तहत BAPS के साधु महिलाओं से दूरी रखते हैं। देखते ही देखते सवाल उठने लगे कि आखिर ये साधु कौन हैं? किस परंपरा से आते हैं? और वो कौन-सी संस्था है जिसके नियम इतने कठोर हैं, लेकिन जिसका विस्तार दुनिया के सबसे बड़े शहरों तक हो चुका है? यहीं से शुरू होती है BAPS की कहानी। 

गुजरात के एक छोटे से गांव बोचासन से निकली एक संस्था, जिसने दिल्ली से लंदन, अमेरिका से अबू धाबी और पेरिस तक विशाल मंदिर खड़े किए, तो आज न हम केवल BAPS की पूरी कहानी खोलेंगे बल्कि बताएँगे कि वो कहाँ से आया, किसे सर्वोच्च भगवान मानता है, बाकी स्वामीनारायण परंपरा से अलग कैसे हुआ।

अगर BAPS से आपको कहानी नहीं समझ आ रही है तो अगर आप दिल्ली आए हों तो आपने कभी ना कभी रास्ते में या मेट्रो में जाते हुए एक विशाल मंदिर देखा होगा जिसे अक्षरधाम कहते हैं, जहाँ जाने के लिए लंबी कतारें लगती हैं और इसकी खूबसूरती को देखकर लोग अनायास ही अपने फ़ोन की गैलरी में एक और बार इस मंदिर की तस्वीर खींच लेते हैं। इसे बनाने वाली संस्था का नाम है BAPS। 

कैसे हुई BAPS की शुरुआत?

अगर आपको BAPS को समझना है, तो इसकी शुरुआत इसके पूरे नाम से करते हैं। क्योंकि इसका नाम ही इसकी पूरी कहानी अपने अंदर समेटे हुए है- BAPS यानी बोचासनवासी श्री अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था। पहली बार सुनने पर ये नाम थोड़ा लंबा और मुश्किल लग सकता है लेकिन इसे चार हिस्सों में तोड़ दीजिए- बोचासनवासी, अक्षर-पुरुषोत्तम, स्वामीनारायण और संस्था। इन चार शब्दों को समझ लिया तो आपको ये भी समझ आ जाएगा कि BAPS कहाँ से आया, किसे भगवान मानता है बाकी स्वामीनारायण संप्रदाय से अलग कैसे हुआ और कैसे दुनियाभर में पहुँच गया।

सबसे पहले ‘बोचासनवासी’- बोचासन गुजरात के आदंण जिले में एक गांव है और BAPS की अलग संस्थागत कहानी इसी गांव से 1907 में शुरू होती है लेकिन इसका मतलब ये बिल्कुल नहीं कि स्वामीनारायण परंपरा भी 1907 में शुरू हुई थी। स्वामीनारायण परंपरा इससे करीब एक सदी साल पुरानी है। 1907 में हुआ ये कि शास्त्री महाराज ने बोचासन में एक मंदिर बनवाया और मंदिर के केंद्रीय गर्भगृह में भगवान स्वामीनारायण को ‘पुरुषोत्तम’ और गुणातीतानंद स्वामी  को ‘अक्षर’ के रूप में प्रतिष्ठित किया है। BAPS अपनी औपचारिक संस्थागत स्थापना 5 जून 1907 की इसी घटना से मानता है। इसीलिए नाम के पहले हिस्से में बोचासन आया और संस्था हुई बोचासनवासी।

अब नाम के दूसरे हिस्से पर आइए- ‘अक्षर पुरुषोत्तम’। असल में BAPS को दूसरे स्वामीनारायण समूहों से अलग समझने की चाबी यही दो शब्द हैं। BAPS की मान्यता है कि भगवान स्वामीनारायण सर्वोच्च परमात्मा हैं, जिन्हें वह पुरुषोत्तम, परब्रह्म और सर्वोपरी मानता है। दूसरी तरफ गुणातीतानंद स्वामी को वह अक्षरब्रह्म मानता है। इसे बिल्कुल आसान भाषा में समझें तो पुरुषोत्तम सर्वोच्च परमात्मा हैं और अक्षर वह पूर्ण और आदर्श भक्त है जो परमात्मा के सबसे निकट है। BAPS का कहना है कि मनुष्य को अपने जीवन में अक्षर जैसा बनने का प्रयास करना चाहिए और फिर पुरुषोत्तम की भक्ति करनी चाहिए। इसी विचार को वह ‘अक्षर-पुरुषोत्तम उपासना’ कहता है। संस्था की पूरी धार्मिक पहचान इसी पर टिकी है।

अब आखिरी शब्द ‘स्वामीनारायण’ की बात… सवाल उठता है कि ये भगवान स्वामीनारायण कौन थे और उनके नाम से इतनी बड़ी धार्मिक परंपरा कैसे खड़ी हुई? इसके लिए कहानी हमें 1781 में ले जाती है। भगवान स्वामीनारायण का जन्म 3 अप्रैल 1781 को अयोध्या के पास छपैया में हुआ था, ये अब गोंडा जिले में है। बचपन का नाम घनश्याम पांडे था। स्वामीनारायण परंपरा बताती है कि बहुत कम उम्र से ही उनमें वैराग्य और आध्यात्मिक रुचि दिखाई देने लगी थी और 11 वर्ष की उम्र में उन्होंने घर छोड़ दिया और नीलकंठ वर्णी के नाम से भारत की लंबी यात्रा पर निकल पड़े, उन्होंने उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक अनेक तीर्थों, आश्रमों और धार्मिक केंद्रों की यात्रा की।

कई वर्ष तक भ्रमण करने के बाद 1799 में वे गुजरात के लोज पहुँचे, जहाँ उनका संपर्क रामानंद स्वामी की परंपरा से हुआ। 1800 में रामानंद स्वामी ने उन्हें दीक्षा दी और सहजानंद स्वामी नाम दिया। इसके एक वर्ष बाद 1801 में रामानंद स्वामी ने उन्हें अपने धार्मिक समुदाय का नेतृत्व सौंप दिया।

भगवान स्वामीनारायण

मान्यता है कि रामानंद स्वामी के निधन के बाद सहजानंद स्वामी ने एक सभा में लोगों ने भी ‘स्वामिनारायण’ मंत्र का जाप करने कहा और उन्हें भी अक्षरधाम के दर्शन हुए। इसी घटना के बाद उनके लिए ‘स्वामिनारायण’ नाम और मंत्र प्रसिद्ध हुआ और उनके अनुयायी उन्हें स्वामिनारायण के नाम से पुकारने लगे। अब सहजानंद स्वामी स्वयं भगवान स्वामीनारायण के रूप में प्रतिष्ठित हो गए।

यहीं एक बहुत जरूरी फर्क भी समझना चाहिए। स्वामीनारायण संप्रदाय और BAPS एक ही चीज नहीं हैं। स्वामीनारायण संप्रदाय की जड़ भगवान स्वामीनारायण के समय में है, जबकि BAPS उसी बड़ी परंपरा के अंदर बाद में विकसित हुई एक खास शाखा है। भगवान स्वामीनारायण के जीवनकाल में ही मंदिर बनाए गए और धार्मिक व्यवस्था संगठित की गई। उनका पहला बड़ा मंदिर 1822 में अहमदाबाद के कालूपुर में बना, जहाँ नर-नारायण देव की मूर्तियाँ स्थापित की गईं। इसके बाद भुज, जूनागढ़ और कई जगहों पर मंदिर बनते गए…तो पहला स्वामीनारायण मंदिर अहमदाबाद का था और BAPS का पहला मंदिर बोचासन वाला था जो 1907 में बना।

भगवान स्वामीनारायण की शिक्षाओं को भी व्यवस्थित रूप दिया गया। उनके उपदेशों का सबसे महत्वपूर्ण संग्रह ‘वचनामृत’ माना जाता है, जिसमें उनके आध्यात्मिक संवाद और प्रवचन दर्ज हैं। 1826 में उन्होंने ‘शिक्षापत्री’ लिखी, जिसमें 212 संस्कृत श्लोकों में गृहस्थों, साधुओं और अनुयायियों के आचरण के नियम बताए गए। BAPS वचनामृत और शिक्षापत्री को अपनी धार्मिक समझ का केंद्रीय आधार मानता है। इसके अलावा गुणातीतानंद स्वामी से जुड़ी ‘स्वामिनी वातो’ भी BAPS के अंदर अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसमें गुणातीतानंद स्वामी के प्रवचन हैं।

1830 में भगवान स्वामीनारायण के देहावसान के बाद उनके बनाए संप्रदाय को आगे चलाने की जिम्मेदारी उनके द्वारा तय की गई व्यवस्था के अनुसार चली। भगवान स्वामीनारायण ने अपने जीवनकाल में संप्रदाय की देखरेख के लिए दो प्रमुख गादियाँ बनाई थीं एक अहमदाबाद में नर-नारायण देव गादी और दूसरी वडताल में लक्ष्मी-नारायण देव गादी। यहाँ ‘गादी’ का मतलब किसी धार्मिक संस्था के नेतृत्व और जिम्मेदारी का केंद्र है।

इन दोनों गादियों पर आचार्य होते थे, जो मंदिरों और संप्रदाय की धार्मिक व्यवस्था को संभालते थे और यह पद आगे आचार्य परंपरा में चलता रहा लेकिन BAPS जिस आध्यात्मिक परंपरा को मानता है, वह थोड़ी अलग है। BAPS के अनुसार भगवान स्वामीनारायण ने गुणातीतानंद स्वामी को अक्षरब्रह्म के रूप में प्रकट किया था। इसके बाद गुणातीतानंद स्वामी से भगतजी महाराज, फिर शास्त्रीजी महाराज, योगीजी महाराज, प्रमुख स्वामी महाराज और आज महंत स्वामी महाराज तक गुरु परंपरा चली आती है। ये BAPS की अपनी मान्यता है। स्वामीनारायण की दूसरी शाखाएँ इस गुरु परंपरा को इसी रूप में स्वीकार करें, यह जरूरी नहीं है। 

अब आते हैं उन व्यक्ति पर जिसके बिना BAPS की अलग कहानी शुरू ही नहीं होती- शास्त्रीजी महाराज। उनका जन्म 1865 में डुंगर भक्त के रूप में हुआ था, साधु बनने के बाद उनका नाम यज्ञपुरुषदास पड़ा। वे वडताल परंपरा के साधु थे और धार्मिक ग्रंथों के गहरे अध्ययन के कारण शास्त्रीजी महाराज कहलाए। शास्त्रीजी महाराज का मानना था कि भगवान स्वामीनारायण पुरुषोत्तम हैं और गुणातीतानंद स्वामी अक्षरब्रह्म के स्वरूप हैं।

वे चाहते थे कि इस अक्षर-पुरुषोत्तम उपासना को मंदिरों में भी उसी रूप में स्थापित किया जाए। वडताल में उनके इस विचार का विरोध बढ़ता गया और उनके लिए परिस्थितियाँ मुश्किल होती गईं। आखिरकार नवंबर 1905 में शास्त्रीजी महाराज ने वडताल छोड़ दिया। उस समय उनके साथ केवल पाँच साधु और कुछ भक्त थे। वे वडताल से अलग होकर भी इसी विचार का प्रचार करते रहे और ऐसा मंदिर बनाना चाहते थे जहाँ अक्षर और पुरुषोत्तम की उपासना मुख्य रूप से स्थापित की जा सके।

वडताल छोड़ने के बाद शास्त्रीजी महाराज ने गुजरात में घूम-घूमकर अपने विचार का प्रचार किया। इसके बाद 1907 में बोचासन में पहला मंदिर बनवाया, जहाँ मुख्य स्थान पर भगवान स्वामीनारायण को पुरुषोत्तम और गुणातीतानंद स्वामी को अक्षर के रूप में स्थापित किया गया। BAPS इसी बोचासन मंदिर की स्थापना को अपनी संस्था की औपचारिक शुरुआत मानता है और इसी से उसका पूरा नाम बोचासनवासी श्री अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था सामने आया। इस तरह 1905 में वडताल से अलग होने और 1907 में बोचासन मंदिर की स्थापना के बीच शास्त्रीजी महाराज ने एक अलग संगठन और अपनी आध्यात्मिक पहचान की नींव तैयार की।

बोचासन के बाद काम रुका नहीं। 1916 में सारंगपुर में मंदिर बना, 1934 में गोंडल और बाद में अटलादरा सहित दूसरे स्थानों पर मंदिर स्थापित हुए। लेकिन इन मंदिरों की खासियत केवल उनकी बनावट नहीं थी। BAPS के लिए मंदिर उसके सिद्धांत को दिखाई देने वाला रूप भी था। मंदिर में कौन मुख्य स्थान पर है, किस तरह मूर्तियाँ स्थापित हैं और किस गुरु परंपरा को स्मरण किया जाता है। इन सबके जरिए उसकी धार्मिक पहचान साफ दिखाई देती थी। धीरे-धीरे यह केवल कुछ मंदिरों वाला समूह नहीं रहा बल्कि अपनी अलग साधु व्यवस्था, गुरु परंपरा, सत्संग व्यवस्था और भक्त समुदाय वाला संगठन बनता गया।

अब एक आम आदमी का सबसे सीधा सवाल आता है कि क्या BAPS में हिंदू देवी-देवाताओं की पूजा होती है, अगर नहीं तो फिर किसकी? इसका सीधा जवाब है कि भगवान स्वामीनारायण को सर्वोच्च परमात्मा माना जाता है। लेकिन पूरी बात समझने के लिए अक्षर की भूमिका भी समझनी पड़ेगी। BAPS पाँच शाश्वत तत्वों की बात करता है- जीव, ईश्वर, माया, अक्षरब्रह्म और परब्रह्म। जीव सामान्य आत्माएँ हैं। ईश्वर उससे ऊँची ब्रह्मांडीय शक्तियों की श्रेणी है। माया वह शक्ति है जो जीव को संसार और अज्ञान से बाँधती है। अक्षरब्रह्म माया से परे है और परब्रह्म यानी पुरुषोत्तम इन सब से सर्वोच्च है। BAPS क्या मानता है, वो मानता है कि भगवान स्वामीनारायण वही पुरुषोत्तम हैं और गुणातीतानंद स्वामी अक्षरब्रह्म हैं। इसी के चलते BAPS में गुरु की भूमिका बहुत बड़ी हो जाती है। यहाँ गुरु केवल प्रवचन देने वाला संत नहीं है। BAPS का मानना है कि अक्षरब्रह्म गुरु के रूप में संसार में प्रकट रहता है और वही साधक को परमात्मा तक पहुँचने का मार्ग दिखाता है। इसलिए वर्तमान गुरु के प्रति बहुत गहरा सम्मान और समर्पण दिखाई देता है।

BAPS बताता है कि उसकी ताकत बड़े-बड़े मंदिरों नहीं बल्कि वो जीवनशैली है जो अपने अनुयायियों से अपनाने को कहता है। मतलब साफ है- नशे से दूर रहो, मांसाहार मत करो, चोरी-धोखाधड़ी से दूर रहो, विवाह के बाहर संबंधों से बचो,नियमित पूजा करो और परिवार को भी धार्मिक मूल्यों के साथ चलाओ। खाने-पीने में भी सात्विकता पर काफी जोर है और साफ तौर पर BAPS के अनुयायियों को प्याज-लहसुन तक ना खाने को कहा जाता है।

अब यहां एक बात समझने वाली है। BAPS के हिसाब से धर्म का मतलब केवल इतना नहीं है कि आप रविवार को मंदिर गए, दर्शन किए और वापस आ गए। बात ये है कि आप रोजमर्रा की जिंदगी में कैसे इंसान हैं और यहीं से आता है BAPS का एक बहुत जरूरी शब्द ‘सेवा’ अब सेवा सुनकर आपके दिमाग में शायद दान-पैसा आए लेकिन यहाँ सेवा का मतलब उससे बड़ा है। मंदिर में जूते संभालना भी सेवा है, खाना बनाना भी सेवा है, सफाई करना भी सेवा है, बड़े कार्यक्रम में व्यवस्था संभालना भी सेवा है। कोई चिकित्सा शिविर में काम कर रहा है, कोई राहत कार्य में लगा है, कोई बच्चों को पढ़ा रहा है और कोई मंदिर निर्माण में अपना समय दे रहा है।

BAPS का बहुत बड़ा ढांचा स्वयंसेवकों के सहारे चलता है। संस्था अपने आधिकारिक आंकड़ों में 5000 से ज्यादा सत्संग केंद्र, करीब 55000 स्वयंसेवक और दस लाख से ज्यादा अनुयायियों की बात करती है। साधुओं की संख्या भी एक हजार से ज्यादा बताई गई है, ये संस्था के अपने आंकड़े हैं लेकिन इससे आपको इसके आकार का अंदाजा जरूर हो जाता है।

अब सवाल है कि इतने लोग संस्था के साथ जुड़ते कैसे हैं? अगर कोई आम व्यक्ति BAPS से जुड़ना चाहता है, तो इसके लिए कोई मुश्किल सदस्यता प्रक्रिया नहीं है। शुरुआत आम तौर पर नजदीकी BAPS मंदिर या सत्संग केंद्र जाने से होती है, जहाँ व्यक्ति नियमित सभा में बैठता है, संतों और कार्यकर्ताओं से मिलता है और धीरे-धीरे स्वामीनारायण परंपरा, अक्षर-पुरुषोत्तम उपासना और BAPS के जीवन नियमों को समझता है। इसके साथ ही साप्ताहिक सभाएँ और आयु वर्ग के हिसाब से बनी बाल, युवा व महिला सभाएँ भी आयोजित की जाती हैं। जब व्यक्ति इस परंपरा को अपनाने का फैसला करता है, तो उसे सत्संग में दीक्षित किया जाता है, जिसे परंपरा में ‘वर्तमान’ कहा जाता है और तुलसी की कंठी धारण कराई जाती है.. साथ ही आधुनिक समय में डिजिटल ऐप्स, यूट्यूब चैनल्स और ऑनलाइन सत्संग परीक्षाओं के जरिए भी नई पीढ़ी तेजी से इस वैश्विक परिवार का हिस्सा बन रही है।

बचपन से ही इस परंपरा से जुड़ाव हो सके इसका विचार बहुत पुराना है। योगीजी महाराज के समय बच्चों और युवाओं के लिए अलग-अलग गतिविधियाँ बन दी गई थी। 1950 के दशक से युवा मंडल और बाल मंडल तेजी से बढ़े, हर हफ्ते सभाएं होतीं, धार्मिक कहानियां सुनाई जातीं, भजन होते, नाटक और प्रतियोगिताएँ होतीं, सेवा के कार्यक्रम होते।

इसका असर खासकर विदेशों में बसे भारतीय परिवारों पर बहुत ज्यादा पड़ा, क्योंकि वहां मंदिर केवल भगवान के दर्शन की जगह नहीं रह गया। वो बच्चों को गुजराती या भारतीय संस्कृति से जोड़ने की जगह बन गया। परिवार मिलते हैं, बच्चे अपनी परंपरा सीखते हैं और अगली पीढ़ी भी समुदाय से जुड़ी रहती है। अब यहीं से हम उस व्यक्ति पर आते हैं जिसके दौर में BAPS दुनिया भर में बहुत तेजी से फैलता दिखाई देता है। वो हैं प्रमुख स्वामी महाराज, उनका जन्म 1921 में शांतिलाल के रूप में हुआ था। 1940 में वे साधु बने और उनका नाम नारायणस्वरूपदास रखा गया और फिर 1950 में, सिर्फ 28 साल की उम्र में, शास्त्रीजी महाराज ने उन्हें संस्था का प्रमुख बना दिया। इसीलिए आगे चलकर उन्हें प्रमुख स्वामी महाराज कहा गया।

1971 में योगीजी महाराज के निधन के बाद प्रमुख स्वामी महाराज ने आध्यात्मिक नेतृत्व संभाला। इसके बाद उन्होंने लगातार यात्राएं कीं। गांव, शहर, विदेश जहां भक्त थे, वहां पहुंचने की कोशिश की। इसी दौर में BAPS की पहचान गुजरात की संस्था से निकलकर एक वैश्विक हिंदू संगठन के रूप में बनने लगी लेकिन यहां एक दिलचस्प बात है। BAPS की विदेश वाली कहानी सीधे अमेरिका या लंदन से शुरू नहीं होती। इसकी शुरुआती मजबूत जमीन बनी थी, अफ्रीका में।

क्योंकि पहले से ही बड़ी संख्या में गुजराती व्यापारी और परिवार केन्या, युगांडा और तंजानिया जैसे देशों में बस चुके थे। इनमें स्वामीनारायण परंपरा से जुड़े लोग भी थे। नैरोबी में 1920 के दशक से सत्संग गतिविधियों का रिकॉर्ड मिलता है। 1945 में वहां एक प्रारंभिक अक्षर-पुरुषोत्तम मंदिर बना और 1955 में योगीजी महाराज अफ्रीका गए और मोम्बासा में मंदिर का उद्घाटन किया और BAPS विदेश में फैला कैसे? ये तरीका समझना बहुत जरूरी है।

मान लीजिए किसी शहर में पांच-दस गुजराती परिवार जाकर बसे। पहले वे किसी के घर पर मिलना शुरू करते। भजन होता, वचनामृत पढ़ा जाता, गुरु और भारत के साधुओं से संपर्क रखा जाता। धीरे-धीरे परिवारों की संख्या बढ़ती। फिर कोई साधु वहां जाता। उसके बाद छोटा प्रार्थना स्थल बनता और फिर जब समुदाय बड़ा हो जाता, तो स्थायी मंदिर खड़ा हो जाता।

ब्रिटेन में भी लगभग यही हुआ, 1950 के आसपास लंदन में भक्तों ने नियमित सत्संग शुरू किया। 1959 तक संस्था वहां औपचारिक रूप लेने लगी। फिर 1970 में इस्लिंगटन में एक पुराना चर्च खरीदा गया और उसे मंदिर में बदल दिया गया। इसके बाद 1972 में एक बड़ी घटना हुई। युगांडा के शासक ईदी अमीन ने एशियाई मूल के लोगों को देश छोड़ने का आदेश दिया। बड़ी संख्या में भारतीय मूल के लोग ब्रिटेन पहुंचे और इनमें बहुत से गुजराती परिवार थे। इससे BAPS का समुदाय भी तेजी से बढ़ा।

फिर आगे चलकर नेस्डन में बड़ी जगह ली गई और 1995 में वहां पत्थर का प्रसिद्ध BAPS मंदिर खुला। अब BAPS सिर्फ छोटे प्रवासी धार्मिक समूह के रूप में नहीं दिख रहा था। अब वह ऐसे बड़े मंदिर बना रहा था जिन्हें पूरा देश नोटिस कर रहा था।

अमेरिका में भी यही कहानी आगे बढ़ी। 1974 में न्यूयॉर्क के फ्लशिंग में शुरुआती मंदिर बना। फिर न्यू जर्सी, ह्यूस्टन, शिकागो, अटलांटा, लॉस एंजिलिस जैसे शहरों में केंद्र और मंदिर बनते गए। इसी मॉडल से बाद में गांधीनगर का अक्षरधाम, दिल्ली का अक्षरधाम, लंदन का नेस्डन मंदिर और अमेरिका का रॉबिन्सविल अक्षरधाम जैसी बड़ी पहचानें सामने आईं।

अबू धाबी का मंदिर तो इस वैश्विक विस्तार का एक और बड़ा उदाहरण है। संयुक्त अरब अमीरात के नेतृत्व ने मंदिर के लिए जमीन उपलब्ध कराई। 2015 में 13.5 एकड़ और बाद में अतिरिक्त जमीन मिलने के बाद कुल क्षेत्र करीब 27 एकड़ हुआ। फरवरी 2024 में मंदिर का उद्घाटन हुआ और फ्रांस की राजधानी पेरिस में सितंबर 2026 में यह मंदिर खुला है।

लेकिन अब एक और जरूरी हिस्सा समझिए… BAPS के साधु। बाहर से देखने पर लग सकता है कि कोई युवक घर छोड़ता है और सीधे भगवा पहनकर साधु बन जाता है। लेकिन प्रक्रिया इतनी सीधी नहीं है… पहले युवक संस्था के जीवन को करीब से समझता है। फिर पार्षद दीक्षा का चरण आता है। पार्षद आम तौर पर सफेद वस्त्र पहनते हैं और पूर्ण साधु जीवन की तैयारी करते हैं। इस दौरान सेवा, धार्मिक अध्ययन, अनुशासन और त्याग की परीक्षा होती है।

इसके बाद योग्य पार्षद को भागवती दीक्षा दी जाती है। तब वह भगवा वस्त्र धारण करके पूर्ण साधु बनता है और उसे नया साधु नाम मिलता है।

साधु बनने के बाद पांच प्रमुख व्रतों पर जोर दिया जाता है- निष्काम, निस्नेह, निस्वाद, निर्मान और निर्लोभ। आसान भाषा में समझें तो काम और यौन आकर्षण से दूरी, परिवार और सांसारिक मोह से दूरी, स्वाद पर नियंत्रण, अहंकार से दूरी और धन-संपत्ति के लोभ से दूरी और ब्रह्मचर्य के नियम यहां बहुत सख्त हैं। इसी वजह से BAPS साधुओं के महिलाओं से संपर्क को लेकर भी कड़े नियम रखता है।

swaminarayan.org में BAPS के discipline के नियम बताए गए हैं उनमें निष्काम में यह बात स्पष्ट होती है। इनमें साधुओं के लिए जीवन भर ब्रह्मचर्य का पालन करना। शादी न करना। महिलाओं से कोई संपर्क न रखना। महिलाओं को शारीरिक रूप से न छूना, उनसे न लिखना या बात न करना, उन्हें जान-बूझकर न देखना, या उनके बारे में सोचना भी नहीं… कहा गया है… यही वो हिस्सा है जिसे लेकर अभी बहस हो रही है.. संस्था इसे महिला-विरोध नहीं बल्कि संन्यास और ब्रह्मचर्य का हिस्सा मानती है… अब 

अब आते हैं उस सवाल पर जिसे सुनने को आप उत्सुक हैं और जिसे लेकर सबसे ज्यादा बहस या चर्चा हो रही है- क्या BAPS हिंदू धर्म से अलग है या उसने हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ कुछ कहा है? baps.org के WhoWeAre सेक्शन में लिखा है, “BAPS एक सामाजिक-आध्यात्मिक हिंदू संप्रदाय है, जिसकी जड़ें वेदों में हैं। इसकी स्थापना की शुरुआत भगवान स्वामीनारायण द्वारा 18वीं शताब्दी के अंतिम दौर में हुई थी।” उनके मंदिरों में राम, कृष्ण, शिव, पार्वती, गणेश और हनुमान जैसे देवताओं की मूर्तियाँ भी होती हैं और साधु प्रशिक्षण में गीता, उपनिषद और रामायण भी पढ़ते हैं। 

लेकिन कहानी इतनी नहीं है, कहानी इसके बाद शुरू होती है। मूर्तियाँ तो होती हैं लेकिन वो सब मूर्तियाँ स्वामी स्वामीनारायण से छोटी होती हैं और इसे लेकर भी बड़ी संख्या में हिंदुओं की नाराजगी रहती है और इनके literature में किस तरह हिंदू देवी देवताओं को छोटा दिखाया गया है उसकी बात करें उससे पहले एक उदाहरण सुनिए।

हमारे एक सहयोगी हैं मेघलसिंह परमार, ऑपइंडिया गुजराती में काम करते हैं, वो करीब 1-2 साल पहले गुजरात में एक BAPS के मंदिर में गए, सर्दियों के दिन थे, तो भगवान स्वामीनारायण को बाकायदा गर्म कपड़े पहनाए हुए थे लेकिन बाकी देवी-देवताओं की मूर्तियाँ सामान्य ही थीं। उन पर कोई गर्म कपड़ा नहीं था। देखने सुनने में ये बात छोटी है लेकिन आस्थावान लोगों के लिए इसका क्या महत्व है ये मुझे बताने की जरूरत नहीं है।

अब आगे बढ़ते हैं और BAPS के literature पर आते हैं। हालाँकि, समय-समय पर इनके लिटरेचर में बदलाव होते रहे हैं, तो एक ही किताब के अलग-अलग संस्करणों में आपको अलग कहानियाँ मिलेंगी और अभी गुजरात में हुए विवाद के बाद ताजा संस्करणों से लगभग सभी विवादित बातें हटा दी गई हैं, अब क्योंकि संस्थान बड़ा है, अलग-अलग वेबसाइट्स हैं तो उन्हीं से हमने कुछ पुरानी किताबों को ढूँढा है और आपको बताएँगे कि किस तरह स्वामीनारायण को सबसे बड़ा दिखाया गया है।

एक किताब है ‘नीलकंठ चरित्र’। आपको याद होगा कि स्वामीनारायण जब घर से निकले थे तब उनका नाम नीलकंठ हुआ करता था और वहीं से यह नाम आया होगा। इस किताब में जो बाते हैं वो बेहद ही गंभीर है। इसमें लिखा है कि हनुमान जी ने खुद को नीलकंठ का सेवक बताया था। एक कथा में हनुमान नीलकंठ का ‘कथित अपमान’ करने वाले साधुओं की पिटाई करते हैं, इस पर उनका परिचय पूछते हैं तो वो कहते हैं कि ‘मैं अंजना का पुत्र हनुमान हूँ और नीलकंठ का सेवक हूँ’। जानते हैं इस कथा में नीलकंठ का अपमान क्यों हुआ था? क्योंकि उन्होंने पुरुषों और महिलाओं के साथ राम कथा सुनने पर आपत्ति जताई थी कि वो साथ बैठकर कथा कैसे सुन सकते हैं। इसी कहानी में एक जगह लिखा है कि हनुमानजी को हर दिन नीलकंठ के दर्शन करने की आदत थी। 

नीलकंठ चरित्र

सिर्फ हनुमानजी को लेकर ही नहीं लिखा गया है, एक जगह लिखा है, “वे लक्ष्मणझूला पहुँचे। नीलकंठ ने गंगा के ठंडे पानी में स्नान किया और फिर मंदिर में जाकर लक्ष्मणजी की मूर्ति के सामने प्रणाम किया, उसी समय लक्ष्मणजी स्वयं अपनी मूर्ति से प्रकट हुए और नीलकंठ के चरणों में झुक गए। नीलकंठ ने उनके हाथ पकड़कर उन्हें उठाया और उन्हें भगवान श्रीराम के दिव्य स्वरूप में अपने दर्शन कराए।”

पुस्तक के एक चैप्टर में सूर्यनारायण को नीलकंठ के सामने दिखाया गया है। इस चैप्टर में लिखा है, “ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी नीलकंठ के दर्शन करने और उनकी सेवा के लिए वहाँ आए।” आगे लिखा है, “इसके बाद सूर्यनारायण ने नीलकंठ से कहा, “हे प्रभु, आप स्वयं पुरुषोत्तम नारायण हैं। आप सबसे श्रेष्ठ हैं और सभी अवतारों के भी कारण हैं। आप पूर्ण रूप से पवित्र हैं।”

भगवान शिव और माता पार्वती को लेकर इसी तरह की बातें कही गई हैं। इसमें लिखा है, “नीलकंठ स्वयं भगवान थे, फिर भी वे शालिग्राम की बहुत गहरी श्रद्धा और भक्ति से पूजा करते थे। नीलकंठ अभी यही सोच रहे थे कि शालिग्राम के लिए भोजन कहाँ से मिलेगा, तभी वहाँ एक बैल पर सवार एक पुरुष और एक स्त्री आए। दोनों का रूप संन्यासियों जैसा था।  उन्होंने उनसे पूछा, “आप कौन हैं?” तब उस स्त्री ने कहा, “ये शिवजी हैं और मैं सती हूँ। आप कई दिनों से भूखे हैं, इसलिए हम आपके लिए साथवो लेकर आए हैं।” वास्तव में वे भगवान शिव और माता पार्वती थे। नीलकंठ की सेवा करने का अवसर पाकर दोनों बहुत प्रसन्न हुए।”

एक और किताब है नाम है घनश्याम चरित्र, इसमें स्वामीनारायण के जन्म से जुड़ी कथाएँ हैं। इसमें लिखा है, “हनुमानजी बाल घनश्याम को लेकर तुरंत गाँव वापस पहुँचे और उन्हें भक्तिमाता की गोद में सौंप दिया। इसके बाद हनुमानजी ने भक्तिमाता को प्रणाम किया और कहा, ‘माता, आपका यह बालक स्वयं भगवान है और मैं उनका सेवक हूँ। जब भी आपको मेरी सहायता की जरूरत हो, मुझे याद कर लीजिएगा। मैं हमेशा आपकी सेवा के लिए उपस्थित रहूँगा’।” अब दिलचस्प बात ये भी है कि आगे के संस्करणों में कहानी तो यही है लेकिन इसमें से भगवान कहने वाला हिस्सा हटा दिया गया है। 

घनश्याम चरित्र

इस नए संस्करण में लिखा है, “जैसे-जैसे घनश्याम बोलते गए, उनके शरीर से दिव्य प्रकाश की किरणें निकलने लगीं। वहाँ बैठे सभी लोगों को समाधि की अवस्था का अनुभव हुआ। हर विद्वान को घनश्याम के रूप में अपने-अपने आराध्य देव के दर्शन होने लगे। किसी को उनमें शंकराचार्य दिखाई दिए, किसी को भगवान शिव, किसी को श्रीराम और किसी को श्रीकृष्ण के दर्शन हुए।” उन्हें भगवान श्रीराम बताने वाली ऐसी कितनी ही कहानियाँ इसमें हैं।

गुणातीतानंद स्वामी पर लिखी एक किताब है। नाम है गुणातीतानंद स्वामी- विस्तृत जीवन और कार्य। वे स्वामीनारायण के पहले आध्यात्मिक उत्तराधिकारी हैं। यह किताब गुजराती में है और इसमें एक जगह लिखा है, “महाविष्णु अपनी अनंत शक्ति मूल प्रकृति और मूल पुरुष से प्राप्त करते हैं। इस तरह ब्रह्मांड में करोड़ों भगवान माने जा सकते हैं, लेकिन उन सभी भगवानों के भी भगवान स्वामीनारायण हैं, इस विचार को इसी रूप में समझाया जाता है।”

साधु विवेकसागर दास अपने एक लेख ‘विश्वमा व्यापेली अद्भुत सृष्टि BAPS मंदिरों नी’ में लिखते हैं, “वचनामृत गढ्डा के आखिरी अध्याय 38 में भगवान स्वामीनारायण के कहे शब्दों की पुष्टि करते हुए स्वामी ने कहा कि दूसरे अवतार तो प्रणाम और पूजा के लायक हैं, लेकिन सिर्फ़ हमारे आराध्य भगवान स्वामीनारायण ही पूजा के लायक हैं।” यह लेख BAPS की वेबसाइट पर अभी भी मौजूद है।

ऐसे कहानियाँ इस पूरे literature में भरी पड़ी है। ये तो हुई literature के बाद, इसके अलावा BAPS से जुड़ा एक और विवाद है, जो खूब चर्चा में रहा।

अमेरिका के न्यू जर्सी में BAPS का बहुत बड़ा स्वामीनारायण अक्षरधाम मंदिर बनाया गया। लेकिन 2021 में मंदिर बनाने वाले कुछ भारतीय मजदूर अदालत पहुँच गए। उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें भारत से धार्मिक काम करने वाले लोगों के वीजा पर अमेरिका बुलाया गया था, लेकिन वहाँ उनसे मंदिर बनाने का भारी काम कराया गया। मजदूरों का कहना था कि उनसे रोज करीब 12 से 13 घंटे और हफ्ते में 87 घंटे से भी ज्यादा काम कराया जाता था जबकि पैसे केवल करीब 450 डॉलर महीने मिलते थे। 

दावा किया गया कि भारत से जानबूझकर दलित, आदिवासी और दूसरे हाशिये के समुदायों से मजदूरों की भर्ती की।

कुछ मजदूरों ने यह भी कहा कि अमेरिका पहुँचने के बाद उनके पासपोर्ट अपने पास रख लिए गए, उन्हें बिना अनुमति बाहर जाने की आजादी नहीं थी और बाहरी लोगों से मिलने-जुलने पर भी रोक थी। मामला सामने आने के बाद अमेरिका की संघीय एजेंसियों ने भी जाँच शुरू की। दूसरी तरफ BAPS ने सभी गंभीर आरोपों से इनकार किया। संस्था का कहना था कि मंदिर का काम सामान्य नौकरी की तरह नहीं बल्कि धार्मिक सेवा के रूप में किया जा रहा था और बहुत से लोग अपनी इच्छा से सेवा कर रहे थे। 2023 में इस मामले में एक बड़ा बदलाव आया जब 12 मजदूरों ने अपने मुकदमे वापस ले लिए। उनके वकील ने अदालत को बताया कि मुकदमा वापस लेने के बदले उन्हें BAPS से कोई पैसा नहीं मिला और उन्होंने धार्मिक कारणों से केस आगे न बढ़ाने का फैसला किया। लेकिन बाकी मजदूर मुकदमे में बने रहे, इसलिए पूरा मामला खत्म नहीं हुआ।

सितंबर 2025 में अमेरिकी न्याय विभाग ने इस मामले से जुड़ी आपराधिक जाँच बिना किसी आपराधिक आरोप के बंद कर दी। यह BAPS के लिए बड़ी राहत थी। लेकिन इसका मतलब यह नहीं था कि अदालत ने मजदूरों के सभी आरोप झूठे साबित कर दिए। आपराधिक जाँच बंद हुई लेकिन मजदूरों का अलग दीवानी मुकदमा चलता रहा। 2026 तक BAPS उस मुकदमे को खारिज कराने की कोशिश कर रहा था और मजदूरों की ओर से उसका विरोध किया जा रहा है।

इस कहानी में हमने आपको BAPS की शुरुआत से लेकर उसके देश-विदेश में फैलने तक सारे मुद्दे बता दिए हैं, तो BAPS को सिर्फ उसके संगमरमर के मंदिरों से मत देखिए। इसकी असली कहानी उन विचारों में छिपी है, जिन पर इसका पूरा ढांचा खड़ा है। अक्षर-पुरुषोत्तम की उपासना, गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण, बेहद सख्त साधु जीवन, और दुनिया भर में फैला संगठन। लेकिन जितना बड़ा इसका विस्तार हुआ, उतने ही इसके साहित्य, धार्मिक दावों और न्यू जर्सी मामलों को लेकर सवाल भी उठे। किसी संगठन को समझने का सही तरीका न उसकी केवल प्रशंसा है, न केवल आलोचना। असली तस्वीर तब बनती है जब उसकी आस्था, ताकत, इतिहास और विवाद। सबको एक साथ सामने रखा जाए। और BAPS की कहानी शायद यहीं सबसे ज्यादा दिलचस्प हो जाती है।

Join OpIndia's official WhatsApp channel

  सहयोग करें  

'द वायर' जैसे राष्ट्रवादी विचारधारा के विरोधी वेबसाइट्स को कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

शिव
शिव
7 वर्षों से खबरों की तलाश में भटकता पत्रकार...

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

EC में कैसे आए 3 कमिश्नर? जब राजीव गांधी से भिड़े CEC शास्त्री, तो बदल दिया गया चुनाव आयोग का पूरा गेम

चुनाव आयोग में तीन कमिश्नर्स की व्यवस्था कैसे शुरू हुई? राजीव गाँधी, आरवीएस शास्त्री और टीएन शेषन से जुड़ी पूरी कहानी समझिए।

खून वही, बस नैरेटिव बदल गया: प्राचीन बलि से ईसाई संस्कार तक, इतिहास ने ये फर्क कैसे बनाया?

पश्चिम ने पुरानी सभ्यताओं को खून और बलि के नाम पर बर्बर कहा। ईसाई परंपरा को आध्यात्मिक ऊँचाई बताया। लेकिन चर्च के केंद्र में भी रोटी और वाइन के जरिए शरीर और रक्त का अनुष्ठान बैठा है। सभ्यता की कहानी इतनी साफ नहीं।
- विज्ञापन -