आज भारत में इस बात पर हंगामा मचा हुआ है कि चुनाव आयोग के तीन कमिशनर्स में से 2 बहुत से फैसलों से सहमत नहीं होते। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट को लेकर एकदम आंदोलन की बात हो रही है। लेकिन क्या आपको पता है कि आख़िर इलेक्शन कमीशन में तीन कमिश्रनर्स हैं ही क्यों? क्या हमेशा से भारत में तीन ही कमिश्नर हुआ करते थे?
या फिर किसी ने अपने हित साधने को इस इंडिपेंडेंट इंस्टीटूशन को सिंगल मेंबर बॉडी से ट्रिपल मेंबर बॉडी में बदल दिया? आख़िर कैसे राजीव गांधी की बातें ना मानने का ख़ामियाज़ा एक चीफ इलेक्शन कमिश्नर को अपनी पॉवर्स के पर कतरने से चुकाना पड़ा।
और कैसे तब चीफ इलेक्शन कमिश्नर को ही आख़िरी दिन तक पता नहीं था कि उसके पर कतरे जाने वाले है। तो ये कहानी शुरू होती है साल 1950 से, लेकिन इसका मेन प्लॉट है 1980 के दशक का। दरअसल जब भारत का संविधान लिखा जा रहा था तब चुनाव को लेकर काफ़ी बहस हुई।
इसके बाद 25 जनवरी, 1950 को इलेक्शन कमीशन बनाया गया, जिसे एक कान्सटीट्युशनल बॉडी का दर्जा दिया गया। इसका जिम्मा था देश में फ्री एंड फ़ेयर चुनाव करवाना। इसको हेड करने के लिए एक चीफ इलेक्शन कमिश्नर को नियुक्त किया गया जिसके कंधों पर ये ज़िम्मेदारी थी कि वो इस इलेक्शन कमीशन को चलाएगा।
देश के पहले चुनाव यानी 1952 के आम चुनाव सफलतापूर्वक करवाए गए और ये व्यवस्था 1984 तक चली। किसी को कोई समस्या नहीं हुई। लेकिन इसके बाद साल 1984 में राजीव गाँधी सिंपथी लहर में प्रधानमंत्री बने। 400 से अधिक सीटें उन्होंने संसद में जीत ली, उनके हाथ में ये अधिकार आ गया कि वो किसी भी तरह का संशोधन कर सकें।
राजीव गांधी ने शाह बानो जजमेंट को पलटना हो या फिर एंटी डिफ़ेक्शन लॉ लाना, अपनी इस ताक़त का इस्तेमाल खूब किया। लेकिन उन्होंने इस ताक़त का मतलब ये भी समझ लिया कि वो चुनाव आयोग को अपने हिसाब से चला सकते हैं।
उन्होंने चुनाव की तारीखों से लेकर उपचुनाव जैसे मामलों को अपने हिसाब से करवाने के लिए दबाव डालना शुरू किया ताकि उनकी पार्टी यानी कांग्रेस को बढ़त मिले। और उनका सीधा टकराव हुआ तब के मुख्य चुनाव आयुक्त RVS पेरी शास्त्री से।
1 जनवरी 1986 को मुख्य चुनाव आयुक्त बने शास्त्री चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को लेकर काफ़ी गंभीर थे। राजीव गाँधी ने इसी कड़ी में साल 1987 में चुनाव आयोग पर दबाव बनाना शुरू किया। ये दबाव था हरियाणा विधानसभा और राष्ट्रपति चुनावों को लेकर। राजीव गाँधी चाहते थे कि हरियाणा विधानसभा के चुनाव राष्ट्रपति चुनाव से पहले ना हों।
यानी वो हरियाणा विधानसभा चुनाव टालना चाहते थे। ऐसा इसलिए था क्योंकि तब हरियाणा में कांग्रेस की सरकार थी और भजनलाल मुख्यमंत्री थे, राष्ट्रपति चुनाव में विधायकों के भी वोट डलते हैं और अगर नए चुनाव हो जाते और कांग्रेस हार जाती तो शायद उनकी पोजिशन इसको लेकर कमजोर हो जाती।
लेकिन RVS शास्त्री ने ये मानने से मना कर दिया। देश भर में राजीव गांधी के खिलाफ माहौल बन चुका था और शास्त्री ने तय समय पर यानी जून 1987 में ही हरियाणा में विधानसभा चुनाव करवाए और कांग्रेस की तगड़ी हार हुई। लोकदल-भाजपा गठबंधन यहाँ भारी मतों से जीत कर सत्ता में पहुँचा और ताऊ देवीलाल सीएम बने।
इसके बाद RVS शास्त्री ने प्रेसिडेंशियल इलेक्शन भी तय समय पर यानी जुलाई 1987 में करवाए और इसमें कांग्रेस कैंडिडिएट R वेंकटरामन जीते। लेकिन CEC शास्त्री का दबाव में ना आना राजीव गांधी को पसंद नहीं आया और वो राजीव गांधी की आँखों में चढ़ गए!
लेकिन ये शास्त्री और राजीव गांधी की आख़िरी लड़ाई नहीं थी। बल्कि इसके बाद कहानी और खराब हुई। साल 1988 में फरीदाबाद लोकसभा में उपचुनाव हुआ और कांग्रेस ने कहा कि यहाँ भयानक गड़बड़ी हुई और हिंसा भी हुई है। कांग्रेस ने शास्त्री से कहा कि लोकसभा में पूरा उपचुनाव दोबारा से करवाया जाए।
शास्त्री ने इस माँग को ठुकरा दिया और उन 161 बूथों पर ही रिपोल करवाया जो हिंसा प्रभावित थे। ये दूसरा मौक़ा था जब राजीव गांधी और शास्त्री आमने सामने थे। इसके बाद असम में वोटर लिस्ट को लेकर भी तल्खी हुई।
कहा गया कि शास्त्री असम गण परिषद का पक्ष ले रही है। बाद में AGP ने ये चुनाव भी जीत लिया। अब तक लड़ाई खुले में आ चुकी थी और शास्त्री पर रिजाइन करने तक का प्रेशर था। जब कोई रास्ता नहीं मिला तो राजीव गाँधी ने शास्त्री को कट टू साइज करने का फैसला ले लिया।
और ये हुआ अक्तूबर 1989 में। 9 अक्तूबर 1989 को देश के राष्ट्रपति ने एक नोटिफिकेशन जारी किया। नोटिफिकेशन ने पिछले लगभग 4 दशक से चली आ रही चुनाव आयोग की व्यवस्था को बदल दिया। सरकार ने अब चुनाव आयोग में शास्त्री के साथ 2 और लोगों को अपॉइंट कर दिया।
इस बदलाव का किसी को अंदाजा नहीं था। ये नोटिफिकेशन सीधे तौर पर मुख्य चुनाव आयुक्त की ताकतों को बाँटने का जुगाड़ थी। इसके बाद राजीव गाँधी सरकार ने तुरंत ही दो और इलेक्शन कमिश्नर SS धनोआ और वीएस सहगल को अपॉइंट कर दिया, ये नियुक्ति 16 अक्तूबर 1989 को हुई थी।
SS धनोआ ने ख़ुद इस बदलाव के बारे में लिखा है। उन्होंने बताया है कि राजीव गाँधी ने पहले ही उन्हें इस बात के लिए राजी कर लिया था कि उन्हें सरकार में कोई पोजिशन दी जाएगी। यानी राजीव गांधी पहले ही बदलाव के लिए मन बना चुके थे और शास्त्री की ताक़त कम करना चाहते थे।
धनोआ ने बताया है कि जब 16 अक्तूबर 1989 को वो शास्त्री के पास पहुँचे तो यहाँ पहले ही माहौल काफ़ी ख़राब था। शास्त्री के पास राजीव गांधी के कानून मामलों के सचिव आए हुए थे और उन पर ये दबाव बना रहे थे कि वो एडिशनल चुनाव आयुक्त नियुक्त करने का फैसला मान लें।
हालांकि शास्त्री एकदम गुस्सा थे और कह रहे थे कि वो प्रधानमंत्री की ये हरकत बर्दाश्त नहीं करेंगे। इन फैक्ट धनोआ ने तो ये भी लिखा है कि शास्त्री क्या उन्हें ही अपनी इस अपॉइंटमेंट के बारे में उस दिन तक नहीं बताया गया था, उनकी कोई सलाह भी नहीं ली गई थी।
यानी राजीव गांधी ने चुनाव आयोग के पर कतरने के लिए बिना मुख्य चुनाव आयुक्त को बताए ही नियुक्तियाँ कर दी थीं और वो लोग नियुक्त किए थे जो वो पहले से जानते थे। अब चूंकि चुनाव आयोग 1 की जगह तीन सदस्यीय हो चुका था तो सारे निर्णय भी बहुमत से होने थे।
यानी राजीव गांधी ने अपनी मनमर्जी के लिए चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को ख़त्म कर दिया था। लेकिन ये लोकतंत्र पर राजीव गांधी सरकार का आख़िरी हमला था, ऐसा बिल्कुल मत सोचिएगा। अपने मनमर्जी के आयुक्त चुनाव आयोग में बिठाने के बाद तुरंत राजीव गाँधी ने अपना एजेंडा इम्प्लीमेंट कर दिया।
राजीव गांधी ने 17 अक्तूबर को ख़ुद ही अगले आम चुनाव की डेट अनाउंस कर दी, जो काम चुनाव आयोग का था, वो अब प्रधानमंत्री कर रहे थे। और जो डेट भी अनाउंस की गई वो सिर्फ़ एक महीने की थी, यानी विपक्षी पार्टियों को तैयारी करने की भी सहूलियत ना मिले।
इन सब बातों को लेकर लगातार शास्त्री और राजीव गाँधी में तनातनी होती रही। CEC शास्त्री ने हालाँकि शांत दिमाग़ से काम लिया और चुनाव उसी तारीख़ में करवाए जो पीएम ने अनाउंस किए थे, अगर ऐसा नहीं होता तो देश संकट में फँस जाता।
लेकिन इस पूरी कहानी ने दिखा दिया था कि अपनी एब्सोल्यूट मेजॉरिटी में चूर राजीव गाँधी अपनी पार्टी को फ़ायदा पहुँचाने के लिए किसी भी हद तक तैयार थे और देश संवैधानिक संस्थाओं को भी अपने हिसाब से तोड़ मरोड़ रहे थे।
ज्यादा हँसी की बात ये है कि राजीव गांधी ख़ुद शुरुआत में चुनाव आयोग के बहु सदस्यीय होने के ख़िलाफ़ थे।
एक साल पहले ही उन्होंने इस बात का संसद में विरोध किया था और साल भर बाद वो ये अनाउंस कर रहे थे कि सिर्फ़ एक चुनाव आयुक्त को बहुत ज़्यादा काम करना पड़ रहा है इसलिए 2 और लोगों की नियुक्ति जायज़ है। अब आपको समझना चाहिए कि तब तक मिस्टर क्लीन कहे जाने वाले गांधी की छवि बोफोर्स घोटाले के चलते धूमिल हो चुकी थी।
राजा नहीं फ़क़ीर है, देश की तक़दीर है, कह कर देश भर में वीपी सिंह प्रचार कर रहे थे और उन्होंने ही बोफोर्स को लेकर राजीव गांधी को निशाने पर ले रखा था। लेकिन यहाँ भी हार के डर से राजीव गांधी ने जनता दल को चुनाव चिह्न देने में रोड़े अटकाने शुरू किए। हालाँकि शास्त्री ने किसी तरह मसला सुलझा लिया।
ये सब हरकतों के बावजूद भी राजीव गांधी चुनाव हार गए। उनके चुनाव हारते ही चुनाव आयोग की इस व्यवस्था पर भी नई वीपी सिंह की सरकार ने रोक लगा दी। 1990 में वापस से चुनाव आयोग को तीन की जगह एक ही सदस्यीय कर दिया गया।
SS धनोआ इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चले गए लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने वीपी सिंह सरकार के फैसले को सही माना। इस तरह से वापस चुनाव आयोग अपने मूल स्वरूप में लौटा। चुनाव आयोग में कमिशनर्स का नंबर बढ़ाना इश्यू नहीं है, लेकिन ये काम किस नीयत से हो रहा है, वो जरूरी है।
लेकिन कांग्रेस इस मौके पर मुँह की खाके भी बाज नहीं आई। बल्कि उसने 1991 में सत्ता में दोबारा आने के बाद वापस यही हरकत की। 1993 तक टीएन शेषन देश के CEC बन चुके थे और वो कांग्रेस को अपनी मनमर्जी नहीं करने दे रहे थे। कांग्रेस ने अपनी 4 साल पुरानी प्लेबुक वापस से दोहराई।
उसने 1993 में शेषन के साथ ही दो और लोगों की नियुक्ति चुनाव आयोग में करके इसे वापस से मल्टी मेंबर बॉडी बना दिया। इस नियुक्ति में एक नाम मनोहर सिंह गिल का भी था जो बाद में UPA की सरकार में मंत्री बने। जाहिर है, इन नियुक्तियों के ख़िलाफ़ टीएन शेषन सुप्रीम कोर्ट चले गए।
1995 में सुप्रीम कोर्ट की एक पाँच सदस्यीय बेंच ने सरकार का फैसला सही माना और तब से ही तीन आयुक्तों की व्यवस्था परमानेंटली लागू हुई। लेकिन इस पूरी टाइमलाइन से आपको ये जरूर क्लियर हो गया होगा कि कांग्रेस को चुनाव आयोग की कितनी इज्जत है या फिर वो इसके फार्मेशन को लेकर कितनी गंभीर है।
आज इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट पर हंगामा हो रहा है कि तीन चुनाव आयुक्त आपस में सहमत नहीं थे। लेकिन कांग्रेस ने इसे मल्टी मेंबर बनाया ही इसलिए था कि वो अपने फैसले बहुमत से करवा ले। ऐसे में अच्छा होगा कि लोग थोड़ा पुराने समय की तरफ़ भी देखें और आज के लिए हल्ला मचाना थोड़ा कम करें। अगर किसी को समस्या है तो वो सुप्रीम कोर्ट का रास्ता अख्तियार कर सकता है।


