इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा छह साल तक फैसला सुरक्षित रखने के बावजूद निर्णय न सुनाए जाने पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में लंबित तीन आपराधिक पुनर्विचार याचिकाओं को अपने पास ट्रांसफर करने का आदेश दिया है। इन याचिकाओं पर वर्ष 2020 में सुनवाई पूरी हो चुकी थी लेकिन फैसला नहीं सुनाया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस देरी के कारण 1994 के एक हत्या मामले की सुनवाई भी वर्षों से रुकी हुई है, जो न्याय प्रक्रिया के लिए गंभीर चिंता का विषय है। सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि आम तौर पर कोर्ट इस तरह की असाधारण शक्ति का इस्तेमाल नहीं करती लेकिन इस मामले में न्याय मिलने में असामान्य देरी को देखते हुए हस्तक्षेप करना जरूरी हो गया।
2020 में सुनवाई पूरी लेकिन फैसला अब तक नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि इलाहाबाद हाई कोर्ट में इन तीनों याचिकाओं की सुनवाई 5 फरवरी 2020 को पूरी हो गई थी और उसी दिन फैसला सुरक्षित रख लिया गया था। इसके बाद मामला कई बार सूची में आया लेकिन निर्णय नहीं सुनाया गया।
यहाँ तक कि फरवरी 2026 में भी मामला सूचीबद्ध हुआ लेकिन फिर उसे स्थगित कर दिया गया। कोर्ट ने कहा कि इतने लंबे समय तक फैसला लंबित रहना न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता को प्रभावित करता है। इन याचिकाओं के लंबित रहने का सीधा असर उस आपराधिक मुकदमे पर पड़ा जो 30 मई 1994 की हत्या की घटना से जुड़ा है।
हाई कोर्ट में मामला लंबित होने के कारण निचली अदालत में चल रही सुनवाई आगे नहीं बढ़ सकी और मुकदमा दशकों से रुका हुआ है। मामले में 1995 में FIR दर्ज की गई थी और भारतीय दंड संहिता (IPC) की विभिन्न धाराओं के तहत नौ लोगों को आरोपित बनाया गया था। बाद में एक अन्य आरोपित के खिलाफ 2004 में मामला दर्ज हुआ क्योंकि वह पहले फरार था।
रिकॉर्ड मँगाने का आदेश, सुप्रीम कोर्ट में होगी सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 139ए का इस्तेमाल करते हुए इन तीनों पुनर्विचार याचिकाओं को अपने पास मँगाने का आदेश दिया है। कोर्ट ने हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया है कि तीन सप्ताह के भीतर सभी रिकॉर्ड सुप्रीम कोर्ट भेजे जाएँ।
यह याचिका मृतक के परिजनों की ओर से संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर की गई थी, जिसमें त्वरित न्याय के अधिकार के उल्लंघन का मुद्दा उठाया गया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्याय में अत्यधिक देरी से पीड़ित पक्ष को नुकसान होता है, इसलिए ऐसे मामलों में समय पर निर्णय बेहद जरूरी है।

