इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गुरुवार (16 अप्रैल 2026) को समीर नाम के एक व्यक्ति की राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत की गई गिरफ्तारी को सही ठहराया। उस पर आरोप है कि उसने पिछले साल होली के समय जंगल में दो बछड़ों और एक गाय की हत्या की थी। कोर्ट ने कहा कि इस तरह की घटना से समाज में लोगों की भावनाएँ आहत होती हैं और इससे गुस्सा और हिंसक प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक है, क्योंकि यह एक बड़े वर्ग की धार्मिक भावनाओं को चोट पहुँचाता है।
जस्टिस जेजे मुनीर और संजीव कुमार की बेंच ने कहा, “कुछ मुद्दे ऐसे होते हैं जिनके प्रति समाज बहुत संवेदनशील होता है। अगर ये मुद्दे सामने आते हैं, तो समाज में बड़ी हलचल मच सकती है और लोगों के सामान्य जीवन पर असर पड़ सकता है। गाय की हत्या ऐसा ही एक संवेदनशील मुद्दा है।”
गाय की हत्या की खबर आते ही तुरंत गुस्सा दिखता है: कोर्ट
कोर्ट ने आगे कहा, “जब भी गाय की हत्या की खबर सामने आती है, तो लोगों में तुरंत गुस्सा और भावनात्मक प्रतिक्रिया देखने को मिलती है, क्योंकि यह उनकी धार्मिक आस्था से जुड़ा है। इतिहास में भी ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं, जहाँ इस तरह की घटनाओं के बाद हिंसा और तनाव पैदा हुआ है। यह सिर्फ पुरानी बातें नहीं हैं, बल्कि आज के समय में भी ऐसी घटनाएँ समाज पर गहरा असर डालती हैं।”
कोर्ट ने कहा कि कोई भी व्यक्ति यह कहकर अनजान नहीं बन सकता कि उसे पता नहीं था कि गाय की हत्या करना कानून का गंभीर उल्लंघन है। कोर्ट ने यह कहा कि ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई पहले भी होती रही है। कोर्ट के अनुसार, सार्वजनिक व्यवस्था का संबंध किसी व्यक्ति की मंशा या उसने कौन सा कानून तोड़ा, इससे नहीं बल्कि उसके काम के असर से होता है।
बेंच ने दोहराया कि गाय की हत्या का समाज पर तुरंत और व्यापक असर पड़ता है और लगभग हर बार इससे बड़े स्तर पर हिंसा फैलती है, जिससे शांतिपूर्ण माहौल बिगड़ जाता है। कोर्ट ने कहा, “इस कोर्ट के कई फैसलों में यह माना गया है कि गाय की हत्या से सांप्रदायिक तनाव बढ़ता है, आपसी सौहार्द बिगड़ता है और ऐसी स्थिति बनती है जिससे सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित होती है।”
अपराधी के कृत्य से बड़े वर्ग की धार्मिक भावनाएँ हुईं आहत: कोर्ट
कोर्ट ने यह भी माना कि याचिकाकर्ता के इस कृत्य का सार्वजनिक व्यवस्था पर गंभीर नकारात्मक असर पड़ा और यह सिर्फ कानून-व्यवस्था का मामूली उल्लंघन नहीं था। जजों ने कहा, “यह ध्यान रखना चाहिए कि याचिकाकर्ता का अपराध कोई सामान्य हिंसक घटना नहीं थी, जो केवल एक व्यक्ति या कुछ लोगों को प्रभावित करती और समाज का बाकी जीवन सामान्य चलता रहता। उसने ऐसा काम किया जिससे इलाके के बड़े वर्ग में गुस्सा फैल गया और उनकी धार्मिक भावनाएँ आहत हुईं।”
कोर्ट ने आगे कहा कि अगर इस तरह की घटना दोबारा होती है और हिरासत में रखने वाली प्राधिकरण के पास यह भरोसेमंद जानकारी है कि आरोपित रिहा होने के बाद फिर ऐसा कर सकता है, तो इलाके का सामान्य जीवन और खासकर सार्वजनिक व्यवस्था निश्चित रूप से खतरे में पड़ जाएगी।
कोर्ट ने कहा, “याचिकाकर्ता का अपराध समाज के एक वर्ग में तुरंत हिंसा और गुस्सा पैदा करता है। इसीलिए हिरासत में रखने वाली प्राधिकरण का यह मानना पूरी तरह सही था कि जेल से बाहर आने के बाद याचिकाकर्ता ऐसी गतिविधियों में शामिल हो सकता है, जो सार्वजनिक व्यवस्था के लिए हानिकारक हों। याचिकाकर्ता की ओर से यह दलील दी गई कि ऐसा कोई खतरा नहीं है या इसके समर्थन में कोई ठोस सबूत नहीं है, लेकि मौजूदा परिस्थितियों में इस दलील को खारिज किया जाता है।”
कोर्ट ने यह मुद्दा भी उठाया कि क्या जेल में बंद व्यक्ति को भी एहतियातन हिरासत में रखा जा सकता है। इस पर पहले के एक फैसला का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि अगर किसी व्यक्ति के जल्द जमानत पर छूटने की असल में संभावना हो और इस बात के ठोस सबूत हों कि बाहर आने के बाद वह गैरकानूनी काम कर सकता है, तो ऐसे व्यक्ति के खिलाफ हिरासत का आदेश देना कानूनन सही है।
कोर्ट ने माना, कृत्य का असर सार्वजनिक व्यवस्था पर पड़ा
कोर्ट ने याचिकाकर्ता की इस दलील को भी खारिज कर दिया कि राज्य सरकार और सलाहकार बोर्ड ने उसकी तरफ से दी गई अपील पर फैसला लेने में बहुत देर की। इसके बाद कोर्ट ने उसकी हिरासत को चुनौती देने वाली ‘हैबियस कॉर्प्स’ याचिका को खारिज कर दिया।
यह हिरासत शामली के जिला मजिस्ट्रेट द्वारा NSA की धारा 3(3) के तहत दी गई थी, जिसे बाद में राज्य सरकार ने भी मंजूरी दे दी थी। कोर्ट ने साफ कहा कि यह मामला सिर्फ कानून तोड़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि इस कृत्य का सीधा असर सार्वजनिक व्यवस्था पर पड़ा है।
जानें पूरा मामला
दरअसल, 15 मार्च 2025 को पुलिस की एक टीम को शामली क्षेत्र के एक गाँव के खेत में एक बछड़े के अवशेष मिले। इस घटना से होली के दौरान हिंदू समुदाय में चिंता और तनाव फैल गया, जिसके चलते कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस बल तैनात करना पड़ा।
पुलिस के अनुसार, हिंदू संगठनों के सदस्य और स्थानीय लोग मौके पर इकट्ठा हो गए और आरोपितों की तुरंत गिरफ्तारी की माँग करते हुए नारेबाजी करने लगे। लोगों ने एक सड़क को भी जाम कर दिया, जिससे लंबा ट्रैफिक जाम लग गया। कई घंटों तक रास्त बाधित रहा, जिसके बाद हालात को संभालने और सार्वजनिक व्यवस्था बहाल करने के लिए पुलिस को वहाँ भेजा गया।
जाँच के बाद याचिकाकर्ता और उसके साथियों को हिरासत में लिया गया और उन्होंने अपना अपराध स्वीकार कर लिया। आरोपित के जेल में रहने के दौरान पुलिस को जानकारी मिली कि वह जमानत पर रिहा होने की कोशिश कर रहा है। बताया गया कि उसने जेल से संदेश भेजे थे, जिनमें कहा गया था कि रिहा होने के बाद वह फिर से गाय की हत्या करेगा और प्रशासन उसके खिलाफ कुछ नहीं कर पाएगा। इसी वजह से उसके खिलाफ हिरासत में रखने का आदेश जारी किया गया।

