राजधानी दिल्ली और उसके आसपास के इलाकों में हनीट्रैप और सेक्सटॉर्शन का एक ऐसा संगठित गिरोह सक्रिय है, जो बाकायदा कॉन्ट्रैक्ट लेकर रसूखदार लोगों को बर्बाद कर रहा है। यह गिरोह पैसे ऐंठने के लिए पॉक्सो (POCSO) जैसे कड़े कानूनों को हथियार बना रहा है।
दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, जाँच में सामने आया है कि ये अपराधी जानबूझकर कम उम्र की लड़कियों को ढाल बनाते हैं ताकि टारगेट पर ऐसा केस बने जिससे उसका बचना नामुमकिन हो जाए। चौंकाने वाली बात यह है कि गिरोह के तार कई होटलों और बिचौलियों से जुड़े हुए हैं, जहाँ बिना किसी पहचान पत्र के नाबालिगों की एंट्री कराई जाती है।
पॉक्सो को बनाया वसूली का हथियार
इस धंधे में शामिल एजेंटों का मानना है कि 18 साल से ऊपर की महिलाओं के मामले में ‘सहमति’ की गुंजाइश रहती है, लेकिन 14-15 साल की लड़की होने पर सीधा पॉक्सो एक्ट लगता है। अपराधियों के मुताबिक, इस कानून में अगर लड़की सिर्फ टच होने का आरोप भी लगा दे, तो केस पक्का हो जाता है और आरोपित सालों तक जेल से बाहर नहीं आ पाता। गिरोह के पास गवाही अपने हाथ में होती है, जिसका इस्तेमाल वे पीड़ित परिवार से लाखों-करोड़ों रुपए वसूलने के लिए करते हैं।
होटलों में सेटिंग और रशियन-इंडियन के विकल्प
दिल्ली के महिपालपुर जैसे इलाकों में करीब 300 से ज्यादा होटलों में इन गिरोहों की सेटिंग है। यहाँ अपराधियों को सीसीटीवी और पुलिस से बचाने के लिए गाड़ियों में मीटिंग की जाती है। गिरोह के पास इंडियन और रशियन दोनों तरह की लड़कियों के ‘ऑप्शन’ मौजूद होते हैं।
टारगेट को फँसाने के लिए उसे मनाली जैसे पर्यटन स्थलों पर ले जाया जाता है और शराब पिलाकर आपत्तिजनक वीडियो रिकॉर्ड कर लिए जाते हैं। अगर टारगेट पैसे देने से मना करता है, तो तुरंत पुलिस बुलाकर झूठी FIR दर्ज करा दी जाती है।
कैसे बिछाया जाता है यह गंदा जाल?
इस अपराध को अंजाम देने के तीन मुख्य तरीके सामने आए हैं। पहले दोस्ती और प्यार का नाटक कर नजदीकियाँ बढ़ाना और फिर गुप्त कैमरों से संबंध रिकॉर्ड कर ब्लैकमेल करना। कोई अपना ही व्यक्ति पैसे के लालच में टारगेट को गिरोह की महिलाओं से मिलवाता है।
वीडियो कॉल के जरिए फुटेज रिकॉर्ड कर रसूखदार लोगों को डराना। उत्तर प्रदेश पुलिस के एक बड़े अधिकारी भी इस तरह के जाल में फँस चुके हैं।
डर की वजह से चुप रहते हैं रसूखदार
एक्सपर्ट्स का कहना है कि निर्भया कांड के बाद बने सख्त कानूनों का अब वसूली के लिए गलत इस्तेमाल हो रहा है। रसूखदार लोग, नेता और बिजनेसमैन समाज में अपनी इज्जत और बदनामी के डर से पुलिस के पास जाने के बजाय गिरोह को करोड़ों रुपए दे देते हैं।
कई मामलों में तो गिरोह के मास्टरमाइंड पीड़ित के अपने ही दोस्त निकलते हैं। कानून के जानकारों का मानना है कि अगर कोई इसमें फंस जाए, तो डरे बिना इलेक्ट्रॉनिक सबूतों के साथ पुलिस से शिकायत करनी चाहिए, क्योंकि झूठा सबूत बनाना भी 10 साल तक की सजा वाला अपराध है।

