देशी बीजों और पारंपरिक फसलों के संरक्षण पर सरकार का बड़ा जोर, 5346 किस्मों को कानूनी पहचान: जानिए किसानों को कैसे मिलेगा सीधा लाभ

देश की पारंपरिक खेती, देशी बीजों और पुरानी फसल किस्मों को बचाने के लिए केंद्र सरकार लगातार कई बड़े कदम उठा रही है। सरकार का उद्देश्य सिर्फ इन बीजों का संरक्षण करना नहीं है, बल्कि किसानों को इनके इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहित करना और इनसे जुड़े उत्पादों को बेहतर बाजार भी उपलब्ध कराना है।

लोकसभा में कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर ने बताया कि सरकार भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR), राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (NBPGR) और अन्य संस्थानों के माध्यम से देशी बीजों के संरक्षण, शोध और विकास पर लगातार काम कर रही है।

सरकार का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के दौर में यही पारंपरिक बीज भविष्य की खेती को सुरक्षित बनाने में अहम भूमिका निभाएँगे।

5346 पारंपरिक बीज किस्मों का हुआ पंजीकरण

सरकार ने बताया कि 15 जुलाई 2026 तक पौध किस्म एवं कृषक अधिकार संरक्षण (PPV&FR) प्राधिकरण के पास किसानों की 5346 पारंपरिक और स्थानीय बीज किस्मों का पंजीकरण किया जा चुका है।

इससे किसानों और स्थानीय समुदायों को अपनी पारंपरिक बीज किस्मों पर कानूनी अधिकार मिला है। अब इन बीजों के संरक्षण, उपयोग और पहचान को कानूनी सुरक्षा भी प्राप्त होगी।

एक लाख से ज्यादा देशी बीज राष्ट्रीय जीन बैंक में सुरक्षित

सरकार के अनुसार, ICAR-NBPGR के राष्ट्रीय जीन बैंक में अब तक एक लाख से अधिक देशी बीजों और स्थानीय फसल किस्मों को सुरक्षित रखा गया है। देश के अलग-अलग क्षेत्रों से इन बीजों को एकत्र कर उनका वैज्ञानिक अध्ययन किया जा रहा है।

इन किस्मों में कई ऐसे गुण पाए गए हैं जो सूखा, अधिक गर्मी, बाढ़ और बदलते मौसम जैसी परिस्थितियों को बेहतर तरीके से सहन कर सकते हैं। यही कारण है कि भविष्य में नई और अधिक मजबूत फसल किस्में विकसित करने में इनका महत्वपूर्ण योगदान रहेगा।

किसानों को मिल रहे हैं पुरस्कार और सम्मान

पारंपरिक बीजों को सुरक्षित रखने वाले किसानों और समुदायों को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार ‘पादप जीनोम संरक्षक पुरस्कार’ भी दे रही है। अब तक देशभर में 45 सामुदायिक पुरस्कार, 69 कृषक पुरस्कार और 88 कृषक मान्यताएँ दी जा चुकी हैं।

राष्ट्रीय जीन कोष के माध्यम से लाभ-साझाकरण, पुरस्कार और क्षमता निर्माण जैसी योजनाओं के जरिए किसानों को सहयोग दिया जा रहा है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा एवं पोषण मिशन (NFSNM) के तहत पारंपरिक किस्मों के बीज उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए अलग उप-घटक शुरू किया गया है।

इसके तहत किसानों को बीज उत्पादन, बीज वितरण, प्रशिक्षण और सामुदायिक बीज बैंक बनाने के लिए आर्थिक सहायता दी जाती है। इसका उद्देश्य पारंपरिक बीजों को दोबारा खेती में बढ़ावा देना और उनकी उपलब्धता बढ़ाना है।

‘वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट’ से मिलेगा बाजार

सरकार ने बताया कि प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना (PMFME) के तहत ‘एक जिला-एक उत्पाद’ (ODOP) योजना चलाई जा रही है। इसके तहत 35 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 726 जिलों के लिए विशेष कृषि और उद्यानिकी उत्पादों का चयन किया गया है।

इनमें मखाना, शाही लीची, जर्दालू आम जैसे पारंपरिक उत्पाद भी शामिल हैं। सरकार इन उत्पादों की प्रोसेसिंग, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और मार्केटिंग के लिए वित्तीय और तकनीकी सहायता दे रही है।

GI टैग और अलग-अलग बोर्ड भी कर रहे मदद

सरकार पारंपरिक कृषि उत्पादों को भौगोलिक संकेतक (GI) टैग के जरिए भी संरक्षण दे रही है। इससे इन उत्पादों की पहचान मजबूत होती है और बाजार में उनकी कीमत बढ़ाने में मदद मिलती है।

इसके अलावा चाय बोर्ड, कॉफी बोर्ड, मसाला बोर्ड, एपीडा और राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड जैसी संस्थाएँ भी गुणवत्ता सुधार, निर्यात और ब्रांडिंग में सहयोग कर रही हैं। हाल ही में सरकार ने मखाना के उत्पादन और विपणन को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय मखाना बोर्ड का भी गठन किया है।

श्री अन्न और मिलेट्स पर विशेष फोकस

सरकार ने अंतरराष्ट्रीय मिलेट वर्ष के बाद ‘श्री अन्न’ यानी मोटे अनाजों को बढ़ावा देने पर भी विशेष जोर दिया है। हैदराबाद स्थित भारतीय मिलेट्स अनुसंधान संस्थान को मिलेट्स के लिए वैश्विक उत्कृष्टता केंद्र बनाया गया है।

वहीं उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना (PLI) में भी मिलेट आधारित उत्पादों के लिए अलग प्रावधान किया गया है ताकि इनका व्यावसायीकरण और मूल्य संवर्धन बढ़ सके।

देशी बीजों पर तेजी से बढ़ रहा शोध

सरकार ने बताया कि गेहूँ, धान, मक्का, तिल, मसूर, खीरा और टमाटर जैसी फसलों में देशी जर्मप्लाज्म और स्थानीय किस्मों पर 13 बड़े शोध प्रोजेक्ट चल रहे हैं। इनका उद्देश्य जलवायु परिवर्तन को सहने वाली, अधिक उत्पादन देने वाली और रोग प्रतिरोधी नई किस्में विकसित करना है।

इसी शोध के तहत उन्नत पूसा बासमती किस्में विकसित की गई हैं, जिनका भारत के बासमती चावल निर्यात में बड़ा योगदान है। वहीं पूर्वी उत्तर प्रदेश की प्रसिद्ध कालानमक धान किस्म के बेहतर उत्पादन के लिए ‘पूसा नरेंद्र केएन-1’ और ‘पूसा CRD केएन-2’ जैसी नई किस्में भी विकसित की गई हैं।

सामुदायिक बीज बैंक और नई पहचान

सरकार ने बताया कि 11 राज्यों में 25 फसलों की 5000 से अधिक देशी किस्मों का मूल्यांकन किया गया है। इनमें से करीब 300 उत्कृष्ट किस्मों की पहचान बड़े स्तर पर खेती के लिए की गई है। साथ ही देशभर में लगभग 50 सामुदायिक बीज बैंक बनाए गए हैं, जहाँ 25 से अधिक फसलों की 4000 से ज्यादा पारंपरिक किस्मों को सुरक्षित रखा जा रहा है। ‘नेटिव बास्केट’, ‘माउंटेन ग्रेन्स’ और ‘धरती नेचुरल्स’ जैसे ब्रांडों के माध्यम से इन देशी उत्पादों की ब्रांडिंग और बाजार से जोड़ने का भी काम किया जा रहा है।

खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय के अनुसार, अब तक 257 शोध एवं विकास परियोजनाओं को मंजूरी दी जा चुकी है। इनमें मिलेट आधारित उत्पाद, महुआ, सहजन और अन्य पारंपरिक कृषि उत्पादों पर शोध शामिल हैं। सरकार का मानना है कि इससे किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ देश की कृषि जैव विविधता को भी सुरक्षित रखने में मदद मिलेगी।