आपको ये शख्स याद हैं? याद ही होंगे, ये हमारी देश की सेंट्रल बैंक यानी रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया के पूर्व गवर्नर हैं। दुनिया के नामी अर्थशास्त्री हैं। रघुराम राजन इनका नाम है। वैसे मैंने आपको जो इनकी पहचान बताई है आपने इसके लिए उन्हें पिछले पाँच-छह सालों में खबरों में नहीं देखा होगा।
आपने इन्हें GDP को लेकर रोना रोते, मैन्युफैक्चरिंग को श्राप देते हुए देखा होगा, लेकिन अब इनका तख्तापलट हो गया है। इनकी जगह पर एक नए पूर्व साहब आए हैं, इनका नाम है सुभाष गर्ग।
गर्ग साहब ने पिछले दिनों 7.8% की रफ्तार से बढ़ती जीडीपी को लेकर एक कैलकुलेशन दी थी। अब इन्होंने कहा है कि 12 साल पहले देश में शुरू की गई प्रधानमंत्री जनधन योजना फेल हो गई है।
कल उन्होंने लेफ्ट इकोसिस्टम की वेबसाइट क्विंट पर एक आर्टिकल लिखा है। हँसी की बात ये है कि जनधन योजना के फेल होने के उन्होंने जो पैरामीटर्स बताए हैं, वो कॉमेडी का स्तर बढ़ा देते हैं।
सबसे पहले जानिए कि सुभाष गर्ग ने किस बेसिस पर कहा है कि ये योजना फेल हुई है। अपने आर्टिकल में उन्होंने कहा है कि अब लगभग 5 करोड़ ऐसे एकाउंट्स ऐसे हैं जिनमें कोई बैलेंस ही नहीं है।
उनका दूसरा दावा है कि इस योजना में खोले गए 59 करोड़ एकाउंट्स में से 15 करोड़ एकाउंट्स इनएक्टिव हैं, तीसरा इनमें से कितने UPI यूज कर रहे ये क्लियर नहीं है और चौथा कि जिनके पास एकाउंट्स हैं वो सिर्फ़ सरकारी स्कीमों का पैसा निकालने आते हैं।
और इन सब बातों के आधार पर गर्ग साहब ने कहा है कि स्कीम को अबोलिश कर दिया जाए क्योंकि ये एक फेलियर है। वैसे तो ऐसी कॉमेडी को इग्नोर करना चाहिए लेकिन सच्चाई सामने रखना हमारा काम है।
पहली बात, जनधन योजना साल अगस्त 2014 में जब लॉंच हुई थी तब देश में करोड़ों एडल्ट्स के पास एक बैंक अकाउंट नहीं था। ऐसे लोग ना अपना बचाया पैसा कहीं जमा कर सकते थे, ना कोई लोन अवेल कर सकते थे।
इससे पहले लोगों को जीरो बैलेंस अकाउंट खुलवाने के बारे में पता ही नहीं था, एक स्कीम जरूर थी जिसे BSBDA का नाम UPA सरकार ने दिया था लेकिन इसके बारे में लोगों ने सुना ही नहीं था।
ऐसे में PMJDY ने बिना किसी बैलेंस के लोगों को खाता खोलने की सर्विस दी, जहाँ 2014 में सिर्फ़ 53% एडल्ट भारतीयों के पास एक अकाउंट था तो वहीं 2024 में नंबर 89% हो गय।
नतीजा ये हुआ कि अब तक 59 करोड़ ऐसे एकाउंट्स इस योजना में खुल चुके हैं। अब इसमें से कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने इन खातों में कभी पैसा जमा नहीं किया वो जमा नहीं रखते, यही तो सुविधा है। गर्ग साहब जनधन योजना के अकाउंट्स में बैलेंस का ना होना बग नहीं है, फ़ीचर है।
गर्ग साहब आगे कहते हैं कि इनमें से जिन एकाउंट्स ए पैसा है भी वो औसतन 5 हज़ार रुपए ही है। अरे भाई! जनधन अकाउंट कोई गुड़गांव के कैमेलियास में रहने वाले थोड़े खोल रहे हैं।
गांव और क़स्बों के ग़रीब लोग खोल रहे हैं जिनके लिए 5 हज़ार की बचत भी बड़ी है। और आपको पता है कि इस 5 हज़ार की बचत ने कुल मिलाकर बैंकों को 3 लाख करोड़ से ज्यादा की फ्रेश कैपिटल दी है।

बैंक इसका इस्तेमाल लोन देने और बिजनेस एक्सपैंड करने के लिए कर सकते हैं। यानी जनधन योजना ने ना सिर्फ़ लोगों को इम्पावर किया है बल्कि बैंक्स को भी मजबूत किया है। उनका दूसरा दावा है कि 15 करोड़ जनधन एकाउंट्स इनएक्टिव हैं, हो सकता है ऐसा ही हो। जनधन योजना का काम लोगों को एक बार बैंकिंग सिस्टम में लाना था।
उन्हें उसी अकाउंट से बाँध कर रखना नहीं। अगर किसी ने बैंक का मुँह पहली बार जनधन योजना के सहारे देखा और बाद में और बेहतर सुविधा के लिए प्राइवेट बैंक के पास चला गया तो ये फेलियर थोड़े है।
यही मोटिव था कि एक बार वो किसी तरह फाइनेंसियल सिस्टम में जुड़ें। इसके आगे गर्ग साहब दावा करते हैं कि जनधन अकाउंट खोलने वाले बस सरकारी योजनाओं का पैसा लेने के लिए ही ये एकाउंट्स यूज करते हैं।
हाँ भाई तो इसमें क्या बुराई है? और सरकार कैसे करोड़ों लोगों के एकाउंट्स में पैसा डालेगी? क्या सिस्टम होगा? अगर जनधन एकाउंट्स ना होते तो सरकार डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर नहीं कर पाती।
और अगर ये नहीं होता तो सरकारी डेटा ही कहता है कि 5 लाख करोड़ से ज़्यादा की सेविंग्स नहीं होती। ऐसे में अगर कोई जनधन एकाउंट्स का इस्तेमाल सिर्फ़ किसान सम्मान निधि या फिर प्रधानमंत्री आवास योजना की किश्त निकालने को कर रहा है तो वो पर्पज ही सोल्व कर रहा है।
आगे सुभाष गर्ग के लॉजिक और भी फनी हो जाते हैं, वो कहते हैं कि इसका कोई डेटा नहीं है कि कितने जनधन एकाउंट्स यूजर UPI यूज कर रहे हैं। वैसे तो देश में अभी 55 करोड़ UPI यूजर्स हैं और इनमें से बड़ा नंबर उनका भी होगा जो जनधन अकाउंट से UPI यूज करते होंगे लेकिन इवन अगर ऐसा नहीं है, तो ये भी जनधन योजना का फेलियर नहीं है।
बैंक में पैसा जमा करना, यहाँ से पैसा निकलाना, लोन के लिए एक्सेस और ATM कार्ड के लिए एक्सेस, ये सारे जनधन योजना के मैंडेट थे जो इसने पूरे किए हैं। ये कहीं भी नहीं कहा गया है कि जनधन योजना का असल मक़सद लोगों को एक प्रोडक्ट से दूसरे प्रोडक्ट की तरफ़ ले जाना था। आगे गर्ग साहब कहते हैं कि इस योजना को अबोलिश कर दिया जाना चाहिए।
वो ये भी कहते हैं कि अब सरकार को इस योजना का प्रचार बंद कर देना चाहिए। भाई मेरे, अगर सरकार ने कोई अचीवमेंट हासिल की है तो वो तो प्रचार करेगी ही। और अगर पहले की सरकारों ने ही ये काम कर दिया होता तो मोदी सरकार को ये मौक़ा ही ना मिलता, इन फैक्ट UPA ने एक ऐसा ही प्रयास किया था।
लेकिन UPA जहाँ 8 साल में सिर्फ़ 24 करोड़ अकाउंट खोल पाई तो वहीं मोदी सरकार ने टेक्नोलॉजी का यूज करके 50 करोड़ से ज़्यादा एकाउंट्स उसी समय में खोल दिए। अगर UPA ने ऐसी योजना लागू की होती तो वो भी प्रचार करते। अब उन्होंने नहीं की और मोदी सरकार ने एक योजना लागू की और वो प्रचार कर रहे हैं तो इसमें आख़िर गर्ग साहब को क्या समस्या है?
राजीव जी कम्प्यूटर लाए, नेहरू जी ने IIT खोली, इंदिरा जी ने पाकिस्तान तोड़ा टाइप की बातों को आज भी हवा देने वाले जब ये बातें कहते हैं तो हँसी आती है। यार! मोदी सरकार से आपको नफ़रत है ठीक है, आपको सरकार पसंद नहीं है, ठीक है। लेकिन काउंटर तो ढंग का करो, आख़िर कब तक ख़ुद को हँसी का पात्र बनवाओगे।
गर्ग को सवाल ये पूछना चाहिए कि बैंक अकाउंट जैसी बेसिक फैसिलिटी भी करोड़ों लोगों को दशकों तक क्यों नहीं मिली थी? इसके लिए एक विशेष योजना क्यों लांच करनी पड़ी? लेकिन आजकल वो किसी भी चीज में बाल की खाल निकालते हैं, ऐसे में उनका कोई दोष भी नहीं है।


