“या तो वे (मुस्लिम) रहेंगे या हिंदू संभल में रहेंगे।”
“आज पुलिस मस्जिद में प्रवेश करने वालों को नहीं बचा पाएगी।”
“जो भी मस्जिद में प्रवेश करेगा, उसे जिंदा जला दिया जाएगा।”
2024 में संभल दंगों का दंश जिन्होंने झेला, आँखों-देखी वो खौफनाक मंजर सहा, ऊपर उनके चंद बयान दर्ज हैं। ऐसे 199 लोग संभल दंगे की साजिश से पर्दा उठाने के लिए नियुक्त आयोग के समक्ष अपने-अपने बयान दर्ज करवा चुके हैं। सिर्फ 6 गवाह (जो मस्जिद इंतेजामिया समिति से संबंधित हैं) को छोड़ कर 193 गवाह इसे पूर्व-नियोजित और षड्यंत्र-रचित दंगा मानते हैं।
लेकिन क्या बहुमत का गणित ही काफी है किसी घटना को साबित करने के लिए? मतलब लोकतंत्र के गणित से ही न्यायपालिका भी चलेगी? नहीं। विधि-विरुद्ध या सिंपल शब्दों में कहें तो सरकारी तंत्र के खिलाफ जो भी षड्यंत्र रचा जाता है, वो हमेशा गुप्त रूप से रचा जाता है। न्यायिक प्रक्रिया में इसलिए इसे प्रत्यक्ष साक्ष्य से सिद्ध करना बहुत मुश्किल होता है, मतलब गवाह 1 हो या 193 – सिर्फ गवाही से काम नहीं चलेगा। गवाहों की गवाही के साथ-साथ इसे अप्रत्यक्ष साक्ष्य के पैमाने पर कसा जाता है, फिर पूरे षड्यंत्र को सिद्ध किया जाता है। कोर्ट-कचहरी की भाषा में कहें तो – परिस्थितिजन्य साक्ष्य।
- क्या संभल दंगा स्वतःस्फूर्त था, मतलब अचानक घटित हुआ था?
- तकनीक, सोशल मीडिया, ऐप आदि का भी प्रयोग किया गया दंगा भड़काने में?
- क्या इस दंगे में सिर्फ स्थानीय मुस्लिम ही शामिल थे?
- क्या लोगों के साथ-साथ राजनीति का भी रोल इन दंगों में रहा?
- सिंपल सरकारी काम में मजहबी एंगल कैसे घुसा?
- मजहब के अलावे पैसे और वर्चस्व की बातें क्यों आई?
- जिस जामा मस्जिद को लेकर दंगा हुआ, उससे जुड़े लोग कौन-कौन हैं? दंगों को लेकर उनका रोल क्या-क्या रहा?
- 6 जिलों की मुस्लिम भीड़ सर्दी के मौसम में सुबह-सुबह जामा मस्जिद तक कैसे पहुँची?
- संभल जामा मस्जिद के पास रहने वाली हिंदू आबादी भी क्या दंगाइयों के निशाने पर थी?
परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को एक साथ गूँथने के लिए कुछ ऐसे ही सवालों के जवाब आयोग ने अपनी रिपोर्ट में दर्ज की है। और इन्हीं जवाबों को एक साथ लाकर हम जानेंगे कि आखिर 2024 का संभल दंगा हुआ तो हुआ क्यों? किसने करवाया, कैसे करवाया, दंगों से किसको फायदा होना था, उत्तर प्रदेश की पुलिस ने हिंदुओं को कैसे बचाया?
2024 संभल दंगा स्वतःस्फूर्त था?
दंगा हुआ था 24 नवंबर 2024 को। लेकिन क्यों और कैसे हुआ था, इसको समझने के लिए क्रोनोलॉजी को समझना होगा।
19 नवंबर 2024
यह क्रोनोलॉजी लेकर जाती है हमें 19 नवंबर 2024 को। इसी तारीख को चंदौसी सिविल कोर्ट ने संभल की जामा मस्जिद के सर्वेक्षण का आदेश दिया था। विवाद का मुख्य बिंदु यह था कि क्या यह जामा मस्जिद है या हिंदुओं के दावे के अनुसार हरि हर मंदिर? इसके लिए कोर्ट ने एक एडवोकेट कमिश्नर भी नियुक्त किया था। एडवोकेट कमिश्नर रमेश सिंह राघव ने कोर्ट के आदेश के बाद डीएम संभल से पर्याप्त पुलिस बल प्रदान करने का अनुरोध किया ताकि सर्वेक्षण का कार्य बिना किसी बाधा के किया जा सके। 19 नवंबर की शाम को ही पुलिस-प्रशासनिक अधिकारियों और भारी पुलिस बल की मौजूदगी में सर्वेक्षण शुरू हुआ।
जब सब कुछ न्यायालय के आदेश पर हुआ, सर्वेक्षण से संबंधित सूचना सरकारी तंत्र को दी गई… तो सवाल यह उठता है कि आखिर 19 नवंबर को जामा मस्जिद के आस-पास मुस्लिम भीड़ इकट्ठा कैसे हो गई? और भीड़ इतनी आक्रामक कैसे हो गई कि सरकारी सर्वेक्षण को ही स्थगित करना पड़ गया?
इन सवालों के उत्तर ढूँढने में पहली कड़ी जो मिलती है, वो है – जामा मस्जिद की प्रबंध समिति के अध्यक्ष और एडवोकेट जफर अली का। हुआ यह कि सरकारी प्रोसेस के तहत कोर्ट के आदेश से संभल जामा मस्जिद की समिति को भी अवगत कराया गया। इस समिति के अध्यक्ष थे एडवोकेट जफर अली।
संभल दंगों की जाँच करने वाली आयोग की रिपोर्ट में पुलिस-प्रशासन की ओर से जो बयान दिए गए हैं, उसके अनुसार 19 नवंबर 2024 को मस्जिद समिति के अध्यक्ष जफर अली को सर्वेक्षण का नोटिस मिला शाम को 6 बज कर 4 मिनट पर। सरकारी अधिकारियों द्वारा यह नोटिस दिया गया मस्जिद पहुँचने पर। आश्चर्य की बात यह है कि इस समय तक मस्जिद के आस-पास मुस्लिम भीड़ जमा हो चुकी थी। प्रथम दृष्टया किसी को भी लग सकता है कि जिस समय जफर अली को सर्वेक्षण की सूचना मिली, उस समय अगर भीड़ जमा हो गई थी, तो शायद इस भीड़ को बुलाने में इनका हाथ नहीं रहा होगा। लेकिन ऐसा नहीं है। वो इसलिए क्योंकि रिपोर्ट में मस्जिद समिति के ही एक अन्य सदस्य की भी गवाही है, जो जफर अली को मस्जिद के सर्वेक्षण की सूचना से संबंधित है और बहुत ही अहम है। यह गवाही है – कासिम जमाल का, जो जामा मस्जिद के सदस्य भी हैं और वकील भी।
कासिम जमाल ने आयोग को बताया कि वे 19 नवंबर को सर्वेक्षण के दौरान मौजूद थे। उसी दिन दोपहर लगभग 3:30-3:45 बजे कोर्ट कार्यालय में एक फाइल से आदेश पढ़ने की कोशिश करते समय उनकी वादी के अधिवक्ता के साथ तीखी बहस भी हुई थी। सबसे मजेदार बात उन्होंने यह बताई कि मस्जिद का सर्वेक्षण शाम 6 बजे के लिए निर्धारित है, यह सूचना उन्हें जफर अली ने दी थी। इतना ही नहीं, जब वो शाम 6:00-6:15 बजे के बीच जामा मस्जिद पहुँचे, तो स्थानीय सांसद (जिया-उर-रहमान बर्क) पहले से ही वहाँ था और स्थानीय विधायक (इकबाल महमूद) का बेटा सुहेल इकबाल भी मौजूद था।
7 वर्षों से संभल जामा मस्जिद समिति के अध्यक्ष रहे जफर अली ने लेकिन अपनी ही समिति के सदस्य कासिम जमाल से अलग बयान दिया है। जफर अली के अनुसार 19 नवंबर को वे चंदौसी कोर्ट में थे, जहाँ लोग चर्चा कर रहे थे कि जामा मस्जिद से संबंधित एक मामला दायर किया गया है। वे दोपहर लगभग 4:00 बजे कोर्ट गए और कोर्ट क्लर्क से पूछताछ की, जिन्होंने उन्हें बताया कि एक मामला दायर किया गया है लेकिन उन्होंने वाद पत्र की प्रति नहीं दिखाई।
जामा मस्जिद से संबंधित दायर याचिका को अधिवक्ता शकील वारसी और अमीर हुसैन के अलावा अन्य वकील देख रहे थे। पहले जफर अली ने आयोग को यह बताया कि उन्हें बाकी अन्य अधिवक्ताओं के बारे में जानकारी नहीं है। इसके बाद जब आयोग ने पूछा कि क्या कासिम जमाल और फारूकी अधिवक्ता भी जामा मस्जिद के मामले को देखते हैं, तो उन्होंने जवाब दिया – हाँ। इसके बाद और भी मजेदार बात कही। जफर अली के अनुसार उन्हें याद ही नहीं था कि उन्होंने फारूकी और कासिम जमाल को कोर्ट कार्यालय भेजा था या नहीं, और अगर भेजा था तो वहाँ क्या-क्या हुआ था। और तो और, शाम में लगभग 4:00-5:00 बजे कासिम जमाल और फारूकी ने उन्हें सर्वेक्षण के बारे में सूचित किया था। सरकारी अधिकारी की तरफ मस्जिद के सर्वेक्षण की सूचना शाम 5:15 बजे कोतवाली संभल से आए एक फोन के जरिए मिली थी, जिसमें उन्हें सूचित किया गया था कि जामा मस्जिद का सर्वेक्षण होने वाला है और उन्हें मस्जिद पहुँचने के लिए कहा गया था – यह बात भी उन्होंने खुद अपनी गवाही में बताई है। मतलब मस्जिद पहुँचने पर शाम 6 बज कर 4 मिनट पर जो नोटिस थमाया गया था, उससे 1 घंटे पहले ही उनको पुलिस-प्रशासन की तरफ से भी सूचना मिल चुकी थी।
अब इन कड़ियों को जोड़िए। जफर अली साफ झूठ बोलते दिखेंगे। यही वो शख्स थे, जिन्होंने मस्जिद में सर्वेक्षण होने वाला है, जैसी गंभीर और कानूनी प्रक्रिया को आम सूचना में बदल दिया। इसका असर हुआ कि जब तक पुलिस-प्रशासन, सर्वे करने वाली टीम शाम 6 बज कर 4 मिनट पर मस्जिद पहुँचती, तब तक आस-पास की मुस्लिम आबादी से लेकर सांसद-विधायक तक को यह सूचना पहुँच चुकी थी। इसके बाद सूचना का राजनीतिकरण किया गया, मजहबी जामा पहना गया और भीड़ इकट्ठा करके उसे आक्रामक रूप दिया गया।
21 नवंबर
दंगे की साजिश और षड्यंत्र की क्रोनोलॉजी की बात करें तो 19 नवंबर के बाद 21 नवंबर का दिन भी महत्वपूर्ण है। इस बीच 20 नवंबर का दिन छूट जा रहा है तो इसका मतलब यह नहीं है कि इस दिन कुछ नहीं हुआ था। दरअसल 19 नवंबर को जब मस्जिद का सर्वेक्षण पूरा नहीं हो पाया तो उसके शेष सर्वे के लिए 20 नवंबर को ही कोर्ट द्वारा नियुक्त अधिवक्ता आयुक्त ने आवश्यक पुलिस बल और प्रशासनिक व्यवस्थाओं का अनुरोध करते हुए एक पत्र भेजा था। मामले की गंभीरता को देखते हुए उसी दिन संभल के एसपी ने पत्र के माध्यम से सूचित किया कि कुंदरकी विधानसभा क्षेत्र में उप-चुनाव के कारण पुलिस बल प्रदान करना संभव नहीं था। इसलिए सर्वेक्षण को बाद की तारीख के लिए निर्धारित करना उचित होगा।
इसके बाद संभल में डीएम और एसपी ने पुलिस बल के साथ पैदल गश्त की। विवादित धार्मिक स्थल के पास की कैमरों को ठीक करवाया गया और शहर काजी अलाउद्दीन, जामा मस्जिद के सदर जफर अली और जामा मस्जिद के खादिम मश्हूद अली फारूकी के वीडियो संदेशों के माध्यम से मुस्लिम समुदाय को संदेश भी दिया गया कि जिले में धारा 163 बीएनएसएस लागू है, जो पाँच से अधिक लोगों के एकत्र होने पर रोक लगाती है। उन्हें अपनी-अपनी मस्जिदों में नमाज अदा करने, अफवाहों से बचने, भ्रामक संदेशों को अग्रेषित न करने और अपने शहर की समृद्धि के लिए प्रार्थना करने का आग्रह भी किया गया। धारा 163 बीएनएसएस के निषेधाज्ञा आदेश जिले में प्रकाशित किए गए और दैनिक समाचार पत्रों में भी छपवाए गए। मतलब 20 नवंबर को सरकारी महकमा चुनाव में व्यस्त था, लेकिन संभल में शांति रहे, इसके लिए भी प्रयासरत था। लेकिन क्या दंगों की मानसिकता लिए लोग शांत थे? नहीं। इन लोगों ने 21 नवंबर को जो किया, वो आने वाले दिनों में दंगों की प्लानिंग थी।
संभल के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक कृष्ण कुमार ने आयोग को बताया कि 19 नवंबर को भीड़ एकत्र करके सर्वेक्षण को सफलतापूर्वक बाधित करने के बाद सांसद बर्क और मस्जिद समिति का आत्मविश्वास बढ़ गया था। इसके बाद 21 नवंबर को व्हाट्सएप ग्रुपों के माध्यम से लोगों को जामा मस्जिद में बुलाया गया। ठीक एक दिन बाद मतलब 22 नवंबर को शुक्रवार का दिन था। इस दिन बहुत भारी संख्या में भीड़ को जामा मस्जिद आकर नमाज पढ़ने का मैसेज कई व्हाट्सएप ग्रुपों में भेजा गया। यह काम सिर्फ संभल में नहीं किया गया बल्कि आस-पास के 5-6 जिलों के व्हाट्सएप ग्रुपों पर भी ऐसे मैसेज भेजे गए। इस मैसेज में लिखा था:
“संभल के सभी लोग शुक्रवार की नमाज शाही जामा मस्जिद में बड़ी संख्या में अदा करें और शाही जामा मस्जिद के पास की मस्जिदों में नहीं। केवल शाही जामा मस्जिद में नमाज अदा करें, और इस संदेश को यथासंभव साझा करें।”
‘मन्नत’ वॉट्सऐप ग्रुप और ‘संभल सांसद’ वॉट्सऐप ग्रुप में भेजे गए मैसेज जिनका रिकॉर्ड पुलिस के पास भी दर्ज है, से स्पष्ट है कि भीड़ को जुमे के नमाज के लिए क्यों बुलाया जा रहा था – शेष होने वाले सर्वेक्षण को किसी भी तरह से रोकने के लिए, चाहे उसके लिए दंगा ही क्यों न करना पड़े।
22 नवंबर
इस दिन जब जुमे की नमाज के लिए संभल जामा मस्जिद में भीड़ इकट्ठा होती है, और वो भीड़ अप्रत्याशित होती है, तो समझ में आता है कि भीड़ को क्यों बुलाया गया था, जबकि जिले में धारा 163 बीएनएसएस लागू था। नमाज के बाद मस्जिद की सीढ़ियों पर से समाजवादी पार्टी के सांसद जिया उर रहमान बर्क ने भड़काऊ नारे लगाए, मजहबी बयानबाजी की थी। इससे माहौल और भी संवेदनशील हो गया था।
समाजवादी पार्टी के सांसद जिया उर रहमान बर्क 19 नवंबर से ही एक्टिव थे। उस दिन भी शाम को सर्वे करने गई टीम अपना कार्य पूरा नहीं कर पाई थी, तो उसकी एक मुख्य वजह सांसद बर्क द्वारा इकट्ठा की गई भीड़ थी, जो मस्जिद के भीतर पहुँच कर सर्वे में बार-बार बाधा डाल रही थी। शेष सर्वे आगे कभी न हो पाए, इसके लिए उन्होंने वॉट्सऐप मैसेज, सोशल मीडिया आदि के जरिए 22 नवंबर को जुमे के दिन भीड़ जमा की। इसके बाद उन्होंने नमाज के बाद भीड़ को जो संबोधित किया, उसके कुछ मुख्य पॉइंट्स देखिए:
- “यह मस्जिद है, मस्जिद थी, और मस्जिद रहेगी। कोई भी हमारी मस्जिद हमसे नहीं ले सकता।”
- “जैसे अयोध्या में हमारी मस्जिद छीनी गई, वैसे ही इसे नहीं छीनने देंगे।”
- “पुलिस कितने ही ड्रोन तैनात कर ले, मस्जिद थी, है, और रहेगी, और हमें इसे हर हाल में बचाना है।”
- “हम पुलिस, प्रशासन या सरकार से डरने वाले नहीं हैं। हम इस देश के मालिक हैं, नौकर या गुलाम नहीं।”
- “हम अपनी जामा मस्जिद को कानूनी रूप से बचाएँगे और इंशा अल्लाह, कयामत तक इसे सुरक्षित रखने के लिए हर जरूरी काम करेंगे।”
संभल जिले में धारा 163 बीएनएसएस लागू होने के बावजूद नमाज के लिए इतनी भीड़ का आना अपने आप में गैर-कानूनी काम था, और यह हुआ संसद में बैठ कर कानून बनाने वाले सांसद की आँखों के सामने। अब सवाल उठता है कि क्या सांसद बर्क ने नमाज के बाद मस्जिद की सीढ़ियों पर से जो बयानबाजी की, उसकी जरूरत थी? हालाँकि सांसद ने आयोग को दिए अपने बयान में बताया है कि उस दिन जुमे की नमाज के बाद उन्होंने कोई भाषण नहीं दिया था बल्कि वहाँ मौजूद मीडिया के सवालों का सिर्फ जवाब दिया था। लेकिन उनके बयान की काट जामा मस्जिद प्रबंधन समिति के अध्यक्ष जफर अली की वो गवाही है, जिसमें उन्होंने कहा – “जब सांसद बर्क नमाजियों को संबोधित कर रहे थे, तब उनको चुप करवाने की कोशिश भी की थी। कहा था, “बस, कृपया रूकें।” लेकिन सांसद बर्क ने अनसुना कर दिया, बोलना जारी रखा।”
जफर अली के अलावा मशहूद अली फारूकी, जो जामा मस्जिद प्रबंधन समिति के सदस्य और अधिवक्ता हैं, उन्होंने भी अपनी गवाही में यह लिखवाया – “22 नवंबर 2024 को जुमे की नमाज के बाद सांसद बर्क ने मस्जिद की सीढ़ियों पर से मीडिया को संबोधित किया था। मस्जिद की सीढ़ियों से राजनीतिक बयान या प्रेस कॉन्फ्रेंस अनुचित था।”
23 नवंबर
दंगा हो और मुस्लिमों की ओर से प्रभावी ढंग से हो – इसके लिए 23 नवंबर 2024 का दिन सबसे अहम था। दरअसल इस दिन 3 चीजें एक साथ हुई थीं।
पहला – संभल जिले में धारा 163 बीएनएसएस लागू होने के बावजूद नमाज के इकट्ठा की गई भीड़ के सामने सांसद बर्क ने एक दिन पहले ही भड़काऊ भाषण दिया था, जिसमें कोर्ट के आदेश से असहमति भी व्यक्त की थी। और मुस्लिम समुदाय को एकजुट होने और विवादित स्थल की रक्षा के लिए बड़ी संख्या में एकत्र होने का आह्वान भी किया था। प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से, उन्होंने जिला पुलिस और प्रशासन की भूमिका और विश्वसनीयता पर सवाल भी उठाए थे, सर्वेक्षण का कड़ा विरोध किया था। सांसद के इस कार्य के लिए 23 नवंबर को उनके खिलाफ धारा 168 बीएनएसएस के तहत नोटिस जारी किया गया था और उन्हें तामील किया गया था।
दूसरा – कुंदरकी उप-चुनाव का परिणाम घोषित हुआ था। इसी विधानसभा सीट से पहले जिया-उर-रहमान बर्क विधायक थे। जब वो सांसद बने तो यह सीट खाली हो गई थी, इसलिए यहाँ उप-चुनाव कराए गए थे। जो सीट कुछ दिन पहले तक समाजवादी पार्टी के पास थी, 23 नवंबर को ही पार्टी इस सीट को हार गई थी। मतलब यह हार समाजवादी पार्टी के साथ-साथ सांसद जिया-उर-रहमान बर्क की निजी हार भी थी। क्योंकि चुनाव परिणाम अपेक्षित नहीं थे, इसलिए सांसद बर्क ने पुलिस और प्रशासन को हार के लिए दोषी ठहराया, उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठाए और प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से “उत्तर प्रदेश में संविधान की हत्या” जैसे शब्दों का उपयोग किया तथा जनता को पुलिस और प्रशासन के खिलाफ भड़काया। एक तरह से कहें तो मौके का फायदा उठाते हुए हिंसा के लिए अनुकूल वातावरण बनाया गया।
तीसरा – 23 नवंबर को ही कोर्ट द्वारा नियुक्त अधिवक्ता आयुक्त ने एक नोटिस भेजा था, जिसमें कहा गया कि जामा मस्जिद का शेष सर्वेक्षण अगले दिन मतलब 24 नवंबर को सुबह 7 बजे से लगभग 11 बजे तक आयोजित किया जाएगा और सभी पक्षों से उपस्थित रहने का अनुरोध किया गया। संभल की उप-जिलाधिकारी वंदना मिश्रा ने आयोग को अपनी गवाही में बताया कि 23 नवंबर को जब कोर्ट कमिश्नर (अधिवक्ता आयुक्त) ने जफर अली को टेलीफोन के माध्यम से 24 नवंबर को निर्धारित सर्वेक्षण के बारे में सूचित किया और नोटिस लेने के लिए आने को कहा, तो उन्होंने अपनी खराब तबीयत का हवाला देकर आने से इनकार कर दिया। इसके बाद वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशों पर वह, सर्किल ऑफिसर संभल के साथ, लगभग 06:30 बजे उनके निवास पर नोटिस देने गईं। उस समय वह नोटिस में उल्लिखित आयोग की कार्यवाही के समय के साथ पूरी तरह सहमत थे। पुलिस-प्रशासन यह सारी प्रक्रिया इसलिए कर रही थी ताकि वो मस्जिद प्रबंध समिति के साथ शेष सर्वे के वक्त मौजूद रहें, भीड़ को नियंत्रित करें। संभल के सांसद जिया-उर-रहमान बर्क को भी सूचित किया गया था, जो उस समय बेंगलुरु में थे। संभल के विधायक इकबाल महमूद के बेटे सुहेल इकबाल के साथ-साथ मस्जिद समिति के अन्य सदस्यों को भी रात में ही सूचित कर दिया गया था। डीएम संभल के आदेश के माध्यम से यह निर्देश भी दिया गया था कि 24 नवंबर को सुबह 7 बजे से सर्वेक्षण बिना किसी बाधा के आयोजित किया जाए और शांति और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए पर्याप्त पुलिस-बल तैनात किए जाएँ।
कुल मिला कर मुस्लिम पक्ष और उनके रहनुमाओं के लिए 23 नवंबर 2024 का दिन हर तरफ से खराब दिन था। ऐसे में दंगाई भावना पहले से दिल में पाल बैठा शख्स क्या करेगा? दंगों के लिए और साजिश रचेगा, प्लानिंग करेगा। और हुआ भी यही। 23 नवंबर की शाम को सर्वेक्षण की जानकारी प्राप्त होने के बाद सांसद बर्क और जामा मस्जिद समिति के अध्यक्ष जफर अली ने विभिन्न स्तरों पर योजना बनाई, कई लोगों के साथ मीटिंग की।
जामा मस्जिद के अध्यक्ष और एडवोकेट जफर अली ने सांसद जिया-उर-रहमान बर्क से 23-24 नवंबर 2024 की रात कई बार बात की। इसके बाद जफर अली ने 23 नवंबर की रात 10:01 बजे 38 सेकंड की कॉल के माध्यम से सांसद बर्क को सर्वेक्षण के बारे में सूचित किया, यह जफर अली के CDR में दर्ज है। बाद में रात 11:04 बजे सांसद बर्क ने जफर अली को कॉल-बैक किया, यह भी CDR में दर्ज है।
चूँकि सांसद बर्क संभल में मौजूद नहीं थे, ऐसे में उन्होंने जफर अली को भीड़ एकत्र करने की जिम्मेदारी सौंपी, जो अपनी स्थिति के कारण कम समय में बड़ी भीड़ जुटा सकते थे। इसमें भीड़ एकत्र करने और सर्वेक्षण को हर हाल में रोकने की योजना बनाई गई, किसी भी स्थिति से निपटने की तैयारी की गई। यह सब कुछ CDR के माध्यम से पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज है, वॉट्सऐप कॉल इंटरेक्शन भी।
सांसद बर्क के निर्देशों का पालन करते हुए जफर अली ने आधी रात को सुहेल इकबाल (जामा मस्जिद इंतजामिया कमेटी के कैशियर और संभल के विधायक के बेटे) के निवास पर अन्य कमेटी सदस्यों के साथ एक बैठक की, जिसमें सर्वेक्षण और सांसद बर्क के निर्देशों के बारे में जानकारी दी गई। इसके बाद सांसद बर्क से जफर अली को 24 नवंबर की रात 12:32 बजे और 01:48 बजे कॉल प्राप्त हुईं, जिनमें भीड़ एकत्र करने और सर्वेक्षण को हर हाल में रोकने की योजना बनाई गई, किसी भी स्थिति से निपटने की तैयारी की गई। वॉट्सऐप कॉल इंटरेक्शन भी CDR में दर्ज है।
24 नवंबर
संभल जामा मस्जिद का सर्वे शुरू होना था सुबह 7 बजे से। सभी संबंधित पक्षों के साथ-साथ पुलिस-प्रशासन को भी इसकी सूचना समय पर दे दी गई थी। पुलिस-प्रशासन को तो सुबह 6 बजे ही मस्जिद पहुँच जाने के दिशा-निर्देश थे। लेकिन जिस तेजी से सरकार का सूचना तंत्र काम कर रहा था, अफसोस उससे अधिक तेजी दंगाई मानसिकता के लोगों ने दिखाई। 24 नवंबर की सुबह, वो भी उत्तर प्रदेश का मैदानी इलाका। मतलब सर्दी ठीक-ठाक रही होगी। इसके बावजूद 23 नवंबर की शाम से 23-24 नवंबर की देर रात तक जिस तरह के फोन कॉल, वॉट्सऐप मैसेज, सोशल मीडिया आदि का प्रयोग किया गया भीड़ जुटाने के लिए – उसी का नतीजा रहा कि सर्वे करने गई टीम और पुलिस बल को सुबह-सुबह ही जामा मस्जिद के आस-पास अप्रत्याशित मुस्लिम भीड़ (4000 से 4500 तक की अनुमानित संख्या) देखने को मिली। लेकिन शुरुआत में भीड़ ने दंगा नहीं किया, बाद में यही भीड़ दंगाई कैसे बन गई, यह भी पिछली रात को रची गई साजिश का नतीजा थी। जो लोग 24 नवंबर को सर्वे के दौरान मस्जिद परिसर में थे, उन्होंने अपनी-अपनी गवाही में बताया है कि कैसे भीड़ देखते-देखते दंगा करने लगी।
अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन
हरि हर मंदिर को ध्वस्त करके उसी जगह पर जामा मस्जिद बना दी गई, इसकी सच्चाई जानने के लिए हिंदू पक्ष ने जो याचिका कोर्ट में दी थी, उसके अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन की गवाही के अनुसार सर्वे में शामिल होने वाले सभी अधिकारी और सर्वे टीम सुबह लगभग 6:45 बजे संभल की कोतवाली पुलिस स्टेशन पहुँच गए थे। इसमें अधिवक्ता आयुक्त रमेश राघव, वादी के स्थानीय वकील गोपाल शर्मा, डीजीसी (सिविल) प्रिंस शर्मा, एएसआई के वकील विष्णु शर्मा और जिला प्रशासन (जिसमें जिला मजिस्ट्रेट, एसपी संभल, सर्किल ऑफिसर संभल और एसडीएम संभल) शामिल थे। कोई लेट से आया था, तो वे थे जामा मस्जिद समिति के वकील जफर अली। वो आए ही सुबह लगभग 7:00 बजे और कहा कि दो अन्य वकील भी आ रहे हैं और थोड़ा इंतजार करने का अनुरोध किया। लगभग 20 मिनट इंतजार करने के बाद अधिवक्ता-आयुक्त ने विवादित स्थल पर जाने का फैसला किया और प्रशासन की उपस्थिति में सभी वकील पैदल विवादित स्थल पर पहुँचे। अधिवक्ता-आयुक्त की कार्यवाही सुबह लगभग 7:30 बजे शुरू हुई और 45 मिनट के भीतर परिसर के आसपास एक बड़ी भीड़ जमा हो गई। उन्होंने धार्मिक नारे लगाने शुरू कर दिए। कुछ समय बाद उन्हें क्षेत्र के चारों ओर गोलीबारी की आवाज सुनाई देने लगी।
सुबह लगभग 8:30 बजे अधिवक्ता-आयुक्त ने मस्जिद के मुतवल्ली को वजू टैंक से पानी निकालने के लिए कहा। इसके तुरंत बाद सुबह लगभग 9:00 बजे ऐसे तनावपूर्ण स्थिति में भी जफर अली बाहर गए और बताया कि वे ‘दिलबाग पान मसाला’ लेने जा रहे हैं और कुछ समय बाद वापस आएँगे। लगभग 30 मिनट बाद वे वापस आए। जैसे ही वे वापस आए, बाहर की भीड़ अत्यधिक हिंसक हो गई और उन्होंने पुलिस कर्मियों और जिला प्रशासन पर बहुतायत में पत्थरबाजी शुरू कर दी। स्थिति बिगड़ने लगी थी। क्षेत्र में पूरी तरह से अराजकता थी। इस कारण से वजू टैंक का सर्वेक्षण नहीं हो सका।
विष्णु शंकर जैन ने यह भी आयोग को बताया कि जफर अली, जो जामा मस्जिद के मुतवल्ली भी हैं, ने मस्जिद के लाउडस्पीकर से घोषणाएँ शुरू कीं और भीड़ से शांत रहने का अनुरोध किया लेकिन जितना अधिक वे अनुरोध करते, भीड़ उतनी ही अधिक हिंसक होती गई। उन्हें लगा कि यह हिंसा को तेज करने का कोई संकेत था। सुबह 9:30 बजे से लगभग 10:45 बजे तक पत्थरबाजी, गोलीबारी, आँसू गैस, नारेबाजी विवादित स्थल के आसपास हो रही थी।
अपर पुलिस अधीक्षक (उत्तरी) श्रीश्चंद
संभल के अपर पुलिस अधीक्षक (उत्तरी) श्रीश्चंद ने अपनी गवाही में बताया कि जामा मस्जिद में सुबह की नमाज सुबह 6:00 बजे होती है, इसके बाद दूसरी नमाज दोपहर लगभग 1:30 बजे होती है, जिसमें नमाजी दोपहर 12:00 बजे से आने शुरू होते हैं। इसलिए जामा मस्जिद के अध्यक्ष जफर अली की सहमति से सर्वेक्षण का समय सुबह 7:00 बजे से 10:30 बजे तक निर्धारित किया गया था। मस्जिद के आसपास की दुकानें सुबह 10:00 बजे के बाद खुलती हैं और सामान्य रूप से जामा मस्जिद के पास इतनी बड़ी भीड़ कभी एकत्र नहीं होती। सुबह लगभग 7:30 बजे मस्जिद से थोड़ी दूर बने वारसी जिम के पास हजारों लोग एकत्र हुए और ‘एकरात की मस्जिद’ (यह एक मस्जिद है, जो जामा मस्जिद से लगभग 500 मीटर की दूरी पर है) की दिशा से हजारों और आए। गिरफ्तार आरोपियों और मृतकों में असमौली और हयातनगर क्षेत्रों (जामा मस्जिद से 5 से 15 किलोमीटर दूर स्थित क्षेत्र) के व्यक्ति शामिल थे। तलाशी के दौरान मामले से संबंधित वस्तुओं के अलावा ऐसा कुछ और नहीं मिला, जो दर्शाता है कि वे खरीदारी के लिए आए थे, न ही यह कि मस्जिद में नमाज का समय था और वो नमाज के लिए आए थे। तीन-स्तरीय बैरिकेडिंग के बावजूद इतनी बड़ी भीड़ गलियों के माध्यम से चुपके से आए थे।
अपर पुलिस अधीक्षक (उत्तरी) श्रीश्चंद ने यह भी बताया कि वर्तमान संभल विधायक इकबाल महमूद के बेटे सुहेल इकबाल जो जामा मस्जिद में नमाज नहीं अदा करते, शेष सर्वेक्षण के दिन 24 नवंबर 2024 को सुबह 5:00-5:30 बजे मस्जिद पहुँचे और पास में रहने वाले अधिवक्ता मशहूद अली के निवास पर गए, जहाँ उन्होंने लोगों के साथ चर्चा की। सुबह लगभग 6:30 बजे ड्यूटी की जाँच के दौरान उन्हें अधिवक्ता मशहूद अली के निवास पर कई लोगों के साथ देखा गया। वरिष्ठ अधिकारियों और उनके द्वारा उन्हें संवेदनशील मामले के कारण अपने निवास पर लौटने का अनुरोध किया गया। हालाँकि उन्होंने कहा कि वह जल्द ही चले जाएँगे लेकिन बाद में वो नहीं गए। बाद में पता चला कि उन्होंने नमाज से पहले कई लोगों से मुलाकात की और नमाज के बाद अधिवक्ता मशहूद अली के निवास से हिंसक घटना में सक्रिय भूमिका निभाई।
पुलिस अधीक्षक कृष्ण कुमार
संभल के पुलिस अधीक्षक कृष्ण कुमार ने आयोग को अपनी गवाही में बताया कि 24 नवंबर को सर्वेक्षण कार्यवाही नियमों के अनुसार शुरू हुई और सुचारू रूप से चल रही थी। मस्जिद की इंतजामिया कमेटी के सदस्य जिनमें सदर जफर अली शामिल थे, अंदर मौजूद थे। सुबह लगभग 08:30 बजे जफर अली ने एक पूर्व नियोजित साजिश के तहत सर्वेक्षण के दौरान मस्जिद छोड़ दी, 2-3 व्यक्तियों को इशारा किया, उनसे फुसफुसाकर बात की और उन्हें मस्जिद के पीछे की ओर भेजा। इसके तुरंत बाद एक आक्रामक भीड़ गलियों से निकलकर आई, जो अवैध हथियारों से लैस थी, चेहरे ढके हुए थे, नारे लगा रहे थे, और सीसीटीवी कैमरे तोड़ रहे थे। भीड़ ने दावा (जिन लोगों को पुलिस ने हिरासत में लिया था) किया कि जफर अली ने कहा था कि वजू के टैंक का पानी निकाला जा रहा है और मस्जिद की खुदाई की जा रही है, जिसने घटना को हिंसक बना दिया।
अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट प्रदीप वर्मा
संभल के अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट प्रदीप वर्मा ने आयोग को बताया कि 24 नवंबर की सुबह लगभग 8:30 बजे से जामा मस्जिद के ढलान के पास भीड़ एकत्रित होकर नारेबाजी और विरोध प्रदर्शन करने लगी। वह जिला मजिस्ट्रेट के साथ, भीड़ को शांत करने की कोशिश कर रहे थे। लगभग 10:15 बजे जामा मस्जिद के अध्यक्ष जफर अली ने लाउडस्पीकर के माध्यम से घोषणा की कि सर्वेक्षण समाप्त हो गया है। इसके बाद भीड़ तुरंत आक्रामक हो गई और हिंसक कृत्यों में संलग्न हो गई। घटना में शामिल व्यक्तियों ने अपने चेहरों/पहचान को छिपाने के लिए मास्क का उपयोग किया था। भीड़ ने जामा मस्जिद के पीछे की गलियों से पत्थरबाजी, आगजनी और गोलीबारी शुरू कर दी। परिणामस्वरूप पुलिस और प्रशासनिक कर्मियों को चोटें आईं। लगभग 11:00 बजे जानकारी मिली कि भीड़ एकता चौकी को जलाने की कोशिश कर रही थी, इसलिए वह पुलिस अधीक्षक के साथ वहाँ गए, चौकी को सुरक्षित किया और आक्रामक भीड़ को तितर-बितर किया। लगभग 11:15 बजे एकता चौकी, तुर्तीपुर तिराहा और हिंदुपुरखेड़ा क्षेत्रों में पत्थरबाजी, आगजनी और गोलीबारी की घटनाएँ शुरू हुईं, जो लगभग 2:00 बजे तक नियंत्रण में लाई गईं।
उप-जिलाधिकारी वंदना मिश्रा
संभल की उप-जिलाधिकारी वंदना मिश्रा ने बताया कि 24 नवंबर को सर्वेक्षण के दौरान, कोर्ट कमिश्नर ने वजू टैंक के मापन और उसकी वीडियोग्राफी/फोटोग्राफी और आगे के मापन के बारे में कहा कि जब तक पानी नहीं निकाला जाता, तब तक यह संभव नहीं था। कोर्ट कमिश्नर ने यह भी कहा कि वह वजू टैंक में एक छड़ी डालकर गहराई को माप सकते हैं लेकिन सदर श्री जफर अली और इंतजामिया समिति के अन्य सदस्यों ने सहमति नहीं दी। कोर्ट कमिश्नर ने तब पूछा कि वजू टैंक का पानी कब निकाला जाता है, जिस पर जफर अली ने जवाब दिया कि हर शुक्रवार को नमाज से पहले पानी निकाला और साफ किया जाता है। अंततः काफी तर्क-कुतर्क के बाद उन्होंने स्वयं पानी निकालने की सहमति दी और प्रक्रिया शुरू की।
इसी बीच जफर अली पान-मसाला खाने के बहाने मस्जिद छोड़कर मस्जिद के बाईं ओर पीछे की ओर चले गए, जहाँ भीड़ एकत्र थी और लगभग आधे घंटे से पैंतीस मिनट बाद लौटे। जफर अली के मस्जिद छोड़ने के बाद मशहूद अली और कासिम जमाल अधिवक्ता भी मस्जिद के बाईं ओर से निकले और लगभग आधे घंटे बाद लौटे। मस्जिद में लौटने पर जफर अली ने मस्जिद के लाउडस्पीकर के माध्यम से भीड़ को संबोधित किया, जिसमें कहा गया कि सब कुछ ठीक चल रहा है। उस समय भीड़ आक्रामक नारे लगा रही थी, “नारा-ए-तकबीर अल्लाह-हु-अकबर” चिल्ला रही थी। उन्होंने जफर अली से भीड़ को शांत करने का अनुरोध किया। फिर वह जामा मस्जिद की छत पर गए, भीड़ की ओर हाथ उठाया, मुस्कुराए और लौट आए। शेष सर्वेक्षण कार्यवाही की गई और सर्वेक्षण पूरा होने के बाद सुबह लगभग 10:00-10:30 बजे उन्होंने मस्जिद के लाउडस्पीकर के माध्यम से घोषणा की कि सर्वेक्षण पूरा हो गया है, चिंता की कोई बात नहीं है और लोगों को चले जाना चाहिए। हालांकि, उनके संबोधन ने भीड़ को और भड़का दिया, नारे तेज हो गए, पत्थरबाजी बढ़ गई, आगजनी और गोलीबारी की आवाजें सुनाई दीं।
अधिवक्ता गोपाल शर्मा
हरि हर मंदिर बनाम जामा मस्जिद संबंधित हिंदू पक्ष ने जो याचिका कोर्ट में दायर की थी, उसके अधिवक्ता गोपाल शर्मा की गवाही के अनुसार 24 नवंबर 2024 को वजूखाना की फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी के लिए उसमें भरा पानी निकालने पर सहमति बनी थी। इसके लिए हुए बातचीत में खुद जफर अली भी शामिल थे। इसके बाद जब पानी निकाला जा रहा था, उसी समय जफर अली मस्जिद से बाहर गए और लगभग 35 मिनट बाद लौटे। लौटने के बाद उन्होंने लाउडस्पीकर पर घोषणा की, “अल्लाह के लिए, सब कुछ ठीक चल रहा है, शांत रहें।” हालाँकि उनकी घोषणाओं के बाद भीड़ और अधिक उत्तेजित हो गई, नारे लगाने लगी और पत्थरबाजी करने लगी। बिगड़ते माहौल को देखते हुए उन्होंने जफर अली, जो उनके साथ चंदौसी कोर्ट में वकालत करते हैं, से अनुरोध किया कि वे बाहर जाकर भीड़ को शांत करें। लेकिन जफर अली ने जवाब दिया कि वे मस्जिद के भीतर से ही जो करना है, वो कर रहे हैं। अधिवक्ता गोपाल शर्मा ने आयोग को बताया कि उनके अनुसार जफर अली की घोषणाएँ उपद्रवियों को और उकसा रही थीं।
प्रिंस शर्मा, प्रतिवादी अधिवक्ता
इनकी गवाही बहुत मायने रखती है। वो इसलिए क्योंकि यह वादी (मतलब हिंदू पक्ष, जिन्होंने जामा मस्जिद के सर्वेक्षण के लिए याचिका दायर की थी) के वकील नहीं थे। ये प्रतिवादियों (जामा मस्जिद का पक्ष रखने वाले) के वकील थे, इन्हें संभल जिला मजिस्ट्रेट की ओर से आयोग की टीम में शामिल किया गया था। 24 नवंबर को सर्वेक्षण के दौरान जो दंगा हुआ, उसको लेकर इन्होंने गवाही दी:
“सर्वे शुरू होने के लगभग 35-40 मिनट बाद बाहर से हंगामे की तेज आवाजें मस्जिद के अंदर सुनाई दी। सुबह लगभग 9:30 बजे मस्जिद के हौज (वजू टैंक) से पानी निकाला गया और इसके तुरंत बाद, मस्जिद के पीछे से विस्फोटों की आवाजें सुनाई दीं, जो यह संकेत दे रही थीं कि बाहर दंगा शुरू हो गया है। बाहर से लगातार विस्फोटों की आवाजें आ रही थीं। इस घटना के पूर्व नियोजित न होने का सवाल ही नहीं उठता, क्योंकि इतनी बड़ी भीड़ का इतनी दूर से और इतनी संख्या में आना संभव नहीं है। यदि भीड़ उत्तर की ओर बढ़ती तो हिंदू मोहल्ले में कई लोग मारे जाते। सर्वेक्षण के बाद जब वे जा रहे थे, पुलिस ने सुरक्षा प्रदान की और उन्हें हिंदू मोहल्ले के माध्यम से सुरक्षित निकाला, यदि उन्हें किसी अन्य मार्ग से निकाला जाता तो उनकी हत्या हो जाती।”
विष्णु कुमार शर्मा, प्रतिवादी अधिवक्ता
यह संभल जिला कोर्ट में भारत सरकार के स्थायी अधिवक्ता हैं। इन्होंने भी वादी के विपक्ष में संभल कोर्ट के समक्ष प्रतिवादी (जामा मस्जिद के पक्ष में) के अधिवक्ता के तौर पर कानूनी सेवाएँ प्रदान कीं। इन्होंने आयोग को अपनी गवाही में बताया कि सर्वे शुरू होते ही सुबह लगभग 7:30-7:45 बजे मस्जिद के बाहर से हल्की आवाजें सुनाई दीं और सुबह लगभग 8:30 बजे तक तेज आवाजें और उत्तेजक नारे सुनाई देने लगे, इसके तुरंत बाद विस्फोटों की आवाज भी सुनाई दी। धीरे-धीरे शोर तेज होता गया, जो मस्जिद के अंदर स्पष्ट रूप से सुनाई दे रहा था और विस्फोटों की आवाज बढ़ गई। मस्जिद के पीछे से काला धुआँ उठने लगा, जिससे उन्हें लगा कि बाहर पीछे की ओर दंगा शुरू हो गया है। जफर अली ने भीड़ को शांत करने की कोशिश की लेकिन इसका दूसरा प्रभाव पड़ा। दंगाई की संख्या हजारों में थी, जिसमें दूर-दराज से आए लोग भी शामिल थे, यह पुष्टि करता है कि यह घटना पूर्व नियोजित थी। कोर्ट के आदेश में बाधा डालने और उन पर हमला करने के लिए भीड़ इकट्ठा हुई थी।
प्रत्यक्षदर्शी (सार्वजनिक गवाह, सरकारी/पुलिस-प्रशासनिक लोगों से अलग) की गवाहियाँ
पुलिस-प्रशासन और वादी के अधिवक्ताओं के अलावे भी अन्य आम लोगों ने दंगों से संबंधित गवाही दिए। इन लोगों ने 24 नवंबर को हुए दंगे को अपनी आँखों से देखा है, मतलब ये प्रत्यक्षदर्शी हैं। परिस्थितजन्य साक्ष्यों को जोड़ने और एक नतीजे तक पहुँचने के लिए इनकी गवाही भी बहुत मायने रखती है।
प्रत्यक्षदर्शी तुफैल अहमद ने आयोग को बताया कि जामा मस्जिद के आसपास की सड़कों पर भारी भीड़ थी और भीड़ ने सर्वेक्षण कार्य में बाधा डालने की कोशिश की। पुलिस-प्रशासन ने बार-बार भीड़ को समझाने की कोशिश की थी लेकिन उन्होंने न तो सुना और न ही वहाँ से भागे, बल्कि उन्होंने पुलिस पर पथराव और गोलीबारी से हमला किया।
मुकेश शर्मा ने गवाही देते हुए कहा कि 24 नवंबर से पहले ही मुस्लिम दंगाइयों ने पूरी योजना के साथ वहाँ पत्थर, ईंटें और अवैध हथियार इकट्ठा कर रखा था। जब प्रशासन ने उन्हें घर जाने का अनुरोध किया तो उन्होंने पत्थरबाजी और गोलीबारी शुरू कर दी। सड़क पर खड़े वाहनों में आग लगा दी।
राहुल कुमार ने बताया कि 19 नवंबर को जब पहली बार सर्वेक्षण हुआ, उसके बाद से ही संभल में मुस्लिम समुदाय के बाहरी लोगों की आवाजाही बढ़ गई थी। इस इलाके में वे पहली बार देखे गए थे। इसके बाद 24 नवंबर को ऐसे बाहरी लोगों को उन्होंने ट्रैक्टर-ट्रॉलियों में भर-भर कर संभल की ओर आते देखा।
विक्की नाम के एक गवाह ने बताया कि 24 नवंबर को वे अपने घर पर थे। उन्होंने देखा कि मुस्लिम समुदाय के लोग चारों ओर से इकट्ठा हो रहे थे, जामा मस्जिद की ओर बढ़ रहे थे। वो लोग बहुत शोर मचा रहे थे, एक-दूसरे को भड़का रहे थे। भीड़ कह रही थी कि आज पुलिस मस्जिद में प्रवेश करने वालों को नहीं बचा पाएगी।
गवाह अमन पुठिया ने आयोग को बताया कि 24 नवंबर को हरि हर मंदिर को मुस्लिम समुदाय के हजारों लोगों ने तीन ओर से घेर लिया था और सांप्रदायिक नारे लगा रहे थे। हजारों लोगों के पास पत्थर, लाठियाँ और देसी बंदूकें थीं। थोड़ी देर बाद वहाँ से भारी गोलीबारी की आवाज आई, धुएँ का एक बड़ा बादल दिखाई दिया। संभल तहसील में अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय बहुत भयभीत स्थिति में है।
अभिषेक शर्मा ने कहा कि 24 नवंबर को उनके घर (जामा मस्जिद से 150 मीटर दूर) के बाहर कुछ हिंदू बहुत डरे हुए थे। जामा मस्जिद की दिशा से मजहबी नारों की आवाजें आ रही थीं और गोलीबारी भी सुनाई दे रही थी। सभी गलियाँ भरी हुई थीं; हजारों लोग “अल्लाह-हु-अकबर” के नारे लगा रहे थे। इतनी बड़ी भीड़ को सर्वेक्षण टीम के काम में बाधा डालने और उन पर घातक हमला करने के लिए योजनाबद्ध तरीके से इकट्ठा किया गया था।
आलोक भारती ने आयोग को जो गवाही दी, वो कट्टर मुस्लिम भीड़ का सबसे घिनौने मजहबी मानसिकता को दर्शाता है। उनके अनुसार 24 नवंबर को दंगे के दौरान उन्होंने अपने पड़ोस में खड़े 12-15 साल के मुस्लिम लड़कों की ललकार सुनी थी। वो गुस्से में कह रहे थे कि आज वे सर्वेक्षण नहीं होने देंगे। आज या तो वे (मुस्लिम) रहेंगे या संभल में हिंदू रहेंगे। उन्होंने यह अपनी कानों से सुना है। इन्हीं लड़कों की भीड़ ने थोड़ी देर बाद “अल्लाह-हु-अकबर” के नारे लगाना शुरू कर दिया।
सौरभ गुप्ता ने बताया कि 24 नवंबर को उन्होंने व्यक्तिगत रूप से सड़कों पर मुस्लिम युवा लड़कों को नंगी तलवारें और देसी बंदूकें लहराते देखा। यह भीड़ लगातार हिंदू मोहल्लों में प्रवेश करने की कोशिश कर रही थी। जब पुलिस ने उन्हें रोका तो उन्होंने पुलिस पर गोलीबारी कर दी। सौरभ ने आयोग से यह माँग भी रखी कि दंगे के बाद कई मदरसों की जाँच होनी चाहिए क्योंकि इससे पहले उक्त मदरसों में कई बच्चे थे और अब वे वहाँ नहीं हैं। इसमें अन्य राज्यों के बच्चे भी शामिल थे।
सोनू नाम के गवाह ने बताया कि उनके घर के आसपास के क्षेत्रों में नए मुस्लिम चेहरों की आबादी बढ़ गई। ये अपरिचित लोग 19 नवंबर के बाद पहली बार क्षेत्र में घूमते हुए दिखे। ये भीड़ में चलते थे और संभल के पत्थरबाजों को पीड़ित और शहीद के रूप में बात करते थे। सोनू ने बताया कि 24 नवंबर को जब वे सुबह 5:00-5:30 बजे खेतों की ओर टहलने गए थे तो उन्होंने ट्रैक्टर-ट्रॉलियों में लोगों को शहर की ओर जाते देखा था, जिनमें से कई लोग सिंहपुर साहनी से असमौली मिल तक निर्माणाधीन सड़क से पत्थर इकट्ठा कर रहे थे।
संभल जिले के प्रत्यक्षदर्शियों (सरकारी गवाहों मतलब पुलिस-प्रशासन या सर्वे की टीम से इतर लोग) की गवाहियों से स्पष्ट रूप से संकेत मिलता है कि दंगे के दिन (24 नवंबर 2024) जिले के बाहर से लोग आए थे और उन्हें सर्वेक्षण की पूर्व जानकारी थी। इसलिए वे सर्वेक्षण टीम, पुलिस और प्रशासनिक टीम जो सर्वेक्षण की सुरक्षा के लिए आए थे, पर हमला करने और विरोध करने के लिए पूरी तैयारी के साथ इकट्ठा हो रहे थे। इस दंगाई भीड़ ने सुबह-सुबह सड़कों से ईंटें इकट्ठा की थी, ये हथियारों से भी लैस होकर आए थे। भीड़ द्वारा यह कहते सुना जाना कि सर्वेक्षण टीम को आज जिंदा नहीं जाने दिया जाएगा, उनकी मंशा को स्पष्ट करता है।
सर्वे की रिपोर्टिंग करने गए मीडियाकर्मियों की गवाहियाँ
टाइम्स नाउ नवभारत के वरिष्ठ संवाददाता गौरव श्रीवास्तव ने आयोग को अपनी गवाही भी दी, साथ ही घटना से संबंधित बिना संपादित रिकॉर्डिंग भी एक पेन ड्राइव में प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि 24 नवंबर को वो अपने कैमरामैन अंकित के साथ सुबह 5:45 बजे ही जामा मस्जिद पहुँच गए थे। सर्वेक्षण टीम सुबह लगभग 7:30 पहुँची थी। सर्वेक्षण टीम के मस्जिद में प्रवेश करने के बाद मुस्लिम भीड़ मस्जिद के तीन ओर से इकट्ठा होने लगे। भीड़ ने “नारा-ए-तकबीर, अल्लाह-हु-अकबर” जैसे मजहबी नारे लगाने शुरू कर दी थी। भीड़ में कुछ लोगों ने चेहरा ढका हुआ था, जिसमें छोटे बच्चे भी शामिल थे, जिन्होंने आँसू गैस छोड़े जाने से पहले ही अपने चेहरों को ढक लिया था। इसके बाद पत्थरबाजी हुई। भीड़ मस्जिद तक पहुँचने की कोशिश कर रही थी।
गौरव श्रीवास्तव ने बताया कि उनके अनुसार भीड़ में कोई संदेश पहुँचा, जिसके कारण वह अचानक अत्यधिक आक्रामक हो गई और पुलिस, प्रशासन और मीडिया कर्मियों को पत्थरबाजी के साथ निशाना बनाना शुरू कर दिया ताकि लाइव कवरेज रोकी जा सके। जब कुछ पुलिसकर्मियों ने पत्थरबाजी करने वाली भीड़ से कहा कि कम से कम डीएम और एसपी की उपस्थिति का सम्मान करें, तो भीड़ ने चिल्ला कर जवाब दिया कि लाइव कवरेज बंद करो क्योंकि उसके कारण कई चेहरे पहचान में आ रहे थे। इसके बाद भीड़ ने सार्वजनिक और पुलिस के वाहनों में आग लगा दी गई, जिसे उन्होंने कवर किया।
सबसे महत्वपूर्ण गौरव श्रीवास्तव की वो गवाही है, जो मस्जिद समिति के एक लड़के और उसकी माँ से संबंधित है। पूरी घटना को कवर करने के दौरान उन्होंने एक लड़के को देखा, जो भीड़ को अपनी मस्जिद समिति का आईडी कार्ड दिखा रहा था। वो चिल्ला-चिल्ला कर यह बता रहा था कि वह समिति से है और मस्जिद में कुछ भी गलत नहीं हो रहा है। इसके बावजूद भीड़ ने उस पर पत्थरों से हमला किया, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गया। तभी उसकी माँ जो पास में ही थी, दौड़ते हुए उसके पास आई। जब उसने इससे संबंधित सवाल किया तो उन्होंने रोते-रोते कहा कि ये बाहरी लोग अशांति पैदा कर रहे हैं।
कवरेज सुबह से लगभग 11:30-12:00 बजे तक चली। कवरेज के दौरान उन्होंने एक लड़के को देखा जो भीड़ को अपनी मस्जिद समिति का आईडी कार्ड दिखा रहा था, यह कहते हुए कि वह समिति से है, मस्जिद में कुछ गलत नहीं हो रहा है और शांत रहें और वापस चले जाएं। भीड़ ने उस पर पत्थरों से हमला किया जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गया। उसकी मां जो पास में थी, उसके पास आई और पूछने पर आंसुओं के साथ कहा कि ये बाहरी लोग अशांति पैदा कर रहे थे।
भीड़ का अचानक से जुटना, तीन तरफ से मस्जिद की ओर बढ़ना, आँसू-गैस को प्रभावशाली नहीं होने देने के लिए एक अलग ढंग से पत्थरबाजी करना, लाइव कवरेज को बंद कराने के लिए पुलिस पर दबाव डालना – इन सब से गौरव श्रीवास्तव को यह महसूस हुआ कि भीड़ स्वतः प्रेरित नहीं थी बल्कि उकसावे के कारण इकट्ठा हुई थी। उनके अनुसार संभल में बाहरी लोगों को बुलाया गया था। भीड़ की हिंसा और पत्थरों का मस्जिद की परिधि तक पहुँचना यह सुझाव देता है कि उनकी मंशा मस्जिद परिसर में प्रवेश करने, कोर्ट के आदेशानुसार सर्वेक्षण को बाधित करने और सर्वेक्षण टीम को नुकसान पहुँचाने की थी।
सर्वेक्षण के बाद भी गौरव श्रीवास्तव ने मस्जिद से सटी गलियों में रिपोर्टिंग की। उस समय कई जगहों पर उन्हें पत्थरों के ढेर मिले, जो संभवतः पत्थरबाजी से बचे हुए थे।
दैनिक भास्कर के पत्रकार सनी गुप्ता ने आयोग को बताया कि 24 नवंबर को लगभग 5000 की मुस्लिम भीड़ ने मस्जिद को तीन ओर से घेर लिया था। वे मजहबी नारे लगा रहे थे, मस्जिद की ओर बढ़ रही थी। इसके बाद उन्होंने पुलिस पर पत्थरबाजी शुरू कर दी। पुलिस ने जब आँसू गैस का उपयोग किया तो भीड़ के पीछे से गोलीबारी की आवाज सुनाई दी। इसमें कई पुलिस कर्मी घायल हुए। भीड़ मस्जिद में घुसने के लिए आमादा थी। सनी गुप्ता के अनुसार 19 नवंबर को अधूरा सर्वेक्षण, मस्जिद की सीढ़ियों से 22 नवंबर को सांसद बर्क का भाषण और 24 नवंबर को हुआ दंगा एक पूर्व नियोजित घटना का संकेत देती है।
हिंदी चैनल के जिला संवाददाता अरुण कुमार ने अपनी गवाही में बताया कि दंगे के दिन मुस्लिम भीड़ ‘एक रात की मस्जिद’ (यह एक मस्जिद का नाम है) की तरफ से आ रही थी। उनके अनुसार सर्दियों में सुबह 7:00 बजे इतनी बड़ी भीड़ का इकट्ठा होना, मजहबी नारे लगाना और पत्थर फेंकना, पुलिस पर गोली चलाना – एक पूर्व नियोजित घटना का संकेत देता है। समय पर पुलिस की कार्रवाई के बिना हिंदू-मुस्लिम दंगा या सर्वेक्षण टीम को नुकसान हो सकता था।
न्यूज 18 इंडिया के संवाददाता भीष्म सिंह देवर ने आयोग को अपनी गवाही के साथ-साथ पूरे घटना की रिकॉर्डिंग भी प्रदान की है। उन्होंने बताया कि वो जामा मस्जिद से बाहर घटना को कवर कर रहे थे। सुबह 8:15 बजे उन्हें ‘एक रात की मस्जिद’ की ओर से मुस्लिम भीड़ दिखाई दी। इस भीड़ को पुलिस ने वापस जाने का आग्रह किया था। लेकिन मुस्लिम भीड़ न वापस लौटी, न ही रुकी। मजहबी नारों के साथ भीड़ आगे बढ़ती रही, पुलिस को धक्का दिया और पत्थरबाजी शुरू कर दी। जब पुलिस ने आँसू गैस का उपयोग किया तो सबसे पहले भीड़ के पीछे से गोलीबारी की आवाज सुनाई दी। भीड़ मस्जिद में प्रवेश करने के लिए दृढ़ संकल्पित दिख रही थी। भीष्म सिंह के अनुसार दूर-दराज के क्षेत्रों से बड़ी भीड़ का इकट्ठा होना एक पूर्व नियोजित घटना का संकेत देता है।
आज तक न्यूज चैनल के स्ट्रिंगर अभिनव माथुर ने अपनी गवाही में बताया कि जब सर्वेक्षण टीम मस्जिद में प्रवेश कर गई तो वे अपने चैनल के लिए मस्जिद के बाहर रिपोर्टिंग कर रहे थे। तभी सुबह 8:15 बजे मजहबी नारे लगाती मुस्लिम भीड़ ने पुलिस के ऊपर पत्थरबाजी शुरू कर दी। पुलिस ने जब आँसू गैस का उपयोग किया तो भीड़ के पीछे से गोलीबारी की आवाज सुनाई दी। इनके अनुसार जब केवल कुछ लोगों को ही सर्वेक्षण की जानकारी (23 तारीख की शाम को सरकारी आदेश, 24 की सुबह को सर्वेक्षण का निर्देश) थी, तो ऐसे में हजारों लोग इकट्ठा कैसे हो गए? पहचान छुपाने के लिए भीड़ में कई लोग मास्क लगाए हुए थे, पत्थर फेंक रहे थे, मजहबी नारे लगा रहे थे – जो एक पूर्व नियोजित घटना का संकेत देता है।
ANI के स्ट्रिंगर धर्मेंद्र सिंह ने गवाही दी कि 24 नवंबर को जब वो रिपोर्टिंग के लिए मस्जिद पहुँचे, तो वहाँ सर्वेक्षण टीम पहले से मौजूद थी। थोड़ी देर बाद मस्जिद के पश्चिमी छोर से आ रही भीड़ ने पत्थरबाजी शुरू कर दी, गोलीबारी भी की। भीड़ ने आगजनी भी की। इन्होंने बताया कि भीड़ में कुछ अपरिचित चेहरे भी इन्हें दिखे, जिससे पता चलता है कि उन्हें पहले से बुलाया गया था, जो मुस्लिम समुदाय द्वारा पूर्व नियोजित घटना का संकेत देता है।
टीवी9 भारतवर्ष के स्ट्रिंगर मोहम्मद मुजम्मिल ने अपनी गवाही में बताया कि 24 नवंबर को वे सुबह 8 बजे कवरेज के लिए जामा मस्जिद पहुँचे, जहाँ सर्वेक्षण टीम काम कर रही थी। करीब आधे घंटे बाद सुबह 8:30 बजे उन्हें पश्चिमी छोर से शोर सुनाई दिया। उसे कवर करने वे नगरपालिका टैंक रोड पर पहुँचे, जहां भीड़ मजहबी नारे लगा रही थी, हंगामा कर रही थी। एसपी और सीओ संभल ने माइक्रोफोन का उपयोग करके भीड़ से उकसावे से बचने और शांति बनाए रखने का आग्रह किया। भीड़ ने उनकी अनदेखी की, मस्जिद की ओर बढ़ी और पत्थरबाजी शुरू कर दी। भीड़ का मकसद था कि किसी भी तरह पुलिस को आँसू गैस का उपयोग नहीं करने दिया जाए। भीड़ ने सड़क पर वाहनों को नुकसान पहुँचाया और आग लगा दी। उन्होंने कहा कि पुलिस के प्रयासों ने एक बड़ी घटना को रोका और सर्वेक्षण टीम को दूसरी राह (हिंदू बस्ती की ओर से) से सुरक्षित निकाला गया, जिससे संभावित नुकसान टल गया।
हिंदुस्तान अखबार के फोटोग्राफर ओमवीर सिंह ने आयोग को बताया कि 24 नवंबर को वो मस्जिद के बाहर से अपने संस्थान के लिए घटना को कवर कर रहे थे। सुबह लगभग 8:15 बजे पुलिस मस्जिद के पश्चिमी छोर की ओर गई क्योंकि एक बड़ी भीड़ ‘एक रात की मस्जिद’ की तरफ से आ रही थी। मुस्लिम भीड़ ने मजहबी नारे लगाते हुए पहले पुलिस को धक्का दिया और फिर पत्थरबाजी शुरू कर दी। जब पुलिस ने आँसू गैस का उपयोग किया तो भीड़ के पीछे से गोलीबारी की आवाज सुनाई दी। भीड़ मस्जिद में प्रवेश करने के लिए दृढ़ संकल्पित दिख रही थी। अगर पुलिस की कार्रवाइयाँ सफल नहीं होती तो सर्वेक्षण टीम को सुरक्षित निकालना मुश्किल था। साथ ही यह सांप्रदायिक दंगे का रूप भी ले लेता। उनका मानना है कि 24 नवंबर की घटना पूर्व नियोजित थी।
रिपब्लिक चैनल के स्ट्रिंगर प्रदीप ने आयोग को दी अपनी गवाही में बताया कि 24 नवंबर को वे सुबह 7:15 बजे ही जामा मस्जिद पहुँच गए थे। मस्जिद के बाहर से वो घटना को कवर कर रहे थे। सुबह 8:15 बजे मुस्लिम भीड़ ‘एक रात की मस्जिद’ की तरफ से आने लगी। जब पुलिस ने उन्हें वापस जाने का आग्रह किया तो मुस्लिम भीड़ ने मजहबी नारे लगाते हुए पत्थरबाजी शुरू कर दी। जैसे पुलिस ने आँसू गैस का उपयोग किया, भीड़ के पीछे से गोलीबारी की आवाज सुनाई देने लगी। उन्होंने कहा कि बहुत बड़ी भीड़ पत्थरबाजी, आगजनी में लिप्त थी और मस्जिद में प्रवेश करने की कोशिश कर रही थी। कुछ दंगाइयों ने चेहरों पर स्याही पोत रखी थी। सब मिला कर देखा जाए तो जो हुआ, वो एक पूर्व नियोजित घटना का संकेत देता है।
इन तमाम मीडियाकर्मियों ने आयोग के समक्ष न केवल गवाही दी, बल्कि डिजिटल साक्ष्य भी उपलब्ध कराए। इनकी प्रत्यक्षदर्शी गवाही (और ये निष्पक्ष भी हैं, ना तो सरकारी-तंत्र से जुड़े हैं, ना ही मंदिर-मस्जिद की तरफ से) का सार यह है कि सर्दियों में सुबह 7 बजे दूर-दराज के स्थानों से हजारों लोगों का इकट्ठा होना, मजहबी नारे लगाना, पत्थर फेंकना और मस्जिद में प्रवेश करने की कोशिश करना यह दर्शाता है कि यह एक पूर्व नियोजित घटना थी। वरना भीड़ में ऐसे अनजान व्यक्ति क्यों देखे गए, जो पहले कभी संभल में नहीं देखे गए थे। ऐसा तभी संभव है, जब उन्हें पहले से सूचित किया गया और बुलाया गया हो।
19 नवंबर से लेकर 24 नवंबर तक संभल के सांसद जिया-उर-रहमान बर्क, जामा मस्जिद समिति के अध्यक्ष जफर अली, संभल विधानसभा क्षेत्र के विधायक इकबाल महमूद के बेटे सुहेल इकबाल क्या-क्या कर रहे थे, कैसे उनके दिए बयान उन्हीं के साथ इस दौरान रहे लोगों के बयानों के विरोधाभासी निकले, इन सब का आकलन करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि वर्ष 2024 का संभल दंगा स्वतःस्फूर्त नहीं था बल्कि एक षड्यंत्र के तहत जानबूझ कर भीड़ इकट्ठा की गई थी। सरकारी पक्ष के लोग या मीडियाकर्मी या फिर संभल की आम जनता – जिन-जिन ने उस दंगे को अपनी आँखों से देखा, सबने अपनी गवाही में भी दंगे को पूर्व नियोजित माना। भीड़ जिस तरीके से बर्ताव कर रही थी, जैसी तैयारी के साथ आई थी – सबने यह स्वीकार किया कि इस भीड़ की मजहबी भावनाओं को भड़काया गया और दंगा करवाया गया था।
दंगा भड़काने में तकनीक, सोशल मीडिया, ऐप का भी प्रयोग
क्या आपने जंगी ऐप (Zangi Private Messenger App) का नाम सुना है? संभल दंगों में इस ऐप का भी इस्तेमाल किया गया। पता है क्यों? क्योंकि इस ऐप पर बिना फोन नंबर या ईमेल के, सिर्फ एक रैंडम 10-डिजिट नंबर से अकाउंट बन जाता है। बिना फोन नंबर के रजिस्ट्रेशन हो जाता है। सबसे बड़ी बात – ऐप खुद ही आपको एक 10-डिजिट का जंगी-नंबर देता है, जो आपकी पहचान बनता है। साथ ही इस ऐप पर की गई बातचीत का किसी भी सर्वर पर कोई डेटा नहीं होता। मतलब यह एक सर्वरलेस मॉडल पर काम करता है। आपकी चैट हिस्ट्री, फाइल्स और कॉल्स का डेटा कंपनी के सर्वर पर स्टोर नहीं होता, बल्कि सिर्फ आपके फोन में रहता है। यही कारण है कि इस ऐप पर भारत में प्रतिबंधित लगाया गया है।
इसी जंगी ऐप का दुबई से उपयोग किया गया। शारिक साठा नाम के एक गैंगस्टर ने दुबई से इस ऐप के जरिए संभल में बैठे अपने गिरोह के एक प्रमुख सदस्य गुलाम नवी को कॉन्टैक्ट किया। उसे प्रतिबंधित जंगी ऐप के माध्यम से निर्देश दिया गया कि भीड़ में सशस्त्र सदस्यों को शामिल किया जाए। उनसे 2-4 पुलिसकर्मियों के साथ-साथ अपनी तरफ के भी 2-4 लोगों (यह बहुत महत्वपूर्ण है) को मारा जाए। ऐसा करने से यह मुद्दा राष्ट्रीय स्तर का बन जाएगा। और इस तरह से संभल में इस गैंग का प्रभुत्व पुनः स्थापित हो जाएगा।
इन निर्देशों का पालन करते हुए गुलाम नवी ने अपने सहयोगियों मुल्ला अफरोज और वारिश को अवैध हथियार प्रदान किए। इन दोनों ने दंगे वाले दिन धुएँ और अराजकता का फायदा उठाकर पूर्व-नियोजित गोलीबारी की, जिसके परिणामस्वरूप चार लोगों की मौत हुई, एक व्यक्ति घायल हुआ और 28 पुलिस अधिकारी और कर्मी घायल हुए।
उत्तर प्रदेश पुलिस ने गुलाम नवी को 2 मोबाइल फोनों के साथ गिरफ्तार किया। इनमें से एक शारिक साठा की पत्नी रोशन जहां का था, जिसमें एक विदेशी नंबर भी था। उसकी जानकारी के आधार पर तीन पिस्तौल और एक देसी हथियार के साथ कारतूस (विदेशी/घरेलू) भी बरामद किए गए।
इसके बाद मुल्ला अफरोज को 0.32-बोर पिस्तौल और तीन जिंदा कारतूस के साथ गिरफ्तार किया गया। उसने मृतक अयान और बिलाल को गोली मारने की बात भी कबूली। घटनास्थल से बरामद तीन प्रयोग किए गए कारतूस मुल्ला अफरोज से बरामद पिस्तौल से निकले थे जैसा कि FSL आगरा की बैलिस्टिक रिपोर्ट में पुष्टि भी हुई है।
वारिश को 315-बोर देसी हथियार, दो जिंदा कारतूस, दो प्रयोग किए गए 315-बोर कारतूस और दो मोबाइल फोन के साथ गिरफ्तार किया गया। उसके एक मोबाइल में एक रिकॉर्डेड ऑडियो कॉल थी, जिसमें वारिश एक अन्य आरोपी समीर को जामा मस्जिद के पीछे हथियार लाने के लिए कह रहा था। वारिश ने मृतक नईम और मोहम्मद कैफ को गोली मारने और वसीम को घायल करने की बात भी कबूल कर ली है। उससे बरामद दो 315-बोर कारतूस (प्रयोग किए गए) उसके हथियार से ही निकले थे, इसकी पुष्टि भी FSL आगरा की रिपोर्ट ने कर दी है।
साल 2024 में संभल में हुए दंगे को भड़काने के लिए सिर्फ जंगी ऐप का इस्तेमाल किया गया था, ऐसा नहीं था। दंगों से 2 दिन पहले मतलब 22 नवंबर को शुक्रवार यानी जुमे के दिन औसतन भीड़ से कहीं ज्यादा नमाजियों की भीड़ शाही जामा मस्जिद में नमाज के लिए पहुँचती है। यह स्वाभाविक नहीं था, बल्कि सोशल मीडिया और वॉट्सऐप के जरिए इस भीड़ को साजिशन बुलाया गया था।
21 नवंबर को ‘संभल सांसद’ के नाम से बने वॉट्सऐप ग्रुप में अब्दुल्ला और कासिफ हुसैन नाम के दो व्यक्तियों ने एक मैसेज भेजा, जिसमें लिखा था:
“संभल के सभी लोग शुक्रवार की नमाज शाही जामा मस्जिद में बड़ी संख्या में अदा करें और शाही जामा मस्जिद के पास की मस्जिदों में नहीं। केवल शाही जामा मस्जिद में नमाज अदा करें, और इस संदेश को यथासंभव साझा करें।”
इसी तरह का मैसेज ‘मन्नत’ नामक एक वॉट्सऐप ग्रुप के माध्यम से किया गया ताकि शुक्रवार की नमाज के लिए शाही जामा मस्जिद में बड़ी भीड़ एकत्र हो। और यह सब तब किया जा रहा था, जब जिले में धारा 163 BNSS लागू थी, मतलब एक साथ 5 से ज्यादा लोगों का एक जगह पर जमा होना प्रतिबंधित था। नमाज के लिए मुस्लिम समुदाय के लोगों से स्पेशल अपील की गई थी कि वो अपने-अपने पास की मस्जिदों में नमाज पढ़ें, किसी स्पेशल मस्जिद में भीड़ जमा न करें।
22 नवंबर (शुक्रवार) को जब सांसद बर्क ने जामा मस्जिद में नमाज अदा करने के बाद प्रेस कॉन्फ्रेस आयोजित की और कहा – “यह मस्जिद है, मस्जिद थी, और मस्जिद रहेगी। कोई भी हमारी मस्जिद हमसे नहीं ले सकता” – तो उनके इस भड़काऊ भाषण को भी कई सारे वॉट्सऐप ग्रुपों और अन्य माध्यमों से प्रसारित किया ताकि लोगों को भड़काया जा सके। यह इसलिए किया गया ताकि सुनिश्चित हो कि यदि सर्वेक्षण फिर से शुरू हुआ तो इसे किसी भी कीमत पर रोका जाए।
23 नवंबर को जब कोर्ट कमिश्नर ने यह तय किया कि अगले दिन जामा मस्जिद का शेष सर्वे किया जाएगा, तो इसकी सूचना हर संबंधित व्यक्ति को दी गई। सूचना मिलने के बाद जामा मस्जिद समिति के अध्यक्ष जफर अली ने क्या किया? उसी रात 10:01 बजे 38 सेकंड की कॉल के माध्यम से सांसद बर्क को सर्वेक्षण के बारे में सूचित किया, यह जफर अली के CDR में दर्ज है। बाद में रात 11:04 बजे सांसद बर्क ने जफर अली को कॉल-बैक किया, यह भी CDR में दर्ज है। चूँकि सांसद बर्क संभल में मौजूद नहीं थे, ऐसे में उन्होंने जफर अली को भीड़ एकत्र करने की जिम्मेदारी सौंपी, जो अपनी स्थिति के कारण कम समय में बड़ी भीड़ जुटा सकते थे।
सांसद बर्क के निर्देशों का पालन करते हुए जफर अली ने आधी रात को सुहेल इकबाल (जामा मस्जिद इंतजामिया कमेटी के कैशियर और संभल के विधायक के बेटे) के निवास पर अन्य कमेटी सदस्यों के साथ एक बैठक की, जिसमें सर्वेक्षण और सांसद बर्क के निर्देशों के बारे में जानकारी दी गई। इसके बाद सांसद बर्क से जफर अली को 24 नवंबर की रात 12:32 बजे और 01:48 बजे कॉल प्राप्त हुईं, जिनमें भीड़ एकत्र करने और सर्वेक्षण को हर हाल में रोकने की योजना बनाई गई, किसी भी स्थिति से निपटने की तैयारी की गई। वॉट्सऐप कॉल इंटरेक्शन भी CDR में दर्ज है।
ऐप के अलावे सोशल मीडिया भी दंगों की तैयारी का एक प्लेटफॉर्म बना था। जिले में धारा 163 BNSS लागू होने के बावजूद 22 नवंबर की नमाज जामा मस्जिद में ही पढ़ी जाए – इसके लिए बड़ी संख्या में भीड़ जुटे, ऐसा पोस्टर बनाया गया, उसे पोस्ट किया गया। कोतवाली संभल के प्रभारी अनुज कुमार तोमर की गवाही के अनुसार यह काम किया था बिलाल ने 21 नवंबर को। भीड़ जुटाने के साथ-साथ इन संदेशों में अधिक से अधिक धन का योगदान करने की भी अपील की गई थी। एलआईयू मतलब लोकल इंटेलिजेंस यूनिट ने भी अपनी जो रिपोर्ट सौंपी है, उसमें इस तथ्य को हाईलाइट किया गया है।
“कोई भी हमारी मस्जिद नहीं छीन सकता। यह मस्जिद है, मस्जिद थी, और कयामत तक मस्जिद रहेगी। जैसे अयोध्या में हमारी मस्जिद छीनी गई, वैसे ही इसे नहीं छीनने देंगे। हम इसकी रक्षा करने के लिए हमेशा तैयार हैं। हम पुलिस, प्रशासन या सरकार से डरने वाले नहीं हैं। हम इस देश के मालिक हैं, नौकर या गुलाम नहीं।”
22 नवंबर को जुमे की नमाज के बाद जब सांसद जिया-उर-रहमान बर्क ने जामा मस्जिद की सीढ़ियों से उपरोक्त भड़काऊ भाषण दिया, उसे भी सोशल मीडिया हैंडलों पर खूब प्रचारित-प्रसारित किया गया।
19 नवंबर 2024 को सर्वेक्षण में सफलतापूर्वक बाधा डालने के बाद जामा मस्जिद समिति के लोग, मुस्लिम समुदाय के रहनुमा बनने की राजनीति में विधायक-सांसद, गैंगस्टर टाइप के लोग अपना प्रभुत्व जमाने के लिए और कट्टर मुस्लिम लोगों ने दंगों की तैयारी के लिए तमाम जनसंचार के साधनों का इस्तेमाल किया। आपस में बातचीत, प्लानिंग, साजिश, भड़काऊ सामग्रियों के प्रचार-प्रसार के लिए ऐप से लेकर सोशल मीडिया – हर एक चीज इनका टूल बनी थी।
संभल दंगा 2024 में क्या सिर्फ स्थानीय मुस्लिम ही थे शामिल?
इस दंगे के लिए कितनी साजिश रची गई थी, संभल के अपर पुलिस अधीक्षक (उत्तरी) श्रीश्चंद ने अपनी गवाही में सब कुछ बताया है। और ऐसा भी नहीं है कि इनकी गवाही सिर्फ इनकी अपनी सोच के आधार पर है। उत्तर प्रदेश पुलिस की स्थानीय खुफिया इकाई (LIU: Local Intelligence Unit) द्वारा दर्ज रिपोर्ट के आधार पर तथ्य रखे गए हैं।
एलआईयू को पहले बाहरी लोगों के इस दंगे में शामिल होने की जानकारी नहीं थी। लेकिन वो जानकारी गलत निकली। बाद में पता चला कि संभल के अलावे रामपुर, शाहजहाँपुर, मुरादाबाद, कानपुर देहात और अमरोहा जिलों से भी भीड़ आई थी, दंगे में सक्रिय रूप से शामिल हुई थी। मतलब कुल 6 जिलों की मुस्लिम भीड़ जमा हुई थी दंगा करने। इतना ही नहीं, संभल स्थित मस्जिदों और मदरसों में रहने वाले लोग भी दंगों में सक्रिय रूप से शामिल थे। दंगों के बाद गिरफ्तार लोगों में सराय मुस्तफा, नखासा कोतवाली पुलिस स्टेशन के अंतर्गत, हैदर और रुकनुद्दीन मस्जिद के मुअज्जम (अज़ान देने वाला व्यक्ति, इस्लाम में बहुत ही सम्मानित और महत्वपूर्ण पद) भी थे।
एलआईयू ने जब पूरी घटना की समीक्षा की तो पता चला कि जब भी संभल में दंगे होते हैं, जामा मस्जिद केंद्र में रहती है। शहरी क्षेत्र में दंगों के दौरान सिरसी रोड, चंदौसी रोड, गवाँ रोड, हसनपुर रोड और असमौली-जोया रोड के साथ लगे गाँवों से अचानक भीड़ आती है। यही भीड़ लूटपाट, तोड़फोड़ और आगजनी से संबंधित गतिविधियों में शामिल होती है।
संभल दंगा में राजनीति का क्या रोल?
दंगे के लिए मजहबी भावनाओं को भड़काया गया। इससे कट्टर इस्लामी लोग “मस्जिद छीनने नहीं देंगे” जैसी बातों में आ गए। लेकिन क्या इसके पीछे जो खेल खेला गया, वो सिर्फ मजहबी थी? स्थानीय खुफिया इकाई (एलआईयू) ने इस मामले की भी पोल-पट्टी अपनी रिपोर्ट में खोली है।
24 नवंबर को दंगे के बाद एलआईयू ने पूरे मामले की समीक्षा की। एलआईयू की टीम ने स्थिति का आकलन किया। मामले से संबंधित कई व्यक्तियों के साथ चर्चा की। गिरफ्तार आरोपितों से पूछताछ भी की गई। इसी पूछताछ से पता चला कि संभल में सांप्रदायिक घटनाओं में हमेशा चार समूह प्रभावशाली रहे हैं और सक्रिय भूमिका निभाते हैं:
- पहला: राजनीतिक महत्वाकांक्षाएँ
- दूसरा: संभल शहर में मुस्लिम समुदाय में धार्मिक उन्माद
- तीसरा: मस्जिद समिति के सदस्यों की महत्वाकांक्षाएँ
- चौथा: आपराधिक गिरोहों की सक्रिय भूमिका
इसमें जो पहला कारक है, वो है राजनीतिक। इसी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के कारण सांसद जिया-उर-रहमान बर्क और विधायक इकबाल महमूद के बेटे सुहेल इकबाल ने दंगों में सक्रिय भूमिका निभाई, मुस्लिम समुदाय के लोगों को उकसाया। एलआईयू को पता चला कि सांसद और विधायक दोनों एक ही पार्टी (समाजवादी पार्टी) से होने के बावजूद प्रतिद्वन्द्वी हैं।
एलआईयू को मिली जानकारी के अनुसार लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान दोनों पक्षों ने अपने-अपने विवादों को सुलझा लिया था लेकिन वो सिर्फ सतही था। अंदरूनी रस्सा-कस्सी बनी हुई थी। जैसे ही जामा मस्जिद का मामला सामने आया, दोनों नेताओं ने अपने-अपने समर्थकों को तैयार किया। समर्थकों के दम पर और इस्लाम के नाम पर दोनों नेताओं ने मुस्लिम भीड़ को उकसाया। दोनों ओर के लोग यह साबित करने में जुट गए थे कि आम जनता उन्हें “मस्जिद का रखवाला” समझे। इसलिए खुद को मुस्लिम हितों के बड़े रक्षक के रूप में चित्रित करने का एक भी मौका नहीं छोड़ा।
एलआईयू की रिपोर्ट के अलावे संभल के अपर पुलिस अधीक्षक (उत्तरी) श्रीश्चंद ने भी आयोग को दी गवाही में दोनों नेताओं की राजनीतिक महत्वाकांक्षा पर टिप्पणी की है:
“राजनीतिक महत्वाकांक्षा के फलस्वरूप वर्तमान सांसद जिया-उर-रहमान बर्क ने दंगों में सक्रिय भूमिका निभाई। ऐसा इसलिए क्योंकि सांसद बर्क के मृत दादा शफीकुर्रहमान बर्क एवं वर्तमान विधायक इकबाल महमूद के बीच राजनीतिक प्रतिद्वन्दिता वर्षों से चली आ रही है। इसलिए मुस्लिमों का खैरख्वाँ बनने के लिए दोनों ने बढ़-चढ़ कर सक्रीय भागीदारी की। हिंसक घटना वाले दिनांक 24 नवंबर को भी इसी महत्वाकांक्षा के कारण वर्तमान सांसद बर्क एवं विधायक इकबाल महमूद का बेटा सुहेल इकबाल द्वारा घटना में सक्रिय भूमिका निभाई गयी और लोगों को उद्वेलित किया गया।”
कोर्ट का आदेश, प्रशासनिक सर्वे… फिर मजहबी एंगल कैसे घुसा?
संभल दंगों की जाँच करने को बने आयोग ने जो रिपोर्ट शासन को सौंपी है, उसमें एक अध्याय है – 7वाँ अध्याय। इसका शीर्षक है – साक्ष्य के अनुसरण में निर्धारण के बिंदू। इसमें आयोग ने कुल 9 प्रश्नों को चिह्नित किया है। इसी अध्याय में सभी प्रश्नों का विस्तार से उत्तर भी दिया गया है।
इस अध्याय के प्रश्न 6 को जरा पढ़िए – क्या 19, 22 और दिनांक 24.11.2024 की तारीखों पर कोई भीड़ किसी विशेष उद्देश्य के लिए इकट्ठी हुई थी और यदि हाँ, तो किसके उकसावे पर?
इसी प्रश्न का जो उत्तर आयोग ने दिया है, उसमें स्पष्ट है कि जो कार्य सरकारी तरीके से 2-4 घंटे में पूरा हो जाता, जिसको करने का आदेश राजनीति की कुर्सी से नहीं बल्कि न्यायालय की ओर से आया था, आखिर वो क्यों 5 दिन लंबा खींच गया और अंततः दंगों में तब्दील हो गया?
इसकी शुरुआत होती है 19 नवंबर की दोपहर से। शाही जामा मस्जिद कभी हरि हर मंदिर था, इसके सर्वेक्षण का आदेश अदालत ने दिया। इसके लिए अधिवक्ता रमेश सिंह राघव को अधिवक्ता आयुक्त भी नियुक्त कर दिया कोर्ट ने। इसके बाद इन्हीं अधिवक्ता आयुक्त ने वादी के वकीलों, आधिकारिक प्रतिवादियों, जिला प्रशासन के साथ-साथ जामा मस्जिद समिति के अध्यक्ष जफर अली (जो खुद भी एक अधिवक्ता हैं) को सूचित किया। खुद जफर अली ने भी आयोग को दी अपनी गवाही में बताया है कि शाम 5:15 बजे जब वह चंदौसी अदालत परिसर के अपने चैंबर में थे, उस समय कोतवाली संभल से उन्हें एक कॉल आया था कि जामा मस्जिद का सर्वेक्षण होना है और उन्हें मस्जिद पहुँचने का अनुरोध किया गया।
इस सूचना के बाद वो जफर अली अपने बेटे हैदर अली और दो अन्य अधिवक्ता कासिम जमाल और आफताब अहमद के साथ जामा मस्जिद जाने के लिए गाड़ी से निकले। रास्ते में उन्होंने जामा मस्जिद इंतजामिया समिति के नायक सदर लड्डन खान को सर्वेक्षण के बारे में सूचित किया और मस्जिद पहुँचने को कहा। कॉल पर लड्डन खान ने उन्हें बताया किया कि वह पहले से ही जामा मस्जिद पर मौजूद हैं। जब ये लोग जामा मस्जिद पहुँचे तो वहाँ समिति के सचिव मशहूद अली फारुकी, हाजी लड्डन और महमूद खान (कैशियर) मौजूद थे।
जफर अली के अलावे स्थानीय विधायक के बेटे सुहेल इकबाल ने भी अपनी गवाही में बताया कि 19 नवंबर को दोपहर में उसे जामा मस्जिद के सर्वेक्षण के बारे में पता चला। उसे एक अधिवक्ता (नाम नहीं बताया अधिवक्ता का) ने कॉल किया था। इसके अलावे उसने यह भी बताया कि एक पत्रकार ने भी उसे कॉल किया था और बताया था कि संभल जिले के डीएम और एसपी भी शाम को सर्वेक्षण के लिए जामा मस्जिद जा सकते हैं।
समाजवादी पार्टी के नेता और संभल के सांसद जिया-उर-रहमान बर्क ने आयोग को अपनी गवाही में बताया कि मस्जिद के सर्वेक्षण की सूचना उन्हें शाम 6:30 से 7:00 बजे के बीच मिली। सर्वेक्षण की जानकारी उन्हें कोटगढ़ी के निवासी नदीम नामक व्यक्ति ने दी थी। इसी सूचना के बाद वो जामा मस्जिद पहुँचे थे।
आयोग ने इन प्रमुख व्यक्तियों की गवाही के आधार पर पाया कि जामा मस्जिद में 19 नवंबर की शाम को सर्वेक्षण होने की जानकारी सामान्य जनता तक पहुँचा दी गई थी। इतना ही नहीं, सुहेल इकबाल और जिया-उर-रहमान बर्क का भीड़ के साथ पहुँचना उस साजिश की ओर इशारा करता है कि न केवल लोग बल्कि मीडिया के लोगों को भी सर्वे की जानकारी हो गई थी। इस जानकारी को फैलाया गया मजहबी भावनाओं को भड़का कर, जिसकी शुरुआत होती है संभल की अदालत से। क्योंकि सर्वप्रथम वहीं से सर्वे के आदेश की बात लीक की गई, उसका प्रचार-प्रसार किया गया।
मजहब के अलावे गुंडई, पैसे और वर्चस्व की बातें क्यों
कट्टर इस्लामी पहलू के अलावा संभल दंगे में कुछ और भी प्रमुख कारक थे। जैसा कि ऊपर बताया गया कि एलआईयू ने अपनी समीक्षा में 4 प्रभावशाली तत्वों का नाम लिया था। एक – धार्मिक उन्माद और दूसरा – राजनीतिक महत्वाकांक्षा पर हमने आयोग की रिपोर्ट के हवाले से ऊपर विस्तार में पढ़ लिया है। एलआईयू की समीक्षा का चौथा पॉइंट है – आपराधिक गिरोहों की सक्रिय भूमिका। इसी में छिपा है पैसे और गुंडई वाले सवाल का जवाब।
शारिक साठा नाम का एक गैंगस्टर हुआ करता था संभल में। इसी के नाम से एक गिरोह भी सक्रिय था – शारिक साठा गिरोह। CM योगी की सरकार आने और यूपी पुलिस का गुंडों के लिए जीरो-टॉलरेंस पॉलिसी अपनाने के बाद साल 2020 में शारिक साठा नकली पासपोर्ट बनाकर दुबई भाग गया था। जब उसे सूचना मिली कि संभल के जामा मस्जिद का सर्वे होना है, तो इसमें उसे अपने गिरोह को संभल में फिर से सक्रिय कर, अपने प्रभुत्व को पुनः स्थापित करने का मौका दिखा। इसके बाद उसने दुबई में बैठे-बैठे जंगी ऐप के सहारे अपने गिरोह के एक प्रमुख सदस्य गुलाम नवी को कॉन्टैक्ट किया। उसको निर्देश दिया कि जामा मस्जिद पर पहुँचने वाली भीड़ में सशस्त्र सदस्यों को शामिल किया जाए। उनसे 2-4 पुलिसकर्मियों के साथ-साथ अपनी तरफ के भी 2-4 लोगों (यह बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि मस्जिद का सर्वे और मुस्लिमों की ही मौत भी – मतलब विपक्ष इस मामले को उछालेगा) को मारा जाए। ऐसा करने से यह मुद्दा राष्ट्रीय स्तर का बन जाएगा। और इस तरह से संभल में इस गैंग का प्रभुत्व पुनः स्थापित हो जाएगा।
शारिक साठा के सभी गुर्गे जो दंगों में शामिल थे, UP पुलिस ने सबको गिरफ्तार कर लिया। गुलाम नवी (जिससे शारिक साठा ने दुबई से संपर्क किया था) ने बताया कि उसके घर से लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर शारिक साठा का घर है, जहाँ उसकी बीवी और 11-12 बच्चे रहते हैं। भल स्थित नखासा पुलिस स्टेशन के सब-इंस्पेक्टर मोहम्मद शाह फैसल ने भी अपनी गवाही में बताया कि वो शारिक साठा को जानते हैं क्योंकि उनका घर उनकी चौकी क्षेत्र में ही पड़ता है और उसकी हिस्ट्री शीट भी उनके ही पुलिस स्टेशन में दर्ज है।
गुंडई करके व्यक्तिगत प्रभाव जमाना यह बॉलीवुड के आम फिल्म के स्क्रिप्ट जैसी है। बढ़िया फिल्में इससे बेहतर स्क्रिप्ट वाली होती है। संभल में भी शारिक साठा की गुंडई से एक लेवल ऊपर देखें तो वर्चस्व की लड़ाई में वहाँ 2 गुट शामिल हैं – तुर्क बनाम पठान। और यह बात आयोग को वहाँ के आम गवाहों ने, पीड़ितों ने बताई है।
संभल जिले में मुसलमानों में दो समूह तुर्क और पठान सक्रिय हैं। कई बार उनके बीच प्रभुत्व की लड़ाई के लिए हिंसक वातावरण बनाया जाता है। संभल दंगा के दौरान भी ये देखा गया। दंगों के दौरान वसीम को लगी चोट के संबंध में उसके चाचा नसीम ने जो FIR दर्ज करवाई थी, वो अज्ञात तुर्क समुदाय के खिलाफ की गई थी। जब आयोग ने पीड़ित वसीम से तुर्क समुदाय के विरुद्ध की गई FIR की सत्यता पर सवाल किए, तो वसीम ने उसे सच बताया। FIR में लिखा था:
“24 नवंबर को हमारे घर से कुछ दूर पर स्थित जामा मस्जिद में सरकारी कर्मचारियों द्वारा सर्वे का काम किया जा रहा था। उसी समय शहर के कुछ शरारती व उपद्रवी लोगों ने जामा मस्जिद के आस-पास इकट्ठा होना शुरू कर दिया, जिसमें तुर्क बिरादरी के लोग भी थे तथा कुछ उपद्रवियों के द्वारा सर्वे कर रहे लोगों पर पथराव शुरू कर दिया गया। जब प्रशासन के लोगों ने पथराव कर रहे लोगों को समझाना चाहा तो पथराव कर रही भीड़ में से कुछ तुर्क बिरादरी के लोगों ने फायरिंग शुरू कर दी। तुर्क लोग पठान बिरादरी के लोगों पर गोलीबारी कर रहे थे। अज्ञात तुर्क बिरादरी के उपद्रवियों द्वारा जान से मारने की नीयत से की जा रही फायरिंग में से एक गोली मेरे भतीजे वसीम जो कि अपने घर के दरवाजे पर खड़ा था, उसे लगी। वो गंभीर रूप से घायल हो गया। हम उसे तुरंत डॉक्टर के पास ले गए।”
पीड़ितों की गवाही के अलावे एडिशनल एसपी श्रीश्चंद ने भी आयोग को शपथ-पत्र में उल्लिखित बयान दिया है। इनके अनुसार संभल दंगों में मारे गए कुल 4 व्यक्ति तुर्कों और पठानों के बीच क्रॉस फायरिंग के कारण मारे गए। कई पुलिस अधिकारी, प्रशासनिक अधिकारी और अन्य गवाहों ने भी कहा है कि उन्होंने भीड़ से गोलीबारी की आवाज सुनी और देखी।
जिस जामा मस्जिद के लिए दंगा, उससे जुड़े लोग कौन-कौन?
निम्नलिखित 4 लोग जामा मस्जिद इंतजामिया समिति से जुड़े हुए थे:
- अधिवक्ता जफर अली, जामा मस्जिद इंतजामिया समिति के अध्यक्ष
- लड्डन खान, जामा मस्जिद इंतजामिया समिति के सदस्य
- कासिम जमाल, जामा मस्जिद इंतजामिया समिति के अधिवक्ता
- मशहूद अली फारूकी, जामा मस्जिद इंतजामिया समिति के अधिवक्ता
“साक्ष्य के अनुसरण में निर्धारण के बिंदू” – आयोग की रिपोर्ट का यह 7वाँ अध्याय है। इसमें जो 8वाँ प्रश्न है, वो है – “जामा मस्जिद की इंतजामिया समिति के सदस्यों, स्थानीय सांसद और स्थानीय विधायक के पुत्र और प्रतिनिधि के बयानों का मूल्यांकन।” इस प्रश्न को आयोग ने संबंधित व्यक्तियों की गवाही पर कसा है, एक-दूसरे की गवाही से मिलान किया गया है – और नतीजा क्या निकला? जो जवाब सामने आया, उससे चार लोगों (मस्जिद समिति से जुड़े) और सांसद तथा विधायक के पुत्र की पोल-पट्टी खुलती दिखती है।
इन सबके बयान विरोधाभाषी निकले। जामा मस्जिद के सर्वेक्षण से जुड़ी सूचना के बारे में इन लोगों ने क्या-क्या बयान दिए, पढ़ा जाए:
- जफर अली ने बताया कि 19 नवंबर को अधिवक्ता कासिम जमाल और अधिवक्ता फारुकी ने उन्हें शाम के लगभग 4-5 बजे बताया कि सर्वेक्षण आदेश जारी हो गया है।
- जबकि कासिम जमाल ने अपने साक्ष्य में कहा कि जफर अली ने उन्हें सूचित किया कि जामा मस्जिद के खिलाफ मामला दायर किया गया है, इसलिए वह अदालत के कार्यालय 3:30 से 3:45 तक आ गए। इसके बाद शाम के 6 बजे जफर अली ने कॉल करके सर्वे होने की सूचना दी, साथ ही मस्जिद पहुँचने का भी निर्देश दिया।
- जफर अली ने यह बताया कि शाम को 5:15 बजे संभल कोतवाली थाना से उनको कॉल आया कि जामा मस्जिद का सर्वेक्षण होना है, इसलिए मस्जिद पहुँचना है।
- जफर अली ने दंगों के दौरान हुई मौतों के संबंध में अपने शपथ-पत्र में जो बातें कहीं, आयोग के सामने उससे बिल्कुल उलट। उनके शपथ-पत्र में कहा गया है कि पुलिस ने भीड़ पर सीधी गोलीबारी की, जिससे 4-5 लोगों की मौत हुई। शपथ-पत्र में उन्होंने लिखा है कि वह पुलिस गोलीबारी के दौरान डीएम और एसपी के साथ घटनास्थल पर मौजूद थे और पूरी घटना देखी। मतलब पुलिस ने भीड़ पर गोली चलाई, यह उनकी आँखों-देखी है। लेकिन इसी बात को उन्होंने आयोग के सामने कुछ और ही ढंग से रखी। आयोग के समक्ष, उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने इसे अपनी स्वयं की जानकारी के आधार पर नहीं लिखा बल्कि अन्यों के कहने पर शपथ-पत्र में शामिल किया। आयोग के समक्ष उन्होंने स्पष्ट किया कि वह इसके प्रत्यक्षदर्शी नहीं हैं बल्कि हिंसा समाप्त होने के बाद घटनास्थल पर मौजूद लोगों ने उन्हें घटनाओं के बारे में बताया।
- जफर अली 19 नवंबर को अदालत में किस वक्त कहाँ-कहाँ मौजूद थे, इसको लेकर वादी के अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन की भी गवाही महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार 19 नवंबर को पहले 12:30 बजे मामला सिविल जज के समक्ष प्रस्तुत हुआ और सुनवाई के दौरान जामा मस्जिद की ओर से अधिवक्ता कासिम जमाल मौजूद थे। उनके साथ अदालत में जफर अली भी मौजूद थे। इसके बाद दोपहर के 2 बजे जब सर्वे कमीशन और अस्थायी निषेधाज्ञा की सुनवाई हेतु मामला निर्धारित किया गया, तब भी कासिम जमाल और जफर अली, मस्जिद के अन्य अधिवक्ताओं के साथ अदालत में मौजूद थे। इनके अलावे एएसआई के विष्णु शर्मा(अधिवक्ता) और डीजीसी (सिविल) श्री प्रिंस शर्मा भी मौजूद थे।
- जामा मस्जिद इंतजामिया समिति के सदस्य लड्डन खान ने भी विरोधाभासी गवाही दी है। मतलब शपथ-पत्र में कुछ और जबकि आयोग के समक्ष कुछ और। लड्डन खान के शपथ-पत्र के अनुसार, टैंक/वज़ूखाने का पानी प्रशासन और एसडीएम द्वारा इसकी गहराई मापने के लिए निकाला गया। जबकि इसी लड्डन ने आयोग को गवाही दी कि वज़ूखाना का पानी एसडीएम के निर्देश पर निकाला गया और वह एसडीएम के साथ थे। उनका ही कर्मचारी उनके ही निर्देश पर पानी का टैंक खोला।
- जामा मस्जिद के अधिवक्ता कासिम जमाल के भी शपथ-पत्र और आयोग के समक्ष दी गई गवाही में विरोधाभास है। इनके अनुसार 19 नवंबर को जब ये शाम के 6 से 6:15 तक मस्जिद पहुँचे, तब तक सांसद बर्क, विधायक का बेटा सुहेल इकबाल और इंतजामिया समिति के बाकी सदस्य वहाँ पहले से मौजूद थे। 19 नवंबर को सर्वे होना है, यह जानकारी जफर अली को इन्होंने दी या जफर अली ने इनको – दोनों के अलग-अलग दावे हैं।
- जामा मस्जिद के अधिवक्ता मशहूद अली फारूकी ने भी शपथ-पत्र और आयोग के सामने दी गवाही में विरोधाभासी तथ्य प्रदान किए। इनके अनुसार जफर अली ने इनको नहीं बताया कि 19 नवंबर को जामा मस्जिद से संबंधित कोई कमीशन गठित किया गया है। जब शाम को यह घर (जामा मस्जिद के बगल में ही) पहुँचे तो वहाँ भीड़ देखी, पूछने पर पता चला कि सर्वे होना है। उसी समय जफर अली ने भी फोन पर सूचना दी। इन्होंने हालाँकि यह बताया कि मस्जिद के वजूखाने का टैंक इंतजामिया समिति के ही कर्मचारी ने खोला, पुलिस-प्रशासन ने नहीं।
- सांसद जिया-उर-रहमान बर्क का बयान भी बाकी गवाहों से मैच नहीं करता है। उनके खुद के बयान भी विरोधाभासी हैं। सांसद बर्क ने बताया था कि जामा मस्जिद के सर्वे होने की सूचना उनके क्षेत्र के लोगों से शाम के 6:30 से 7 बजे के बीच मिली। ऐसे में जामा मस्जिद के अधिवक्ता कासिम जमाल का वो दिया वो तथ्य विरोधाभासी हो गया कि 19 नवंबर को जब वो शाम के 6 से 6:15 तक मस्जिद पहुँचे, तब तक सांसद बर्क वहाँ पहले से मौजूद थे।
24 नवंबर को जामा मस्जिद का शेष सर्वेक्षण होगा, इसकी जानकारी सांसद बर्क को मस्जिद समिति के अध्यक्ष जफर अली ने फोन पर दी। आयोग के सामने इस बात पर सांसद ने सहमति जताई। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि इसी सांसद बर्क ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में एक शपथ-पत्र दायर किया था, जिसमें कहा गया था – “24 नवंबर 2024 को जामा मस्जिद का शेष सर्वे होना है, इसकी जानकारी सांसद बर्क को नहीं थी।”
सांसद बर्क ने आयोग को बताया कि 22 नवंबर को जुमे की नमाज से पहले या बाद में उन्होंने मस्जिद के अंदर या बाहर से कोई भाषण नहीं दिया। जबकि इसके उलट मशहूद अली फारूकी ने बताया कि जुमे की नमाज के बाद सांसद बर्क ने मस्जिद की सीढ़ियों पर से मीडिया को संबोधित किया था। अपने बयान में मशहूद अली फारूकी ने सहमति जताई कि मस्जिद की सीढ़ियों से राजनीतिक बयान या प्रेस कॉन्फ्रेंस अनुचित था। - संभल के विधायक इकबाल महमूद के बेटे सुहेल इकबाल ने भी शपथ-पत्र और आयोग को दी गवाही में विरोधाभासी बयान दिया। शपथ-पत्र में सुहेल ने बताया कि 19 नवंबर को सर्वे रात के 8 बजे तक चला, जबकि आयोग को दी गवाही में इसे रात के 8:30 से 9:30 तक बताया। 22 नवंबर मतलब जुमे की नमाज के दिन को लेकर इसने बताया कि यह जामा मस्जिद नहीं गया था। इसके उलट सांसद जिया-उर-रहमान बर्क ने गवाही में बताया कि नमाजियों की भीड़ में यह भी था।
जामा मस्जिद से संबंधित उपरोक्त सभी लोगों के शपथ-पत्र और आयोग के समक्ष दी गई गवाही में विरोधाभास स्पष्ट है। इन सबके विरोधाभासी बयानों को लेकर आयोग ने अपने विश्लेषण में लिखा है कि इन लोगों ने ऐसा इसलिए किया, ताकि 24 नवंबर को हुए शेष सर्वे के खिलाफ एक झूठी कहानी गढ़ी जा सके। मुस्लिम भीड़ जो मस्जिद के पास जुटी, उसके लिए एक डिफेंस तैयार किया जा सके।
दंगा संभल में, भीड़ 6 जिलों से: सर्दी में सुबह-सुबह जामा मस्जिद तक कैसे पहुँचे दंगाई
सोशल मीडिया, वॉट्सऐप, जुमे की नमाज पर मुस्लिम लोगों से मस्जिद बचाने की मजहबी अपील, दंगे से ठीक एक रात पहले फोन पर जामा मस्जिद के अध्यक्ष जफर अली और समाजवादी पार्टी के सांसद जिया-उर-रहमान बर्क के बीच लगातार फोन पर बातचीत और भीड़ जुटाने की साजिश, संभल विधायक इकबाल महमूद और संभल सांसद बर्क के बीच की राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के कारण दोनों के बीच मुस्लिमों का रहनुमा बनने की होड़ में अपने-अपने समर्थकों की भीड़ जुटाना, भारत से भाग कर दुबई में रहने वाले गैंगस्टर शारिक साठा का दंगों की आड़ में फिर से संभल में अपना वर्चस्व स्थापित करने की मंशा, संभल में दो मुस्लिम समूहों तुर्क और पठान के बीच प्रभुत्व की लड़ाई – इन सभी पहलुओं ने आराम से होने वाले सरकारी सर्वेक्षण को मजहबी रंग दिया।
उपरोक्त सभी पहलुओं ने अपना-अपना काम अलग-अलग किया। लेकिन 24 नवंबर 2024 को दंगे के दिन सबका लक्ष्य रहा – संभल का जामा मस्जिद। इससे हुआ यह कि न सिर्फ संभल बल्कि आस-पास के 5 और जिलों के कट्टर मुस्लिम दंगे के लिए तैयार हो गए, धारा 163 BNSS लागू होने के बावजूद मस्जिद के पास अलग-अलग रास्तों से पहुँच गए। जिन जिलों से ये लोग आए, उनके नाम हैं – रामपुर, शाहजहाँपुर, मुरादाबाद, कानपुर देहात और अमरोहा।
इन सभी जिलों से संबंधित लोगों के व्हाट्सएप ग्रुपों में सबसे पहले जुमे की नमाज (22 नवंबर 2024) पढ़ने के लिए जामा मस्जिद बुलाया गया। फिर यहाँ से यह संदेश सबको दिया गया कि शेष होने वाले सर्वेक्षण को किसी भी तरह से रोकना है, चाहे उसके लिए दंगा ही क्यों न करना पड़े।
ऊपर संभल जिले के आम नागरिकों ने जो बयान दिया है, उससे भी यह स्पष्ट है कि दंगे के दिन जिले के बाहर से लोग आए थे और उन्हें शेष सर्वेक्षण की पूरी जानकारी थी। इसलिए भीड़ पूरी तैयारी के साथ इकट्ठा होकर आई थी। प्रत्यक्षदर्शियों ने भीड़ को सड़क से ईंट-पत्थर इकट्ठा करते, हथियारों से भी लैस होकर आते देखा है। ये लोग ट्रैक्टर-ट्रॉलियों में अलग-अलग रास्ते से आए थे। ईंट-पत्थर इकट्ठा करने के लिए इन लोगों ने सिंहपुर साहनी से असमौली मिल तक निर्माणाधीन सड़क को चुना था।
इतना ही नहीं, संभल स्थित मस्जिदों और मदरसों में रहने वाले लोग भी दंगे में सक्रिय रूप से शामिल थे। गिरफ्तार लोगों में सराय मुस्तफा, नखासा कोतवाली पुलिस स्टेशन के अंतर्गत, हैदर और रुकनुद्दीन मस्जिद में मुअज्जिम थे। पूरी घटना की समीक्षा से यह भी पता चला है कि जब भी संभल में दंगे होते हैं, जामा मस्जिद केंद्र में रहती है। शहरी क्षेत्र में दंगों के दौरान सिरसी रोड, चंदौसी रोड, गवां रोड, हसनपुर रोड और असमौली-जोया रोड के साथ लगे गाँवों से अचानक भीड़ आती है, जो लूटपाट, तोड़फोड़ और आगजनी से संबंधित गतिविधियों में शामिल होती है।
संभल जामा मस्जिद के पास रहने वाली हिंदू आबादी भी क्या दंगाइयों के निशाने पर थी?
बिल्कुल। संभल जामा मस्जिद की उत्तरी दिशा में बाजार की ओर हिंदू आबादी है, जिनकी सुरक्षा के लिए पुलिस-प्रशासन को स्पष्ट निर्देश दिया गया था। अगर 24 नवंबर 2024 को हिंसा केवल पुलिस और दंगाइयों तक सीमित नहीं होता, तो यह हिंदू आबादी की तरफ बढ़ता। पुलिस की सक्रियता और हिंसक स्थिति को जामा मस्जिद की 3 दिशाओं (जिधर-जिधर मुस्लिम आबादी है) में नियंत्रित कर लेने के कारण हिंसा सांप्रदायिक दंगा में नहीं बदल पाया।
दंगाइयों की शुरुआती प्लानिंग थी मस्जिद में प्रवेश करना। इसके बाद सर्वेक्षण करने आई टीम (जिसमें सभी हिंदू ही थे) की हत्या करना। मस्जिद के मुख्य द्वार के पास से ही जो रास्ता जाता है, वो हिंदू आबादी की ओर जाता है। अगर दंगाई मस्जिद में प्रवेश कर जाते, वहाँ सर्वे टीम पर हमला कर देते तो उनका अगला निशाना हिंदू बस्ती ही थी। इसे रोकने के लिए पुलिस ने एक बफर जोन (मजबूत बैरिकेडिंग और पर्याप्त पुलिस बल की तैनाती) बनाया, जिससे दंगाइयों को हिंदू क्षेत्रों में प्रवेश करने से रोका गया। पुलिस-प्रशासन के लिए इस बफर जोन ने दो-तरफा काम किया। एक – दंगाई हिंदुओं पर हमला नहीं कर सके। दूसरा – दंगा नियंत्रित करने के साथ-साथ जब सर्वेक्षण टीम को मस्जिद से सकुशल वापस संभल थाना भेजने की बारी आई, तो यही एकमात्र रास्ता काम आया। पुलिस ने सर्वे पूरा होने के बाद पूरी टीम को शाही जामा मस्जिद से धीमरों वाली गली (हिंदू मोहल्ला) के माध्यम से सरथल चौकी तक सुरक्षित निकाला था।
“या तो वे (मुस्लिम) रहेंगे या हिंदू संभल में रहेंगे।”
पुलिस-प्रशासन ने हिंदुओं की सुरक्षा के लिए इतने कड़े इंतजाम क्यों किए थे, इसके लिए आपको ऊपर का बयान दोबारा पढ़ना होगा। आयोग ने वर्ष 1936-37 से लेकर 2024 तक संभल में हुए 15 बड़े सांप्रदायिक दंगों का भी जिक्र अपनी रिपोर्ट में किया है। OpIndia ने संभल में 1924 से लेकर 2024 तक के 16 दंगों पर रिपोर्ट बनाई है। इसके कारण हिंदुओं का पलायन, मुस्लिम आबादी का बेतहाशा बढ़ना, संभल में आतंकी गतिविधियाँ (जिसमें विदेशी कनेक्शन और अलकायदा जैसों की घुसपैठ तक शामिल) भी रिकॉर्ड में दर्ज है। इसलिए पुलिस ने सिर्फ शक के आधार पर हिंदू आबादी की सुरक्षा के लिए पुख्ता इंतजाम नहीं किए थे बल्कि इसके पीछे ठोस सबूत थे।
2024 का संभल दंगा सुनियोजित साजिश के तहत अंजाम दिया गया था। जामा मस्जिद का सर्वेक्षण सिर्फ एक ट्रिगर पॉइंट था, लेकिन यह एकमात्र पहलू था, ऐसा नहीं है। राजनीति, वर्चस्व, गैंग-वसूली, तुर्क-पठान, हिंदू-घृणा आदि तत्वों ने इस दंगे के लिए खाद-बीज का काम किया। समय रहते अगर इसे नियंत्रित नहीं किया गया होता राज्यव्यापी सांप्रदायिक दंगों में यह तब्दील हो जाता।


