भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से खिंच रही ट्रेड डील अब अपने आखिरी मुकाम पर पहुँच गई है। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने साफ कर दिया है कि बातचीत लगभग पूरी हो चुकी है और अब कोई भी ‘अटकाने’ वाला मुद्दा नहीं बचा है। हालाँकि, अमेरिकियों का मिजाज कब बदल जाए, इसका कोई भरोसा नहीं है, क्योंकि पिछले साल ही ट्रंप ने रूसी तेल खरीदने के नाम पर भारत पर 50% का भारी टैरिफ ठोक दिया था। इसके बावजूद, पीयूष गोयल का कहना है कि भारत अब कमजोरी से नहीं बल्कि ‘पावर’ के साथ टेबल पर बैठता है।
डील की 5 बड़ी खास बातें
पीयूष गोयल ने 5 मुख्य बातों को कहा जिसमें, भारत-अमेरिका ट्रेड डील क्लोजिंग के करीब पहुँच चुकी है। कोई डेडलाइन नहीं, संतुलन सबसे जरूरी बताया। EU-UK डील से भारत मजबूत पोजिशन में पहुँच गया है। मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट को बड़ा फायदा होगा। अमेरिका के साथ डील में पूरी सतर्कता को बताया।
सारे पेंच सुलझे, अब रास्ता साफ- भारत और अमेरिका के बीच अब कोई भी ‘स्टिकी इश्यू’ (पेचीदा मुद्दा) बाकी नहीं बचा है। पहले कई ऐसी शर्तें थीं जिन पर दोनों देश अड़े हुए थे, लेकिन अब बातचीत उस मोड़ पर पहुँच गई है जहाँ सिर्फ फाइनल मुहर लगना बाकी है। इसका मतलब है कि व्यापार के रास्ते में जो भी बड़े रोड़े थे, उन्हें आपसी समझबूझ से हटा दिया गया है।
डेडलाइन नहीं, संतुष्टि है जरूरी- इस डील की सबसे अनोखी बात यह है कि सरकार किसी हड़बड़ी या डेडलाइन में नहीं है। पीयूष गोयल का कहना है कि हम तारीख देखकर डील नहीं करते। जब भारत और अमेरिका, दोनों ही पक्ष शर्तों से पूरी तरह संतुष्ट हो जाएँगे, तभी इसकी तारीख का ऐलान किया जाएगा। यानी सरकार जल्दबाजी में कोई ऐसा समझौता नहीं करना चाहती जिससे बाद में देश के हितों को नुकसान पहुँचे।
2047 की महाशक्ति वाला तेवर- भारत अब दुनिया के सामने गिड़गिड़ाने वाली स्थिति में नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी की रणनीति साफ है- हम आज की $4 ट्रिलियन वाली इकोनॉमी के आधार पर नहीं, बल्कि 2047 की $30 ट्रिलियन वाली ताकत के तौर पर बातचीत कर रहे हैं। दुनिया देख रही है कि आने वाले समय में भारत सबसे बड़ा बाजार होगा और इसी ‘फ्यूचर वैल्यू’ की वजह से अमेरिका जैसे देश अब भारत की शर्तों को गंभीरता से ले रहे हैं।
टैरिफ के कड़वे अनुभवों से सीख- पिछले साल ट्रंप प्रशासन ने रूसी तेल खरीदने के मुद्दे पर भारत पर 50% का भारी टैरिफ लगा दिया था, जिसने रिश्तों में कड़वाहट पैदा कर दी थी। लेकिन अब इस ‘टैरिफ वॉर’ को पीछे छोड़कर दोस्ती का नया अध्याय लिखने की कोशिश हो रही है। इस डील का एक बड़ा मकसद उन पुरानी रुकावटों को खत्म करना और व्यापारिक बाधाओं को कम करना है ताकि दोनों देशों के बीच बिजनेस फिर से रफ़्तार पकड़ सके।
लोकल मैन्युफैक्चरिंग को मिलेगी नई जान- इस डील का सबसे बड़ा फायदा भारत के कारखानों और मजदूरों को होगा। खासकर टेक्सटाइल (कपड़ा उद्योग) जैसे क्षेत्रों के लिए यह किसी वरदान से कम नहीं है। अमेरिका के साथ व्यापार आसान होने से भारत में मैन्युफैक्चरिंग को जबरदस्त बूस्ट मिलेगा। जब हमारे प्रोडक्ट पर ड्यूटी (टैक्स) कम लगेगी, तो भारत का बना सामान अमेरिकी बाजारों में छा जाएगा, जिससे देश में रोजगार के लाखों नए अवसर पैदा होंगे।
जोर किस बात पर है?
पीयूष गोयल का पूरा जोर इस बात पर है कि भारत अब किसी भी देश के साथ ‘दबकर’ समझौता नहीं करेगा। उन्होंने साफ किया कि पीएम मोदी की लीडरशिप में भारत अब एक ‘रिस्पेक्टेड’ देश है। अब हम बराबर के स्तर पर बैठकर बात करते हैं। गोयल ने बताया कि हम आज के हालात नहीं, बल्कि भविष्य की जरूरतों को देखकर फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) कर रहे हैं। दुनिया भारत के टैलेंट और पॉलिटिकल स्थिरता की कायल है, इसलिए अब वो खुद हमारे साथ बिजनेस करने को बेताब हैं।
ब्रिटेन-यूरोप के बाद अब अमेरिका की बारी
ब्रिटेन और यूरोपीय संघ (EU) के साथ ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ करने के बाद अब भारत का पूरा फोकस अमेरिका पर है। गोयल ने बताया कि जर्मनी जैसे बड़े देश भी मान रहे हैं कि भारत के साथ बाजार खोलना दुनिया के हित में है। हालाँकि, अमेरिका के मामले में थोड़ी सावधानी जरूरी है। ट्रंप प्रशासन ने बीच में काफी सख्ती दिखाई थी, लेकिन अब पर्दे के पीछे बातचीत फिर से पटरी पर है।

