एथेनॉल बनाने के नाम पर MP में ₹1160 करोड़ का चावल घोटला, प्लांट्स की बजाय राइस मिलों तक पहुँचा अनाज: 4 गिरफ्तार, SIT ने 40 से की पूछताछ

मध्य प्रदेश में एथेनॉल उत्पादन के नाम पर सरकारी फोर्टिफाइड चावल के दुरुपयोग का बड़ा मामला सामने आया है। आरोप है कि सरकार ने जिस चावल को रियायती दर पर एथेनॉल बनाने के लिए प्लांट्स को दिया था, उसे उत्पादन में इस्तेमाल करने के बजाय राइस मिलों तक पहुँचा दिया गया।

राइस मिलों ने उसी चावल को सरकारी चावल बताकर फिर से सरकार को सप्लाई कर दिया और जिस धान से चावल बनाना था, उसे बाजार में बेचकर अलग से कमाई कर ली। यानी एक ही सरकारी चावल का कई बार इस्तेमाल दिखाकर सरकार को करोड़ों रुपए का नुकसान पहुँचाने का आरोप है।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, इस पूरे मामले में एथेनॉल प्लांट संचालकों, राइस मिलर्स, ट्रांसपोर्टर्स और कुछ सरकारी अधिकारियों की भूमिका भी जाँच के दायरे में है।

एथेनॉल नीति की आड़ में फोर्टिफाइड चावल के दुरुपयोग का आरोप

सरकार अतिरिक्त अनाज के सुरक्षित उपयोग और एथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से गोदामों में मौजूद चावल एथेनॉल प्लांट्स को रियायती दर पर उपलब्ध कराती है। जिस चावल की खरीद, भंडारण और प्रोसेसिंग पर सरकार का खर्च करीब 3,900 से 4,000 रुपए प्रति क्विंटल आता है, उसे प्लांट्स को लगभग 2,320 रुपए प्रति क्विंटल में दिया जाता है।

आरोप है कि इसी व्यवस्था का फायदा उठाकर बड़ी मात्रा में फोर्टिफाइड चावल एथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल होने के बजाय दोबारा राइस मिलों और सरकारी आपूर्ति श्रृंखला में पहुँच गया। बताया जा रहा है कि एक वर्ष में एथेनॉल प्लांट्स को करीब 50 लाख क्विंटल चावल आवंटित किया गया था, जिसकी कुल कीमत लगभग 1,160 करोड़ रुपए आँकी जा रही है।

तीन ट्रकों से खुला पूरा मामला, SIT ने संभाली जाँच

मामले का खुलासा तब हुआ जब 2 जून 2026 को बालाघाट के नवेगांव वेयरहाउस से छिंदवाड़ा जिले के बोरगाँव स्थित एवीजे एथेनॉल प्लांट के लिए भेजे गए तीन ट्रकों की जाँच की गई। यह चावल एथेनॉल उत्पादन के लिए भेजा गया था लेकिन अगले ही दिन एक ट्रक बालाघाट की संचेती राइस मिल में मिला जबकि बाकी दो ट्रक भी निर्धारित प्लांट तक नहीं पहुँचे।

घटना के बाद पुलिस की स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) ने जाँच शुरू की। अब तक 40 से अधिक लोगों से पूछताछ की जा चुकी है, चार आरोपितों की गिरफ्तारी हुई है और 12 ट्रक जब्त किए गए हैं। जाँच का दायरा बालाघाट, छिंदवाड़ा और सिवनी से आगे बढ़ाकर प्रदेश के अन्य एथेनॉल प्लांट्स और कस्टम मिलिंग करने वाली राइस मिलों तक बढ़ा दिया गया है।

जाँच में सामने आया नेटवर्क, कई पक्षों की भूमिका पर सवाल

जाँच एजेंसियों के अनुसार, एथेनॉल प्लांट संचालक सरकार से रियायती दर पर फोर्टिफाइड चावल प्राप्त करते थे, जबकि खुले बाजार में एथेनॉल उत्पादन के लिए इस्तेमाल होने वाला ब्रोकन राइस इससे भी कम कीमत पर उपलब्ध है। आरोप है कि इसी कारण फोर्टिफाइड चावल को एथेनॉल बनाने के बजाय अधिक कीमत पर राइस मिलर्स को बेच दिया जाता था।

इसके बाद राइस मिलर्स कथित तौर पर नए बारदाने में पैक कर इस चावल को कस्टम मिलिंग के चावल के रूप में सरकारी गोदामों में जमा कर देते थे। इससे उन्हें धान की मिलिंग का खर्च बचने के साथ-साथ मिलिंग शुल्क का लाभ भी मिलता था, जबकि मिलिंग के लिए मिला धान खुले बाजार में बेचकर अतिरिक्त मुनाफा कमाने की आशंका भी जताई गई है।

जाँच में भारतीय खाद्य निगम (FCI) के कुछ अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठे हैं। नियमों के मुताबिक एथेनॉल के लिए पहले से गोदामों में रखा पुराना चावल (FIFO प्रणाली) आवंटित किया जाना चाहिए, लेकिन आरोप है कि इसके बजाय नया फोर्टिफाइड चावल जारी किया गया।

अधिकारियों के अलग-अलग दावे, करोड़ों की हेराफेरी की आशंका

बालाघाट कलेक्टर मृणाल मीणा का कहना है कि उन्हें सूचना मिली थी कि FCI के गोदाम से निकलने वाला एथेनॉल प्लांट्स की जगह चावल राइस मिलर्स तक पहुँच रहा है, जिसके बाद जाँच शुरू की गई। FCI की स्थानीय क्वालिटी कंट्रोल शाखा का कहना है कि गोदाम से चावल जारी करने तक सभी निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन किया गया और उसके बाद चावल कहाँ गया, इसकी जिम्मेदारी FCI की नहीं है।

FCI के अधिकारियों का अनुमान है कि यदि एक वर्ष में आवंटित 50 लाख क्विंटल चावल का बड़ा हिस्सा खुले बाजार में बेचा गया है, तो करीब 250 करोड़ रुपए की वित्तीय हेराफेरी हो सकती है। वहीं एथेनॉल प्लांट एसोसिएशन के एक पदाधिकारी ने भी स्वीकार किया कि कुछ मामलों में सरकारी चावल प्लांट्स तक पहुँचने के बजाय राइस मिलर्स तक गया हो सकता है।