‘काफिरों को दोस्त बनाने वाला मुसलमान नहीं’: अफगानिस्तान की भारत से दोस्ती से बौखलाया पाकिस्तान, तालिबान को बताया RSS-BJP का ‘सेवक’

पाकिस्तान फौज के इंटर-सर्विसेज पब्लिक रिलेशंस (DG ISPR) के महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ चौधरी ने रावलपिंडी में आयोजित एक आधिकारिक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अफगानिस्तान और भारत के संबंधों को लेकर विवादित बयान दिया।

यह बयान उस समय आया, जब उनसे भारत दौरे पर आए अफगानिस्तान की तालिबान सरकार के एक मंत्री की उस टिप्पणी पर सवाल पूछा गया, जिसमें उन्होंने कहा था कि भारत और अफगानिस्तान ‘एक ही DNA साझा करते हैं‘ और दोनों देशों के बीच निकटता की बात कही थी।

News 18 की रिपोर्ट के अनुसार, इस पर प्रतिक्रिया देते हुए चौधरी ने कुरान की एक आयत का हवाला दिया और कहा, “अल्लाह ने स्पष्ट किया है कि मुसलमानों को काफिरों को अपना दोस्त नहीं बनाना चाहिए। यदि कोई ऐसा करता है, तो वह मुसलमानों में नहीं रहता।” उनके इस बयान का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया और इसे लेकर विवाद छिड़ गया।

अफगान मंत्री के DNA वाले बयान को लेकर लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ चौधरी ने कहा, “मौलवी साहब जज्बात में आ गए… इनका DNA एक है, लेकिन दोनों के बीच में जो ताल्लुक है वो मास्टरस्लेव का है, बीजेपी, आऱएसएस और तालिबान के बीच मास्टरस्लेव का रिश्ता है। तालिबान रिजीम उनकी गुलाम है।”

RSS-भाजपा पर लगाए आरोप, भारत पर भी साधा निशाना

प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान चौधरी ने भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर भी निशाना साधा। उन्होंने दावा किया, “भारतीय भाजपा या RSS और तालिबान शासन के बीच मालिक और गुलाम का रिश्ता है। भारत में जो व्यवस्था है, वह उनका मालिक है और वे उसके सेवक हैं। RSS और तथाकथित हिंदू राष्ट्र मुसलमानों और कश्मीरियों पर अत्याचार कर रहा है और तालिबान शासन उसी एजेंडे की सेवा कर रहा है। यह किस तरह का इस्लाम है? वे इससे भी बड़ा नुकसान कर रहे हैं।”

प्रेस कॉन्फ्रेंस का मुख्य विषय आतंकवाद-रोधी अभियान, बलूचिस्तान की स्थिति, पाकिस्तान-अफगानिस्तान संबंध और भारत पर आतंकवादी गतिविधियों को समर्थन देने के पाकिस्तान के आरोप थे। पाकिस्तान लंबे समय से भारत पर ऐसे आरोप लगाता रहा है, जबकि भारत लगातार इन्हें सिरे से खारिज करता आया है।

खुफिया सूत्रों का दावा- आंतरिक चुनौतियों से ध्यान भटकाने की कोशिश

शीर्ष खुफिया सूत्रों के अनुसार, चौधरी की इन टिप्पणियों को पाकिस्तान के भीतर बढ़ती चुनौतियों से ध्यान हटाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में बढ़ती हिंसा, चीन समर्थित चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) परियोजनाओं की सुरक्षा को लेकर चिंताओं और देश की आंतरिक अस्थिरता के बीच ऐसे बयान दिए गए हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान अब तक भारत के खिलाफ लगाए गए आतंकवाद संबंधी आरोपों के समर्थन में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई विश्वसनीय साक्ष्य पेश नहीं कर पाया है। उनका कहना है कि भारत पर आरोप लगाने की यह रणनीति घरेलू समस्याओं की जिम्मेदारी बाहरी शक्तियों पर डालने की व्यापक कोशिश का हिस्सा है।

साथ ही ‘फितना अल-हिंदुस्तान’ जैसे शब्दों के इस्तेमाल को राजनीतिक और कानूनी आधार तैयार करने की रणनीति के रूप में भी देखा जा रहा है, ताकि आंतरिक आलोचकों के खिलाफ कार्रवाई को उचित ठहराया जा सके और पाकिस्तान की सुरक्षा चुनौतियों के लिए भारत तथा अफगानिस्तान को जिम्मेदार ठहराया जा सके।