13 साल का सपना, पूरा होने से पहले ही धू-धू कर जला: जानिए क्यों राजस्थान के पचपदरा रिफाइनरी का PM मोदी को दोबारा करना पड़ा था शिलान्यास, अब ठीक होने में लगेंगे 4 महीने

राजस्थान के बलोतरा जिले के पचपदरा क्षेत्र स्थित रिफाइनरी में सोमवार (20 अप्रैल 2026) को आग लग गई। यह हादसा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मंगलवार (21 अप्रैल 2026) को रिफाइनरी का प्रस्तावित उद्घाटन समारोह से एक दिन पहले हुआ। हादसे के बाद प्रधानमंत्री का दौरा स्थगित हो गया।

रिफाइनरी प्रबंधन और पेट्रोलियम मंत्रालय के मुताबिक, यह आग रिफाइनरी के सबसे अहम हिस्से क्रूड डिस्टिलेशन यूनिट (CDU) के पास लगी, जो किसी भी तेल रिफाइनरी का मुख्य प्रोसेसिंग यूनिट होता है। शुरुआती जाँच में यह सामने आया कि तकनीकी गड़बड़ी के कारण हीट एक्सचेंजर सिस्टम में किसी वाल्व या फ्लैंज से हाइड्रोकार्बन का रिसाव हुआ, जिससे आग लग गई। रिफाइनरी को ठीक होने में अभी 4 महीने लगेंगे।

रिफाइनरी का बयान

रिफाइनरी प्रबंधन ने अपने बयान में स्पष्ट किया कि घटना के तुरंत बाद इमरजेंसी रिस्पॉन्स सिस्टम सक्रिय कर दिया गया था और फायर सेफ्टी टीम ने तेजी से कार्रवाई करते हुए आग पर काबू पा लिया। इस पूरी घटना में राहत की बात यह रही कि किसी भी कर्मचारी या व्यक्ति की जान नहीं गई और न ही कोई गंभीर रूप से घायल हुआ। सुरक्षा के लिहाज से CDU, वैक्यूम डिस्टिलेशन यूनिट (VDU) और अन्य संबंधित इकाइयों को तुरंत आइसोलेट कर दिया गया, ताकि आग फैलने का खतरा खत्म हो सके।

रिफाइनरी की खासियत

बालतोरा जिले के पचपदरा में बन रही HPCL राजस्थान रिफाइनरी लिमेटिड देश की सबसे जरूरी और बड़ी ग्रीनफील्ड रिफाइनरी परियोजनाओं में से एक है, जिसे राजस्थान सरकार और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (HPCL) ने मिलकर विकसित किया है।

यह परियोजना न केवल एक रिफाइनरी है, बल्कि एक इंटीग्रेटेड रिफाइनरी-कम-पेट्रोकेमिकल कॉम्पलेक्स है, जिसका उद्देश्य कच्चे तेल का प्रोसेस करके उच्च गुणवत्ता वाले पेट्रोल, डीजल और अन्य पेट्रोकेमिकल उत्पाद तैयार करना है। इसकी उत्पादन क्षमता लगभग 9 मिलियन मीट्रिक टन प्रति वर्ष रखी गई है, जबकि इसके साथ पेट्रोकेमिकल उत्पादन की भी बड़ी क्षमता जोड़ी गई है, जिससे यह परियोजना औद्योगिक दृष्टि से और भी महत्वपूर्ण बन जाती है।

रिफाइनरी का इतिहास

पचपदरा में बनी HPCL राजस्थान रिफाइनरी लिमिटेड रिफाइनरी की यह परियोजना शुरुआत से ही राजनीतिक और प्रशासनिक बदलावों के चलते देरी का शिकार रही। इसकी कहानी असल में 2008 से शुरू होती है, जब इस प्रोजेक्ट का ऐलान हुआ था। लेकिन जमीन पर काम लंबे समय तक शुरू ही नहीं हो पाया। इसकी सबसे बड़ी वजह राज्य सरकार और कंपनी के बीच टैक्स छूट जैसे मुद्दों पर सहमति न बन पाना था, जिस कारण प्रोजेक्ट सालों तक अटका रहा।

इसके बाद केंद्र में UPA की सरकार के समय 22 सितंबर 2013 को कॉन्ग्रेस की सोनिया गाँधी के नेतृत्व में इसकी आधारशिला रखी गई। लेकिन नींव रखने के बाद भी काम उस स्पीड से आगे नहीं बढ़ पाया जैसा उम्मीद था। उस समय इसकी अनुमानित लागत करीब 37 हजार करोड़ रुपए तय की गई थी और इसे राजस्थान के विकास के बड़े प्रोजेक्ट के रूप में देखा जा रहा था।

रिफाइनरी के काम में क्यों हुई देरी?

हालाँकि, 2014 में केंद्र सरकार बदलने के बाद इस परियोजना को दोबारा देखा गया कि यह आर्थिक रूप से कितना सही है, इसकी लागत कितनी बढ़ेगी और इसे किस मॉड पर चलाया जाए। यही वो समय था जब प्रोजेक्ट प्रैक्टिकली धीमा पड़ गया। नई सरकार ने इसमें कई बदलाव सुझाए और जब तक सब चीजें फाइनल नहीं हुईं, तब तक काम आगे नहीं बढ़ सका। इसी देरी का सीधा असर लागत पर पड़ा। शुरुआत में जो लागत कम रखी गई थी, वो धीरे-धीरे बढ़ने लगी।

फिर 16 जनवरी 2018 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस प्रोजेक्ट को दोबारा लॉन्च किया। लेकिन इस बार इसे सिर्फ एक साधारण रिफाइनरी नहीं रखा गया, बल्कि इसे एक बड़े रिफाइनरी-कम-पेट्रोकेमिकल कॉन्पलेक्स के रूप में विकसित करने का फैसला लिया गया। यानी प्रोजेक्ट का स्कोप बढ़ा दिया गया- नई यूनिट्स जोड़ी गईं, टेक्नोलॉजी अपग्रेड की गई और पेट्रोकेमिकल प्रोडक्शन को भी इसमें शामिल कर दिया गया।

सीधे शब्दों में समझे तो यह प्रोजेक्ट इसीलिए डिले हुआ क्योंकि शुरुआत में ही नीतिगत और वित्तीय मुद्दे क्लियर नहीं थे, सरकार बदलने के बाद इसे फिर से डिजाइन करना पड़ा औऱ बाद में जब इसे बड़े लेवल पर अपग्रेड किया गया तो समय और पैसा दोनों ज्यादा लग गया। लेकिन 2018 के बाद इसमें तेजी आई और यह धीरे-धीरे पूरा होने के करीब पहुँच गया। हालाँकि, हाल की आग की घटना के कारण इसका उद्घटान फिर से टल गया है।