सिर्फ ‘गाली’ देने से नहीं लगेगा SC/ST एक्ट: सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में किया साफ, कहा- जाति को निशाना बनाया गया या नहीं, ये स्पष्ट होना जरूरी

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि अगर किसी अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के व्यक्ति को गाली दी जाती है, तो सिर्फ गाली देने से ही SC/ST एक्ट के तहत अपराध नहीं बन जाता। इसके लिए यह साफ होना जरूरी है कि ‘गाली’ उस व्यक्ति को उसकी जाति के आधार पर अपमानित करने के इरादे से दी गई हो।

यह फैसला बिहार के एक मामले में सुनाया गया है, जहाँ केशव महतो नाम के एक व्यक्ति पर आरोप था कि उसने एक आँगनवाड़ी केंद्र में अनुसूचित जाति के व्यक्ति को गाली दी। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उसके खिलाफ चल रही आपराधिक कार्रवाई को रद्द कर दिया।

कोर्ट ने कहा कि न तो FIR में और न ही चार्जशीट में यह बात लिखी गई थी कि केशव महतो ने शिकायतकर्ता को उसकी जाति की वजह से गाली दी थी या उसे जाति के नाम पर अपमानित किया था। इसी वजह से कोर्ट ने माना कि इस मामले में SC/ST एक्ट लागू नहीं होता है।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला

मामले में सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने फैसला सुनाया। पीठ ने SC/ST एक्ट की धारा 3(1) ‘र’ का हवाला देते हुए साफ किया कि इस कानून के तहत किसी को दोषी ठहराने के लिए दो जरूरी बातों पर ध्यान दिया जाना जरूरी है। पहली बात, शिकायत करने वाला व्यक्ति अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से होना चाहिए।

दूसरी बात, दी गई गाली या किया गया अपमान साफतौर पर उसकी जाति की वजह से किया गया हो। कोर्ट ने कहा किसी मामले में अपराध तभी बनता है, जब यह साबित हो कि आरोपित ने जानबूझकर पीड़ित को सिर्फ इस वजह से अपमानित किया या डराया, क्योंकि वह अनुसूचित जाती या जनजाति से आता है।

इस मामले में केशव महतो ने पटना हाई कोर्ट के फरवरी 2025 के उस आदेश की सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के उस फैसले में दखल देने से इनकार किया था, जिसमें महतो को समन जारी किया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दोनों ट्रायल कोर्ट और पटना हाई कोर्ट से गलती हुई, क्योंकि FIR में कहीं भी जाति के आधार पर गाली देने या धमकाने का आरोप नहीं था। बावजूद SC/ST एक्ट के तहत केस चलने दिया गया।