‘POCSO एक्ट में बच्चों को मोहरा न बनाएँ’: शादी के झगड़ों में कानून के दुरुपयोग पर सुप्रीम कोर्ट ने जताई चिंता, कहा- झूठे केस से निर्दोष लोग हो रहे परेशान

सुप्रीम कोर्ट ने पारिवारिक झगड़ों और आपसी विवादों में बच्चों से जुड़े पॉक्सो (POCSO) कानून के गलत इस्तेमाल पर गहरी चिंता जताई है। अदालत ने कहा है कि पति-पत्नी के आपसी विवादों, पैसों के लेन-देन या व्यापारिक दुश्मनी में पॉक्सो एक्ट को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करने का चलन तेजी से बढ़ रहा है।

जस्टिस बीवी नागरथना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने साफ चेतावनी दी है कि कानून का ऐसा गलत इस्तेमाल निर्दोष लोगों को बर्बाद करता है और अदालतों पर बोझ बढ़ाता है। सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में पति और उसके परिवार के खिलाफ दर्ज पॉक्सो और रेप समेत 10 से ज्यादा मामलों को पूरी तरह से रद्द (Quash) करते हुए यह फैसला सुनाया।

कोर्ट ने कहा कि जब रिश्तों में कड़वाहट आती है, तो लोग बदला लेने के लिए इस गंभीर कानून का सहारा लेने लगते हैं, जो कि बेहद खतरनाक है। आइए समझते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में क्या-क्या बड़ी बातें कहीं हैं।

‘मैट्रीमोनियल बुके’: शादी के झगड़े में हर तरह की धाराएँ लगाने का चलन

अदालत ने कहा कि आज के समय में जब पति-पत्नी का झगड़ा होता है, तो एक पूरा ‘बुके’ (गुलदस्ता) तैयार कर दिया जाता है। इसमें दहेज प्रताड़ना, घरेलू हिंसा, क्रूरता (498A) जैसी कई धाराएँ एक साथ लगा दी जाती हैं। अब इस लिस्ट में पॉक्सो और रेप जैसी गंभीर धाराओं को भी जोड़ा जाने लगा है।

अदालत ने पाया कि ऐसे मामलों में पूरे परिवार को फँसाने की कोशिश होती है। बिना किसी ठोस सबूत या तारीख के, घर के बूढ़े और बीमार रिश्तेदारों का नाम भी शिकायत में लिखवा दिया जाता है। कोर्ट ने इसे केवल परेशान करने और दबाव बनाने की रणनीति बताया है।

‘सबसे गंदा चलन’: माँ ही अपनी बेटियों को पिता के खिलाफ सिखाती है झूठ

जस्टिस नागरथना ने अपने फैसले में इसे कानूनी लड़ाई का ‘सबसे गंदा रूप’ (Uglier Trend) कहा है। कोर्ट ने कहा कि कई मामलों में पत्नियाँ अपने ही पति के खिलाफ शिकायत दर्ज करा देती हैं कि उसने अपनी ही नाबालिग बेटी के साथ गलत काम किया है।

इस खेल के बीच में एक मासूम बच्चा फँस जाता है। माँ अपनी ही बेटी को उसके पिता के खिलाफ झूठ बोलना सिखाती है। ऐसा सिर्फ इसलिए किया जाता है ताकि पति से ज्यादा से ज्यादा पैसे ऐंठे जा सकें, बदला लिया जा सके या उसे जेल भिजवाकर मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा सके।

सिर्फ शादी ही नहीं, व्यापार और उधारी के विवाद में भी पॉक्सो का डर

सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि पॉक्सो कानून का यह गलत इस्तेमाल सिर्फ पति-पत्नी के झगड़ों तक ही सीमित नहीं है। आज के समय में पड़ोसियों की लड़ाई, जमीनी विवाद, बिजनेस की दुश्मनी और यहाँ तक कि उधारी के लेन-देन में भी इसका गलत फायदा उठाया जा रहा है।

पैसे डूबने पर या कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए लोग सामने वाले पर पॉक्सो का झूठा केस करने की धमकी देते हैं। डरा-धमका कर अपनी बातें मनवाने के लिए बच्चों के माता-पिता इस गंभीर कानून को एक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं।

वकीलों को नसीहत: समझौते के लिए झूठे केस दर्ज कराने की सलाह न दें

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने देश के वकीलों (Legal Practitioners) को भी अपनी जिम्मेदारी समझने की नसीहत दी है। कोर्ट ने कहा कि वकीलों को अपने मुवक्किलों (क्लाइंट्स) को ऐसे झूठे और मनगढ़ंत केस दर्ज करने से रोकना चाहिए।

अदालत ने कहा कि सिर्फ विपक्षी पार्टी पर समझौते का दबाव बनाने के लिए ऐसी गंभीर धाराएँ लगवाने की सलाह देना बिल्कुल गलत है। इससे अदालतों में केसों की बाढ़ आ जाती है और कोर्ट का कीमती समय बर्बाद होता है, जिससे सच्चे पीड़ितों को न्याय मिलने में देरी होती है।

रट्टू तोते की तरह बयान: हाईकोर्ट का फैसला पलटते हुए सुप्रीम कोर्ट ने क्या देखा?

इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने केस रद्द करने से इनकार कर दिया था, जिसके फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने पलट दिया। सुप्रीम कोर्ट ने जब शिकायतकर्ता माँ और बेटी के बयानों को देखा, तो वे चौंक गए। दोनों के बयान शब्द-ब-शब्द (Word by Word) बिल्कुल एक जैसे थे।

अदालत ने कहा कि यह बयानों की समानता नहीं है, बल्कि रट्टू तोते की तरह रटाया हुआ बयान है। साफ पता चलता है कि बच्ची को उसकी माँ और परिवार ने पूरी तरह सिखा-पढ़ाकर कोर्ट भेजा था। मेडिकल रिपोर्ट में भी कोई सबूत नहीं मिला था।

असली मामलों पर नहीं पड़ेगा असर, जज शुरुआत में ही करें कड़ी जाँच

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि उनकी इन टिप्पणियों का असर उन मामलों पर बिल्कुल नहीं पड़ेगा जो पूरी तरह सच और गंभीर हैं। बच्चों के साथ होने वाले असली अपराधों पर पुलिस और अदालतों को पूरी संवेदनशीलता और सख्ती से काम करना चाहिए।

हालाँकि, जजों को आदेश दिया गया है कि जब भी उनके सामने कोई ऐसा मामला आए, खासकर जो शादी के विवाद से जुड़ा हो, तो वे शुरुआत में ही उसकी गहरी जाँच करें। आँखों पर पट्टी बाँधकर हर आरोप को सच मान लेना सही नहीं है, क्योंकि एक छोटी सी गलती किसी निर्दोष का जीवन हमेशा के लिए तबाह कर सकती है।