उत्तर प्रदेश की राजनीति से जुड़ी एक बहुत बड़ी खबर सामने आ रही है। मंगलवार (4 अगस्त) को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय कैबिनेट बैठक की गई। इस बैठक में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के मुताबिक मदरसा शिक्षा बोर्ड अधिनियम के तहत दी जाने वाली उच्च डिग्रियाँ, यानी कामिल और फाजिल के नियमों में बदलाव करने पर गंभीर चर्चा हुई।
बैठक के दौरान उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा बोर्ड अधिनियम, 2004 में संशोधन करने का अहम प्रस्ताव रखा गया। इस कैबिनेट मीटिंग से ठीक पहले राज्य के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने बड़ा बयान दिया था। उन्होंने साफ कर दिया था कि अब मदरसों की तरफ से पहले मिलने वाली कामिल और फाजिल डिग्रियों की मान्यता पूरी तरह खत्म कर दी जाएगी।
क्या होती हैं कामिल और फाजिल की डिग्रियाँ?
बता दें कि कामिल अरबी, फारसी और इस्लामिक स्टडीज का तीन साल का कोर्स होता है। उत्तर प्रदेश मदरसा बोर्ड द्वारा दी जाने वाली इस कामिल डिग्री को पहले सामान्य ग्रेजुएशन यानी बीए (BA) के बराबर माना जाता था।
वहीं दूसरी तरफ, फाजिल, कामिल की पढ़ाई पूरी करने के बाद किया जाने वाला दो साल का एक एडवांस कोर्स होता था। मदरसा बोर्ड की तरफ से मिलने वाली इस फाजिल डिग्री को पोस्ट ग्रेजुएशन यानी एमए (MA) के बराबर मान्यता दी जाती थी, जिसे अब सरकार पूरी तरह समाप्त करने जा रही है।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद उठाया गया यह सख्त कदम
योगी सरकार की तरफ से कामिल और फाजिल डिग्री की मान्यता रद्द करने का यह प्रस्ताव पूरी तरह से सुप्रीम कोर्ट के आदेश के आधार पर लाया गया है। नवंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा अधिनियम 2004 की संवैधानिक वैधता को सही माना था। अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस पुराने फैसले को पलट दिया था जिसमें मदरसा एक्ट को असंवैधानिक बताया गया था।
हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया था कि मदरसे औपचारिक उच्च शिक्षा की डिग्रियाँ जैसे कामिल और फाजिल नहीं दे सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट का मानना था कि इस तरह की डिग्रियाँ यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन यानी यूजीसी (UGC) के नियमों और दायरे से बाहर आती हैं।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और शिक्षा व्यवस्था में सख्ती
मामले की सुनवाई करते हुए तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा था कि हाईकोर्ट का यह सोचना गलत था कि मदरसा कानून सेक्युलरिज्म का उल्लंघन करता है। सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक, मदरसा बोर्ड एक्ट का मुख्य मकसद मदरसों में पढ़ाई के स्तर को सुधारना और एक सही मानक तय करना था।
आपको बता दें कि इस साल जून 2026 में उत्तर प्रदेश बोर्ड ने राज्यभर के 465 सेल्फ-फिनांस स्कूलों की मान्यता को भी स्वतः समाप्त कर दिया था। राज्य सरकार शिक्षा व्यवस्था में पूरी पारदर्शिता लाने और नियमों का कड़ाई से पालन करवाने के लिए लगातार ऐसे बड़े फैसले ले रही है।

