Saturday, October 31, 2020
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धर्म और आस्था की आड़ में गुरमीत का फलता-फूलता साम्राज्य आख़िर किसकी देन है ?

गुरमीत के समर्थन में उमड़ा यह जनसैलाब एक दिन में नहीं बनता बल्कि इसकी प्रक्रिया बहुत ही धीमे होती है जो बेहद ख़तरनाक होती है।

डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम को एक विशेष सीबीआई की अदालत द्वारा गुरुवार (17 जनवरी 2019) को उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई गई। आजीवन कारावास की यह सज़ा इस बात का प्रमाण है कि धर्म और आस्था के नाम पर गुरमीत ने न सिर्फ़ भोले-भाले लोगों को बेवकूफ़ बनाया बल्कि उनकी श्रद्धा से खिलवाड़ भी किया। जबकि असलियत तो यह है कि ऐसे पाखंडी और धूर्त बाबा का धर्म, आस्था और श्रद्धा से कोई सरोकार ही नहीं होता।

सवाल यह है कि आख़िर ऐसी क्या वजह है जो एक बलात्कारी व्यक्ति की पूजा में तल्लीन लोग कैसे उनके पाखंड को समझ नहीं पाते? लोगों के पाँव में वो कौन-सी बेड़ियाँ पड़ जाती हैं जो गुरमीत जैसे शैतान का नाम, ‘राम और रहीम’ से जोड़ देते हैं। जबकि भक्ति के मायनों से गुरमीत जैसे लोग कोसों दूर रहते हैं।

अपने प्रिय बाबा के आगे नतमस्तक होने वाले लोग यह मान ही नहीं पाते कि उनके बाबा से भी कोई ग़लती, अपराध या गुनाह हो सकता है। यहाँ तक कि ऐसे ढोंगी बाबाओं के कुकर्मों से पर्दाफ़ाश होने के बावजूद भी उनके समर्थक न सिर्फ़ इस बात पर डटे रहते हैं कि उनका गुरू निर्दोष है बल्कि अपने प्रिय बाबा को दोषमुक्त करने के लिए उसके महिमामंडन से भी परहेज़ नहीं करते।

दरअसल, होता यह है कि जब लोग अपने जीवन में आए दु:खों और परेशानियों का भार उठाने में अक्षम हो जाते हैं तो वे अपनी समस्याओं के निदान के लिए इधर-उधर के उपाय आजमाने लग जाते हैं। ऐसे में लोगों को गुरमीत जैसे पाखंडी और भ्रमित करने वाले बाबा ही नज़र आते हैं जिसके बाद वो उनकी शरण में पहुँच जाते हैं। अपने बाबा से ऐसे लोगों को यह उम्मीद होती है कि वो कोई जादू की छड़ी घुमााएगा और झट से उनकी सभी समस्याओं को हल कर देगा। जबकि उनकी इस उम्मीद का कोई आदि-अंत नहीं होता।

यह सच है कि पवित्र और निश्छल मन भक्ति का आधार होता है, जिसके बलबूते असंभव भी संभव हो जाता है। बजाय अपनी इस अंदरुनी ताक़त को समझने के, अपनी समस्याओं से घिरे लोग गुरमीत का दामन थामते चलते हैं और स्वयं को बाबा के चरणों में समर्पित कर देते हैं, जिसका अंजाम यह होता है कि वे आँख मूँदकर उसी मार्ग पर चल पड़ते हैं जो उनका प्रिय बाबा उन्हें बताता है।

यही मार्ग ऐसे धूर्त बाबाओं की नींव रखता है। यह हमारी अंधभक्ति की देन ही है जिसके बलबूते ऐसे बाबाओं का विशाल साम्राज्य बन जाता है।

सच तो यह है कि इस धूर्त बाबा की शरण में अक्सर वो लोग जाते हैं जिनकी अपनी आस्था मज़बूत नहीं होती क्योंकि उन्हें लगता है कि भक्ति के इस मार्ग पर कोई उनकी मदद करे। मदद से मतलब है कि उन्हें वो मार्ग दिखाए जिसपर चलकर मनोकामना जल्दी पूरी होती हो। वैसे भी आज के दौर में लोग धैर्यवान होने की बजाय अधीर हो गए हैं जिन्हें अपने दु:ख का निदान तुरत-फुरत में चाहिए।

आस्था और मनगढ़ंत प्रपंच के बीच के फ़ासले को समझना आज के समय में बहुत ज़रुरी हो गया है, नहीं तो आने वाले समय में इसके परिणाम और भी भयंकर हो सकते हैं। अपने-अपने प्रिय बाबाओं के स्वागत-सत्कार में जुटा भीड़तंत्र यह समझने में लगभग असमर्थ है कि उनके यही प्रिय बाबा उनके सोचने-समझने की क्षमता को तो दिन-प्रतिदिन क्षीण करते ही जा रहे हैं, और साथ ही साथ उनकी बुद्धि व विवेक को भी हरते जा रहे हैं।

साल 2002 में गुरमीत पर आरोप लगाने वाली महिलाओं (साध्वियों) की एक चिट्ठी याद है जिसमें तत्कानीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से न्याय की याचनाभरी माँग की गई थी। उस चिट्ठी पर यदि ग़ौर फ़रमाएँ तो उसमें दोनों पीड़िताओं ने गुरमीत के ख़िलाफ़ शिक़ायत तो की ही थी साथ में यह भी लिखा था कि उनके माता-पिता उनकी नहीं सुनेंगे क्योंकि उन पर गुरमीत का बहुत अधिक प्रभाव है।

इसका सीधा मतलब है कि कहीं न कहीं पीड़िताओं को यह अंदेशा था कि यदि उन्होंने अपने ख़िलाफ़ हो रहे शोषण के बारे में अपने माता-पिता को बताया तो शायद वो उन पर यक़ीन ही नहीं करेंगे। यह डर जो दोनों महिलाओं में व्याप्त था उसका सीधा संबंध गुरमीत की बढ़ती लोकप्रियता, उसके बढ़ते साम्राज्य और उसके ख़ौफ़ से था।

आख़िर माता-पिता की आँखों पर वो कौन-सा पर्दा पड़ जाता है जो उन्हें अपनी ही संतानों को हाशिए पर ले जाता है? समर्थक रूपी उन माता-पिता को अपनी ही संतानों की वो चीत्कार क्यों नहीं सुनाई देती जो चीख़-चीख़ कर अपना हाल बताने को आतुर रहती है?

ऐसे में यह सवाल उठना लाज़मी हो जाता है कि ऐसे दुराचारी बाबा का क़द जो लगातार बढ़ता है, उसमें वो माता-पिता भी शामिल हैं जो अपनी अंधभक्ति के चलते समाज को ग़लत राह की दिशा में बढ़ाने का काम करते हैं। कल की तारीख़ में जिसे कोर्ट में दोषी करार दिया गया वो गुरमीत क्या कभी अकेला इतना सक्षम हो पाता कि वो इतने बड़े अपराधों को अंजाम तक पहुँचा देता। उसके इस अदम्य साहस के पीछे समाज का वो तबका भी दोषी है जो इन बाबाओं को इतना फलने-फूलने का अवसर दे देते हैं।

पिछले साल घटित उस दौर को याद कीजिए जब गुरमीत पर दोष सिद्ध हो गया था और उसके समर्थकों ने जो हंगामा किया था जिसमें कई शहरों और क़स्बों में तांडव मचाया गया था, वाहनों को फूँका गया था, तोड़फोड़ समेत सुरक्षाबलों से कई हिंसक झड़पें भी हुई थी और दर्जनों लोग हिंसा की भेंट भी चढ़ गए थे। क्या वो विध्वंसकारी घटना भूलाई जा सकती है, उसका ज़िम्मेदार क्या अकेला गुरमीत ही है?

बाबा के समर्थकों द्वारा इस भारी विरोध की बुनियाद आख़िर इतनी मज़बूत कब और कैसे होती चली गई, यह एक बड़ा प्रश्न है। यह वास्तव में गहन चिंता का विषय भी है। इस तरह का प्रदर्शन करना क्या उन लोगों पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाता जो ऐसे आडंबरी बाबा का बचाव करते नहीं थकते। घोर निंदा के पात्र को बड़ी शान से सिर पर बिठाना क्या वास्तव में न्यायसंगत है ?

गुरमीत के समर्थन में उमड़ा यह जनसैलाब एक दिन में नहीं बनता बल्कि इसकी प्रक्रिया बहुत ही धीमे होती है जो बेहद ख़तरनाक होती है। यह कारवाँ यूँ ही नहीं बनता चला जाता बल्कि इसके पीछे एक सोची-समझी रणनीति काम कर रही होती है, जिसके जाल में वो लोग फँसते हैं जो आस्था, प्रेम, विश्वास और श्रद्धा-भाव के असली मायनों को समझने से कोसों दूरी पर होते हैं।

गुरमीत के नाम को राम और रहीम से जोड़ने पर ऐसे लोगों को कोई परहेज़ नहीं होता क्योंकि उनके लिए इनके बीच के अंतर को समझना बेहद जटिल काम होता है। इसके लिए शुद्ध और शांत मन की ज़रुरत होती है न कि एक झटके में सब कुछ पा लेने की असीम चाहत।

फ़िलहाल, आज के दौर में अपने मन को टटोल कर यह देखने का प्रयास करने की ज़रुरत है कि बाबाओं द्वारा रचे गए इस आडंबरी खेल का मक़सद केवल और केवल उन मासूमों की आस्था पर कब्जा करना होता है जिन्हें वो आसानी से भ्रमित कर सकें।

गुरमीत के भक्तों की संख्या लाखों में है, जिनमें से ज़्यादातर लोग ग़रीब और पिछड़ी जातियों से संबंध रखते हैं, जो सही सूचना के अभाव में सही और ग़लत के भेद को समझने में कुछ स्तर पर असमर्थ होते हैं। ये समर्थक या भक्त अपने गुरू के भड़कीले वस्त्र पहनने और भड़कीले अभिनेता के कुरूप को भी सहजता से स्वीकार कर लेते हैं। यहाँ तक कि अपने प्रिय बाबा को ‘चमकीला बाबा’ कहने से भी ग़ुरेज नहीं करते और उसकी रॉकस्टार और फ़िल्मस्टार की छवि भी लोगों को ख़ूब भाती है।

अपने प्रिय बाबा की इसी दोहरी छवि की दुहाई देते नहीं थकते उनके समर्थक, जोकि असल में अनेकों विकृतियों से परिपूर्ण चेहरा है। हमें इस दिशा में आज एक ऐसे ठोस क़दम उठाने की आवश्यकता है जिसमें गुरमीत के इस बहरुपिए वाले स्वरूप को एक सिरे से नकारा जाए और उसके इस बनावटी अस्तित्व का पुरज़ोर विरोध किया जाए। विश्वास-अंधविश्वास के बीच अंतर को समझा जाए, जिससे आस्था और प्रेम के नाम पर होने वाली ठगी से ग़रीब जनता को बचाया जा सके।

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