Thursday, September 24, 2020
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26 जनवरी विशेष: क्या है राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद? जानिए भारत जैसे देश के लिए इसकी अहमियत

अक्टूबर 2018 में भारत सरकार ने NSCS का पुनर्गठन करते हुए उसमें तीन डिप्टी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नियुक्त किए। यह बड़ा परिवर्तन है क्योंकि अब तक राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के अधीन एक ही डिप्टी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार होता था।

राष्ट्रीय सुरक्षा क्या है? भारत के राष्ट्रीय रक्षा महाविद्यालय (National Defence College) के अनुसार किसी राष्ट्र की राष्ट्रीय सुरक्षा उसके राजनैतिक लचीलेपन एवं परिपक्वता, मानव संसाधन, आर्थिक ढाँचे एवं क्षमता, तकनीकी दक्षता, औद्योगिक आधार एवं संसाधनों की उपलब्धता तथा अंत में सैन्य शक्ति के समुचित व आक्रामक सम्मिश्रण से प्रवाहित होती है।

इसलिए राष्ट्रीय सुरक्षा का अर्थ केवल भारी भरकम सेना और आयुध भंडार से ही नहीं समझा जाना चाहिए। भारतीय तटरक्षक बल के पूर्व महानिदेशक एवं रणनीतिक चिंतक डॉ प्रभाकरन पलेरी ने अपनी पुस्तक National Security: Imperatives and Challenges में राष्ट्रीय सुरक्षा के पन्द्रह घटक बताये हैं: सैन्य सुरक्षा, आर्थिक सुरक्षा, संसाधनों की सुरक्षा, सीमा सुरक्षा, जनसांख्यिकीय सुरक्षा, प्राकृतिक आपदा से सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा, भूरणनीतिक सुरक्षा, सूचना सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य सुरक्षा, जातीय/सामुदायिक सुरक्षा, पर्यावरण सुरक्षा, साइबर सुरक्षा तथा जीनोम सुरक्षा।

राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ राष्ट्रीय शक्ति की अवधारणा अंतर्निहित है। राष्ट्रीय शक्ति की अवधारणा तब बलवती होती है जब हम राष्ट्रीय सुरक्षा के मूल्यों को संस्थागत स्वरूप देते हैं। इसे समझना आवश्यक है। उदाहरण के लिए डॉ पलेरी द्वारा बताए गए राष्ट्रीय सुरक्षा के 15 घटकों को देखें तो उसमें हमने प्राकृतिक आपदा से सुरक्षा की बात की है। इस विचार को मूर्त रूप तब दिया गया जब हमने 2005 राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) का गठन किया। उससे पहले सन 1965 में सीमा सुरक्षा के लिए हमने BSF का गठन किया। जब खाद्य सुरक्षा की बात हुई तो हमने 2013 में खाद्य सुरक्षा अधिनियम लागू किया।  

यह प्रक्रिया विगत सात दशकों तक चलती रही और भारत का सुरक्षा ढाँचा धीरे-धीरे सिद्धांतों से संस्थानों में विकसित हुआ। यह ढाँचा आज भी पूर्ण रूप से निर्मित नहीं हुआ है जिसके कारण सरकारें आलोचनाओं का शिकार होती रही हैं। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि हम राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति एकदम उदासीन रहे हैं।   

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सन 1998 में जब हमने स्वयं को परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्र घोषित कर दिया तब हमारा यह दायित्व भी बन गया कि राष्ट्रीय सुरक्षा के समग्रता में अध्ययन हेतु एक शीर्ष संस्था बनाई जाए। एक ऐसी संस्था जो राष्ट्रीय सुरक्षा के सभी पहलुओं पर अध्ययन करे और सरकार को भविष्य की रूपरेखा बनाने और नीति निर्धारण में सुझाव दे।

तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने ऐसी संस्था बनाने के लिए एक टास्क फ़ोर्स का गठन किया जिसके सदस्य थे कृष्ण चंद्र पंत, जसवंत सिंह और एयर कमोडोर जसजीत सिंह (सेवानिवृत्त)। दिसंबर 1998 में इस समिति के सुझावों पर अमल करते हुए ‘राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद’ (National Security Council) का गठन किया गया।

राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद तीन अंगों वाली परिषद है जिसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते हैं। प्रधानमंत्री के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (National Security Adviser) राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद का पूरा काम-काज देखते हैं। इस परिषद के तीनों अंग इस प्रकार हैं: Strategic Policy Group, National Security Council Secretariat (NSCS) और National Security Advisory Board (NSAB).

स्ट्रेटेजिक पॉलिसी ग्रुप में सभी महत्वपूर्ण मंत्रालयों के सचिव, सशस्त्र सेनाओं के अध्यक्ष, गुप्तचर सेवाओं के अध्यक्ष, डीआरडीओ के प्रमुख, रिज़र्व बैंक के गवर्नर तथा परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष होते हैं। इनका कार्य है देश के लिए दीर्घकालिक राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति का दस्तावेज तैयार करना।

राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद बनने के पश्चात एकाध राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति दस्तावेज बने भी थे किन्तु अटल जी की सरकार जाने के बाद कोई विस्तृत नीति सामने नहीं आई। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड (NSAB) में अकादमिक जगत के विशेषज्ञ और सेवानिवृत्त अधिकारियों को आमंत्रित किया जाता है ताकि वे राष्ट्रीय सुरक्षा पर अपने सुझाव दे सकें।

राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय (NSCS) सीधा राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के नीचे काम करने वाला महत्वपूर्ण अंग है। देश की इंटेलिजेंस एजेंसियाँ पहले जॉइंट इंटेलिजेंस कमिटी (JIC) को अपनी रिपोर्ट भेजती थीं जहाँ गोपनीय सूचनाओं के ढेर में से काम की सूचना छाँटकर सरकार को उस पर कार्रवाई करने का सुझाव दिया जाता था। इस प्रक्रिया को ‘raw intelligence’ में से ‘actionable intelligence’ छाँटने की संज्ञा दी जाती है।

जॉइंट इंटेलिजेंस कमिटी को अब राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय के अधीन कर दिया गया है। विभिन्न इंटेलिजेंस एजेंसियाँ अब NSCS को अपनी रिपोर्ट भेजती हैं। अक्टूबर 2018 में भारत सरकार ने NSCS का पुनर्गठन करते हुए उसमें तीन डिप्टी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नियुक्त किए। यह बड़ा परिवर्तन है क्योंकि अब तक राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के अधीन एक ही डिप्टी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार होता था।

तीन डिप्टी एनएसए को तीन अलग कार्यक्षेत्रों की ज़िम्मेदारी दी गई है। आर एन रवि को आंतरिक सुरक्षा, सीमा प्रबंधन, आतंकवाद, वास्तविक नियंत्रण रेखा के समीप चीन की हरकतों पर निगरानी इत्यादि काम सौंपे गए हैं। भारतीय विदेश सेवा के पूर्व अधिकारी पंकज सरन को मूलतः बाह्य सुरक्षा संबंधी मामले देखने को कहा गया है।

उन्हें चीन, रूस और अमेरिका के साथ राजनयिक और रणनीतिक संबंध प्रगाढ़ करने तथा थिंक टैंकों से संवाद स्थापित करने का भी काम दिया गया है। तीसरे डिप्टी एनएसए राजिंदर खन्ना पूर्व R&AW अधिकारी हैं। उन्हें साइबर सिक्योरिटी और सशस्त्र सेनाओं के लिए अंतरिक्ष विज्ञान एवं तकनीक और इसरो की उपयोगिता सुनिश्चित करने के कार्यभार सौंपा गया है।

तीन डिप्टी एनएसए के अतिरिक्त NSCS में एक बड़ा परिवर्तन करते हुए लेफ्टिनेंट जनरल वी जी खंडारे (सेवानिवृत्त) को मिलिट्री एडवाइजर बनाया गया है। जनरल खंडारे तीनों डिप्टी एनएसए के संपर्क में रहेंगे और थलसेना, वायुसेना तथा नौसेना मुख्यालय से NSCS का सीधा संवाद स्थापित करेंगे।

यह उल्लेखनीय निर्णय है क्योंकि रणनीतिक चिंतकों की लंबे समय से यह शिकायत रही है कि सरकार सुरक्षा संबंधी नीति निर्धारण में सशस्त्र सेनाओं के अध्यक्षों की भूमिका को नकारती रही है। राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय (NSCS) की भूमिका अब केवल राष्ट्रीय सुरक्षा पर मंडराते खतरों का मूल्यांकन करना ही नहीं है बल्कि अब वह राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी नीतियाँ बनाने में भी प्रत्यक्ष सहयोग करेगा।

जानकारों की माने तो अब NSCS के अधिकारी रक्षा, गृह और विदेश मंत्रालय जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों के अतिरिक्त लगभग हर मंत्रालय जैसे कि रेलवे, नागरिक उड्डयन, पर्यावरण आदि के सचिवों से भी लगातार परामर्श करते रहेंगे। इससे किसी भी आपात स्थिति में सभी पक्षों का विश्लेषण कर त्वरित निर्णय लेने में सुविधा होगी।

ध्यातव्य है कि भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद को एक निष्प्रभावी संस्था माना जाता रहा है क्योंकि यह अमेरिका की नेशनल सिक्योरिटी कॉउंसिल के तर्ज़ पर बनी थी लेकिन इसे संवैधानिक दर्ज़ा नहीं दिया गया था। जहाँ अमेरिका की नेशनल सिक्योरिटी कॉउंसिल 1947 के अधिनियम से बनी थी और वह देश की सुरक्षा संबंधी निर्णय लेने वाली सर्वोच्च संस्था है वहीं भारतीय राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद एक प्रशासनिक आदेश से बनाई गई संस्था है और आज भी भारत में सुरक्षा संबंधी निर्णय सर्वोच्च स्तर पर प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली कैबिनेट की सुरक्षा मामलों की समिति ही लेती है।

फिर भी हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष भी प्रधानमंत्री ही होते हैं और अटल जी के कार्यकाल से ही यह परिपाटी रही है कि प्रधानमंत्री और उनके राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के मध्य जितना अच्छा तालमेल बनता गया, यह संस्थान उतना ही मजबूत होता गया।

हमें यह समझना चाहिए कि अमेरिका के हित भारत से भिन्न और बड़े हैं। अमेरिका की नेशनल सिक्योरिटी कॉउंसिल के इतिहास और कार्यशैली पर डेविड रॉथकोप्फ ने एक पुस्तक लिखी है: Running the World: The Inside Story of the National Security Council and the Architects of American Power.

इस पुस्तक में रॉथकोप्फ लिखते हैं कि यद्यपि नेशनल सिक्योरिटी कॉउंसिल कानूनी तौर पर अमेरिका के राष्ट्रपति और उनके अधिकारियों को असीम शक्ति प्रदान करती है लेकिन कानून और इतिहास उतने महत्वूर्ण नहीं हैं जितना राष्ट्रपति और उनके विश्वस्त अधिकारियों के बीच संबंध। इससे हमें पता चलता है कि भले ही कोई एजेंसी क़ानूनी तौर पर बनी हो लेकिन उसका सुचारू रूप से कार्य करना अधिकारियों की दक्षता पर निर्भर करता है।

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