बिहार में कॉन्ग्रेस का हाथ थाम राजनीति करने वाली मीसा रामकृपाल का हाथ क्यों काटना चाहती हैं?

जब मीसा ने गंडासे से रामकृपाल के हाथ काटने की बात कही, तब मुझे लालू के दौर में हुए बाथे और सेनारी कांड की याद आ गई। हिंसा के उस दौर में लोगों को गंडासे और तलवार से ही काटा गया था।

आज के समय में नेताओं के लिए दल-बदल की राजनीति सामान्य सी बात हो गई है। राजनीति में साथ रहते हुए कल तक जिसे ‘चाचा’ की उपाधी दी जाती थी, उसे गठबंधन से अलग होने पर ‘चोर’ कहा जाने लग जाए तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है। लेकिन आश्चर्य की बात तब होती है, जब गाँधी के देश में राजनीतिक फ़ायदे व नुकशान के लिए बात खून ख़राबे तक पहुँच जाए।

राजद नेता और लालू प्रसाद की बेटी मीसा भारती ने कहा, “जब रामकृपाल बीजेपी में शामिल हो रहे थे, तब मेरा मन उनका हाथ गंडासे से काटने का हुआ था।” अब ज़रा सोचिए कि जब महज एक सांसद के पार्टी छोड़ने के बाद मीसा हाथ काटना चाहती है, फ़िर तो नीतीश कुमार के राजद से अलग होकर सरकार गिराने के बाद मीसा के मन में शायद मर्डर करने की बात चल रही होगी! नीचे आप भास्कर का वीडियो देखिए और राजनीतिक पतन पर सोचने को मज़बूर होइए।

मीसा के मुँह से इस बयान को सुनने के बाद राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले लोगों को ज़रूर चोट पहुँचेगा। ऐसा इसलिए क्योंकि जब लालू यादव की बेटी मीसा ने जन्म लिया था, तो देश में लोकतांत्रिक संकट का दौर चल रहा था। लोगों से बोलने के अधिकार छिन लिए गए थे। एक तरह से लोग राजनीतिक बंदी की जिंदगी जी रहे थे।

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ऐसे दौर में जब लालू के घर में बेटी पैदा हुई तो लोगों को लगा कि आगे चलकर मीसा इंदिरा जैसी महिलाओं का जवाब होगी। जिन लोगों ने उस दौर को देखा है, आज भी मीसा शब्द सुनते ही उनके शरीर के रूह खड़े हो जाते हैं। लेकिन यह कहते हुए अफ़सोस होता है कि मीसा अपने नाम के मुताबिक कारनामे नहीं दिखा सकी, बल्कि मीसा ने तो इंदिरा से थोड़ा अलग पर समानांतर राह पकड़ के वो सब किया, जो कानूनी रूप से गलत है।

मीसा को आज हम जिस रूप में देख रहे हैं, दरअसल वो लालू यादव की ही देन है। एक कहावत ‘बापे पूत परापत घोड़ा, नै कुछ तो थोड़म थोड़ा’ लालू जी के प्रदेश में खूब बोला जाता है। इसका अर्थ है कि बच्चों पर बहुत ज्यादा नहीं तो भी कुछ न कुछ असर तो अपने पिता का पड़ता ही है।

मीसा ने आज रामकृपाल यादव के लिए जो हिंसक बयान दिया है, दरअसल वह मानसिकता लालू यादव की ही देन है। लालू यादव जेपी के पवित्र राजनीतिक आंदोलन से निकले हुए वो सिपाही हैं, जो अपने राजनीतिक नफ़ा-नुकसान के लिए बेहद निचले पायदान तक गए हैं।

सत्ता के लिए हिंसा का साथ देना या अपराधियों को गोदी में बिठाकर पुलिस की नज़रों से छिपा लेना लालू जी के लिए आम बात रही है। एक उदाहरण के ज़रिए इस बात को समझा जा सकता है कि अप्रैल 2016 में जब शहाबुद्दीन मर्डर केस में जेल में सजा काट रहे थे तब उसे राजद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का हिस्सा बनाया गया। यही नहीं, विधायक मर्डर केस में आरोपित बाहुबली राजद नेता प्रभुनाथ सिंह को भी लालू ने अपने गोद में बिठाए रखा।

बिहार का बच्चा-बच्चा यह बात जानता है कि 1990 की दौर को जातीय हिंसा, लूट-पाट व खून-ख़राबे की दौर के रूप में जाना जाता है। राम मंदिर के नाम पर आडवाणी को जेल भेजकर अपनी पीठ खुद ही थपथपाने वाले लालू यादव ने राज्य में फ़ैले जातीय हिंसा को रोकने के लिए कोई प्रयास नहीं किया।

जब मीसा ने गंडासे से रामकृपाल के हाथ काटने की बात कही, तब मुझे लालू के दौर में हुए बाथे और सेनारी कांड की याद आ गई। हिंसा के उस दौर में लोगों को गंडासे और तलवार से ही काटा गया था। सेनारी काँड में एक-एक परिवार के आधे दर्जन लोगों को बेरहमी से काटा गया था। जब बिहार में यह घटना घट रही थी तब लालू और राबड़ी इन घटनाओं के ज़रिए राजनीति की रोटी सेंकने में लगे हुए थे।

शायद मीसा ने लाशों पर अपने पिता को राजनीति करते हुए देखा होगा, तभी वो इस तरह की हिंसक बयान दे रही है।

मीसा जब बड़ी हो रहीं थी, उसने अपने पिता को चारा घोटाला करते देखा फ़िर मर्डर के आरोपित शहाबुद्दीन व प्रभुनाथ सरीखे लोगों के साथ गलबहियाँ लगाए बैठे देखा। यही वजह है कि मीसा जब भ्रष्टाचार के मामले में आरोपित होती है, या हिंसक बयान देती है। तब मुझे लगता है कि लालू की बेटी होने की वजह से मीसा के व्यवहार में यह सारी गलत चीजें आ गई है।

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