Thursday, July 29, 2021
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राष्ट्रगान के समय खड़े होने पर राजनीति शुरू… इस बार दक्षिण भारत से आई यह हवा

जब हम छोटे थे तो स्कूलों में राष्ट्रगान बजने के दौरान खड़े होते थे। तब हमें उतनी समझ भी नहीं थी, लेकिन फिर भी खड़े हो जाते थे। अब जब समझदार हो गए हैं तो यह जानकर हैरानी होती है कि समाज में ऐसे लोग भी हैं जिन्हें राष्ट्रगान के समय आदरपूर्वक खड़े होने में कष्ट होता है।

किसी भी नागरिक के लिए देश सर्वोपरि होता है और होना भी चाहिए, क्योंकि देश है तो हम हैं। हमारी पहचान देश से है। जिस देश में हम सुकून और इज्जत के साथ जीते हैं, जिस देश की हम रोटी खाते हैं, जिस देश की मिट्टी में हम सोते हैं, क्या हमारा उस देश के प्रति कोई फ़र्ज़ नहीं बनता? क्या ये हमारा कर्तव्य नहीं बनता कि हम देश की अस्मिता और गरिमा का सम्मान करें और अगर हम ऐसा नहीं कर सकते तो हमें इस देश में रहने का कोई अधिकार नहीं है।

दरअसल, हम यहाँ पर बात कर रहे हैं अभिनेता से नेता बने जन सेना प्रमुख पवन कल्याण की, जिन्होंने उच्चतम न्यायालय के उस निर्देश पर सवाल खड़े किए हैं, जिसमें सिनेमा हॉल के अंदर राष्ट्रगान बजाने को अनिवार्य किया गया। पवन कल्याण को सिनेमा हॉल में राष्ट्रगान पर खड़े होना पसंद नहीं है। पवन ने कहा, “ये मेरी देशभक्ति की परीक्षा नहीं है, सीमा पर युद्ध चल रहा है, यह मेरी देशभक्ति की परीक्षा है। समाज में रूढ़िवाद व्याप्त है, यह मेरी देशभक्ति की परीक्षा है। मैं रिश्वतखोरी को रोक सकता हूँ या नहीं यह मेरी देशभक्ति की परीक्षा है। परिवार और दोस्तों के साथ फ़िल्म देखने के लिए निकाला गया समय अब देशभक्ति के प्रदर्शन का परीक्षण बन गया है।”

ऐसे में यह सवाल उठना ज़रूरी बन पड़ता है कि क्या राष्ट्रगान पर खड़ा होना आपका कर्तव्य नहीं है? माना कि आप परिवार और दोस्तों के साथ मस्ती करने गए हैं, मगर क्या आप उसमें से 52 सेकेंड का समय अपने देश के लिए नहीं निकाल सकते? 3 घंटे की फ़िल्म के दौरान 52 सेकेंड का समय निकालना आपके लिए देशभक्ति प्रदर्शित करने का परीक्षण बन गया?

हमारे राष्ट्रगान का संबंध राष्ट्रीय पहचान, राष्ट्रीय एकता और संवैधानिक देशभक्ति से है। मगर ये देखकर बड़ा ताज्जुब होता है कि कुछ लोगों को हमारे राष्ट्रगान के समय खड़े होने में तकलीफ़ होती है, राष्ट्रगान के समय
उन्हें खड़ा होना पसंद नहीं होता।

बड़ी अजीब सी बात है कि जब हम छोटे थे तो स्कूलों में राष्ट्रगान बजने के दौरान खड़े होते थे। तब हमें उतनी समझ भी नहीं थी, लेकिन फिर भी खड़े हो जाते थे। अब जब समझदार हो गए हैं तो यह जानकर हैरानी होती है कि समाज में ऐसे लोग भी हैं, जिन्हें राष्ट्रगान के समय आदरपूर्वक खड़े होने में कष्ट होता है।

आमतौर पर यह देखा गया है कि अभी भी घर में बड़ों के सम्मान में लोग खड़े हो जाते हैं, ऑफिस में बॉस के आने पर कर्मचारी जन उनके समक्ष खड़े होकर आदर का भाव व्यक्त करते हैं। ऐसे में मात्र 52 सेकंड के लिए राष्ट्रगान के सम्मान में खड़े होने पर भला क्या आपत्ति हो सकती है? जबकि इसका सीधा संबंध हमारे देश के गौरव से है।

हाँ, अगर किसी को शारीरिक तौर पर कोई परेशानी हो या फिर अस्वस्थ हों तो ये बात समझ में आती है, मगर जानबूझकर राष्ट्रगान के समय खड़ा ना होना शिष्टाचार का प्रतीक तो नहीं है।

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