Friday, March 5, 2021
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गोरों से स्वीकृति खोजते अमर्त्य सेन, नोबेल का मेडल घटिया तर्क को सुनहरा नहीं बना सकता

जैसे शादियों में फूफा नाराज रहते हैं कि उनके बिट्टू को केवल तीन रसगुल्ले मिले, जबकि उनके साढ़ू के चिंटू को पाँच, उसी तरह अमर्त्य सेन को भी शिकायत है कि दूरदर्शन ने कॉन्ग्रेस को भाजपा से आधी फुटेज क्यों दी और यह कि विदेशी मीडिया ने तो भारत के बारे में कुछ भी अच्छा नहीं लिखा।

“अमर्त्य सेन ने इंडियन एक्सप्रेस में लेख लिखा है” – इस वाक्य मात्र से आपने जो कुछ अंदाजा लगा लिया, उससे बहुत ज्यादा कुछ अलग नहीं लिखा है। वही घिसा-पिटा राग कि मोदी को तो केवल 37% वोट मिले हैं (अतः इस्तीफा दे देना चाहिए), कॉन्ग्रेस की बेहतर रणनीति होनी चाहिए थी, भाजपा को इतना पैसा कहाँ से मिला (और पार्टियाँ क्यों कंगली हैं), इत्यादि। लेकिन एक-आध ऐसी बातें भी लिखीं, जिन्हें पढ़ कर हँसी आ गई कि एक नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री वह सब कैसे नहीं सोच पाया, जो मैं आधी नींद में होकर भी सोच सकता हूँ।

ऐसे में सवाल भी उठने लगता है कि क्या नोबेल पुरस्कार ही ओवररेटेड है और किसी को भी, राजनीति और विचारधारा का हित साधने के लिए दे दिया जाता है, या नरेन्द्र मोदी की जीत के धक्के से अमर्त्य सेन के दिमाग में अर्थशास्त्र वाले हिस्से पर गंभीर चोटें आईं हैं?

दूरदर्शन ने कॉन्ग्रेस का प्रसारण इसलिए कम किया क्योंकि जनता पक गई थी

जैसे शादियों में फूफा नाराज रहते हैं कि उनके बिट्टू को केवल तीन रसगुल्ले मिले, जबकि उनके साढ़ू के चिंटू को पाँच, उसी तरह अमर्त्य सेन को भी शिकायत है कि दूरदर्शन ने कॉन्ग्रेस को भाजपा से आधी फुटेज क्यों दी। उनके नोबेल-लेवल के अर्थशास्त्री दिमाग में पता नहीं यह कैसे नहीं आया कि जब किसी प्रॉडक्ट (कॉन्ग्रेस की विचारधारा और राजनीति) की जनता में डिमांड (स्वीकार्यता, जो कि कॉन्ग्रेस के 2014 से लेकर 2019 तक लगातार सिमटते जनाधार से नापी जा सकती है) नहीं है तो उसकी सप्लाई (प्रसारण) बम्पर डिमांड वाले प्रॉडक्ट जितनी कैसे हो सकती है, और क्यों होनी चाहिए?

कॉन्ग्रेस के पास ऐसा था क्या, जिसमें लोगों की ऐसी दिलचस्पी होती कि लोग दूरदर्शन लगाते केवल कॉन्ग्रेस को सुनने के लिए? दिग्विजय सिंह ने खुद माना कि कॉन्ग्रेस ने पढ़ना-लिखना (यानी, नए मूल विचार बनाना) नेहरू के बाद ही बंद कर दिया था, और सीपीआई से उधारी की विचारधारा पर गाड़ी दौड़ा रही थी। दूसरी ओर भाजपा, संघ परिवार, दक्षिणपंथ के साथ 70 साल सांस्कृतिक, वैचारिक परिदृश्य में, एलीट समुदाय में अछूत की तरह व्यवहार किया गया, इसलिए भाजपा को लेकर उत्सुकता जाहिर तौर पर रही, जिसका उन्हें  फायदा मिला और उनकी डिमांड ऊँची रही।

इसके अलावा सोशल मीडिया पर तो भाजपा सरकार का कब्जा नहीं था। अधिकांश टीवी चैनल लगातार मोदी के खिलाफ जहर उगल रहे थे, और कॉन्ग्रेस को पेट भरकर फुटेज दे रहे थे- क्या फायदा हुआ उसका? इसके बाद भी प्रॉडक्ट जनता द्वारा नकार दिया गया यानी, स्पष्ट है कि प्रॉडक्ट में ही खोट था। और अमर्त्य सेन कहना चाहते हैं कि खोटे माल पर भारत के लोगों की गाढ़ी कमाई के टैक्स से चल रहे दूरदर्शन का निवेश किया जाना चाहिए था? सवाल यह है कि इन्होंने अर्थशास्त्र का नोबेल ऐसे ही सार्वजनिक सम्पत्ति की बर्बादी की वकालत कर जीता था क्या?

(Edit: अभी देखा कि सेन साहब सच में रेवड़ी बाँटने वाली वेलफेयर इकोनॉमिक्स के ही अर्थशास्त्री हैं।)

जो मीडिया अपने देश में खत्म हो रहा है, उसका सर्टिफिकेट अमर्त्य सेन को ही मुबारक

अमर्त्य सेन का अगला दुःख है कि मोदी के राज में ले मोंडे, दी ज़ाइत, बीबीसी, गार्जियन वगैरह ने भारत की नकारात्मक रिपोर्टिंग की है। “इनटॉलेरेंस”, “मुस्लिम भय में हैं”, वगैरह के शिगूफे जमकर चलाए हैं। और भाजपा के समर्थकों को इस बात से ‘चिंतित होना चाहिए’ कि मोदी ने भारत की अंतररष्ट्रीय मीडिया में छवि बिगड़ गई है। तो पहली बात तो यह अमर्त्य सेन के लिबरल गैंग के ही लोग थे, जिन्होंने कॉलम रंग-रंग कर भारत की छवि डुबोई है- अगर इतनी चिंता थी तो न लिखते। अमर्त्य सेन ने कभी बाहरी मीडिया में देश की बेइज्जती करने वालों की आलोचना की? पहले खुद देश की टोपी बाहर उछलने के बाद अब उसका ठीकरा मोदी पर क्यों फोड़ना? और अगर उन लोगों ने जो लिखा है, वह सही है तो उस पर कायम रहिए।

दूसरी बात यह विदेशी मीडिया भारत के बारे में जानता क्या है- इनके इंटरनेशनल अफेयर्स एडिटर को अगर इंटरनेट बंद करके भारत के पाँच शहरों के नाम पूछे जाएँ तो और बाकियों की तो दूर की बात, जिस बीबीसी के आधे गोरे जर्नलिस्ट अपने ट्विटर पर ‘लव इंडिया’ लिखते हैं, वह भी फेल हो जाएगा। ऊपर से गोरों का श्रेष्ठताबोध इनमें इतना ज्यादा है कि अपने देश में नस्लवाद से लड़ने का दम भरने वाला न्यू यॉर्क टाइम्स भारत में साड़ी के लौटते फैशन पर चिंता प्रकट करता है, क्योंकि अगर भारतीय अपना सांस्कृतिक परिधान पहन रहे हैं तो शर्तिया पिछड़े युग में लौट रहे हैं। इसके अलावा इनके खुद के देश में इन अख़बारों की कुछ नहीं चलती- इनके लाख न चाहने के बाद भी ब्रिटेन में ब्रेक्सिट हो ही गया, अमेरिका में ट्रम्प भी आ ही गया, और मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि अगर उसने कोई बड़ी मूर्खता खुद नहीं की तो वह इन्हें ठेंगा दिखा कर फिर से लौटेगा। तो ऐसे वाहियात और हमारी ज़मीन से कटे लोगों के सर्टिफिकेट अमर्त्य सेन जैसे शैम्पेन लिबरल्स के गैंग को ही मुबारक।

टैगोर के भारत को हिंदुत्व से अलग नहीं किया जा सकता

अमर्त्य सेन इस पर भी चिंता जताते हैं कि मोदी का भारत नेहरू-टैगोर-गाँधी का भारत नहीं है। तो पहली बात तो इन तीनों के भारत बहुत ही अलग थे- गाँधी जहाँ भारत को दोबारा ग्रामीण पिछड़ेपन में घसीट लेना चाहते थे और नाममात्र के हिन्दू थे, वहीं नेहरू का भारत-दर्शन विशुद्ध रूप से आर्थिक-भौतिक-नास्तिक था और गाँधी के उलट वह भारत में औद्योगीकरण और शहरीकरण के पक्षधर थे। वहीं टैगोर इन दोनों से अलग भारत की उसी धार्मिक आत्मा को खुद में रचाए-बसाए थे। अपनी किताब ‘परिचय’ के ‘आत्मपरिचय’ भाग में वह साफ लिखते हैं कि जबकि इस्लाम और ईसाईयत का “केवल मेरा पंथ सही” दुनिया को त्रस्त किए है तो केवल हिन्दू धर्म ही रास्ता दिखा सकता है। वह राष्ट्रवाद शब्द के भले ही खिलाफ थे क्योंकि उन दिनों राष्ट्रवाद की समझ यूरोप में राष्ट्रवाद के नाम पर हुई अमानवीयता के इर्द-गिर्द थी, पर आधुनिक हिन्दू राष्ट्रवाद जैसे बिना किसी गैर-हिन्दू नागरिक के व्यक्तिगत अधिकारों  किए हिन्दू आदर्शों पर राष्ट्र-निर्माण का आकांक्षी है, वह टैगोर के स्वप्न के भारत का दुश्मन नहीं है।

तो कुल मिलाकर अमर्त्य सेन जैसे ‘सम्मानित’ विद्वान को चाहिए कि अपने सम्मानित होने का भी सम्मान करें, और जनादेश की भी गरिमा अक्षुण्ण रखें। देश में बदलाव का दौर है और उनकी रेवड़ीनॉमिक्स तो वैसे ही अप्रासंगिक है- बेहतर होगा वे खुद अप्रासंगिक हो जाने से खुद को बचाएँ।

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