Thursday, November 26, 2020
Home विचार सामाजिक मुद्दे दिक्कत कपिल मिश्रा से नहीं ‘इकलौते दीन’ का प्रभुत्व नहीं मानने वाले हर काफिर...

दिक्कत कपिल मिश्रा से नहीं ‘इकलौते दीन’ का प्रभुत्व नहीं मानने वाले हर काफिर से है

लोकतंत्र की मौज काफ़िरों के दम पर ही है। काफ़िरों से नफ़रत का ऐसा रूह कँपा देने वाला प्रदर्शन करने के बाद डॉ. खान काफ़िर कपिल को ज्ञानवाचन करते हुए बताते हैं कि दुनिया में केवल हिंदुस्तान के ही मुस्लिम ऐसे हैं जो “72 साल से लोकतंत्र का सम्मान करते आ रहे हैं।”

जिस तरह की बजबजाती नाली में अमेरिकी नागरिक सिद्धार्थ वरदराजन का नक्सली पोर्टल ‘द वायर’ तब्दील हो चुका है, वैसे में बड़े-बूढ़ों की तो सलाह होती कि इस गंदगी से बच के निकल जाना ही भले आदमी के लिए सही है- क्योंकि जब आप नाली के शूकर से मल्लयुद्ध करते हैं तो आखिरी वार चाहे जो करे, जीत मल-मूत्र, विष्ठा में आपको लिथाड़ने के कारण शूकर की ही मानी जाती है। लेकिन अफ़सोस की बात यह है कि यह आम समय नहीं है। वायर हिन्दुओं के कत्लेआम की ज़मीन तैयार करने का जो कीचड़ सालों से तैयार कर रहा था, वह अब भभक-भभक कर समाज में फ़ैलने लगा है। हिन्दू इससे संक्रमित हो रहे जिहादियों के हाथों मरने लगे हैं। इसलिए कीचड़ में उतरना, जानवर को जानवरों वाली ज़हरीली ज़ुबान में ही जवाब देना बहुत ज़रूरी है- आत्मरक्षा के लिए, एज़ अ राइट टू सेल्फ़-डिफेंस।

ऐसी ही हिन्दुओं से कातिलाना घृणा की गंध मारता ज़हर उगला है खुद को एम्स में हड्डियों का डॉक्टर और इसी विषय का प्रोफ़ेसर बताने वाले डॉ. शाह आलम खान ने। इसमें नाम के लिए संबोधित भले भाजपा नेता कपिल मिश्रा हैं, लेकिन लेख पढ़कर साफ़ समझ में आ जाएगा कि असल में यह लेख सभी हिन्दुओं को संबोधित है। खीझ उतारी है कि हज़ार साल से रीढ़विहीन हो रेंग रहे, पिछले 5 साल में ‘हिंदूवादी’ सरकार से भी केवल ‘आखिर कुछ करते क्यों नहीं’ चीख ही पा रहे, इन काफिरों में इतनी जान कहाँ से आ गई कि बाबर और तैमूर की औलाद होने का दम भरने वाली, देश में दार-उल-इस्लाम कायम करने के लिए जिहाद कर रहीं नस्लों के आगे अकड़ कर खड़े हो जाएँ!

चूँकि असली निशाना सभी काफ़िर हैं, इसलिए व्यक्तिगत तौर पर कपिल मिश्र को नापसंद करने के बावजूद इसका जवाब देना एक unapologetic काफ़िर के तौर पर मेरे लिए ज़रूरी है।

‘मिश्र’ उपनाम ‘खान’ से भी खराब है?

पहला हमला डॉ. खान करते हैं कपिल मिश्रा की जाति पर। बताते हैं, “मिश्रा जातिसूचक है, इसलिए मैं इसे स्वीकार नहीं करूँगा। मैं तुझे कपिल ही कहूँगा।” अब जाति-व्यवस्था क्या थी और क्या नहीं, यह मुख्य मुद्दा (जिहादी डॉ. की काफ़िरों से घृणा) से ध्यान हटा देगा, इसलिए इसे जाने देता हूँ। (पढ़ने के इच्छुक इस विषय पर मेरे अन्य लेख ऑपइंडिया पर और मुझसे कहीं ज़्यादा जानकार लोगों की टिप्पणियाँ, देख सकते हैं)

लेकिन, अगर जाति के ख़िलाफ़ एक-एक नुक्ताचीनी को सही मान भी लिया जाए, तो भी क्या ‘मिश्रा’ उपनाम का इतिहास, ब्राह्मणों के कथित जातिवाद का इतिहास ‘खान’ उपनाम वालों के इतिहास से भी काला है? क्या मिश्रा नाम के किसी व्यक्ति ने चंगेज़ खान, हलाकू खान, कुबलाई खान, या फिर याह्या खान, मोहम्मद अयूब खान, खिज्र खान, आसिफ़ खान आदि से भी ज्यादा हत्याकाण्ड, बलात्कार, बलात्कार के बाद हत्या किए हैं या उन्हें शह दी है? अगर हाँ, तो सबूत दिखाइए। अगर नहीं, तो शर्म करिए इतना घिनौना और हिंसक इतिहास लिए उपनाम लगा कर कपिल मिश्रा के बहाने हिन्दुओं पर नाम के इतिहास को लेकर हमला करने के लिए।

दिक्कत कपिल मिश्रा से नहीं, उन्हें वोट देने वाले काफ़िरों से

जैसा कि मैंने पहले भी कहा था कि डॉ. खान की असली दिक्कत कपिल मिश्रा नहीं, उन्हें वोट देने की हिमाकत करने वाले ‘गलीज़’ काफ़िर हैं। इसलिए ज़्यादा समय भूमिका बाँधने में बर्बाद किए बिना खान काफ़िरों पर हमला शुरू कर देते हैं। कपिल मिश्रा के बहाने काफ़िरों को शर्म करने की हिदायत देते हैं। बताया जाता है कि काफ़िर कपिल की हार 11 हज़ार मतों से कहीं बड़ी होनी चाहिए थी, न जाने कौन से नामुराद 40% काफ़िर पैदा हो गए जो कपिल मिश्रा को वोट दे आए।

धिम्मी बनकर, ‘मीठे’ बनकर, अपने हाथों अपना बंध्याकरण कर लेने वाले काफ़िरों को ‘शांतिप्रिय समाज’ बताकर उनके मुकाबले में अपने लिए खड़े होने वाले, कलमा पढ़ने से इनकार कर पाकिस्तान-बांग्लादेश-अफ़गानिस्तान से भाग आए सह-काफ़िरों को पनाह देने (और उनके साथ बलात्कार और हत्या करने वाले समुदाय को वही सुविधा न देने के लिए इनकार करने) वालों को असंतुलित, आग उगलता दानव बनाया जाता है। डॉ. शाह आलम खान काफ़िरों से कितनी नफ़रत करते हैं, इस बात को उनके लेख का एक उदाहरण साफ़-साफ़ दिखाता है। वे वहाँ बलात्कृत हो रहे, मारे जा रहे, पुरखों की सम्पत्ति लुटवा रहे, अपने मन्दिर तुड़वा रहे काफ़िरों पर लांछन लगाते हुए कहते हैं कि उनके माँ-बाप ने तो पाकिस्तान में ही रहना स्वीकार कर लिया था, जबकि डॉ. खान के पुरखे पाकिस्तान नहीं गए।

मैं इस कुतर्क की परतों को नोंच-नोंच कर उसकी खाल उधेड़ने के पहले चाहूँगा कि आप ज़रा रुकें, एक गहरी साँस लें और इस व्यक्ति की जिहादी कुंठा, नफ़रत और क्रूरता के इतने नंगे प्रदर्शन पर एक मिनट गौर करें। जिस समय कोई इंसान मज़हबी प्रताड़ना का शिकार होकर, बलात्कृत होकर या उससे बचने के लिए, घर के एक-आध लोगों के क़त्ल हो जाने के बाद या उससे बचने के लिए, घर-बार, व्यवसाय, शिक्षा, पहचान छोड़ कर भागता हुआ कहीं शरण लेना चाहे और वहाँ शरण देने वालों में से कोई ऐसा, जो उसी मज़हबी विचार का पालन करता है जिससे वह शरणार्थी जान बचाकर भागा है, उससे उसके पुरखों के बारे में जाँच पड़ताल शुरू कर दे, तो यह व्यवहार क्या इंसानियत के किसी घटिया रूप की भी श्रेणी के लायक है?

अब इस कुतर्क पर आएँ तो पहली बात अधिकांश शरणार्थी (और पाकिस्तान के हिन्दुओं का बहुसंख्य) अनुसूचित जाति से आते हैं। पत्रकारिता के समुदाय विशेष के हिसाब से तो अनुसूचित जाति में पैदा हो भर जाने से व्यक्ति वंचित, पीड़ित, प्रताड़ित बन जाता है। तो वंचित, पीड़ित, प्रताड़ित व्यक्ति अगर पीछे छूट गए तो अपनी गरीबी, अपने शोषित होने के चलते छूटे होंगे। टिकट खरीदने और सुरक्षित निकल पाने का पैसा न होने के कारण छूटे होंगे। या अपनी मर्जी से, ताकि पहला पीरियड आते ही उनके परिवार की लड़की का बलात्कार कर उसे निकाह के मुलम्मे में आजीवन सेक्स-गुलाम बनाया जा सके, इसलिए जानबूझकर पीछे रह गए होंगे? पुरखों के अपराधों के लिए आज की पीढ़ी को सज़ा देने की बात अगर डॉ. शाह आलम खान चाहते ही हैं तो अपने इलाके में (चाहे वे देश के जिस भी इलाके से आते हों, क्योंकि इस देश का इस्लामी इतिहास काफ़िरों के खून से इतना सना है कि कोई ऐसा टुकड़ा नहीं होगा ज़मीन का जिसे किसी मोमीन ने काफ़िर से रक्त से न सींचा हो) पिछले 1200 साल में हुए काफ़िरों के कत्लेआम से शुरू करना चाहिए।

अपना रास्ता माँगना हर किसी का संवैधानिक अधिकार है

डॉ. शाह आलम खान काफ़िर कपिल से पूछते हैं कि उसे एक राजनीतिक हस्ती के तौर पर दार-उल-इस्लाम की, ‘तेरा मेरा रिश्ता क्या’ की जंग लड़ रहे अल्लाह के बन्दों को हटाने के लिए दिल्ली पुलिस को हिदायत देने का क्या हक़ है। लेकिन वह यह या तो काफ़िरों से नफ़रत में भूल जाते हैं या नज़रअन्दाज़ कर देते हैं कि काफ़िर कपिल हिंदुस्तान का एक नागरिक भी है। उसे जाफराबाद मेट्रो स्टेशन इस्तेमाल करने का भी हक है, जो उसके टैक्स और किराए के पैसे से बना और चलता है। वे यह भी भूल जाते हैं कि अगर काफ़िर कपिल को ऐसा लगा कि उसके टैक्स के पैसे से तनख्वाह पा रही दिल्ली पुलिस अपना काम ठीक से नहीं कर रही थी, जाफराबाद और चाँदबाग में शाहीन बाग़ की तरह एक और दार-उल-इस्लाम बनने दे रही थी (जहाँ किसी काफ़िर के साथ वह भी होता जो काफ़िरों गुंजा कपूर और दीपक चौरसिया के साथ हुआ, और वह भी जो आईबी के अंकित शर्मा के साथ हुआ) तो काफ़िर कपिल का पूरा हक था पुलिस को यह कहने का कि इसे खाली कराए। यह हक़ (डॉ. शाह आलम खान के) दुर्भाग्य से संविधान फ़िलहाल काफ़िरों को भी देता है।

लोकतंत्र की मौज काफ़िरों के दम पर ही है। काफ़िरों से नफ़रत का ऐसा रूह कँपा देने वाला प्रदर्शन करने के बाद डॉ. खान काफ़िर कपिल को ज्ञानवाचन करते हुए बताते हैं कि दुनिया में केवल हिंदुस्तान के ही मुस्लि ऐसे हैं जो “72 साल से लोकतंत्र का सम्मान करते आ रहे हैं।” यह न केवल काफ़िरों की लोकतांत्रिक प्रकृति का बेजा अधिग्रहण करने की कोशिश है, बल्कि CAA के विरोध के भी विरोध में है।

पहली बात तो यह कि अगर दुनिया में लगभग 50 इस्लामी प्रभुत्व के देश हैं और किसी में लोकतंत्र मजबूत नहीं रहा तो यह इस्लामी प्रभुत्व की प्रकृति के बारे में क्या कहता है? साथ ही डॉ. खान को खुद से यह भी सवाल पूछना चाहिए कि उन 50 देशों के मुस्लिम और भारत के मुस्लिम कोई अलग-अलग कुरान और सुन्ना मानते हैं क्या? भारत में वही हनाफ़ी-सलाफ़ी-बरेलवी-देवबंदी-शिया-सुन्नी-खोजा-हज़रा-अहमदिया हैं जो दुनिया में हैं, या हमने कोई अलग प्रजाति विकसित की है, जिसकी कुरान, जिसका हज़रत, जिसका ईमान बाकी मुस्लिमों से अलग है? क्योंकि अगर दुनिया का इस्लाम और भारत का इस्लाम समान है तो ज़ाहिर बात है कि भारत का लोकतंत्र इस्लाम नहीं रखे हुए है (वरना वही इस्लाम पूरी दुनिया में डॉ. खान के ही शब्दों के हिसाब से, लोकतंत्र के साथ बेमेल न होता)।

भारत को लोकतान्त्रिक इसका हिन्दू होना रखे है, इसका हिंदुत्व रखे है। इस्लाम की बहुसंख्या में लोकतंत्र का क्या हाल होता, यह देखने के लिए केवल 5 अगस्त, 2019 के पहले के कश्मीर तक देखने की ज़रूरत है। काफ़िरों को अपने जूते के नीचे बनाए रखने, बराबर में न आने देने की माँग और इच्छा ही 370 का, 35-A का, विशेष दर्जे का, पाकिस्तान के साथ मिल जाने की खुली धमकी का स्रोत थे। अगर डॉ. खान को लगता है कि भारत के आज के मुस्लिम सच में दुनिया के मुस्लिमों से अलग, काफ़िरों से और लोकतंत्र से प्रेम करने वाली कोई अनूठी प्रजाति हैं तो उन्हें यह बताना चाहिए कि ऐसे में CAA का विरोध कर इस लोकतान्त्रिक, काफ़िर-प्रेमी दुर्लभ मजहबी प्रजाति का वह लोकतंत्र-विरोधी, काफ़िरों से नफ़रत करने वाले कठमुल्ले समुदाय विशेष से घालमेल क्यों करना चाहते हैं?

दुश्मन कपिल मिश्रा नहीं, काफ़िर होना है

डॉ. खान और उनके जैसे हर जिहादी की असली दिक्कत न कपिल मिश्रा हैं, न ही CAA। यहाँ तक कि मोदी भी नहीं। असली दिक्कत है काफ़िरों से उनकी नफ़रत। उन्हें हिकारत भरी नज़रों से देखने और अपने जूतों तले रौंदने की 1200 साल पुरानी आदत। आज का काफ़िर इसके आगे और झुकने से इनकार कर रहा है। ‘इकलौते दीन’ का प्रभुत्व मानने या इसके आगे दोयम दर्जे का हो जाने से इनकार कर रहा है। यही नहीं अपने आस-पास के दार-उल-इस्लामों में प्रताड़ित काफ़िरों की तरफ़ हाथ बढ़ा कर अपने सामाजिक हाथ मजबूत कर रहा है। ऐसे में डॉ. खान जैसे लोगों को वह सामाजिक दबदबा फ़िसलता नजर आ रहा है जिसे सदियों से केवल अपना मानने के संस्कार उनके अंदर तक, कांस्टेबल अंकित शर्मा को 400 बार चाकुओं से गोदने वालों के इतने अंदर तक पैवस्त हैं कि जब उसके बिना दुनिया देखनी पड़ रही है तो अंदर की पाशविक वृत्ति खौल कर सड़कों पर निकल रही है और लोगों के सिरों में ड्रिल घोंप रही है।

लिबरपंथियो, आँकड़े चाहिए हिन्दुओं पर हुए अत्याचार के? ये लो – रेप, हत्या, मंदिर सब का डेटा है यहाँ

तू चल मैं आता हूँ: बरखा दत्त माँगे आज का ‘गाँधी’, याद आई लोमड़ी-कौव्वे की कहानी

भारत ने किसी ‘समुदाय विशेष’ का ठेका नहीं ले रखा NDTV के सम्पादक महोदय! अल्पसंख्यक का रोना बंद करें

  सहयोग करें  

एनडीटीवी हो या 'द वायर', इन्हें कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

कानपुर लव जिहाद SIT रिपोर्ट: आखिर वामपंथियों को 14 साल की बच्चियों का मुस्लिम द्वारा गैंगरेप क्यों नॉर्मल लगता है?

बात यह है कि हर मामले में मुस्लिम लड़का ही क्यों होता है? ईसाई या सिक्ख लड़के आखिर किसी हिन्दू लड़की को अपना नाम हिन्दू वाला बता कर प्रेम करते क्यों नहीं पाए जाते?

नाबालिगों से गैंगरेप, जबरन मुस्लिम बनाना, नाम बदल कर दोस्ती… SIT की वह रिपोर्ट जिसे वामपंथी नकार रहे हैं

ऑपइंडिया के पास मौजूद SIT रिपोर्ट में स्पष्ट लिखा है कि यह ग्रूमिंग जिहाद के कुछ बेहद चर्चित मामले थे, जिनमें हिन्दू युवतियों को धोखा देकर उनके धर्मांतरण का प्रयास या उनका उत्पीड़न किया गया।

दिल्ली के बेगमपुर में शिवशक्ति मंदिर में दर्जनों मूर्तियों का सिर कलम, लोगों ने कहते सुना- ‘सिर काट दिया, सिर काट दिया’

"शिव शक्ति मंदिर में लगभग दर्जन भर देवी-देवताओं का सर कलम करने वाले विधर्मी दुष्ट का दूसरे दिन भी कोई अता-पता नहीं। हिंदुओं की सहिष्णुता की कृपया और परीक्षा ना लें।”

संविधान दिवस पर PM मोदी ने की एक राष्ट्र और एक चुनाव पर बात, कहा- ये केवल विमर्श का नहीं बल्कि देश की जरूरत

"हमारे निर्णय का आधार एक ही मानदंड होना चाहिए और वो है राष्ट्रहित। राष्ट्रहित ही हमारा तराजू होना चाहिए। हमें ये याद रखना है कि जब विचारों में देशहित और लोकहित की बजाय राजनीति हावी होती है तो उसका नुकसान देश को उठाना पड़ता है।"

संविधान दिवस: आरक्षण किसे और कब तक, समान नागरिक संहिता पर बात क्यों नहीं? – कुछ फैसले जो अभी बाकी हैं

भारत की धर्म निरपेक्षता के खोखलेपन का ही सबूत है कि हिंदुओं के पास आज अपनी एक 'होम लैंड' नहीं है जबकि कथित अल्पसंख्यक...

बंगाल: मर्डर, फायरिंग, बमबाजी, आगजनी… BJP के प्रदेश अध्यक्ष से लेकर बूथ अध्यक्ष तक बने निशाना

बीजेपी (BJP) ने दक्षिण दिनाजपुर में अपने बूथ अध्यक्ष स्वाधीन राय की हत्या का आरोप सत्ताधारी तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के गुंडों पर लगाया है।

प्रचलित ख़बरें

फैक्टचेक: क्या आरफा खानम घंटे भर में फोटो वाली बकरी मार कर खा गई?

आरफा के पाँच बज कर दस मिनट वाले ट्वीट के साथ एक ट्वीट छः बज कर दस मिनट का था, जिसके स्क्रीनशॉट को कई लोगों ने एक दूसरे को व्हाट्सएप्प पर भेजना शुरु किया। किसी ने यह लिखा कि देखो जिस बकरी को सीने से चिपका कर फोटो खिंचा रही थी, घंटे भर में उसे मार कर खा गई।

‘उसे मत मारो, वही तो सबूत है’: हिंदुओं संजय गोविलकर का एहसान मानो वरना 26/11 तुम्हारे सिर डाला जाता

जब कसाब ने तुकाराम को गोलियों से छलनी कर दिया तो साथी पुलिसकर्मी आवेश में आ गए। वे कसाब को मार गिराना चाहते थे। लेकिन, इंस्पेक्टर गोविलकर ने ऐसा नहीं करने की सलाह दी। यदि गोविलकर ने उस दिन ऐसा नहीं किया होता तो दुनिया कसाब को समीर चौधरी के नाम से जानती।

हाथ में कलावा, समीर चौधरी नाम की ID: ‘हिंदू आतंकी’ की तरह मरना था कसाब को – पूर्व कमिश्नर ने खोला राज

"सभी 10 हमलावरों के पास फर्जी हिंदू नाम वाले आईकार्ड थे। कसाब को जिंदा रखना पहली प्राथमिकता थी। क्योंकि वो 26/11 मुंबई हमले का सबसे बड़ा और एकलौता सबूत था। उसे मारने के लिए ISI, लश्कर-ए-तैयबा और दाऊद इब्राहिम गैंग ने..."

ओवैसी को सूअर वाली स्वादिष्ट बिरयानी खिलाने का ऑफर, AIMIM नेता के बीफ बिरयानी पर BJP का पलटवार

"मैं आपको आज बिरयानी का निमंत्रण दे रहा हूँ। वाल्मिकी समुदाय के लोग पोर्क के साथ बिरयानी अच्छी बनाते हैं। आइए हम आपको स्वादिष्ट बिरयानी..."

जहाँ बहाया था खून, वहीं की मिट्टी पर सर रगड़ बोला भारत माता की जय: मुर्दों को देख कसाब को आई थी उल्टी

पुलिस कमिश्नर राकेश मारिया सुबह साढ़े चार बजे कसाब से कहते हैं कि वो अपना माथा ज़मीन से लगाए... और उसने ऐसा ही किया। इसके बाद जब कसाब खड़ा हुआ तो मारिया ने कहा, “भारत माता की जय बोल” कसाब ने फिर ऐसा ही किया। मारिया दोबारा भारत माता की जय बोलने के लिए कहते हैं तो...

‘माझ्या कक्कानी कसाबला पकड़ला’ – बलिदानी ओंबले के भतीजे का वो गीत… जिसे सुन पुलिस में भर्ती हुए 13 युवा

सामने वाले के हाथों में एके-47... लेकिन ओंबले बिना परवाह किए उस पर टूट पड़े। ट्रिगर दबा, गोलियाँ चलीं लेकिन ओंबले ने कसाब को...
- विज्ञापन -

लालू यादव पर दोहरी मार: वायरल ऑडियो मामले में बीजेपी विधायक ने कराई FIR, बंगले से वार्ड में किए गए शिफ्ट

जेल से कथित तौर पर फोन करने के मामले में लालू यादव पर FIR हुई है। साथ ही उन्हें बंगले से रिम्स के वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया है।

कानपुर लव जिहाद SIT रिपोर्ट: आखिर वामपंथियों को 14 साल की बच्चियों का मुस्लिम द्वारा गैंगरेप क्यों नॉर्मल लगता है?

बात यह है कि हर मामले में मुस्लिम लड़का ही क्यों होता है? ईसाई या सिक्ख लड़के आखिर किसी हिन्दू लड़की को अपना नाम हिन्दू वाला बता कर प्रेम करते क्यों नहीं पाए जाते?

2008 में फार्म हाउस में पार्टी, अब कर रहे इग्नोर: 26/11 पर राहुल गाँधी की चुप्पी 12 साल बाद भी बरकरार

साल 2008 में जब पाकिस्तान के आतंकी मुंबई के लोगों को सड़कों पर मार चुके थे उसके कुछ दिन बाद ही गाँधी परिवार के युवराज अपने दोस्त की संगीत रस्म को इंजॉय कर रहे थे।

’26/11 RSS की साजिश’: जानें कैसे कॉन्ग्रेस के चहेते पत्रकार ने PAK को क्लिन चिट देकर हमले का आरोप मढ़ा था भारतीय सेना पर

साल 2007 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अजीज़ को उसके उर्दू भाषा अखबार रोजनामा राष्ट्रीय सहारा के लिए उत्कृष्ट अवार्ड दिया था। कॉन्ग्रेस में अजीज़ को सेकुलरिज्म का चमचमाता प्रतीक माना जाता था।

नाबालिगों से गैंगरेप, जबरन मुस्लिम बनाना, नाम बदल कर दोस्ती… SIT की वह रिपोर्ट जिसे वामपंथी नकार रहे हैं

ऑपइंडिया के पास मौजूद SIT रिपोर्ट में स्पष्ट लिखा है कि यह ग्रूमिंग जिहाद के कुछ बेहद चर्चित मामले थे, जिनमें हिन्दू युवतियों को धोखा देकर उनके धर्मांतरण का प्रयास या उनका उत्पीड़न किया गया।

‘कबीर असली अल्लाह, रामपाल अंतिम पैगंबर और मुस्लिम असल इस्लाम से अनजान’: फॉलोवरों के अजीब दावों से पटा सोशल मीडिया

साल 2006 में रामपाल के भक्तों और पुलिसकर्मियों के बीच हिंसक झड़प हुई थी जिसमें 5 महिलाओं और 1 बच्चे की मृत्यु हुई थी और लगभग 200 लोग घायल हुए थे। इसके बाद नवंबर 2014 में उसे गिरफ्तार किया गया था।

26/11 की नाकामी छिपाने के लिए कॉन्ग्रेस चाटुकारों की फौज के साथ किसानों को भड़काने में जुटी, शेयर की पुरानी तस्वीरें

कॉन्ग्रेस की एकमात्र कोशिश है कि बस किसी तरह लोगों का ध्यान इस दिन किसी दूसरे मुद्दे की ओर भटक जाए और कोई उनकी नाकामयाबी व कायरता पर बात न करे।

केरल: राहुल गाँधी ने बाढ़ पीड़ितों के लिए भेजी थी राहत किटें, बंद दुकान में लावारिस मिलीं

बाढ़ प्रभावितों के लिए राहुल गाँधी की तरफ से भेजी गई राहत किटें केरल के एक दुकान में लावारिस मिली हैं।

दिल्ली के बेगमपुर में शिवशक्ति मंदिर में दर्जनों मूर्तियों का सिर कलम, लोगों ने कहते सुना- ‘सिर काट दिया, सिर काट दिया’

"शिव शक्ति मंदिर में लगभग दर्जन भर देवी-देवताओं का सर कलम करने वाले विधर्मी दुष्ट का दूसरे दिन भी कोई अता-पता नहीं। हिंदुओं की सहिष्णुता की कृपया और परीक्षा ना लें।”

शादी के लिए धर्म-परिवर्तन की धमकी पर 10 साल, कराने वाले मौलवियों/पुजारियों को 5 साल सजा: MP में सख्त विधेयक

शादी में धर्मांतरण का लालच देने, धमकाने और दबाव बनाने पर 10 साल की सज़ा का प्रावधान होगा। मध्य प्रदेश में इस विधेयक का मसौदा...

हमसे जुड़ें

272,571FansLike
80,404FollowersFollow
358,000SubscribersSubscribe