लिबरपंथियो, आँकड़े चाहिए हिन्दुओं पर हुए अत्याचार के? ये लो – रेप, हत्या, मंदिर सब का डेटा है यहाँ

ओवैसी किस आधार पर उम्मीद कर रहे हैं कि अमित शाह पहले पाकिस्तान में सर्वे कराएँ, उसके बाद ही कुफ़्र आस्था का ख़मियाजा भुगत रहे लोगों के लिए कुछ करें?

असदुद्दीन ओवैसी को डेटा चाहिए। संख्या चाहिए कि इतने हिन्दू पाकिस्तान में बलात्कृत हो रहे हैं, इतने ईसाईयों को बांग्लादेश में मारा जा रहा है, इतने सिख अफ़ग़ानी तालिबान से त्रस्त हैं। इस डेटा के बिना उन्हें विश्वास नहीं हो रहा कि ‘पाक-इस्तान’ जैसी पाक़, अल्लाह के पवित्र किताब में बताए गए हुक्म की बिना पर बनी और उसी के हिसाब से चल रही ज़मीन पर रह रहे काफ़िरों और धिम्मियों को इतनी दिक्कत है कि उन्हें भारत आने की ज़रूरत पड़ जाए। वो अमित शाह से ‘सटीक संख्या’ माँग रहे हैं। संख्या ऐसे है:

पाकिस्तान: 95% मंदिर छीन लिए, सिखों के सर होते हैं कलम, सबसे ज्यादा चर्चों पर हमले

पाकिस्तान की हालत के बारे में जितना ही बोला जाए, उतना कम है। हिन्दुओं की लगातार घटती जनसंख्या के बीच उनकी संसद के अंदर आँकड़ा रखा गया था कि हर साल एक हज़ार हिन्दू लड़कियों को जबरन मुसलमान बना दिया जाता है। ज़ाहिर सी बात है कि जब वे इसके लिए तैयार नहीं होतीं हैं तो इसके लिए उनसे बलात्कार होता है, मारा-पीटा जाता है। परिवार में वापिस न चली जाएँ, इसके लिए उनसे कलमा पढ़वाने के बाद बलात्कारी से ही निकाह करवा दिया जाता है, और एक कागज़ लिखवा लिया जाता है कि वो अपने माँ-बाप से तंग है और मर्जी से निकाह कर रही है; अगर वे उसके अपहरण की एफआईआर करते हैं, तो यह उसे ढूँढ़ने और वापिस काफिर बनाने का पैंतरा है। अमूमन लड़की नाबालिग होती है, तो उसका नकली जन्म प्रमाणपत्र बनवा लिया जाता है। इसी सब अत्याचार से तंग आ कर 5,000 हिन्दू हर साल अपना घरबार छोड़ कर भारत भाग आते हैं

पाकिस्तान में हिन्दुओं के 95% मंदिरों पर कब्ज़ा कर उनमें दुकानें चलाई जातीं हैं। ईसाईयों के कत्लेआम और चर्चों पर हमले, दोनों में टॉपर रह चुका है पाकिस्तान।

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कभी मुस्लिम आक्रांताओं और औरंगज़ेब के सिपहसालारों जैसे देसी जिहादियों की मौत कहे जाने वाले सिख समुदाय की हालत भी ऐसी ही है। 2014 से 2018 के बीच 10 बार उन्हें निशाना बनाकर हमले किए गए। तालिबान का लगाया हुआ जज़िया न चुका पाने पर एक सिख का सिर कलम कर दिया गया

बांग्लादेश: हिन्दुओं पर लगता है ‘दोहरी निष्ठा’ का आरोप, हमले के लिए हर समय बहाने की तलाश

बांग्लादेश में दो हिन्दुओं ने फ़ेसबुक पर इस्लाम की आलोचना कर दी, तो इसका अंजाम 3,000 से ज़्यादा हिन्दुओं को घरबार आगजनी में खो कर भुगतना पड़ा। जमात-ए-इस्लाम, जिसने बांग्लादेश के राष्ट्रपिता और तत्कालीन राष्ट्रपति शेख मुजीब की हत्या की, के उपाध्यक्ष को 30 साल बाद मौत की सज़ा, मौत की सज़ा मिली, तो इसका भी गुस्सा 1500 हिन्दू घरों और 50 मंदिरों पर निकला

इससे बड़ा दोहरापन क्या होगा कि जिस पाकिस्तान-बांग्लादेश की नींव में ही मुसलमानों में दोहरी निष्ठा (अपने निवास का देश, बनाम ख़लीफ़ा की ख़िलाफ़त और इस्लाम की उम्मत) हो, वह किसी अन्य समुदाय पर ‘दोहरी निष्ठा’ का आरोप लगाए? लेकिन बांग्लादेश में यही होता है। और इसे करने वाली भी ‘भारत की मित्र’ कहीं जाने वाली शेख हसीना वाजेद हैं, जिनके पिताजी को (ओवैसी गुस्ताख़ी माफ़ करें, लेकिन सच यही है) पाकिस्तान की सरकार ने बांग्लादेश बनने के पहले ही कुत्ते की मौत मार डाला होता, अगर भारत के हिन्दुओं ने, हिन्दू प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने बांग्लादेशी हिंदुओं के साथ बंगालियों के रोटी-बेटी के संबंध को याद कर शरण न दी होती। आज वही संबंध आँख में खटकता है, और 1 करोड़, 40 लाख हिन्दू दोनों पार्टियों के निशाने पर रहते हैं। शेख हसीना के ऐब अपनी कट्टर जिहादिन विपक्षी खालिदा जिया के आगे बस याद नहीं आते, जैसे इस लेख के मुख्य विषय अकबर ओवैसी अपने भाई की खुद से भी घटिया बदज़ुबानी के चलते ‘अच्छा वाला’ ओवैसी बने घूमते हैं।

केवल हिन्दू ही क्यों, इनके आतंक से अन्य समुदाय भी त्रस्त हैं। केवल 2018 के 11 महीनों में बांग्लादेश के अल्पसंख्यकों ने खुद पर मज़हबी प्रताड़ना के 1700 से अधिक आरोप लगाए हैं। और अगर किसी को ऐसा लग रहा है कि आरोप भर लगने से कोई दोषी नहीं हो जाता, तो उसे यह भी पता होना चाहिए कि मज़हबी हिंसा के 20,000 दोषी भी खुले घूम रहे हैं उसी देश में। 2012 में बौद्धों के मठों और घरों पर सिलसिलेवार हमले में 25,000 लोगों के शामिल होने का अनुमान लगाया गया है।

दूसरे देशों के आँकड़े जुटाना इतना नहीं आसान

ये आँकड़े बानगी के लिए काफ़ी हैं, क्योंकि पतीली के कुछ चावल से ही खाना पका या नहीं, पता चल जाता है। ओवैसी जिस लाटसाहबी से अमित शाह से ”सटीक आँकड़े” माँग रहे हैं, उन्हें शायद पता नहीं है कि दूसरे देश के बारे में इतने महीन आँकड़े सटीकता से ला पाना आसान नहीं है। या शायद पता है, फिर भी बरगला रहे हैं। लेकिन ये कितना मुश्किल है, इसका एक उदाहरण देता हूँ।

विकिपीडिया पर पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के बारे में बने पेज पर दावा किया गया है कि पाकिस्तान की जनसंख्या में हिन्दू और अन्य अल्पसंख्यकों की हिस्सेदारी में कमी केवल 1971 के विभाजन के चलते आई है, वरना पाकिस्तान में हिन्दुओं की जनसंख्या और उनका अनुपात तो बढ़े ही हैं। सबूत के तौर पर पाकिस्तान के डॉन अख़बार के ताज़ा जनगणना से जुड़े किसी लेख का हवाला दिया गया है।

केवल पढ़ कर, लिंक लगी देखकर कोई भी धोखा खा जाएगा। लेकिन इसे अगर आप खोलें तो पाएँगे कि जिस दावे का ‘सबूत’ इस लिंक को बताया जा रहा है, वह तो इसमें किया ही नहीं गया है। यानि पाकिस्तान की जिहादी प्रोपेगंडा मशीनरी इतनी सक्रिय है कि एक सच का विकिपिडिया आर्टिकल भी नहीं निकल सकता। ऐसे में ओवैसी किस आधार पर यह उम्मीद कर रहे हैं कि अमित शाह एनआरसी लाने के पहले पाकिस्तान में एनएसएसओ का सर्वे कराएँ, उसे आईएसआई से प्रमाणित कराएँ, और उसके बाद ही वहाँ केवल अपनी कुफ़्र आस्था का ख़मियामाजा भुगत रहे लोगों के लिए कुछ करें?

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शरजील इमाम
शरजील इमाम वामपंथियों के प्रोपेगंडा पोर्टल 'द वायर' में कॉलम भी लिखता है। प्रोपेगंडा पोर्टल न्यूजलॉन्ड्री के शरजील उस्मानी ने इमाम का समर्थन किया है। जेएनयू छात्र संघ की काउंसलर आफरीन फातिमा ने भी इमाम का समर्थन करते हुए लिखा कि सरकार उससे डर गई है।

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