Wednesday, July 28, 2021
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काँचा इलैया जी, धूर्तता से सने शब्दों में आपका ब्राह्मण-विरोधी रेसिज़्म निखर कर सामने आता है

काँचा के कुतर्क के हिसाब से वो पत्रकारिता के जिस समुदाय विशेष में घूम रहे हैं, उसके काले कारनामों की फेहरिस्त के चलते सभी पत्रकारों को बौद्धिक रूप से दिवालिया और नैतिक रूप से पतित मान लिया जाए? फिर तो उनको सीरियसली लेने की ज़रूरत ही नहीं।

ओबीसी समुदाय में पैदा होने के बाद भी दलित पहचान जबरिया हड़पने वाले काँचा इलैया शेफर्ड ने ‘द वायर’ में लिखा, ‘मोदी की तरह चौकीदार बनने से इंकार कर सुब्रमण्यम स्वामी ने अपनी जातिवादी-ब्राह्मणवादी मानसिकता जताई!’

और ब्राह्मणवाद को (और इसके बहाने ब्राह्मणों को) गरियाना इतना जरूरी हो गया कि जो वायर मोदी को संघ के ‘गुंडा हिन्दूवाद’ का वाहन बताता था, वही आज मोदी को ‘ब्राह्मणवादी’ भाजपा के अन्दर ‘बेचारा’ दिखाने को तैयार हो गया। मतलब ब्राह्मणों के प्रति नफरत फैलानी इतनी जरूरी है कि मोदी से सहानुभूति भी चलेगी?

हार्वर्ड, कैम्ब्रिज, और हार्ड वर्क- तीनों से ज्यादा बड़ा होता है परिप्रेक्ष्य

काँचा इलैया शुरू में ही हमें याद दिलाते हैं कि कैसे मोदी ने एक बार ‘हार्ड वर्क’ (परिश्रम) को हार्वर्ड (विश्वविद्यालय) से बड़ा बताया था, और बताते हैं कि आज हार्वर्ड से पढ़े सुब्रमण्यम स्वामी मोदी का अपमान कर रहे हैं। तो काँचा इलैया जी, परिप्रेक्ष्य देखिए, परिप्रेक्ष्य। मोदी ने ‘हार्वर्ड’ नाम के पीछे केवल अमर्त्य सेन या पी चिदंबरम को नहीं घेरा था बल्कि अपने आलोचकों की उस पूरी लॉबी को निशाने पर लिया था जिनका मोदी का विरोध करने के लिए एक ही तर्क था, ‘हम हार्वर्ड (या ऐसे ही ‘एलीट’ विश्विद्यालय) से पढ़े हैं/में पढ़ाते हैं, इसलिए हमारी बात ‘अनपढ़’ मोदी से बेहतर है…’

वहीं यहाँ इस मसले में सुब्रमण्यम स्वामी ने कहीं भी अपने ‘हार्वर्डत्व’ का हवाला नहीं दिया। ऐसे में आपको एक ‘कैची हेडलाइन’ देने के अलावा इस “हार्वर्ड-हार्ड वर्क” की हाय-हत्या का यहाँ कोई काम नहीं था।

रही बात जो आप मणिशंकर अय्यर के ‘कैम्ब्रिज वाला ब्राह्मण’ होकर मोदी के चायवाले होने के अपमान की बात करते हैं, तो यह भी मणिशंकर अय्यर का दोष था- न कैंब्रिज का, न उनके ब्राह्मण घर में पैदा होने का।

आइए मूल मुद्दे पर- ब्राह्मणों से racist नफरत

काँचा इलैया जी, आपके अनुसार सुब्रमण्यम स्वामी का कथन समूची भाजपा और वृहद् संघ परिवार में मौजूद ‘जातिवादी’ मानसिकता का सबूत है।

इसमें कोई दोराय नहीं कि डॉ स्वामी कुछ मामलों में पुराने ख्यालात के हैं- वह समलैंगिकता के सार्वजनिक प्रदर्शन पर भी आपत्ति खुल कर जता चुके हैं, पर इसे पूरे एक राजनीतिक दल से आपने किस आधार पर जोड़ दिया?

क्या भाजपा में और किसी ने अपने ट्विटर हैंडल को बदलने से इस आधार पर इंकार किया कि उसके जन्मना-वर्ण में चौकीदारी नहीं हो सकती?

आप संघ को भी लपेटे में ले लेते हैं। क्या संघ चुनाव लड़ रहा है?

‘मैं भी चौकीदार’ राहुल गाँधी के भाजपा पर एक राजनीतिक आरोप के जवाब में शुरू किया गया था। क्या राहुल गाँधी ने संघ पर ‘चोरी’ का आरोप लगाया था?

संघ खुद को एक सांस्कृतिक संगठन कहता है- वह भाजपा ही नहीं, करीब दर्जन भर अनुषांगिक संगठनों के चलने के लिए मार्ग की सलाह भर देता है। क्यों बदले ट्विटर हैंडल वह, या उसके स्वयंसेवक?

इसके अलावा, अगर आप कथनों के आधार पर ही चलना चाहते हैं तो आपको यह पता है या नहीं कि मोदी प्रशासन में लाख मीन-मेख निकालने के बाद भी सुब्रमण्यम स्वामी मोदी को ही एस देश की इकलौती उम्मीद बताते हैं आगामी चुनावों में। कौन जातिवादी ऐसा करता है?

और अगर एक मिनट के लिए सुब्रमण्यम स्वामी को ‘दुष्ट जातिवादी-ब्राह्मणवादी’ मान भी लिया जाए, तो सुब्रमण्यम स्वामी के ऐसे होने से भाजपा-संघ के और इस देश के सभी ब्राह्मण सुब्रमण्यम स्वामी जैसे ही हो गए? ऐसे तो आप पत्रकारिता के जिस समुदाय विशेष में घूम रहे हैं, उसके काले कारनामों की फेहरिस्त के चलते सभी पत्रकारों को बौद्धिक रूप से दिवालिया और नैतिक रूप से पतित मान लिया जाए?

और ब्राह्मणों को आप इतना गरिया ही रहे हैं तो एक बात यह भी बताइए – अगर पुरानी जाति व्यवस्था ब्राह्मणों ने ही अपने स्वार्थ और एकाधिकार के लिए बना रखी थी तो केवल ब्राह्मणों से ही फटेहाल-कंगाल होने की उम्मीद क्यों होती थी पुरातन काल में? क्यों उनके भिक्षावृत्ति के अलावा हर अन्य प्रकार से धनोपार्जन पर रोक थी? क्यों हर अपराध में उन्हीं के लिए सबसे ज्यादा समय तक के कारावास का निर्धारण था? क्यों ‘स्वादिष्ट’ माँस-मछली-मदिरा केवल उन्हीं के लिए अभक्ष्य था? आज भी बिहार निकल जाइए तो ऐसे गाँवों की फ़ेहरिस्त है जहाँ का ब्राह्मण बाकी जगह दलित (यानि दबाया हुआ) कहलाने वाले समुदाय से ज्यादा बदहाल है।

इसके अलावा और सबूत चाहिए तो अपने (छद्म)-उदारवादी गैंग के आधे-दुलारे शशि थरूर की किताब ‘Era of Darkness’ का चौथा चैप्टर ‘Divide et Impera’ पढ़ लीजिए, कि कैसे वह अंग्रेज थे जिन्होंने जाति को एक गतिमान, परिवर्तनशील सामाजिक व्यवस्था से एक रूढ़ियों में जकड़ी उत्पीड़न व्यवस्था में बदल दिया।

सच्चाई यह है कि पुरानी वर्ण-व्यवस्था में जकड़न से बनी जाति-व्यवस्था में सभी जातियों के लिए किसी न किसी प्रकार की समस्या निहित थी। इसीलिए आज उसे पीछे छोड़ समाज आगे बढ़ने का प्रयास कर रहा है। यह सच है कि एक समय (पाँच हजार साल पहले से नहीं, केवल अंग्रेजों की मौजूदगी वाली कुछ सदियों में) कुछ जातियों ने अन्य जातियों का सामाजिक उत्पीड़न किया, यह भी सच है कि कुछ स्थानों पर यह आज भी जारी है। पर आज का समाज इन्हें प्रश्रय या बढ़ावा नहीं दे रहा, इनका प्रतिकार और उन्मूलन कर रहा है।

पर आपके जैसे लोग हैं असली जातिवादी, जो अपनी NGO-वादी, victimology पर आधारित मुफ़्त की रोटी बचाने के लिए जाति का मसला ख़त्म नहीं होने देना चाहते। आपके जैसे लोग एक-दो साल के लिए अपने सुर या तो बदल दें या शांत हो जाएँ जातिवाद प्राकृतिक मौत मर जाएगा।

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