Tuesday, September 22, 2020
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फर्श से सत्ता के अर्श तक: अभाव में कोई AK47 उठाता है, कोई जितना है, वही बाँट लेता है

जब देश बेरोजगारी से जूझ रहा था और नक्सलवाद का बीज बोया जा रहा था तब युवाओं में मार्क्सवादी कीड़ा घुस जाना आम बात हुआ करती थी। परन्तु अत्यंत गरीबी में पले बढ़े होने के बावजूद नरेंद्र मोदी को मार्क्सवादी विचारधारा छू भी नहीं पाई थी।

एक पुरानी कहानी है जो रीडर्स डाईजेस्ट के जुलाई 2014 अंक में प्रकाशित हुई थी। बहुत से लोगों ने पहले भी पढ़ी होगी फिर भी आज लिखने का मन हुआ। सन् 1990 की गर्मियों की बात है। असम की रहने वाली दो युवतियाँ जो भारतीय रेलवे सेवा की परिवीक्षाधीन अधिकारी थीं, ट्रेन से लखनऊ से दिल्ली जा रही थीं। प्रथम श्रेणी के उसी डिब्बे में दो सांसद भी यात्रा कर रहे थे जिनके साथ दर्जन भर लफंगे भी थे। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि उस जमाने में जब कोई सांसद बन जाता था तो उसके साथ ढेरों लुच्चे-लपाड़ी, चेले-चपाटे समर्थक भी साथ चलते थे। आज भले ही लोग मोबाइल कैमरे से थोड़ा डरते हों किंतु नब्बे का दशक ‘शूल’ फिल्म के ‘बच्चू यादव’ टाइप विधायक और सांसदों का कालखंड हुआ करता था।

बहरहाल, नेताजी के साथ यात्रा कर रहे उन लफंगों ने असम की उन दो युवतियों पर भद्दे कटाक्ष किये और उन्हें उनकी आरक्षित सीट छोड़कर बैग और सामान के ऊपर बैठने को बाध्य किया। चूँकि डिब्बे में सांसदों और उनके चेलों के अतिरिक्त केवल वही दोनों युवतियाँ थीं इसलिए उन लफंगों के मन में जो आया वह कहते रहे और प्रताड़ित करते रहे। सब कुछ सहती हुई वे दोनों पूरी रात टीटीई की प्रतीक्षा करती रहीं किन्तु कोई नहीं आया। किसी प्रकार यात्रा पूरी कर दोनों युवतियाँ अगले दिन दिल्ली पहुँचीं। दिल्ली पहुँच कर एक युवती वहीं रुक गयी तथा दूसरी अपनी एक अन्य सहेली के साथ भारतीय रेलवे सेवा की ट्रेनिंग के अगले चरण के लिए रात की ट्रेन से दिल्ली से अहमदाबाद की यात्रा पर निकल पड़ी।

इस बार ट्रेन में आरक्षण नहीं मिला था और टिकट वेटिंग में था। युवतियों ने टीटीई से कोई खाली सीट दिलाने की प्रार्थना की। टीटीई महोदय ने कहा कि ट्रेन तो भरी हुई है, फिर एक कम्पार्टमेंट में ले गए जहाँ केवल दो बर्थ थी। उसपर भी दो भलेमानस विराजमान थे। टीटीई ने युवतियों से कहा, “चिंता मत कीजिये ये दोनों सज्जन पुरुष हैं और प्रायः इसी ट्रेन से यात्रा करते हैं आपको दिक्कत नहीं होगी।” इतना कहकर टीटीई चला गया। दोनों ‘सज्जन’ पुरुषों ने खादी पहनी थी यह देखकर युवतियाँ समझ गयीं कि ये दोनों भी नेता हैं। नेताओं के साथ यात्रा करने का परिणाम एक युवती चौबीस घंटे पहले ही भुगत चुकी थी इसलिए उसे डर लग रहा था लेकिन ओखली में सर देने के बाद मूसल से क्या डरना यही सोचकर दोनों ने वहीं बैठने का निश्चय किया।

आश्चर्यजनक रूप से उन दोनों पुरुषों ने युवतियों का सामान बड़े कायदे से सीट के अंदर घुसा दिया और बातचीत करने लगे। वार्तालाप प्रारंभ हुआ तो पता चला कि वे दोनों व्यक्ति गुजरात में भाजपा के कार्यकर्ता हैं। युवतियों ने उन्हें अपना नाम बताया- एक का नाम लीना सरमा था और दूसरी उत्पलपर्णा। उत्पलपर्णा ने इतिहास में एमए किया था अतः भारत के इतिहास पर बातें होने लगीं। उन दोनों पुरुषों को इतिहास में खासी रुचि और विषय का ज्ञान भी था। स्वतंत्रता के पूर्व हिन्दू महासभा और श्यामाप्रसाद मुखर्जी की बातें होने लगीं तो उन दोनों पुरुषों में से जो कम वय का लग रहा था उसने लीना से पूछा, “आप श्यामाप्रसाद मुखर्जी को कैसे जानती हैं?” लीना ने उत्तर दिया कि श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने उनके पिताजी को कलकत्ता विश्वविद्यालय में छात्रवृत्ति दिलाने में सहायता की थी।

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बातचीत समाप्त होते-होते खाना खाने का समय हो चला तो चार शाकाहारी थाली मंगाई गयी। भोजन करने के पश्चात कम आयु वाले व्यक्ति ने सभी का भोजन का पैसा चुका दिया। उसके बाद जब सोने का समय हुआ तो उन दोनों भाजपा के कार्यकर्ताओं ने ट्रेन की फर्श पर सोने का निर्णय लिया और लीना और उत्पलपर्णा को अपनी दोनों बर्थ आराम से सोने के लिए दे दी। प्रातःकाल जब ट्रेन अहमदाबाद पहुँची तो आयु में बड़े व्यक्ति ने लीना और उत्पलपर्णा से अहमदाबाद में ठहरने के ठिकाने के बारे में भी पूछा। उसने कहा कि वे चाहें तो उसके घर में रह सकती हैं। कम आयु वाले व्यक्ति ने कहा कि वह तो घुमक्कड़ है उसका कोई निश्चित ठिकाना नहीं है इसलिए वे उसके मित्र के घर में रह सकती हैं। लीना और उत्पलपर्णा को उन दोनों पुरुषों के निमन्त्रण को विनम्रतापूर्वक अस्वीकार करना पड़ा क्योंकि वे तो ट्रेनिंग के लिए आई थीं इसलिए सरकारी आवास की सुविधा तो उन्हें मिलती ही। इसके बाद दोनों सज्जन पुरुषों ने हाथ जोड़ा और अपने रस्ते चल पड़े।

लीना सरमा और उत्पलपर्णा को जो दो व्यक्ति ट्रेन में मिले थे उनमें से आयु में बड़े वाले शंकर सिंह वाघेला थे और छोटे वाले थे नरेंद्र मोदी जो आज भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री हैं। यह कहानी 2014 में रीडर्स डाइजेस्ट से पहले सन 1995 में असम के समाचार पत्र दैनिक असम और द हिन्दू के किसी संस्करण (तारीख याद नहीं) में भी प्रकाशित हुई थी।

भारतीय रेल की फर्श नब्बे के दशक में इतनी गंदी होती थी कि आजकल स्लीपर में यात्रा करने वाले नौजवान उस समय वयस्क होते तो उस फर्श पर सोना तो दूर बैठना पसंद न करते। नेता तो आज भी ऐसे होते हैं कि विधायक और सांसद तो छोड़िये किसी पार्टी के पार्षद से दोस्ती भी हो जाये तो पूरे नगर में अपनी हेकड़ी दिखाते हैं। दो युवतियों के लिए अपनी सीट स्वेच्छा से छोड़कर ट्रेन की फर्श पर सोने वाला नेता आज देश का प्रधानमंत्री है। ट्रेन की गंदगी ही नहीं बल्कि समूचे देश के मानस में व्याप्त गंदगी उसने देखी है और उसका अनुभव किया है इसीलिए वह व्यक्ति साफ़ सफाई का आग्रह कर पाता है।

सुविख्यात अर्थशास्त्री राजीव कुमार नरेंद्र मोदी के व्यक्तिगत जीवन पर प्रकाश डालते हुए लिखते हैं कि रेलवे स्टेशन पर ट्रेन में यात्रा कर रहे सैनिकों को चाय पिलाते हुए नरेंद्र मोदी ने सैनिक स्कूल में पढ़ने का सपना पाला था लेकिन उनके पिताजी ने जाने नहीं दिया। राजीव कुमार का एक महत्वपूर्ण आकलन है कि जब देश बेरोजगारी से जूझ रहा था और चारू मजूमदार नक्सलवाद का बीज बो रहा था तब युवाओं में मार्क्सवादी कीड़ा घुस जाना आम बात हुआ करती थी। परन्तु अत्यंत गरीबी में पले बढ़े होने के बावजूद नरेंद्र मोदी को मार्क्सवादी विचारधारा छू भी नहीं पाई थी।

नरेंद्र मोदी बाल्यकाल से ही प्रतिदिन अपनी गली के गिरिपुर महादेव मन्दिर दर्शन करते थे और उसपर भगवा ध्वज लहराते थे। हिंदुत्व और स्वामी विवेकानंद की प्रेरणा से ही ट्रेन के फर्श से सत्ता के अर्श पर पहुँचा यह व्यक्ति आज सवा सौ करोड़ भारतवासियों की प्रेरणा का स्रोत है क्योंकि हिंदुत्व अभावों में जीने को बुरा मानकर बंदूक उठाने को नहीं कहता बल्कि अभाव में भी कुछ न कुछ प्रेम का भाव साझा करने का संदेश देता है।

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