Tuesday, June 25, 2024
Homeराजनीति'शरद पवार परिवार के प्रभाव और दबदबे के कारण...': लवासा प्रोजेक्ट पर बॉम्बे HC...

‘शरद पवार परिवार के प्रभाव और दबदबे के कारण…’: लवासा प्रोजेक्ट पर बॉम्बे HC का फैसला, नियमों को ताक पर रख कर हुआ था काम

अदालत ने अपने आदेश में लवासा हिल स्टेशन परियोजना को शरद पवार के दिमाग की उपज बताया। हाई कोर्ट ने परियोजना पर उठाए गए सवालों को योग्य बताया।

बॉम्बे हाई कोर्ट ने पुणे के पास हिल स्टेशन लवासा के निर्माण से संबंधित परियोजना के लिए दी गई अनुमति पर कोई आदेश पारित करने से इनकार कर दिया। इसके साथ ही कोर्ट ने कहा कि सरकारी तंत्र पर राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस पार्टी (NCP) प्रमुख शरद पवार और उनके परिवार के ‘प्रभाव एवं दबदबे’ के कारण ही इसका विकास हुआ। 

अदालत ने अपने आदेश में लवासा हिल स्टेशन परियोजना को शरद पवार के दिमाग की उपज बताया। हाई कोर्ट ने परियोजना पर उठाए गए सवालों को योग्य बताते हुए कहा कि लवासा सिटी को लेकर राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस अध्यक्ष शरद पवार और सांसद सुप्रिया सुले की रुचि स्पष्ट रुप से दिखाई दे रहा है। इससे यह साबित होता है कि आरोप सही हैं।

जज ने कहा कि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि शरद पवार और सुप्रिया सुले द्वारा प्रभाव और दबदबा का इस्तेमाल करना अनुचित निष्कर्ष है। इस तथ्य को दरकिनार नहीं किया जा सकता है। बता दें कि 2001 में महाराष्ट्र सरकार ने हिल स्टेशन के विकास की अनुमति दी थी। तत्कालीन उपमुख्यमंत्री अजित पवार जल संशाधन मंत्री थे, उनके आदेश से इस परियोजना को अनुमति मिली थी। जिसका याचिकाकर्ता ने विरोध किया था।

याचिकाकर्ता अधिवक्ता नानासाहेब जाधव ने यह कहते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया था कि पवार परिवार राजनीतिक स्थिति की वजह से बहुत शक्तिशाली और प्रभावशाली है। उन्होंने कहा कि इस राजनीतिक दबदबे की वजह से लवासा हिल स्टेशन परियोजना का विकास हुआ।

जनहित याचिका में राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी प्रमुख शरद पवार, उनकी बेटी और लोकसभा सांसद सुप्रिया सुले और शरद के भतीजे और उपमुख्यमंत्री अजीत पवार को प्रतिवादी के रूप में नामजद किया गया था। हालाँकि, जवाब में केवल अजीत पवार ने हलफनामा दाखिल किया। 

इस याचिका में आगे कहा गया था कि तमाम विरोधों और चुनौतियों को दरकिनार करते हुए शरद पवार और उनके परिवार ने मिलकर अपने करीबी उद्योगपति को यह प्रोजेक्ट दिलवाया और प्रोजेक्ट को बचाने के लिए साल 2005 के कानून में फेरबदल करवाया। याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि प्रोजेक्ट के लिए पर्यावरण के नियमों की धज्जियाँ उड़ाई गईं और राज्य सरकार के अलग-अलग विभागों से गलत तरीके से परमिशन लेकर प्रोजेक्ट को पूरा किया गया। याचिकाकर्ता ने अपनी शिकायत में यह भी आरोप लगाया कि लवासा हिल स्टेशन के प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए किसानों से कौड़ियों के मोल जमीन खरीदी गई। यानी एक तरह से कब्जाई गई।

आगे याचिका में लवासा के विकास के लिए विकास आयुक्त (उद्योग) की ओर से दी गई विशेष अनुमति को अमान्य, मनमानी, अनुचित और राजनीतिक पक्षपात पर आधारित घोषित करने की अपील की गई थी।

क्यों उठे लवासा प्रोजेक्ट पर सवाल?

हिल स्टेशन लवासा प्रोजेक्ट पर पर्यावरण मंत्रालय ने ‘पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन’ की अधिसूचना का उल्लंघन करने का आरोप लगाया था और कहा था कि निर्माण अनाधिकृत है और इससे पर्यावरण को नुकसान हुआ है। मंत्रालय ने कहा था कि लवासा जैसे बड़े हिल स्टेशन के प्रोजेक्ट को शुरू करने के लिए पर्यावरण अनुमति सबसे अहम होती है। प्रोजेक्ट के लिए यह अनुमति देने का अधिकार सिर्फ केंद्र सरकार के पास है। 

वहीं प्रोजेक्ट पर जारी CAG की रिपोर्ट में खुलासा हुआ था कि लवासा प्रोजेक्ट में नियमों का पालन नहीं हुआ है। लवासा प्रोजेक्ट के तहत निजी कंपनियों को फायदा पहुँचाने की कोशिश की गई। तत्कालीन कृषि मंत्री शरद पवार के लवासा प्रोजेक्ट का समर्थन करने की बात भी सीएजी रिपोर्ट में सामने आई। सीएजी रिपोर्ट के मुताबिक अगर एकसमान पॉलिसी होती तो कई और हिल स्टेशन बन सकते थे।

Special coverage by OpIndia on Ram Mandir in Ayodhya

  सहयोग करें  

एनडीटीवी हो या 'द वायर', इन्हें कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

ऑपइंडिया स्टाफ़
ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

NEET-UG विवाद: क्या है NTA, क्यों किया गया इसका गठन, किस तरह से कराता है परीक्षाओं का आयोजन… जानिए सब कुछ

सरकार ने परीक्षाओं के पारदर्शी, सुचारू और निष्पक्ष संचालन को सुनिश्चित करने के लिए विशेषज्ञों की एक उच्च स्तरीय समिति की घोषणा की है

हिंदुओं का गला रेता, महिलाओं को नंगा कर रेप: जो ‘मालाबर स्टेट’ माँग रहे मुस्लिम संगठन वहीं हुआ मोपला नरसंहार, हमें ‘किसान विद्रोह’ पढ़ाकर...

जैसे मोपला में हिंदुओं के नरसंहार पर गाँधी चुप थे, वैसे ही आज 'मालाबार स्टेट' पर कॉन्ग्रेसी और वामपंथी खामोश हैं।

प्रचलित ख़बरें

- विज्ञापन -