Monday, September 28, 2020
Home राजनीति आर्थिक रूप से पिछड़े सामान्य वर्गों को आरक्षण सही मायने में 'सबका साथ सबका...

आर्थिक रूप से पिछड़े सामान्य वर्गों को आरक्षण सही मायने में ‘सबका साथ सबका विकास’

आर्थिक आधार पर आरक्षण केवल अनारक्षित सामान्य वर्गों के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को राहत देने वाला ही नहीं है, बल्कि सामाजिक न्याय की अवधारणा को बल देने वाला भी है

जब संविधान निर्माताओं ने संविधान रचना की, तो उनके मन में यह सवाल था कि कैसे वंचितों को समाज में आगे बढ़ने की सहूलियत दी जाए। तब आरक्षण की व्यवस्था को सरंक्षण का साधन बनाया गया। वंचितों के रूप में सबसे पहले अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की पहचान की गई। पिछड़ापन का आधार सामाजिक और शैक्षणिक तय किया गया। उस समय अर्थ को आधार इसलिए भी नहीं बनाया गया क्योंकि अंग्रेजों के जाने के बाद बहुत बड़ी जनसंख्या ग़रीबी के चंगुल में थी।

शुरुआती क़दम के रूप में अनुसूचित जाति एवं जनजाति को आगे बढ़ने का रास्ता देना सबसे पहले ज़रूरी समझा गया। उन्होंने उनके लिए थोड़े समय के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था कर दी। उद्देश्य था कि वे अपने पैरों पर खड़े हो जाएँ, कालान्तर में यह मामला राजनीतिक रंग में रंगता चला गया। सत्ता की सड़क पर चलने के लिए बैसाखी की तरह इसका इस्तेमाल लगभग हर राजनीतिक पार्टी अपनी सुविधानुसार करने लगी और इसकी मूल भावना लुप्त हो गई।

बाद में पिछड़ों की गिनती में ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ (OBC) को भी शामिल करने की कवायद चली। कर्पूरी ठाकुर ने उन्हें आरक्षण देने के फ़ॉर्मूले का इस्तेमाल बिहार की राजनीति में अपनी पकड़ बनाने के लिए किया। परिणामस्वरुप उन्हें पिछड़ी जातियों का व्यापक समर्थन भी मिला था। उसके बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह ने भी मंडल कमीशन को लागू करके इस खेल को आगे बढ़ाया। मंडल कमीशन का गठन इंदिरा गाँधी ने अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए ही किया था।

उसके बाद उत्तर भारत में कांशीराम, मायावती, मुलायम और लालू की राजनीति तो दक्षिण भारत में करूणानिधि, जयललिता आदि लगभग सभी राजनेताओं की राजनीति कभी आरक्षण की वक़ालत कर तो कभी जनता को डराकर कि दूसरी पार्टियाँ, ख़ास तौर से बीजेपी, आरक्षण ख़त्म कर देंगी, चलती रही। आरक्षण न सिर्फ शिक्षण संस्थाओं बल्कि नौकरियों और यहाँ तक की प्रमोशन में भी दिया गया। इस तरह आरक्षण का खेल चलता रहा लेकिन आरक्षण का आधार जाति बानी रही क्योंकि भारत में जाति हमेशा से सामाजिक पहचान का कारण रही। जो जातिरुढ़ समाज बनने का प्रमुख कारण भी है। और आज एक तरफ़ हम समरसता पूर्ण समाज समाज चाहते हैं तो दूसरी तरफ़ आरक्षण की वज़ह से पिछड़ों की जातिगत पहचान भी क़ायम रखना चाहते हैं।

- विज्ञापन -

अगर हम राजनीति को एक तरफ़ रखकर सोचें तो, क्या लगता है आपको? क्या सिर्फ़ शैक्षणिक और सामाजिक पिछड़ापन ही पिछड़ापन है? अगर आपके पास धन-सम्पत्ति नहीं तो क्या आप अपना शैक्षणिक और सामाजिक पिछड़ापन दूर कर पाएँगे? ऐसे बहुत से लोग हैं जो कहने को अगड़े जाति (सामान्य) में आते हैं लेकिन उनकी आर्थिक स्थिति इतनी ख़राब है कि वो बेहद दयनीय जीवन जीने को अभिशप्त हैं। ऐसा नहीं है कि यह तथ्य अभी तक नज़रों से ओझल रहा हो। लेकिन अधिकांश दल एक तरह के आरक्षण को सही और दूसरे तरह के आरक्षण को गलत साबित करने में अपनी ऊर्जा खपाते रहें हैं।

और आज जब आर्थिक रूप से वंचितों को, जो अभी तक किसी भी तरह के सरंक्षण के दायरे में नहीं थे, को भी समाज की मुख़्य धारा में शामिल करने की एक कोशिश की जा रही है तो उसे राजनीति से प्रेरित बताकर ख़ारिज करने की कोशिश की जा रही है पर अफ़सोस ऐसा मंसूबा होने के बावजूद अधिकांश विपक्षी दल कसमसाहट के साथ ही सही, पर समर्थन देने को मज़बूर हैं।

आर्थिक रूप से पिछड़े सामान्य वर्ग के लोगों को दस प्रतिशत आरक्षण देने के मोदी सरकार के फ़ैसले को एक राजनीतिक फ़ैसला बताना और ये कहना कि इसका मक़सद चुनावी लाभ लेना है, उतना ही हास्यास्पद है जैसे छिपे तौर पर सही, बाक़ी दल इसका विरोध महान जनकल्याण के लिए कर रहे हों। उसका राजनीति से कोई लेना-देना न हो।

कोई भी राजनीतिक दल हो वह जनहित के फैसले लेते समय यह अवश्य देखता है कि उससे उसे कोई राजनीतिक और चुनावी लाभ मिलेगा या नहीं? इसी कारण एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम बना। मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू हुई और अन्य पिछड़ा वर्गों को 27 प्रतिशत आरक्षण दिया गया। मनरेगा कानून भी राजनीतिक हित साधने के लिए ही अस्तित्व में आया और यहाँ तक कि खाद्य सुरक्षा कानून भी। कुल मिलाकर किसी भी राजनीतिक दल या फिर सरकार से यह अपेक्षा नहीं करनी चाहिए कि वह जनहित का फैसला लेते समय अपने हित की चिंता न करे। एक तरह से, यह सही मायने में ‘सबका साथ सबका विकास’ ही है जो अब सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े सामान्य वर्ग के गरीबों के लिए लाए गए 10 प्रतिशत आरक्षण के प्रावधान के रूप में सामने आया है।   

मोदी सरकार ने एक बड़ा फैसला लेते हुए आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग को, इसमें सिर्फ़ हिन्दू धर्मावलम्बी अनारक्षित जातियों को ही नहीं बल्कि मुस्लिम, ईसाई और अन्य समुदायों को भी सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में 10% आरक्षण देने का फैसला लिया गया है। केंद्रीय मंत्री थावर चंद गहलोत ने लोकसभा में इससे संबंधित बिल पेश किया। सरकार ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए संवैधानिक संशोधन विधेयक 2018 (कांस्टीट्यूशन एमेंडमेंट बिल टू प्रोवाइड रिजर्वेशन टू इकोनॉमिक वीकर सेक्शन-2018) लोकसभा में पेश किया। इस विधेयक के जरिए संविधान की धारा 15 व 16 में बदलाव सुनिश्चित किया गया है। बिल लोकसभा में लंबी चर्चा और उसके बाद हुई वोटिंग के बाद पास हो गया। राज्यसभा में इस बिल को पेश किया गया है। वहाँ से पास होते ही, राष्ट्रपति के हस्ताक्षर की औपचारिकताओं के बाद ये विधेयक कानून का रूप ले लेगी।  

मोदी सरकार ने आर्थिक तौर पर कमज़ोर लोगों के लिए दस प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था करके न सिर्फ़ एक सामाजिक जरूरत को पूरा करने का ही काम किया है, बल्कि आरक्षण की राजनीति को भी एक नया मोड़ दिया है। इस फैसले के बाद आरक्षण माँगने के बहाने सड़कों पर उतरकर हंगामा करने की प्रवृत्ति पर भी कुछ हद तक लगाम लग सकती है।

हालाँकि हार्दिक पटेल और उन जैसे अन्य तमाम नेता जो आर्थिक आधार पर आरक्षण की माँग कर रहे थे। वे आज यह पूछ रहे हैं कि आखिर यह होगा कैसे? जो ऐसे सवाल पूछने में असहज़ता हो रही है। वे यह शोर कर रहे हैं कि आखिर मोदी सरकार इसे अपने कार्यकाल के अंतिम दौर में ही क्यों लाई? ऐसे सवाल उठाने में हर्ज नहीं है, अभिव्यक्ति की पूरी स्वतंत्रता है लेकिन यह याद रखा जाना चाहिए कि 2014 में आम चुनाव की अधिसूचना जारी होने के ठीक पहले मनमोहन सरकार ने जाटों को अन्य पिछड़ा वर्ग के दायरे में लाने का फैसला किया था, जो कि सर्वोच्च न्यायालय ने ख़ारिज कर दिया था।

इसी तरह इसी सरकार ने 2011 में पाँच राज्यों के विधानसभा चुनाव के ठीक पहले अल्पसंख्यकों के लिए साढ़े चार प्रतिशत आरक्षण की घोषणा की गई थी जो आदर्श चुनाव आचार संहिता का खुला उल्लंघन होने के कारण उस पर रोक लगा दी गई थी। यह भी याद रखना बेहतर होगा कि खाद्य सुरक्षा और शिक्षा अधिकार कानून भी आनन-फानन और बिना पूरी तैयारी के आए थे। इसी कारण उन पर प्रभावी ढंग से अमल नहीं हो सका।

10 प्रतिशत आर्थिक आरक्षण की एक बड़ी बाधा यह बताई जा रही है कि सुप्रीम कोर्ट ने यह व्यवस्था दे रखी है कि आरक्षण किसी भी सूरत में 50 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकता। इस व्यवस्था के बावजूद तथ्य यह है कि कई राज्यों में आरक्षण सीमा 60 प्रतिशत से भी अधिक है और वहाँ लोग आरक्षण का लाभ भी उठा रहे हैैं। हालाँकि, आर्थिक आरक्षण संबंधी कानून बनने में अभी देर है, लेकिन यह अंदेशा अभी से जताया जा रहा है कि ऐसे किसी कानून के संदर्भ में न्यायपालिका की ओर से यह कहा जा सकता है कि यह संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन करता है। पता नहीं इस अंदेशे का आधार कितना पुख्ता है, लेकिन किसी को यह बताना चाहिए कि संविधान का मूल ढाँचा क्या है?

संविधान निर्माताओं ने कभी यह व्याख्यायित नहीं किया कि संविधान के कौन से अनुच्छेद मूल ढाँचे को बयान करते हैैं। खुद सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने किसी फैसले में यह स्पष्ट नहीं किया कि संविधान का मूल ढाँचा है क्या? संविधान के मूल ढाँचे की व्याख्या इसलिए भी आवश्यक है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक नियुक्ति आयोग संबंधी कानून को संविधान के मूल ढाँचे के विपरीत बताकर उसे खारिज तो कर दिया था, लेकिन जजों की नियुक्ति की वह कोलेजियम व्यवस्था बनाए रखी जो संविधान में है ही नहीं।

विपक्षी दलों को यह समझना मुश्किल हो रहा है कि वे मोदी सरकार के इस फ़ैसले का विरोध करें तो कैसे? उनके सामने मुश्किल इसलिए बढ़ गई है, क्योंकि अतीत में वे स्वयं आर्थिक आधार पर आरक्षण की पैरवी और माँग करते रहे हैं। विपक्षी दलों की इसी दुविधा के कारण, इस बात के प्रबल आसार हैं कि आर्थिक आधार पर 10 प्रतिशत आरक्षण संबंधी विधेयक पर संसद की मुहर लग जाएगी, लेकिन यह कहना कठिन है कि यह विधेयक कानून का रूप लेने के बाद होने वाली न्यायिक समीक्षा में खरा उतर पाएगा या नहीं? इस बारे में तमाम किंतु-परंतु हैं, क्योंकि इसके पहले आर्थिक आधार पर आरक्षण के तमाम फैसले सुप्रीम कोर्ट में ख़ारिज हो चुके हैं। पहले के कई फैसलों के कारण हमारा आशंकित होना लाज़मी है कि दस प्रतिशत आर्थिक आरक्षण के फैसले को अमली जामा पहनाया जा सकेगा या नहीं?

इस आशंका का समाधान भी मोदी सरकार ने पहले ही ख़ोज लिया है, वित्त मंत्री अरुण जेटली का कहना है कि अब तक ये इसलिए ख़ारिज होता रहा है क्योंकि संविधान में इसका प्रावधान ही नहीं किया गया था। इस बार संविधान में इसका प्रावधान किया गया है, इसलिए यह संविधान सम्मत है। उन्होंने ये भी स्पष्ट किया कि कोर्ट ने भी अपने फ़ैसले में ये साफ़ कर दिया था कि 50 प्रतिशत की आरक्षण सीमा केवल सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े लोगों के सन्दर्भ में थी।

इतना अवश्य है कि मोदी सरकार के इस फ़ैसले ने देश के राजनीतिक विमर्श को एक झटके में बदलने का काम किया है। जिसकी मोदी सरकार को सख़्त जरूरत थी। पिछले कुछ समय से, खासकर कर्नाटक विधानसभा चुनाव के बाद से मोदी सरकार के प्रति शिकायत और निराशा भरे विमर्श को बल मिलता दिख रहा था। आर्थिक आधार पर आरक्षण के फ़ैसले ने अचानक राजनीतिक विमर्श के तेवर व स्वर बदल दिए हैं।

आर्थिक आधार पर आरक्षण केवल अनारक्षित सामान्य वर्गों के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को राहत देने वाला ही नहीं है, बल्कि सामाजिक न्याय की अवधारणा को बल देने वाला भी है। यदि यह फ़ैसला अमल में आता है तो इससे एक लाभ यह भी होगा कि आरक्षण को घृणा की दृष्टि से देखने वालों की मानसिकता बदलेगी। स्पष्ट है कि यह फ़ैसला राजनीतिक ही नहीं, सामाजिक विमर्श में भी एक बड़ा बदलाव लाने का प्रमुख साधन है। अब इस सोच को बल मिलेगा कि सामाजिक और शैक्षणिक रूप से कमजोर लोगों के साथ ही आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए भी कुछ करने की जरूरत है। यह सोच अगड़े-पिछड़े की खाई को पाटने का काम करती नज़र आ रही है।

हो सकता है, आर्थिक आरक्षण के भावी कानून में कुछ कमजोरियाँ हों, अगर ऐसा कुछ सामने आता है तो उन्हें दूर किया जाएगा। लेकिन आरक्षण को आर्थिक आधार प्रदान करने की यह पहल, वह विचार है जिसे अमल में लाने का सही समय आ गया है। इसी के साथ यह भी समझना होगा कि संविधान लोगों के लिए होता है, लोग उसके लिए नहीं होते। इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि लोकतंत्र में लोग ही सर्वोच्च होते हैैं।

  सहयोग करें  

एनडीटीवी हो या 'द वायर', इन्हें कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

रवि अग्रहरि
अपने बारे में का बताएँ गुरु, बस बनारसी हूँ, इसी में महादेव की कृपा है! बाकी राजनीति, कला, इतिहास, संस्कृति, फ़िल्म, मनोविज्ञान से लेकर ज्ञान-विज्ञान की किसी भी नामचीन परम्परा का विशेषज्ञ नहीं हूँ!

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

जब भारत गुलाम था, तब हम स्वतंत्र थे: नेपाली राजदूत ने कहा- चीन नहीं, भारत ने हमारी जमीन पर किया कब्जा

भारत के बारे में नेपाली राजदूत ने कहा कि पड़ोसियों को पड़ोसियों से डरना नहीं चाहिए। उन्होंने तिब्बत, हॉन्गकॉन्ग और ताइवान को चीन का हिस्सा करार दिया।

‘नहीं हटना चाहिए मथुरा का शाही ईदगाह मस्जिद’ – कॉन्ग्रेस नेता ने की श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुक्ति याचिका की निंदा

कॉन्ग्रेस नेता महेश पाठक ने उस याचिका की निंदा की, जिसमें मथुरा कोर्ट से श्रीकृष्ण जन्मभूमि में अतिक्रमण से मुक्ति की माँग की गई है।

जिसने जसवंत सिंह को रुलाया, वो उन्हीं के नाम पर BJP-मोदी को कोस रहा: सुधींद्र कुलकर्णी की वरिष्ठ पत्रकार ने खोली पोल

सुधींद्र कुलकर्णी ने जसवंत सिंह के लिए आपत्तिजनक विशेषणों का इस्तेमाल करते हुए कहा था, "मूर्ख! आपको गिनती तक गिनने नहीं आती है।"

75 सालों से एक पेड़ के नीचे बच्चों को पढ़ाने वाले शिक्षक: नहीं लेते कोई सरकारी सहायता, देते हैं गीता का ज्ञान भी

ओडिशा के जाजपुर में नंदा प्रस्टी नामक एक ऐसे बुजुर्ग शिक्षक हैं, जो 75 वर्षों से क्षेत्र के बच्चों को शिक्षा दे रहे, बिना एक भी रुपया लिए।

भगत सिंह को उनके दादाजी ने जनेऊ संस्कार के समय ही दान कर दिया था… वो ऐलान, जिसे ‘शहीद’ ने जिंदगी भर निभाया

“मिस्टर मजिस्ट्रेट, आप भाग्यशाली हैं कि आपको यह देखने को मिल रहा। भारत के क्रांतिकारी किस तरह अपने आदर्शों के लिए फाँसी पर भी झूल जाते हैं।”

ट्रक में ट्रैक्टर लाया, सड़क पर पटक के जला डाला: कॉन्ग्रेसी नेताओं ने लगाए ‘भगत सिंह’ के नारे, देखें वीडियो

विरोध प्रदर्शन के नाम पर दिल्ली के इंडिया गेट पहुँचे पंजाब यूथ कॉन्ग्रेस के नेताओं ने एक ट्रैक्टर को पलट कर उसे आग के हवाले कर दिया।

प्रचलित ख़बरें

‘मुझे सोफे पर धकेला, पैंट खोली और… ‘: पुलिस को बताई अनुराग कश्यप की सारी करतूत

अनुराग कश्यप ने कब, क्या और कैसे किया, यह सब कुछ पायल घोष ने पुलिस को दी शिकायत में विस्तार से बताया है।

‘दीपिका के भीतर घुसे रणवीर’: गालियों पर हँसने वाले, यौन अपराध का मजाक बनाने वाले आज ऑफेंड क्यों हो रहे?

दीपिका पादुकोण महिलाओं को पड़ रही गालियों पर ठहाके लगा रही थीं। अनुष्का शर्मा के लिए यह 'गुड ह्यूमर' था। करण जौहर खुलेआम गालियाँ बक रहे थे। तब ऑफेंड नहीं हुए, तो अब क्यों?

बेच चुका हूँ सारे गहने, पत्नी और बेटे चला रहे हैं खर्चा-पानी: अनिल अंबानी ने लंदन हाईकोर्ट को बताया

मामला 2012 में रिलायंस कम्युनिकेशन को दिए गए 90 करोड़ डॉलर के ऋण से जुड़ा हुआ है, जिसके लिए अनिल अंबानी ने व्यक्तिगत गारंटी दी थी।

ड्रग्स स्कैंडल: रकुल प्रीत ने उगले 4 बड़े बॉलीवुड सितारों के नाम, करण जौह​र ने क्षितिज रवि से पल्ला झाड़ा

NCB आज दीपिका पादुकोण, सारा अली खान और श्रद्धा कपूर से पूछताछ करने वाली है। उससे पहले रकुल प्रीत ने क्षितिज का नाम लिया है, जो करण जौहर के करीबी बताए जाते हैं।

आजतक के कैमरे से नहीं बच पाएगी दीपिका: रिपब्लिक को ज्ञान दे राजदीप के इंडिया टुडे पर वही ‘सनसनी’

'आजतक' का एक पत्रकार कहता दिखता है, "हमारे कैमरों से नहीं बच पाएँगी दीपिका पादुकोण"। इसके बाद वह उनके फेस मास्क से लेकर कपड़ों तक पर टिप्पणी करने लगा।

एंबुलेंस से सप्लाई, गोवा में दीपिका की बॉडी डिटॉक्स: इनसाइडर ने खोल दिए बॉलीवुड ड्रग्स पार्टियों के सारे राज

दीपिका की फिल्म की शूटिंग के वक्त हुई पार्टी में क्या हुआ था? कौन सा बड़ा निर्माता-निर्देशक ड्रग्स पार्टी के लिए अपनी विला देता है? कौन सा स्टार पत्नी के साथ मिल ड्रग्स का धंधा करता है? जानें सब कुछ।

जब भारत गुलाम था, तब हम स्वतंत्र थे: नेपाली राजदूत ने कहा- चीन नहीं, भारत ने हमारी जमीन पर किया कब्जा

भारत के बारे में नेपाली राजदूत ने कहा कि पड़ोसियों को पड़ोसियों से डरना नहीं चाहिए। उन्होंने तिब्बत, हॉन्गकॉन्ग और ताइवान को चीन का हिस्सा करार दिया।

दूसरी महिला के साथ आपत्तिजनक हालत में पकड़े गए MP के स्पेशल DG, बीवी को बेरहमी से पीटा, Video वायरल

वीडियो में मध्य प्रदेश के स्पेशल डीजी पुरुषोत्तम शर्मा अपनी पत्नी प्रिया शर्मा के साथ बेरहमी से मारपीट करते देखे जा सकते हैं।

‘नहीं हटना चाहिए मथुरा का शाही ईदगाह मस्जिद’ – कॉन्ग्रेस नेता ने की श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुक्ति याचिका की निंदा

कॉन्ग्रेस नेता महेश पाठक ने उस याचिका की निंदा की, जिसमें मथुरा कोर्ट से श्रीकृष्ण जन्मभूमि में अतिक्रमण से मुक्ति की माँग की गई है।

अनिल अंबानी के खिलाफ चीन के 3 बैंको ने शुरू की कार्रवाई: 5276 करोड़ रुपए का है मामला

बैंक ने कहा है कि वह क्रॉस एग्जामिनेशन के जरिए अपने अधिकारों के बचाव हेतु हर कानूनी कार्रवाई करेंगे और अंबानी से अपना लोन वापस लेंगे।

जिसने जसवंत सिंह को रुलाया, वो उन्हीं के नाम पर BJP-मोदी को कोस रहा: सुधींद्र कुलकर्णी की वरिष्ठ पत्रकार ने खोली पोल

सुधींद्र कुलकर्णी ने जसवंत सिंह के लिए आपत्तिजनक विशेषणों का इस्तेमाल करते हुए कहा था, "मूर्ख! आपको गिनती तक गिनने नहीं आती है।"

नाम कफील लेकिन फेसबुक पर ‘करण’… लड़कियों को भेजता था अश्लील मैसेज, हुआ गिरफ्तार

वो खुद को जिम ट्रेनर बताता था। उसने फेसबुक पर करण नाम से फर्जी प्रोफाइल तैयार की थी और उसी से वह महिलाओं को अश्लील मैसेज भेजता था।

75 सालों से एक पेड़ के नीचे बच्चों को पढ़ाने वाले शिक्षक: नहीं लेते कोई सरकारी सहायता, देते हैं गीता का ज्ञान भी

ओडिशा के जाजपुर में नंदा प्रस्टी नामक एक ऐसे बुजुर्ग शिक्षक हैं, जो 75 वर्षों से क्षेत्र के बच्चों को शिक्षा दे रहे, बिना एक भी रुपया लिए।

‘मुझे गोली तो नहीं मारोगे बाबू जी’ – गुंडा नईम UP पुलिस के पैरों में गिर कर रोया, गले में एक तख्ती लटका किया...

"मुझे गोली तो नहीं मारोगे बाबू जी। मुझे गिरफ्तार कर लो, घर में मेरे छोटे-छोटे बच्चे हैं।" - नईम पर गोकशी, गैंगस्टर एक्ट में कई मामले दर्ज।

भगत सिंह को उनके दादाजी ने जनेऊ संस्कार के समय ही दान कर दिया था… वो ऐलान, जिसे ‘शहीद’ ने जिंदगी भर निभाया

“मिस्टर मजिस्ट्रेट, आप भाग्यशाली हैं कि आपको यह देखने को मिल रहा। भारत के क्रांतिकारी किस तरह अपने आदर्शों के लिए फाँसी पर भी झूल जाते हैं।”

ट्रक में ट्रैक्टर लाया, सड़क पर पटक के जला डाला: कॉन्ग्रेसी नेताओं ने लगाए ‘भगत सिंह’ के नारे, देखें वीडियो

विरोध प्रदर्शन के नाम पर दिल्ली के इंडिया गेट पहुँचे पंजाब यूथ कॉन्ग्रेस के नेताओं ने एक ट्रैक्टर को पलट कर उसे आग के हवाले कर दिया।

हमसे जुड़ें

264,935FansLike
78,070FollowersFollow
325,000SubscribersSubscribe
Advertisements